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Monday, July 6, 2020

जिस को क़रीब पाया उसी से


जिस को क़रीब पाया उसी से लिपट गए
सूरज ढला तो लोग क़बीलों में बट गए

वो गुल-परस्त जिन पे बहारों को नाज़ था
आई ख़िज़ाँ तो पा-ए-ख़िज़ाँ से लिपट गए

किस किस की मैं हुजूम में आँखें निकालता
अच्छा हुआ कि आप दरीचे से हट गए

जो क़हक़हे की जाँ से ज़ियादा अज़ीज़ थे
ज़िंदा-दिली के नाम पे कल वो भी बट गए

ठिठुरे हुए बदन को हरारत न मिल सकी
छत पर चढ़े तो धूप के साए सिमट गए

जिन हौसलों पे कोह-ए-गिराँ का गुमान था
आँधी चली तो सैकड़ों हिस्सों में बट गए
*कोह-ए-गिराँ=भारी पहाड़
 
~ सुल्तान अख़्तर

Jul 06, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Wednesday, January 17, 2018

मैं वो सहरा जिसे

मैं वो सहरा जिसे
पानी की हवस ले डूबी,
तू वो बादल जो कभी
टूट के बरसा ही नहीं।
*सहरा=रेगिस्तान, जंगल
~ सुल्तान अख़्तर

  Jan 17, 2018| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh