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Wednesday, April 5, 2017

वर्षा से धुल कर निखर

Image may contain: 2 people, grass, plant, outdoor and nature

वर्षा से धुल कर निखर उठा नीला-नीला
फिर हरे-हरे खेतों पर छाया आसमान,
उजली कुँआर की धूप अकेली पड़ी हार में,
लौटे इस बेला सब अपने घर किसान।

पागुर करती छाहीं में,
कुछ गम्भीर अध-खुली आँखों से,
बैठी गायें करती विचार,
सूनेपन का मधु-गीत आम की डाली में,
गाती जातीं भिन्न कर ममाखियाँ लगातार।

भरे रहे मकाई ज्वार बाजरे के दाने,
चुगती चिड़ियाँ पेड़ों पर बैठीं झूल-झूल,
पीले कनेर के फूल सुनहले फूले पीले,
लाल-लाल झाड़ी कनेर की, लाल फूल।

बिकसी फूटें, पकती कचेलियाँ बेलों में,
ढो ले आती ठंडी बयार सोंधी सुगन्ध,
अन्तस्तल में फिर पैठ खोलती मनोभवन के,
वर्ष-वर्ष से सुधि के भूले द्वार बन्द।

तब वर्षों के उस पार दीखता, खेल रहा वह,
खेल-खेल में मिटा चुका है जिसे काल,
बीते वर्षों का मैं, जिसको है ढँके हुए
गाढ़े वर्षों की छायाओं का तन्तु-जाल।

देखती उसे तब अपलक आँखें, रह जाती

~ रामविलास शर्मा


  Apr 3, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Thursday, April 30, 2015

चाँदनी...!



चाँदी की झीनी चादर-सी
फैली है वन पर चाँदनी,
चाँदी का झूठा पानी है
यह माह-पूस की चाँदनी ।

खेतों पर ओस-भरा कुहरा,
कुहरे पर भीगी चाँदनी,
आँखों में बादल-से आँसू,
हँसती है उन पर चाँदनी ।

दुख की दुनिया पर बुनती है
माया के सपने चाँदनी,
मीठी  मुसकान बिछाती है
भीगी पलकों पर चाँदनी ।

लोहे की हथकड़ियों-सा दुख,
सपनों-सी झूठी चाँदनी,
लोहे से दुख को काटे क्या
सपनों-सी मीठी चाँदनी ।

यह चाँद चुरा कर लाया है
सूरज से अपनी चाँदनी,
सूरज निकला, अब चाँद कहाँ ?
छिप गयी लाज से चाँदनी ।

दुख और कर्म का यह जीवन,
वह चार दिनों की चाँदनी,
यह कर्म-सूर्य की ज्योति अमर,
वह अन्धकार की चाँदनी ।

~ रामविलास शर्मा

  Apr 30, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh