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Friday, April 26, 2019

मुझे जाना है

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मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर
अभी फिर दर्द टपकेगा मिरी आवाज़ से आख़िर
अभी फिर आग उट्ठेगी शिकस्ता साज़ से आख़िर
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*बज़्म-ए-नाज़=शोख़ महफिल; शिकस्ता=टूटे हुए

अभी तो हुस्न के पैरों पे है जब्र-ए-हिना-बंदी
अभी है इश्क़ पर आईन-ए-फ़र्सूदा की पाबंदी
अभी हावी है अक़्ल ओ रूह पर झूटी ख़ुदावंदी
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*जब्र=मजबूरी; आईन-ए-फ़र्सूदा=पुराना आईना

अभी तहज़ीब-ए-अदल-ओ-हक़ की कश्ती खे नहीं सकती
अभी ये ज़िंदगी दाद-ए-सदाक़त दे नहीं सकती
अभी इंसानियत दौलत से टक्कर ले नहीं सकती
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*तहज़ीब-ए-अदल-ओ-हक़=सभ्यता, न्याय और सच; दाद-ए-सदाक़त=सच की तारीफ़

अभी तो काएनात औहाम का इक कार-ख़ाना है
अभी धोका हक़ीक़त है हक़ीक़त इक फ़साना है
अभी तो ज़िंदगी को ज़िंदगी कर के दिखाना है
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*काएनात-सृष्टि; औहाम=धोखा

अभी हैं शहर की तारीक गलियाँ मुंतज़िर मेरी
अभी है इक हसीं तहरीक-ए-तूफ़ाँ मुंतज़िर मेरी
अभी शायद है इक ज़ंजीर-ए-ज़िंदाँ मुंतज़िर मेरी
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*तारीक=अंधेरी; मुंतज़िर=प्रतीक्षा-रत; तहरीक-ए-तूफाँ=तूफान का शुरू होना; ज़न्हजीर-ज़िंदाँ=क़ैद खाने की ज़ंजीर

अभी तो फ़ाक़ा-कश इंसान से आँखें मिलाना है
अभी झुलसे हुए चेहरों पे अश्क-ए-ख़ूँ बहाना है
अभी पामाल-ए-जौर आदम को सीने से लगाना है
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*फ़ाक़ा-कश=भूखे; पामाल-ए-ज़ौर=अन्याय से पीड़ित

अभी हर दुश्मन-ए-नज़्म-ए-कुहन के गीत गाना है
अभी हर लश्कर-ए-ज़ुल्मत-शिकन के गीत गाना है
अभी ख़ुद सरफ़रोशान-ए-वतन के गीत गाना है
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*दुश्मन-ए-नज़्म-ए-कुहन=पुराने गीतों का बैरी; लश्कर=सेना; सरफ़रोशान-ए-वतन=देश के लिए जान देने का जज़्बा

कोई दम में हयात-ए-नौ का फिर परचम उठाता हूँ
ब-ईमा-ए-हमिय्यत जान की बाज़ी लगाता हूँ
मैं जाऊँगा मैं जाऊँगा मैं जाता हूँ में जाता हूँ
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*हयात-ए-नौ=नया जीवन; परचम=झंडा; ब-ईमा-ए-हमिय्यत=जो पावन है, और रक्षा करने योग्य है

~ असरार-उल-हक़ मजाज़


 Apr 26, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, January 23, 2016

तस्कीन-ए-दिल-ए-महज़ूँ न हुई

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तस्कीन-ए-दिल-ए-महज़ूँ न हुई वो सई-ए-करम फ़रमा भी गए,
इस सई-ए-करम को क्या कहिए बहला भी गए तड़पा भी गए।
*तस्कीन-ए-दिल-ए-महज़ू=दुखी/ व्यथित दिल को आराम; सई=कोशिश; करम=कृपा

हम अर्ज़-ए-वफ़ा भी कर न सके, कुछ कह न सके कुछ सुन न सके,
यां हम ने ज़बाँ ही खोली थी, वां आँख झुकी शर्मा भी गए।

*अर्ज़-ए-वफ़ा=वादा पूरा करने का निवेदन

अशुफ्तगी-ए-वहशत की कसम, हैरत की कसम, हसरत की कसम,
अब आप कहे कुछ या न कहे हम राज़-ए-तबस्सुम पा भी गए।

*अशुफ्तगी-ए-वहशत = दीवानगी की घबराहट; राज़-ए-तबस्सुम=मुस्कराहट का रहस्य

रुदाद-ए-गम-ए-उल्फत उन से, हम क्या कहते क्यूँकर कहते,
एक हर्फ़ न निकला होटों से और आँख में आंसूं आ भी गए।

*रुदाद-ए-गम-ए-उल्फत=प्यार के दर्द की कहानी; हर्फ़=शब्द

अरबाब-ए-जुनूँ पे फुरकत में, अब क्या कहिये क्या क्या गुजरा,
आये थे सवाद-ए-उल्फत में, कुछ खो भी गए कुछ पा भी गए।

*अरबाब-ए-जुनूँ=उन्माद की अवस्था में; फुरकत=जुदाई; सवाद-ए-उल्फत=प्यार की गली

ये रंग-ए-बहार-ए-आलम है, क्या फिक्र है तुझ को ऐ साकी,
महफ़िल तो तेरी सूनी न हुई, कुछ उठ भी गए कुछ आ भी गए।

इस महफ़िल-ए-कैफ-ओ-मस्ती में इस अंजुमन-ए-इरफानी में,
सब ज़ाम-ब-क़फ बैठे ही रहे हम पी भी गए छलका भी गए।

*महफ़िल-ए-कैफ-ओ-मस्ती=ख़ुशी और आनंद की महफ़िल; अंजुमन-ए-इरफानी=ज्ञानियों की सभा; ज़ाम-ब-क़फ=जाम हाथ में लेकर बैठना

~ असरार-उल-हक़ मजाज़


  Jan 22, 2016| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Friday, June 5, 2015

रोएँ न अभी अहल-ए-नज़र

रोएँ न अभी अहल-ए-नज़र हाल पे मेरे
होना है अभी मुझ को ख़राब और ज़ियादा

*अहल-ए-नज़र=नज़र रखने वाले

~ मजाज़ लखनवी

  Jun 05, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Sunday, April 5, 2015

हुस्न को बेहिजाब होना था



हुस्न को बेहिजाब होना था
शौक़ को कामयाब होना था

हिज्र में कैफ़-ए-इज़्तिराब न पूछो
ख़ून-ए-दिल भी शराब होना था।

तेरे जलवों में घिर गया आख़िर
ज़र्रे को आफ़ताब होना था।

कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी
कुछ मुझे भी ख़राब होना था।

~ मजाज़ ‘लखनवी'


   Apr 5, 2012| e-kavya.blogspot.com
   Submitted by: Ashok Singh