Disable Copy Text

Monday, December 14, 2015

तू मेरे शौक़ की शिद्दत पे हैराँ

तू मेरे शौक़ की शिद्दत पे हैराँ
मैं तेरे क़र्ब की लज़्ज़त में गुम हूँ
हम इस पल में हैं दोनों क़ाबिले दीद
तुझे देखूँ या तुझको देखने दूँ

*शिद्दत=उग्रता; क़र्ब=यातना; लज़्ज़त=स्वाद

~ अहमद नसीम क़ासमी

  Dec 14, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ऐश की छाँव हो या ग़म की धूप

ऐश की छाँव हो या ग़म की धूप
ज़िन्दगी को कहीं पनाह नहीं
एक वीरान राह है दुनिया
जिसपे कोई क़यामगाह नहीं।

*क़यामगाह=विश्राम-गृह

~ अहकर काशीपुरी


  Dec 13, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Saturday, December 12, 2015

साक़ी ग़म-ए-दुनिया से

साक़ी ग़म-ए-दुनिया से हज़ार जाम पिला
मरने का नहीं मुझको ख़तर जाम पिला
जीने की दुआएं तो बुज़ुर्गों से मिलीं
ले वो भी तेरी नज़्र मगर जाम पिला।

~ अर्श मल्सियानी

  Dec 12, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

वादियाँ-वादियाँ, रास्ते-रास्ते



वादियाँ-वादियाँ, रास्ते-रास्ते
मारे मारे फिरे हम तेरे वास्ते।

आबशारों से पूछा कहाँ हैं सनम
और नज़ारों के जा जा के, पकड़े क़दम
इन बहारों ने फ़रमाया, क्या जाने हम
खा रहा है हमें अब, जुदाई का ग़म।
छाले पड़ते गए भागते-भागते।

*आबशारों=झरने

मचली जाएँ लटें, लिपटी जाए हवा
जलता जाए बदन, रोती जाए वफ़ा
बेवफ़ा मत सता, मिल भी जा - आ भी जा
कि ख़ता क्या बता, क्यों ये दे दी सज़ा।
आँखें पथरा गईं जागते-जागते।

~ नूर देवासी


  Dec 12, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Friday, December 11, 2015

क्यूँकि फ़र्बा न नज़र आवे

क्यूँकि फ़र्बा न नज़र आवे तिरी ज़ुल्फ़ की लट
जोंक सी ये तो मिरा ख़ून ही पी जाती है

*फ़र्बा=हरी-भरी, सेहतमंद 

~ मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

  Dec 11, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ग़ायब बहुत ऐ जाने-जहाँ

ग़ायब बहुत ऐ जाने-जहाँ रहते हो
मानिन्द नज़र हमसे निहाँ रहते हो
हर चंद कि आँखों में हो, दिल में हो तुम
मालूम नहीं पर कि कहाँ रहते हो।

*मानिन्द=जैसे; निहाँ=छुपे हुये; हर चंद=हर समय

~ अमीर मीनाई लखनवी

  Dec 10, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

काश इक रोज़ तेरे तेरे कूचे में

काश इक रोज़ तेरे तेरे कूचे में
यूँ गिरूँ लड़खड़ा के मस्त-ओ-ख़राब
तू ये पूछे किसी से कौन है यह
और क्यों पी गया है इतनी शराब।

*मस्त-ओ-ख़राब=(शराब) पिया हुआ

~ अब्दुल हमीद अदम

  Dec 9, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

हो मुबारक हुज़ूर को गांधी

एक कटाक्ष गांधी-वादी, प्रतिरोध रहित, एक तरफ़ा लड़ाई पर:

हो मुबारक हुज़ूर को गांधी,
ऐसे दुश्मन नसीब हों किसको?
कि पिटें खूब और सर न उठाएँ
और खिसक जाएँ जब कहो खिसको।

~ अकबर इलाहाबादी

  Dec 8, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

अपनी हालत छुपाए जाता हूँ

अपनी हालत छुपाए जाता हूँ
बे-महल मुस्कराये जाता हूँ
ख़ुद हूँ महज़ूं मगर ज़माने को
बेतहाशा हँसाऐ जाता हूँ।

*बे-महल=बेमौका; महज़ूं=शोकाकुल

~ ख़ुमार बाराबंकवी

  Dec 7, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

सीपियाँ खुल गईं तुम्हें छू कर

सीपियाँ खुल गईं तुम्हें छू कर
धूप शीतल हुई तुम्हें छू कर
तुम जो निकली हो रात में बाहर
चाँदनी जल गई तुम्हें छू कर।

~ कुमार शिव

  Dec 6, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

उनका कलम उन्हें लौटाया - धन्यवाद



उनका कलम उन्हें लौटाया - धन्यवाद जी !
पत्र लिखा तो उत्तर आया - धन्यवाद जी !
छायावाद, रहस्यवाद तो बहुत सुने थे,
किंतु कहां से आ टपका यह धन्यवाद जी !

पत्नीवाद मान लेने से गदगद औरत,
पूंजीवाद पकड़ लेने से मिलती दौलत !
सत्य, अहिंसा, सदाचार को मारो गोली,
गांधीवादी को मिल जाती इनसे मोहलत।

मार्क्सवाद के हो-हल्ले में,
नाम-धाम तो हो जाता है।
लेकिन कोरे धन्यवाद में,
क्या जाता है, क्या आता है ?

भेजा - नहीं रसीद पहुंच की
आया - फाइल करें कहां पर ?
धन्यवाद धोबी का कुत्ता -
घर से घाट, घाट से फिर घर।

चला यहां से, गया वहां को,
वहां न पहुंचा, गया कहां फिर ?
घूम रहा है मारा-मारा,
धन्यवाद है नेता का सिर।

नेताजी भाषण देते हैं,
लालाजी पहनाते माला,
संयोजक ने पूरा डिब्बा
मक्खन का खाली कर डाला।

लेकिन जनता बिगड़ उठी है -
इसे उतारो, उसे लाद दो।
मटरूमल जी जल्दी आओ,
खत्म करो अब धन्यवाद दो !

धन्यवाद है या कि मुसीबत ?
बला आगई, इसको टालो।
जिसका भाषण नहीं कराना,
उससे धन्यवाद दिलवा लो।

अयशपाल जी धन्यवाद का -
भाषण देने खड़े हुए हैं।
लोग उठ गए, नेता गायब,
वह माइक पर अड़े हुए हैं।

धन्यवाद है या पत्थर है ?
आए हो तो खाना होगा।
माला भले नहीं ले जाओ
धन्यवाद ले जाना होगा !

धन्यवाद ऐसी गाली है,
देकर इसे लेख लौटा दो।
धन्यवाद उल्लू का पट्ठा -
खड़ा रहेगा, भले लिटा दो।

नाक काटकर उसे उढ़ा दो
धन्यवाद वह दोशाला है।
पाकर हाथ जोड़ने पड़ते,
ठंडी कॉफी का प्याला है।

~ गोपाल प्रसाद व्यास


  Dec 6, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

छिः, छिः, लज्जा-शरम नाम को



छिः, छिः, लज्जा-शरम नाम को भी न गई रह हाय,
औचक चूम लिया मुख जब मैं दूह रही थी गाय।

लोट गई धरती पर अब की उलर फूल की डार,
अबकी शील सँभल नहीं सकता यौवन का भार।
दोनों हाथ फँसे थे मेरे, क्या करती मैं हाय?
औचक चूम लिया मुख जब मैं दूह रही थी गाय।

पीछे आकर खड़ा हुआ, मैंने न दिया कुछ ध्यान,
लगी साँस श्रुति पर, सहसा झनझना उठे मन-प्राण।
किन हाथों से उसे रोकती, मैं तो थी निरुपाय
औचक चूम लिया मुख जब मैं दूह रही थी गाय।

कर थे कर्म-निरत, केवल मन ही था कहीं विभोर,
मैं क्या थी जानती, छिपा है यहीं कहीं चितचोर?
मैंने था कब कहा उसे छूने को अपना काय,
औचक चूम लिया मुख जब मैं दूह रही थी गाय।

~ रामधारी सिंह 'दिनकर'
(Original poem - Alfred Tennyson)


  Dec 5, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

आओ कि आज ग़ौर करें

आओ कि आज ग़ौर करें इस सवाल पर
देखे थे हमने जो, वो ख़्वाब क्या हुए

*ग़ौर=ध्यान

~ साहिर लुधियानवी

  Dec 4, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

भटकते पाँवों को राहों की ज़रूरत

भटकते पाँवों को राहों की ज़रूरत होगी
तसव्वुरात को बाहों की ज़रूरत होगी
तेरे मासूम ख़यालों की क़सम तुझको भी
उम्र के साथ गुनाहों की ज़रूरत होगी।

*तसव्वुरात=कल्पनाओं, ख़यालों

~ किशन सरोज

  Dec 4, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

क्या इनका कोई अर्थ नहीं?




ये शामें, सब की शामें …
जिनमें मैंने घबरा कर तुमको याद किया
जिनमें प्यासी सीपी-सा भटका विकल हिया
जाने किस आने वाले की प्रत्याशा में

ये शामें,
क्या इनका कोई अर्थ नहीं ?

वे लमहें
वे सूनेपन के लमहें
जब मैनें अपनी परछाई से बातें की
दुख से वे सारी वीणाएं फेकीं
जिनमें अब कोई भी स्वर न रहे

वे लमहें,
क्या इनका कोई अर्थ नहीं ?

वे घड़ियां, वे बेहद भारी-भारी घड़ियां
जब मुझको फिर एहसास हुआ
अर्पित होने के अतिरिक्त कोई राह नहीं
जब मैंने झुककर फिर माथे से पंथ छुआ
फिर बीनी गत-पाग-नूपुर की मणियां

वे घड़ियां,
क्या इनका कोई अर्थ नहीं ?

ये घड़ियां, ये शामें, ये लमहें
जो मन पर कोहरे से जमे रहे
निर्मित होने के क्रम में

क्या इनका कोई अर्थ नहीं ?

जाने क्यों कोई मुझसे कहता
मन में कुछ ऐसा भी रहता
जिसको छू लेने वाली हर पीड़ा
जीवन में फिर जाती व्यर्थ नहीं

अर्पित है पूजा के फूलों-सा जिसका मन
अनजाने दुख कर जाता उसका परिमार्जन
अपने से बाहर की व्यापक सच्चाई को
नत-मस्तक होकर वह कर लेता सहज ग्रहण

वे सब बन जाते पूजा गीतों की कड़ियां
यह पीड़ा, यह कुण्ठा, ये शामें, ये घड़ियां

इनमें से क्या है,
जिनका कोई अर्थ नहीं !

कुछ भी तो व्यर्थ नहीं !!!

~ धर्मवीर भारती


  Dec 4, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

रूप की चाँदनी में नहाता रहा

रूप की चाँदनी में नहाता रहा
वो तिमिर में कहीं जगमगाता रहा,
प्यार की उँगलियों से ज़रा छू लिया
देर तक आईना गुनगुनाता रहा।

~ कुँवर बेचैन

  Dec 3, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

प्राण पत्थर थे, अब फूलमाला हुये

प्राण पत्थर थे, अब फूलमाला हुये
हम अँधेरों में हँसता उजाला हुये
प्रीति के रंग ने जब हमें रंग दिया
हम स्वयं प्यार की रंगशाला हुये।

*रंगशाला=रंगभूमि, खेलने का घर

~ कुँवर बेचैन

  Dec 2, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

दिवस का अंत आया, पर..



दिवस का अंत आया, पर डगर का अंत कब आया?

थका सूरज, प्रतीची की सजीली गोद में सोया,
किसी से नीड़ में बिछुडा हुआ पंछी मिला, खोया;
मगर मैं हूं कि सूनी राह पर चुपचाप चलता हूं
थके पग, पर परिश्रम के प्रहर का अंत कब आया?

लिये प्रतिबिंब कूलों का, अंधेरे में नदी सोई,
भ्रमर के प्यार की तड़पन कमल के अंक में खोई!
थकी लहरें हुईं खामोश गिर कर के किनारों पर,
दृगों में किंतु आंसू की लहर का अंत कब आया?

पवन ने पी लिया आसव कुमुद की स्निग्ध पाखों का।
किसी ने भी न पोंछा नीर मेरी क्षुब्ध आंखों का
तिमिर का विष गई पी रात, चांदी के कटोरे से
मगर मेरी निराशा के ज़हर का अंत कब आया?

*प्रतीची=पश्चिम; कूलों=किनारों; आसव=रस; स्निग्ध=चिकनी

~ गोरख नाथ


  Dec 2, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

लाख हम शेर कहें

लाख हम शेर कहें लाख इबारत लिक्खे,
बात वो है जो तिरे दिल में जगह पाती है।

~ मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

  Dec 1, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

खैर खून खांसी खुशी

खैर खून खांसी खुशी बैर प्रीत मधुपान
रहिमन दाबे न दबे जानत सकल जहान

*खैर=सेहत; खून=कत्ल; बैर=दुश्मनी

~ रहीम

  Dec 1, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

अफ़लाक तक औरों की फुगाँ

अफ़लाक तक औरों की फुगाँ जा पहुँची
जो चीज़ यहाँ की थी वहाँ जा पहुँची
तू ख़्वाब की जन्नत को सजाता ही रहा
दुनिया को ज़रा देखो कहाँ जा पहुँची।

* अफ़लाक=आकाश; फुगाँ=आवाज़

~ कादिर सिद्दीक़ी

  Nov 30, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

महकी हुई गुफ्तार में फूलों का

महकी हुई गुफ्तार में फूलों का तबस्सुम
बहकी हुई रफ्तार में झोकों की रवानी
मुमकिन है ख़िजाओं का तसव्वुर ही बदल दे
ऐ जाने - बहाराँ तेरी गुलपोश जवानी।

*गुफ्तार=बात चीत करने का ढंग, तौर-तरीका; तसव्वुर=कल्पना; गुलपोश=फूलों (जैसी)

~ क़तील शिफ़ाई

  Nov 29, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

सत्य का जिसके हृदय में



सत्य का जिसके हृदय में प्यार हो,
एक पथ, बलि के लिए तैयार हो ।

फूँक दे सोचे बिना संसार को,
तोड़ दे मँझधार जा पतवार को ।

कुछ नई पैदा रगों में जाँ करे,
कुछ अजब पैदा नया तूफाँ करे।

हाँ, नईं दुनिया गढ़े अपने लिए,
रैन-दिन जागे मधुर सपने लिए ।

बे-सरो-सामाँ रहे, कुछ गम नहीं,
कुछ नहीं जिसको, उसे कुछ कम नहीं ।

प्रेम का सौदा बड़ा अनमोल रे !
निःस्व हो, यह मोह-बन्धन खोल रे !

मिल गया तो प्राण में रस घोल रे !
पी चुका तो मूक हो, मत बोल रे !

प्रेम का भी क्या मनोरम देश है !
जी उठा, जिसकी जलन निःशेष है ।

जल गए जो-जो लिपट अंगार से,
चाँद बन वे ही उगे फिर क्षार से ।

प्रेम की दुनिया बड़ी ऊँची बसी,
चढ़ सका आकाश पर विरला यशी।

हाँ, शिरिष के तन्तु का सोपान है,
भार का पन्थी ! तुम्हें कुछ ज्ञान है ?

है तुम्हें पाथेय का कुछ ध्यान भी ?
साथ जलने का लिया सामान भी ?

बिन मिटे, जल-जल बिना हलका बने,
एक पद रखना कठिन है सामने ।

प्रेम का उन्माद जिन-जिन को चढ़ा,
मिट गए उतना, नशा जितना बढ़ा ।

मर-मिटो, यह प्रेम का शृंगार है।
बेखुदी इस देश में त्योहार है ।

खोजते -ही-खोजते जो खो गया,
चाह थी जिसकी, वही खुद हो गया।

जानती अन्तर्जलन क्या कर नहीं ?
दाह से आराध्य भी सुन्दर नहीं ।

‘प्रेम की जय’ बोल पग-पग पर मिटो,
भय नहीं, आराध्य के मग पर मिटो ।

हाँ, मजा तब है कि हिम रह-रह गले,
वेदना हर गाँठ पर धीरे जले।

एक दिन धधको नहीं, तिल-तिल जलो,
नित्य कुछ मिटते हुए बढ़ते चलो ।

पूर्णता पर आ चुका जब नाश हो,
जान लो, आराध्य के तुम पास हो।

आग से मालिन्य जब धुल जायगा,
एक दिन परदा स्वयं खुल जायगा।

आह! अब भी तो न जग को ज्ञान है,
प्रेम को समझे हुए आसान है ।

फूल जो खिलता प्रल्य की गोद में,
ढूँढ़ते फिरते उसे हम मोद में ।

बिन बिंधे कलियाँ हुई हिय-हार क्या?
कर सका कोई सुखी हो प्यार क्या?

प्रेम-रस पीकर जिया जाता नहीं ।
प्यार भी जीकर किया जाता कहीं?

मिल सके निज को मिटा जो राख में,
वीर ऐसा एक कोई लाख में।

भेंट में जीवन नहीं तो क्या दिया ?
प्यार दिल से ही किया तो क्या किया ?

चाहिए उर-साथ जीवन-दान भी,
प्रेम की टीका सरल बलिदान ही।

~ रामधारी सिंह 'दिनकर'


  Nov 29, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

जब कभी साक़ी-ए-मदहोश




जब कभी साक़ी-ए-मदहोश की याद आती है
नशा बन कर मेरी रग-रग में समा जाती है।

डर ये है टूट ना जाए कहीं मेरी तौबा
चार जानिब से घटा घिर के चली आती है।
*जानिब=ओर

जब कभी ज़ीस्त पे और आप पे जाती है नज़र
याद गुज़रे हुए ख़ैय्याम की आ जाती है।
*ज़ीस्त=ज़िंदगी; ख़य्याम=उमर ख़य्याम-फ़ारसी के प्रसिद्द कवि

मुसकुराती है कली, फूल हँसे पड़ते हैं
मेरे महबूब का पैग़ाम सबा लाती है।
*सबा=हवा

दूर के ढोल तो होते हैं सुहाने ‘दर्शन’
दूर से कितनी हसीन बर्क़ नज़र आती है।
*बर्क़=बिजली, तड़ित

~ संत दर्शन सिंह



  Nov 28, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh


Ghulam Ali sahab, Jab kabhi saki e madhosh....
https://www.youtube.com/watch?v=4MXi3IYE6nA

आकाश के फूलों से न श्रृंगार करो

आकाश के फूलों से न श्रृंगार करो
तुम स्वर्ग नहीं भू को नमस्कार करो
भगवान को दिन रात रिझाने वालों,
उस के बंदों से भी कुछ प्यार करो।

~ उदय भानु 'हंस'

  Nov 27, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

सुरमई शाम के उजालों से



सुरमई शाम के उजालों से, जब भी सज-धज के रात आती है
बेवफ़ा, बेरहम, ओ बेदर्दी, जाने क्यों तेरी याद आती है।

इस जवानी ने क्या सज़ा पाई, रेशमी सेज हाय तनहाई,
शोख़ जज़्बात ले हैं अँगड़ाई,आँखें बोझल हैं नींद हरजाई,
तेरी तस्वीर तेरी परछाईं दे, के आवाज़ फिर बुलाती है।

आज भी लम्हे वो मोहब्बत के गर्म साँसों से लिपटे रहते हैं,
अब भी अरमान तेरी चाहत के महकी ज़ुल्फ़ों में सिमटे रहते हैं,
तुझको भूलें तो कैसे भूलें हम, बस यही सोच अब सताती है।

वो भी क्या दिन थे जब कि हम दोनों, मरने-जीने का वादा करते थे
जाम हो ज़हर का कि अमृत का, साथ पीने का वादा करते थे।
ये भी क्या दिन हैं क्या क़यामत है ग़म तो ग़म है ख़ुशी भी खाती है।

~ नूर देवासी


  Nov 26, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

यौवन के समय प्रेम की क्या बात

यौवन के समय प्रेम की क्या बात न हो,
क्या दिन ही रहे हमेशा, कभी रात न हो,
संभव भी कहीं है यह भला सोच के देखो
सावन का महीना हो, पर बरसात न हो।

~ उदय भानु 'हंस'

  Nov 25, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

हम बलाएँ लिया करें उनकी



हम बलाएँ लिया करें उनकी, और हम पर बलाएँ वे लाएँ
है यही ठीक तो कहें किससे करें क्या चैन किस तरह पाएँ
किस तरह रंग में रंगें उनको, आह को कौन ढंग सिखलाएँ
जो पसीजे न आंसुओं से वे, क्यों कलेजा निकाल दिखलाएँ।

~ अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरीऔध'


  Nov 24, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ज़िंदगी से गिराँ जवानी है



ज़िंदगी से गिराँ जवानी है
रहम अपने पे खाइये 'कैफ़ी'
देखकर अब कहीं घना साया
आप भी बैठ जाइए 'कैफ़ी'।

*गिराँ= भारी, क़ीमती

~ कैफ़ी आज़मी

  Nov 23, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ज़िन्दगी ये तो नहीं, तुझको...

ज़िन्दगी ये तो नहीं, तुझको सँवारा ही न हो
कुछ न कुछ हमने तिरा क़र्ज़ उतारा ही न हो
शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ
न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो

~ जाँ निसार अख़्तर

  Nov 22, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

हर दर्पन तेरा दर्पन है!


Image may contain: 1 person

हर दर्पन तेरा दर्पन है, हर चितवन तेरी चितवन है,
मैं किसी नयन का नीर बनूँ, तुझको ही अर्घ्य चढ़ाता हूँ !

नभ की बिंदिया चन्दावाली, भू की अंगिया फूलोंवाली,
सावन की ऋतु झूलोंवाली, फागुन की ऋतु भूलोंवाली,
कजरारी पलकें शरमीली, निंदियारी अलकें उरझीली,
गीतोंवाली गोरी ऊषा, सुधियोंवाली संध्या काली,
हर चूनर तेरी चूनर है, हर चादर तेरी चादर है,
मैं कोई घूँघट छुऊँ, तुझे ही बेपरदा कर आता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!

यह कलियों की आनाकानी, यह अलियों की छीनाछोरी,
यह बादल की बूँदाबाँदी, यह बिजली की चोराचारी,
यह काजल का जादू-टोना, यह पायल का शादी-गौना,
यह कोयल की कानाफूँसी, यह मैना की सीनाज़ोरी,
हर क्रीड़ा तेरी क्रीड़ा है, हर पीड़ा तेरी पीड़ा है,
मैं कोई खेलूँ खेल, दाँव तेरे ही साथ लगाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!

तपसिन कुटियाँ, बैरिन बगियाँ, निर्धन खंडहर, धनवान महल,
शौकीन सड़क, गमग़ीन गली, टेढ़े-मेढ़े गढ़, गेह सरल,
रोते दर, हँसती दीवारें नीची छत, ऊँची मीनारें,
मरघट की बूढ़ी नीरवता, मेलों की क्वाँरी चहल-पहल,
हर देहरी तेरी देहरी है, हर खिड़की तेरी खिड़की है,
मैं किसी भवन को नमन करूँ, तुझको ही शीश झुकाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!

पानी का स्वर रिमझिम-रिमझिम, माटी का रव रुनझुन-रुनझुन,
बातून जनम की कुनुनमुनुन, खामोश मरण की गुपुनचुपुन,
नटखट बचपन की चलाचली, लाचार बुढ़ापे की थमथम,
दुख का तीखा-तीखा क्रन्दन, सुख का मीठा-मीठा गुंजन,
हर वाणी तेरी वाणी है, हर वीणा तेरी वीणा है,
मैं कोई छेड़ूँ तान, तुझे ही बस आवाज़ लगाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!

काले तन या गोरे तन की, मैले मन या उजले मन की,
चाँदी-सोने या चन्दन की, औगुन-गुन की या निर्गुन की,
पावन हो या कि अपावन हो, भावन हो या कि अभावन हो,
पूरब की हो या पश्चिम की, उत्तर की हो या दक्खिन की,
हर मूरत तेरी मूरत है, हर सूरत तेरी सूरत है,
मैं चाहे जिसकी माँग भरूँ, तेरा ही ब्याह रचाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है!!

~ गोपालदास नीरज


  Nov 21, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

मँझधार से बचने के सहारे

मँझधार से बचने के सहारे नहीं होते
दुर्दिन में कभी चाँद सितारे नहीं होते
हम पार भी जाएँ तो भला जाएँ किधर से
इस प्रेम की सरिता के किनारे नहीं होते।

~ उदय भानु 'हंस'

  Nov 20, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

मुहब्बत ख़ुद-ब-ख़ुद इक रोज़

मुहब्बत ख़ुद-ब-ख़ुद इक रोज़ दिल का साज़ बन जाती
अगर दिल की हर इक धड़कन, तेरी आवाज़ बन जाती
सदा पी की, पपीहा काश इस अंदाज़ में देता
कि मुझ तक आते-आते वो तेरी आवाज़ बन जाती।

~ एकता शबनम

  Nov 19, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

किताबें झाँकती हैं



किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है
जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके
जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं
कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़
जिनपर अब कोई मानी नहीं उगते
जबां पर जो ज़ायका आता था जो सफ़ा पलटने का
अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे!!

~ गुलज़ार


  Nov 19, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

सारे प्रश्नों के हल नहीं होते

सारे प्रश्नों के हल नहीं होते
हर समय सुख के पल नहीं होते
मुझको पत्थर दिखा के क्या लोगे
सूखे पेड़ों में फल नहीं होते,

~ उर्मिलेश शंखधर

  Nov 18, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ख़्वाब की तरह से है याद



ख़्वाब की तरह से है याद कि तुम आए थे
जिस तरह दामन-ए-मश्रिक़ में सहर होती है
ज़र्रे ज़र्रे को तजल्ली की ख़बर होती है
और जब नूर का सैलाब गुज़र जाता है
रात भर एक अंधेरे में बसर होती है
कुछ इसी तरह से है याद के तुम आये थे
*मश्रिक़=पूर्व; तजल्ली=रोशनी

जैसे गुलशन में दबे पाओं बहार आती है
पत्ती-पत्ती के लिये लेके निखार आती है
और फिर वक़्त वो आता है के हर मौज-ए-सबा
अपने दामन में लिये गर्द-ओ-ग़ुबार आती है
कुछ इसी तरह से है याद के तुम आये थे

जिस तरह मह्व-ए-सफ़र हो कोई वीराने में
और रस्ते में कहीं कोई ख़ियाबाँ आ जाये
चन्द लम्हों में ख़ियाबाँ के गुज़र जाने पर
सामने फिर वोही दुनिया-ए-बियाबाँ आ जाये
कुछ इसी तरह से है याद के तुम आये थे
*मह्व=व्यस्त; ख़ियाबाँ=फुलवारी; बियाबाँ=जंगल

~ जगन्नाथ आज़ाद


  Nov 18, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

एक ऐसा वक़्त भी आता है

एक ऐसा वक़्त भी आता है चाँदनी रात में
मेरा दिमाग़, मेरा दिल, कहीं नहीं होता
तेरा ख़याल भी ऐसा निखर के आता है
तेरा विसाल भी इतना हंसी नहीं होता।

*विसाल=मिलन

~ क़तील शिफ़ाई

  Nov 17, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

दूर इक शहर में जब कोई भटकता



दूर इक शहर में जब कोई भटकता बादल
मेरी जलती हुई बस्ती की तरफ़ जाएगा
कितनी हसरत से उसे देखेंगी प्यासी आँखें
और वो वक़्त की मानिंद गुज़र जाएगा
*हसरत=लालसा; मानिंद=तरह

जाने किस सोच में खो जाएगी दिल की दुनिया
जाने क्या-क्या मुझे बीता हुआ याद आएगा
और उस शह्र का बे-फैज़ भटकता बादल
दर्द की आग को फैला के चला जाएगा
*बे-फैज़=कंजूस

~ अहमद फ़राज़


  Nov 17, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

क्या हुआ इनको कि भागे जा रहे

क्या हुआ इनको कि भागे जा रहे हैं
घर, डगर, गिरिवर छलांगे जा रहे है
कौन - सा रसरूप धरती पर नहीं है
खोंज में जिसकी अभागे जा रहे हैं।

~ आनंद मिश्रा

  Nov 16, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

कहीं-कहीं से हर चेहरा



कहीं-कहीं से हर चेहरा
तुम जैसा लगता है
तुमको भूल न पायेंगे हम
ऐसा लगता है

ऐसा भी इक रंग है जो
करता है बातें भी
जो भी इसको पहन ले वो
अपना-सा लगता है

तुम क्या बिछड़े भूल गये
रिश्तों की शराफ़त हम
जो भी मिलता है कुछ दिन ही
अच्छा लगता है

अब भी यूँ मिलते हैं हमसे
फूल चमेली के
जैसे इनसे अपना कोई
रिश्ता लगता है

और तो सब कुछ ठीक है लेकिन
कभी-कभी यूँ ही
चलता-फिरता शहर अचानक
तन्हा लगता है

~ निदा फ़ाज़ली


  Nov 16, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ज़ाहिर में जो आज़रदा तुम्हें पाता

ज़ाहिर में जो आज़रदा तुम्हें पाता हूँ
कुछ दिल में नहीं दिल को यह समझाता हूँ
होता है कभी अगली मोहब्बत का असर
सच कह दो कभी मैं तुम्हें याद आता हूँ

*ज़ाहिर=प्रत्यक्ष, प्रकट रूप में; आज़रदा=कष्टदायी

~ अमीर मीनाई

  Nov 15, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ओ बदगुमाँ तू जितना भी चाहे

ओ बदगुमाँ तू जितना भी चाहे गुरेज़ कर
बन्दा तेरे मिलाप का उम्मीद - वार है,
तू छुपके भी आएगा तो जाएगा किधर
कहते हैं जिसको ज़ीस्त तेरी रहगुज़ार है।

*गुरेज़=बचाव; ज़ीस्त=ज़िन्दगी; रहगुज़ार=रास्ता

~ अबदुल हमीद 'अदम'

  Nov 14, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

रातें विमुख दिवस बेगाने




रातें विमुख दिवस बेगाने
समय हमारा,
हमें न माने!

लिखें अगर बारिश में पानी
पढ़ें बाढ़ की करूण कहानी
पहले जैसे नहीं रहे अब
ऋतुओं के रंग-
रूप सुहाने।

दिन में सूरज, रात चन्‍द्रमा
दिख जाता है, याद आने पर
हम गुलाब की चर्चा करते हैं
गुलाब के झर जाने पर।

हमने, युग ने या चीज़ों ने
बदल दिए हैं
ठौर-ठिकाने।

~ ओम प्रभाकर


  Nov 14, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

हर बात पे इक अपनी सी

हर बात पे इक अपनी सी कर जाऊँगा
जिस राह से चाहूँगा गुज़र जाऊँगा
जीना हो तो मैं मौत को दे दूँगा शिकस्त
मरना हो तो बेमौत भी मर जाऊँगा

~ महबूब राही

  Nov 13, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

तुम को देखा तो नहीं है लेकिन




सुबह की धूप
खुली शाम का रूप
फ़ाख़्ताओं की तरह सोच में डूबे तालाब
अज़नबी शहर के आकाश
धुंधलकों की किताब
पाठशाला में
चहकते हुए मासूम गुलाब

घर के आँगन की महक
बहते पानी की खनक
सात रंगों की धनक

तुम को देखा तो नहीं है लेकिन
मेरी तन्हाई में
ये रंग-बिरंगे मंज़र
जो भी तस्वीर बनाते हैं
वह
तुम जैसी है।

~ निदा फ़ाज़ली


  Nov 13, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

उसकी आँखों में मेरे आँसू



उसकी हथेली पर मेरे आँसू
कितने अच्छे लगते हैं

जैसे सुब्‍ह-सवेरे
कँवल की पंखुड़ियाँ
शबनम से जगमग करती हों
मोती जैसी शबनम
फूल की आँखों में जाकर हीरे की कनी बन जाती है

क़तरा-क़तरा दिल करता है
ख़ुशबू धीरे-धीरे तन में फैलाती है
शबनम फूल के रंग में आख़िर रंग जाती है
नन्हे-नन्हे चिराग़ों की लौ बढ़ती है तो
उसका चेहरा पहले से बढ़कर रोशन लगने लगता है

उसकी आँखों में मेरे आँसू
कितने अच्छे लगते हैं!

~ परवीन शाकिर


  Nov 12, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Thursday, November 12, 2015

नियाज़-ओ-नाज़ के झगड़े मिटाये



नियाज़-ओ-नाज़ के झगड़े मिटाये जाते हैं
हम उन में और वो हम में समाये जाते हैं
*नियाज़-ओ-नाज़=सावधानी और गर्व

ये नाज़-ए-हुस्न तो देखो कि दिल को तड़पाकर
नज़र मिलाते नहीं मुस्कुराये जाते हैं
*नाज़-ए-हुस्न=सुंदरता के नखरे

मेरे जुनून-ए-तमन्ना का कुछ ख़याल नहीं
लजाये जाते हैं दामन छुड़ाये जाते हैं
*जुनून-ए-तमन्ना=इच्छाओं का उन्माद

जो दिल से उठते हैं शोले वो अंग बन-बन कर
तमाम मंज़र-ए-फ़ितरत पे छये जाते हैं
*मंज़र-ए-फ़ितरत=प्रकृति के दृश्य

मैं अपनी आह के सदक़े कि मेरी आह में भी
तेरी निगाह के अंदाज़ पाये जाते हैं
*आह=कराह; सदक़े=न्योछावर

ये अपनी तर्क-ए-मुहब्बत भी क्या मुहब्बत है
जिन्हें भुलाते हैं वो याद आये जाते हैं
*तर्क-ए-मुहब्बत=प्रेम की समाप्ति

~ जिगर मुरादाबादी


  Nov 12, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Wednesday, November 11, 2015

जल गया है दीप तो ...


आंधियां चाहें उठाओ,
बिजलियां चाहें गिराओ,
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

रोशनी पूंजी नहीं है, जो तिजोरी में समाये,
वह खिलौना भी न, जिसका दाम हर गाहक लगाये,
वह पसीने की हंसी है, वह शहीदों की उमर है,
जो नया सूरज उगाये जब तड़पकर तिलमिलाये,
उग रही लौ को न टोको,
ज्योति के रथ को न रोको,
यह सुबह का दूत हर तम को निगलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

दीप कैसा हो, कहीं हो, सूर्य का अवतार है वह,
धूप में कुछ भी न, तम में किन्तु पहरेदार है वह,
दूर से तो एक ही बस फूंक का वह है तमाशा,
देह से छू जाय तो फिर विप्लवी अंगार है वह,
व्यर्थ है दीवार गढना,
लाख लाख किवाड़ जड़ना,
मृतिका के हांथ में अमरित मचलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

है जवानी तो हवा हर एक घूंघट खोलती है,
टोक दो तो आंधियों की बोलियों में बोलती है,
वह नहीं कानून जाने, वह नहीं प्रतिबन्ध माने,
वह पहाड़ों पर बदलियों सी उछलती डोलती है,
जाल चांदी का लपेटो,
खून का सौदा समेटो,
आदमी हर कैद से बाहर निकलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

वक़्त को जिसने नहीं समझा उसे मिटना पड़ा है,
बच गया तलवार से तो फूल से कटना पड़ा है,
क्यों न कितनी ही बड़ी हो, क्यों न कितनी ही कठिन हो,
हर नदी की राह से चट्टान को हटना पड़ा है,
उस सुबह से सन्धि कर लो,
हर किरन की मांग भर लो,
है जगा इन्सान तो मौसम बदलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

~ गोपाल दास 'नीरज',


  Nov 11, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

आज बिखरी है हवाओं में

आज बिखरी है हवाओं में चरागों की महक
आज रौशन है हवा चाँद-सितारों की तरह

~ सतपाल ख़याल

  Nov 10, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

जहां रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगा

जहां रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगा
किसी चराग का अपना मकां नहीं होता

~ वसीम बरेलवी

  Nov 10, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Tuesday, November 10, 2015

फूल खिला दे शाखों पर



फूल खिला दे शाखों पर, पेड़ों को फल दे मालिक
धरती जितनी प्यासी है, उतना तो जल दे मालिक

वक़्त बड़ा दुखदायक है, पापी है संसार बहुत,
निर्धन को धनवान बना, दुर्बल को बल दे मालिक

कोहरा कोहरा सर्दी है, काँप रहा है पूरा गाँव,
दिन को तपता सूरज दे, रात को कम्बल दे मालिक

बैलों को एक गठरी घास, इंसानों को दो रोटी,
खेतो को भर गेहूं से, काँधों को हल दे मालिक

हाथ सभी के काले हैं, नजरें सबकी पीली हैं,
सीना ढांप दुपट्टे से, सर को आँचल दे मालिक

~ श
कील आज़मी

  Nov 10, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

सरसरी तुम जहान से गुज़रे

सरसरी तुम जहान से गुज़रे
वरना हर जा, जहान-ए-दीगर था

*सरसरी=बेपरवाह; जहान=दुनिया; जा=तरफ; दीगर=दूसरी

~ मीर तक़ी मीर

  Nov 9, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन



श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन, हरण भव भय दारुणं।
नवकंज-लोचन कंज मुख, कर कंज, पद कंजारुणं॥१॥

हे मन, कृपा करने वाले श्रीराम का भजन करो जो कष्टदायक जन्म-मरण के भय का नाश करने वाले हैं, जो नवीन कमल के समान आँखों वाले हैं, जिनका मुख कमल के समान है, जिनके हाथ कमल के समान हैं, जिनके चरण रक्तिम (लाल) आभा वाले कमल के समान हैं॥१॥

कन्दर्प अगणित अमित छवि, नवनील-नीरद सुन्दरं।
पटपीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं॥२॥

जो अनगिनत कामदेवों के समान तेजस्वी छवि वाले हैं, जो नवीन नील मेघ के समान सुन्दर हैं, जिनका पीताम्बर सुन्दर विद्युत् के समान है, जो पवित्रता की साकार मूर्ति सीता जी के पति हैं॥२॥

भजु दीनबन्धु दिनेश, दानव दैत्यवंश-निकन्दनं।
रघुनन्द आनन्द कंद, कौशलचन्द दशरथ-नन्दनं॥३॥

हे मन, दीनों के बन्धु, सूर्यवंशी, दानवों और दैत्यों के वंश का नाश करने वाले, रघु के वंशज, सघन आनंद रूप, अयोध्याधिपति श्रीदशरथ के पुत्र श्रीराम को भजो ॥३॥

सिर मुकट कुण्डल तिलक, चारु उदारु अंग विभूषणं।
आजानु-भुज-शर-चाप-धर, संग्राम जित-खरदूषणं॥४॥

जिनके मस्तक पर मुकुट, कानों में कुंडल और माथे पर तिलक है, जिनके अंग प्रत्यंग सुन्दर, सुगठित और भूषण युक्त हैं, जो घुटनों तक लम्बी भुजाओं वाले हैं, जो धनुष और बाण धारण करते हैं, जो संग्राम में खर और दूषण को जीतने वाले हैं॥४॥

इति वदति तुलसीदास, शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं।
मम हृदय-कंज निवास कुरु, कामादि खलदल-गंजनं॥५॥

श्रीतुलसीदास जी कहते हैं, हे शंकर, शेष और मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले, काम आदि दुर्गुणों के समूह का नाश करने वाले श्रीराम जी आप मेरे हृदय कमल में निवास कीजिये॥५॥

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि, सो बरु सहज सुंदर सांवरो।
करुणा निधान सुजान, सील सनेह जानत रावरो॥६॥

जो तुम्हारे मन को प्रिय हो गया है, वह स्वाभाविक रूप से सुन्दर सांवला वर ही तुमको मिलेगा। वह करुणा की सीमा और सर्वज्ञ है और तुम्हारे शील और स्नेह को जानता है॥६॥

एहि भांति गौरि असीस सुनि, सिय सहित हियं हरषी अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि-पुनि, मुदित मन मंदिर चली॥७॥

इस प्रकार श्रीपार्वती जी का आशीर्वाद सुनकर श्री सीता जी सहित सभी सखियाँ प्रसन्न हृदय वाली हो गयीं। श्रीतुलसीदास जी कहते हैं - श्रीपार्वती जी की बार बार पूजा करके श्रीसीता जी प्रसन्न मन से महल की ओर चलीं॥७॥

जानि गौरी अनुकूल सिय, हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल, वाम अंग फरकन लगे॥८॥

श्रीपार्वती जी को अनुकूल जान कर, श्रीसीता जी के ह्रदय की प्रसन्नता का कोई ओर-छोर नहीं है। सुन्दर और मंगलकारी लक्षणों की सूचना देने वाले उनके बाएं अंग फड़कने लगे॥८॥

~ गोस्वामी तुलसीदास

  Nov 9, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Sunday, November 8, 2015

देव तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से



देव तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं
सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं

धूमधाम से साज-बाज से वे मंदिर में आते हैं
मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं

मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी
फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी

धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रृंगार नहीं
हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं

कैसे करूँ कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं
मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं

नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आयी
पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ चली आयी

पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो
दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो

मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ
जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूँ

चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो
यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो

~ सुभद्राकुमारी चौहान


  Nov 8, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ताइर को चहकने की सज़ा देते हो

ताइर को चहकने की सज़ा देते हो
शोलों को दहकने की सज़ा देते हो
अफ़कार पे ताज़ीर बिठाने वालो -
फूलों को महकने की सज़ा देते हो।

*ताइर=पक्षी; अफ़कार=फ़िक्र का बहुवचन, चिंताएँ; ताज़ीर=सज़ा

~ अख़्तर पयामी


  Nov 7, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Saturday, November 7, 2015

क्यों इन तारों को उलझाते?



क्यों इन तारों को उलझाते?
अनजाने ही प्राणों में क्यों,
आ आ कर फिर जाते?

पल में रागों को झंकृत कर,
फिर विराग का अस्फुट स्वर भर,
मेरी लघु जीवन वीणा पर,
क्या यह अस्फुट गाते?

लय में मेरा चिर करुणा-धन,
कम्पन में सपनों का स्पन्दन,
गीतों में भर चिर सुख, चिर दुख,
कण कण में बिखराते!

मेरे शैशव के मधु में घुल,
मेरे यौवन के मद में ढुल,
मेरे आँसू स्मित में हिल मिल,
मेरे क्यों न कहाते?

~ महादेवी वर्मा

  Nov 7, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

बेपर्दा नज़र आयीं जो कल

बेपर्दा नज़र आयीं जो कल चंद बीवियाँ
अकबर ज़मीं में ग़ैरते-क़ौमी से गड़ गया
पूछा जो उनसे आपका पर्दा किधर गया
बोली वो यों कि अक्ल पे मर्दों की पड़ गया।

*ग़ैरत=स्वाभिमान; क़ौमी=जिसका संबंध देश से हो

~ अकबर इलाहाबादी

  Nov 6, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Friday, November 6, 2015

मेरी आँखों की पुतली में



मेरी आँखों की पुतली में
तू बनकर प्राण समा जा रे!

जिसके कन-कन में स्पन्दन हो,
मन में मलयानिल चन्दन हो,
करुणा का नव-अभिनन्दन हो
वह जीवन गीत सुना जा रे!

खिंच जाये अधर पर वह रेखा
जिसमें अंकित हो मधु लेखा,
जिसको वह विश्व करे देखा,
वह स्मिति का चित्र बना जा रे!

मेरी आँखों की पुतली में
तू बनकर प्राण समा जा रे!

~ जयशंकर प्रसाद


  Nov 6, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Thursday, November 5, 2015

कब कहा मैंने कि यह पहचान

कब कहा मैंने कि यह पहचान दो दिन की अमर हो
सांस इन बेहोश घड़ियों की न लौटे, बे - ख़बर हो
कब कहा मैंने कि मेरी याद की बुझती शमा पर
एक क्षण को भी तुम्हारी लाज से नीची नज़र हो

~ रामेश्वर शुक्ल 'अंचल'

  Nov 5, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ग़ैर को मुंह लगा के देख लिया



ग़ैर को मुंह लगा के देख लिया
झूठ-सच आज़मा के देख लिया

कितनी फ़रहत-फ़ज़ा थी बू-ए-वफ़ा
उसने दिल को जला के देख लिया
*फ़रहत-फ़ज़ा=सुहानी; बू-ए-वफ़ा=वफ़ा की सुगंध

जाओ भी, क्या करोगे मेह्रो-वफ़ा
बारहा, आज़मा के देख लिया
*मेह्रो-वफ़ा=कृपा व प्रेम निर्वाह

है इधर आइना, उधर दिल है
जिसको चाहा, उठा के देख लिया

उसने सुबहे-शबे-विसाल मुझे
जाते जाते भी आ के देख लिया
*सुबहे-शबे-विसाल=मिलन रात्रि के बाद का सवेरा

'दाग़' ने ख़ूब आशिक़ी का मज़ा
जल के देखा, जला के देख लिया

~ दाग़ देहलवी


  Nov 5, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर

सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर, ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं
हाय क्या अच्छी कही, ज़ालिम हूँ मैं जाहिल हूँ मैं

*सख़्तियाँ=पाबंदी लगाना; ग़ाफ़िल=असावधान; ज़ालिम=क्रूर; जाहिल=मूर्ख

~ इक़बाल


  Nov 4, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

देवता हैं नहीं




देवता हैं नहीं,
तुम्हें दिखलाऊँ कहाँ ?
सूना है सारा आसमान,
धुएँ में बेकार भरमाऊँ कहाँ ?

इसलिए, कहता हूँ,
जहाँ भी मिले मौज, ले लो ।
जी चाहता हो तो टेनिस खेलो
या बैठ कर घूमो कार में
पार्कों के इर्द-गिर्द अथवा बाजार में ।
या दोस्तों के साथ मारो गप्प,
सिगरेट पियो ।
तुम जिसे मौज मानते हो, उसी मौज से जियो ।
मस्ती को धूम बन छाने दो,
उँगली पर पीला-पीला दाग पड़ जाने दो ।

लेकिन, देवता हैं नहीं,
तुम्हारा जो जी चाहे, करो ।
फूलों पर लोटो
या शराब के शीशे में डूब मरो ।

मगर, मुझ अकेला छोड़ दो ।
मैं अकेला ही रहूँगा ।
और बातें जो मन पर बीतती हैं,
उन्हें अवश्य कहूँगा ।

मसलन, इस कमरे में कौन है
जिसकी वजह से हवा ठंडी है,
चारों ओर छायी शान्ति मौन है ?
कौन यह जादू करता है ?
मुझमें अकारण आनन्द भरता है ।

कौन है जो धीरे से
मेरे अन्तर को छूता है ?
किसकी उँगलियों से
पीयूष यह चूता है ?

दिल की धड़कनों को
यह कौन सहलाता है ?
अमृत की लकीर के समान
हृदय में यह कौन आता-जाता है ?

कौन है जो मेरे बिछावन की चादर को
इस तरह चिकना गया है,
उस शीतल, मुलायम समुद्र के समान
बना गया है,
जिसके किनारे, जब रात होती है
मछलियाँ सपनाती हुई सोती हैं ?

कौन है, जो मेरे थके पावों को
धीरे-धीरे सहलाता और मलता है,
इतनी देर कि थकन उतर जाए,
प्राण फिर नयी संजीवनी से भर जाए ?

अमृत में भींगा हुआ यह किसका
अंचल हिलता है ?
पाँव में भी कमल का फूल खिलता है ।

और विश्वास करो,
यहाँ न तो कोई औरत है, न मर्द;
मैं अकेला हूँ ।

अकेलेपन की आभा जैसे-जैसे गहनाती है,
मुझे उन देवताओं के साथ नींद आ जाती है,
जो समझो तो हैं, समझो तो नहीं हैं;
अभी यहाँ हैं, अभी और कहीं हैं ।

देवता सरोवर हैं, सर हैं, समुद्र हैं ।
डूबना चाहो
तो जहाँ खोजो, वहीं पानी है ।
नहीं तो सब स्वप्न की कहानी है ।

~ डी० एच० लारेंस
अनुवाद-रामधारी सिंह 'दिनकर


  Nov 4, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

पंच तत्व के सत, रज, तम से

पंच तत्व के सत, रज, तम से बनी जिन्दगी
अर्थ-काम रत, धर्म - मोक्ष से डरी जिन्दगी
आवागमन, अव्यक्त, अनेक रूप है तेरे,
कुछ तो अपना अता-पता दे, अरी जिन्दगी

~ नीरज

  Nov 3, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

वो पैमान भी टूटे जिनको



वो पैमान (वचन) भी टूटे जिनको
हम समझे थे पाइंदा (अनश्वर)
वो शम्एं भी दाग (जल चुकी हुई) हैं जिनको
बरसों रक्खा ताबिंदा (प्रकाशमान)
दोनों वफ़ा करके नाख़ुश हैं
दोनों किए पर शर्मिन्दा।

प्यार से प्यारा जीवन प्यारे,
क्या माज़ी (अतीत) क्या आइंदा (भविष्य)
हम दोनों अपने क़ातिल हैं,
हम दोनों अब तक ज़िन्दा।

~ अहमद फ़राज़


  Nov 3, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

रंगो-हर्फो-सदा की दुनिया में

रंगो-हर्फो-सदा की दुनिया में
ज़िंदगी क़त्ल हो गई है कहीं
मर गया लफ़्ज़, उड़ गया मफ़हूम
और आवाज़ खो गई है कहीं।

*रंगो-हर्फो-सदा=चित्रकला, लेखन और गायन (शायद फिल्मी से मतलब हो?); मफ़हूम=अर्थ

~ अहमद नदीम क़ासमी

  Nov 2, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

अकेलेपन से जो लोग दुखी हैं,



अकेलेपन से जो लोग दुखी हैं,
वृत्तियाँ उनकी,
निश्चय ही, बहिर्मुखी हैं ।
सृष्टि से बाँधने वाला तार
उनका टूट गया है;
असली आनन्द का आधार
छूट गया है ।

उदगम से छूटी हुई नदियों में ज्वार कहाँ ?
जड़-कटे पौधौं में जीवन की धार कहाँ ?

तब भी, जड़-कटे पौधों के ही समान
रोते हैं ये उखड़े हुए लोग बेचारे;
जीना चाहते हैं भीड़ - भभ्भड़ के सहारे ।

भीड़, मगर, टूटा हुआ तार
और तोड़ती है
कटे हुए पौधों की
जड़ नहीं जोड़ती है ।

बाहरी तरंगो पर जितना ही फूलते हैं,
हम अपने को उतना ही और भूलते हैं ।

जड़ जमाना चाहते हो
तो एकान्त में जाओ ;
अगम-अज्ञात में अपनी बाहें फैलाओ ।
अकेलापन है राह
अपने आपको पाने की;
जहाँ से तुम निकल चुके हो,
उस घर में वापस जाने की ।

~ (डी० एच० लारेंस)
अनुवाद-रामधारी सिंह 'दिनकर'


  Nov 2, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

अरमाँ तमाम उम्र के

अरमाँ तमाम उम्र के सीने में दफ़्न हैं
हम चलते फिरते लोग मज़ारों से कम नहीं ।

~ 'नामालूम'

  Nov 1, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Sunday, November 1, 2015

उसने फूल भेजे हैं



उसने फूल भेजे हैं
फिर मेरी अयादत (बीमार का हाल-चाल पूछना) को
एक-एक पत्ती में
उन लबों की नरमी है
उन जमील (सुन्दर) हाथों की
ख़ुशगवार हिद्दत (प्रबलता) है
उन लतीफ़ (रसमय) साँसों की
दिलनवाज़ (दिल को सुख देने वाली) ख़ुशबू है

दिल में फूल खिलते हैं
रुह में चिराग़ां है
ज़िन्दगी मुअत्तर (सुगंधित) है

फिर भी दिल यह कहता है,
बात कुछ बना लेना
वक़्त के खज़ाने से
एक पल चुरा लेना,
काश! वो ख़ुद आ जाता..!

~ परवीन शाकिर


  Nov 1, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

उस एक चेहरे में आबाद थे


उस एक चेहरे में आबाद थे कई चेहरे
उस एक शख़्स में किस किस को देखता था मैं।

~ सलीम अहमद

  Oct 31, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

अकेलेपन की शिकायत



लोग अकेलेपन की शिकायत करते हैं ।
मैं समझ नहीं पाता ,
वे किस बात से डरते हैं ।

अकेलापन तो जीवन का चरम आनन्द है ।
जो हैं निःसंग,
सोचो तो, वही स्वच्छंद है ।

अकेला होने पर जगते हैं विचार;
ऊपर आती है उठकर
अंधकार से नीली झंकार ।

जो है अकेला,
करता है अपना छोटा-मोटा काम,
या लेता हुआ आराम,
झाँक कर देखता है आगे की राह को,
पहुँच से बाहर की दुनिया अथाह को;

तत्वों के केन्द्र-बिन्दु से होकर एकतान
बिना किसी बाधा के करता है ध्यान
विषम के बीच छिपे सम का,
अपने उदगम का।

अकेलेपन से बढ़कर
आनन्द नहीं , आराम नहीं ।
स्वर्ग है वह एकान्त,
जहाँ शोर नहीं, धूमधाम नहीं ।

देश और काल के प्रसार में,
शून्यता, अशब्दता अपार में
चाँद जब घूमता है, कौन सुख पाता है ?
भेद यह मेरी समझ में तब आता है,
होता हूँ जब मैं अपने भीतर के प्रांत में,
भीड़ से दूर किसी निभृत (निर्जन), एकान्त में ।

और तभी समझ यह पाता हूँ
पेड़ झूमता है किस मोद में
खड़ा हुआ एकाकी पर्वत की गोद में ।

बहता पवन मन्द-मन्द है ।
पत्तों के हिलने में छन्द है ।
कितना आनन्द है !

~ (डी० एच० लारेंस)
अनुवाद-रामधारी सिंह 'दिनकर'


  Oct 31, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

अजब तेरी है ऐ महबूब सूरत

अजब तेरी है ऐ महबूब सूरत,
नज़र से गिर गए सब ख़ूबसूरत।

~ हैदर आली आतिश

  Oct 30, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

देर तक, दूर तक रहती है महक



देर तक, दूर तक
रहती है महक
जब तू चला जाता है,
कहाँ घटता है असर,
जब तू चला जाता है…

वो बेमिसाल सा लफ़्ज़ों का जाल,
खिजाँ को जो बना दे
जाँफिज़ा (आत्मिक सुख देने वाला)!

तमाम वो कलाम,
तेरे फुर्क़त (जुदाई) के काम...
जो भेजे मेरे नाम,
वो सारे ही पयाम,
बने रहते हैं बदस्तूर (पहले जैसे),
सब अपनी ही जगह!

उम्र कटती रहे,
घटती है कब कशिश (मोहकता) तेरी?
वक़्त जाता रहे,
बदली है कब रविश (चाल) तेरी?

कब उतरता है नशा,
जब तू चला जाता है
कहाँ होती है बसर,
कहाँ घटता है असर,
जब तू चला जाता है!

~ रेशमा हिंगोरानी


  Oct 30, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ये अहद किया था कि ब-ई-हाले



ये अहद किया था कि ब-ई-हाले-तबाह
अब कभी प्यार भरे गीत नहीं गाऊंगा
किसी चिलमन ने पुकारा भी तो बढ़ जाऊँगा
कोई दरवाज़ा खुला भी तो पलट आऊंगा

*अहद=वादा; ब-ई-हाले-तबाह=यों तबाह-हाल होने पर भी; 

  चिलमन=बाँस की फटि्टयों का परदा

फिर तिरे कांपते होंटों की फ़ुन्सूकार हंसी
जाल बुनने लगी, बुनती रही, बुनती ही रही
मैं खिंचा तुझसे, मगर तू मिरी राहों के लिए
फूल चुनती रही, चुनती रही, चुनती ही रही

*फ़ुन्सूकार=जादू-भरी

~ साहिर लुधियानवी


  Oct 29, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Thursday, October 29, 2015

पढ़ा लिखा कुछ काम न आया




पढ़ा लिखा कुछ काम न आया
जीवन बीता चम्मच चम्मच
सोच विचार विमर्श त्याग कर
जीवन रीता चम्मच चम्मच

बालम ने बहकाया हमको
चूल्हे ने दहकाया हमको
निभी नौकरी लश्टम पश्टम
समय सारिणी भारी भरकम
खड़ी कतारें कर्तव्यों की
सुख और हक़ के लट्टू मद्धम
कब हम जीते कब हम हारे
कौन हिसाब रखे सरपंचम

अब हमने सिर तान लिया है
मन में निश्चय ठान लिया है
अपनी मर्ज़ी आप जियेंगे
जीवन की रसधार पियेंगे
कलश उठाकर, ओक लगाकर
नहीं चाहिए हमें कृपाएँ
करछुल करछुल चम्मच चम्मच l

~ ममता कालिया
 

  Oct 29, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ऐ दिल उन आँखों पर न जा



ऐ दिल उन आँखों पर न जा,
जिनमें वफ़ूरे-रंज (अधिक दु:ख) से
कुछ देर को तेरे लिए
आँसू अगर लहरा गए।

ये चन्द लम्हों की चमक
जो तुझको पागल कर गई
इन जुगनुओं के नूर से
चमकी है कब वो ज़िन्दगी
जिसके मुक़द्दर में रही
सुबहे-तलब से तीरगी (अँधेरा)।

किस सोच में गुमसुम है तू...?
ऐ बेख़बर! नादाँ न बन -
तेरी फ़सुर्दा (उदास) रूह को
चाहत के काँटों की तलब,
और उसके दामन में फ़क़त
हमदर्दियों के फूल हैं।

~ अहमद फ़राज़


  Oct 28, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

इज़हार-ए-मोहब्बत के लिए




इज़हार-ए-मोहब्बत के लिए लाज़मी नहीं
कि फूल ख़रीदे जाएँ
किसी होटल में कमरा लिया जाए
या परिंदे आज़ाद किए जाएँ

इज़हार-ए-मोहब्बत के लिए तुम अपने बोसे
काग़ज़ में लपेट कर भेज सकती हो
जिस तरह मैं ने अपने जज़्बे
तुम्हें पोस्ट कर दिए हैं

*इज़हार=बयान करना; बोसे=चुम्बन; जज़्बे=भावनाएँ

~ ज़ाहिद इमरोज़


  Oct 28, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

दबी हुई है मेरे लबों में


दबी हुई है मेरे लबों में
कहीं पे वो आह भी जो अब तक
न शोला बन के भड़क सकी है

न अश्क-ए-बेसूद (निरर्थक आँसू) बन के निकली
घुटी हुई है नफ़स की हद में
जला दिया जो जला सकी है
न शमा बन कर पिघल सकी है 


न आज तक दूद (धुआँ) बन के निकली
दिया है बेशक मेरी नज़र को वो परतौ(छवि) जो दर्द बख़्शे
न मुझ पर ग़ालिब (विजयी) ही आ सकी है
न मेरा मस्जूद (प्रार्थना) बन के निकली


~ अख़्तर-उल-ईमान

  Oct 27, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

अजाँ हो रही है

अजाँ हो रही है पिला जल्द साक़ी
इबादत करें आज मख़मूर हो कर।

*मख़मूर=मदोन्मत्त

~ नामालूम

  Oct 27, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Tuesday, October 27, 2015

जीना अज़ाब क्यूँ है



जीना अज़ाब क्यूँ है ये क्या हो गया मुझे
किस शख़्स की लगी है भला बद-दुआ मुझे
*अज़ाब=सज़ा, तकलीफ़

मैं अपने आप से तो लड़ा हूँ तमाम उम्र
ऐ आसमान तू भी कभी आज़मा मुझे

बनना पड़ा है आप ही अपना ख़ुदा मुझे
किस कुफ्र की मिली है ख़ुदारा सजा मुझे
*कुफ्र=कृतघ्नता

निकले थे दोनों भेस बदल कर तो क्या अजब
मैं ढूंढता ख़ुदा को फिरा, और ख़ुदा मुझे

पूजेंगे मुझको गाँव के सब लोग एक दिन
मैं इक पुराना पेड़ हूँ, तू मत गिरा मुझे

इस घर के कोने कोने में यादों के भूत हैं
अलमारियां न खोल, बहुत मत डरा मुझे

यह कह कर मैंने रखा हर आइने का दिल
अगले जनम में रूप मिलेगा नया मुझे

तू मुतमईं नहीं है तो मुझे कब है ऐतराज
मिट्टी को फिर से गूंथ मेरी, फिर बना मुझे
*मुतमईं=संतुष्ट

~ सलमान अख़्तर


  Oct 27, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Monday, October 26, 2015

दरिया की ज़िंदगी पर

दरिया की ज़िंदगी पर, सदक़े हज़ार जानें
मुझ को नहीं गवारा साहिल की मौत मरना।

*सदक़े=दान, ख़ैरात; गवारा=स्वीकार

~ नामालूम

  Oct 26, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

इस से पहले की हम




इस से पहले की हम
एक ग़मनाक कहानी के किरदार हो जाएँ
आओ अपने हिस्से की धूप ले कर
हवा हो जाएँ
किसी और सय्यारे में जा बसें
आदम और हव्वा हो जाएँ
फिर ख़ता करें ख़ुदाई से घबरा कर
और इस जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा पाएँ
इक नई दुनिया का सबब हो जाएँ

*ग़मनाक-दु:खी; सय्यारे=ग्रह, दूसरी दुनिया

~ ख़ुर्शीद अकरम


  Oct 25, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ख़्याल, सांस, नज़र, सोच



ख़्याल, सांस, नज़र, सोच - खोल कर दे दो
लबों से बोल उतारो, जुबां से आवाज़ें
हथेलियों से लकीरें उतारकर दे दो
हाँ, दे दो अपनी 'ख़ुदी' भी, कि 'ख़ुद' नहीं हो तुम
उतारों रूह से ये जिस्म का हसीं गहना
उठो दुआ से तो आमीन कह के रूह दे दो

*आमीन=तथास्तु, ईश्वर करे ऐसा ही हो।

~ गुलज़ार


  Oct 25, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

किसे यह होश सुराही कहाँ है

किसे यह होश सुराही कहाँ है जाम कहाँ
निगाहे पीरे-मुग़ाँ से बरस रही है शराब।

*पीरे-मुग़ाँ=मधुशाला का मालिक

~ नामालूम


  Oct 24, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

अक़्ल ने एक दिन ये दिल से कहा

अक़्ल ने एक दिन ये दिल से कहा
भूले-भटके की रहनुमा हूँ मैं
दिल ने सुनकर कहा-ये सब सच है
पर मुझे भी तो देख क्या हूँ मैं
राज़े-हस्ती को तू समझती है
और आँखों से देखता हूँ मैं

*राज़े-हस्ती=अस्तित्व के रहस्य

~ इक़बाल


  Oct 24, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Friday, October 23, 2015

हवा की नर्म-ख़िरामी भी



हवा की नर्म-ख़िरामी भी क्या क़यामत है
कि उसकी याद उमड़ आई है घटा की तरह
मैं उसको सोच तो सकता हूँ, छू नहीं सकता
वो मेरे सामने मौजूद है - ख़ुदा की तरह।

*नर्म-ख़िरामी=धीमी चाल

~ अहमद नदीम क़ासमी


  Oct 23, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh