ज़िन्दगी मेरे घर आना, आना ज़िन्दगी
मेरे घर का सीधा सा इतना पता है
ये घर जो है चारों तरफ से खुला है
न दस्तक ज़रूरी न आवाज़ देना
मेरे घर का दरवाज़ा कोई नहीं हैं
है दीवारें गुम और छत भी नहीं है
बड़ी धूप है दोस्त, कड़ी धूप है दोस्त
तेरे आँचल का साया चुराके
जीना है जीना, जीना ज़िन्दगी
मेरे घर का सीधा सा इतना पता है
मेरे घर के आगे मोहब्बत लिखा है
न दस्तक ज़रूरी, न आवाज़ देना
में साँसों की रफ़्तार से जान लूंगी
हवाओं की खुशबू से पहचान लूंगी
तेरी फूल हूँ दोस्त, तेरी धूल हूँ दोस्त
तेरे हाथों में चेहरा छुपा के
जीना है जीना, जीना ज़िन्दगी
मगर अब जो आना तो धीरे से आना,
यहाँ एक शहज़ादी सोयी हुई है
ये परियों की सपनों में खोई हुई है
बड़ी खूब है ये, तेरा रूप है ये
तेरे आँगन में, तेरे दामन में
ओ तेरी आँखों पे, तेरी पलकों पे
तेरे क़दमों में, इस को बिठा के
जीना है जीना, जीना ज़िन्दगी
~ सुदर्शन फ़ाकिर
August 2, 2013