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Tuesday, June 20, 2017

उल्फ़त का जब किसी ने लिया नाम



उल्फ़त का जब किसी ने लिया नाम रो पड़े 
अपनी वफ़ा का सोच के अंजाम रो पड़े 

हर शाम ये सवाल मोहब्बत से क्या मिला 
हर शाम ये जवाब कि हर शाम रो पड़े 

राह-ए-वफ़ा में हम को ख़ुशी की तलाश थी
दो गाम ही चले थे कि हर गाम रो पड़े
*गाम=क़दम

रोना नसीब में है तो औरों से क्या गिला
अपने ही सर लिया कोई इल्ज़ाम रो पड़े

~ सुदर्शन फ़ाकिर


  May 21, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Tuesday, October 6, 2015

अपना अंजाम तो मालूम है

अपना अंजाम तो मालूम है सबको फिर भी
अपनी नज़रों में हर इंसान सिकंदर क्यूँ है

~ सुदर्शन फ़ाकिर

  Sep 30, 2015| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh 

Sunday, April 5, 2015

ये शीशे के सपने, ये रिश्तों के धागे

 
ये शीशे के सपने, ये रिश्तों के धागे..
किसे क्या ख़बर है कहाँ टूट जाएँ..
मुहब्बत के दरिया में तिनके वफ़ा के
न जाने ये किस मोड़ पर डूब जाएँ

अजब दिल की वादी,अजब दिल की बस्ती
हर एक मोड़ मौसम नई ख़्वाहिशों का
लगाए हैं हमने भी सपनों के पौधे
मगर क्या भरोसा यहाँ बारिशों का

मुरादों की मंज़िल के सपनों में खोये
मुहब्बत की राहों पे हम चल पड़े थे
ज़रा दूर चल के जब आँखें खुली तो
कड़ी धूप में हम अकेले खड़े थे

जिन्हें दिल से चाहा, जिन्हें दिल से पूजा
नज़र आ रहे हैं वही अजनबी से
रवायत है शायद ये सदियों पुरानी
शिकायत नहीं है कोई ज़िंदगी से....

~ सुदर्शन फ़ाकिर

   Apr 28, 2012| e-kavya.blogspot.com
   Submitted by: Ashok Singh 

ये दौलत भी ले लो....!


ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।

मुहल्ले की सबसे निशानी पुरानी
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी
वो नानी की बातों में परियों का डेरा
वो चहरे की झुरिर्यों में सदियों का फेरा
भुलाये नहीं भूल सकता है कोई
वो छोटी सी रातें वो लम्बी कहानी।

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना
वो गुड़िया की शादी में लड़ना झगड़ना
वो झूलों से गिरना वो गिर के सम्भलना
वो पीतल के छल्लों के प्यारे से तोहफ़े
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी।

कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना
घरोंदे बनाना बना के मिटाना
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी
वो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी
न दुनिया का ग़म था न रिश्तों के बंधन
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िंदगानी।
~ सुदर्शन फ़ाकिर

  May 23, 2012| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Friday, April 3, 2015

अपना अंजाम तो मालूम है



आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है
जख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ  है

जब हक़ीक़त है कि हर ज़र्रे में तू रहता है
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ  है

अपना अंजाम तो मालूम है सबको फिर भी
अपनी नज़रों में हर इंसान सिकंदर क्यूँ है

ज़िंदगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब 'फ़ाकिर'
वरना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है

~ सुदर्शन फ़ाकिर

  Jun 11, 2012| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

फिर आज मुझे तुम को



फिर आज मुझे तुम को बस इतना बताना है
हँसना ही जीवन है हँसते ही जाना है

मधुबन हो या गुलशन हो पतझड़ हो या सावन हो
हर हाल में इंसाँ का इक फूल सा जीवन हो
काँटों में उलझ के भी ख़ुशबू ही लुटाना है
हँसना ही जीवन है हँसते ही जाना है

हर पल जो गुज़र जाये दामन को तो भर जाये
ये सोच के जी लें तो तक़दीर सँवर जाये
इस उम्र की राहों से ख़ुशियों को चुराना है
हँसना ही जीवन है हँसते ही जाना है

सब दर्द मिटा दें हम, हर ग़म को सज़ा दें हम
कहते हैं जिसे जीना दुनिया को सिखा दें हम
ये आज तो अपना है कल भी अपनाना है
हँसना ही जीवन है हँसते ही जाना है

~ सुदर्शन फ़ाकिर

 
  Jun 29, 2012| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

उस मोड़ से शुरू करें फिर



उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी
हर शय जहाँ हसीन थी, हम तुम थे अजनबी

लेकर चले थे हम जिन्हें जन्नत के ख़्वाब थे
फूलों के ख़्वाब थे वो मुहब्बत के ख़्वाब थे
लेकिन कहाँ है उन में वो पहली सी दिलकशी

रहते थे हम हसीन ख़यालों की भीड़ में
उलझे हुए हैं आज सवालों की भीड़ में
आने लगी है याद वो फ़ुर्सत की हर घड़ी

शायद ये वक़्त हमसे कोई चाल चल गया
रिश्ता वफ़ा का और ही रंगो में ढल गया
अश्कों की चाँदनी से थी बेहतर वो धूप ही

~ सुदर्शन फ़ाकिर

 
  Aug 2, 2012| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh


Us Mod Se shuru karen phir yeh Zindagi - Jagjit Singh Chitra Singh
https://www.youtube.com/watch?v=FqnMzo-mbsk
See Translation

My favorite Ghazal of these legends Jagjit Singh and...

ज़ख़्म जो आप की इनायत है



ज़ख़्म जो आप की इनायत है इस निशानी को नाम क्या दे हम
प्यार दीवार बन के रह गया है इस कहानी को नाम क्या दे हम

आप इल्ज़ाम धर गये हम पर एक एहसान कर गये हम पर
आप की ये मेहरबानी है मेहरबानी को नाम क्या दे हम

आपको यूँ ही ज़िन्दगी समझा धूप को हमने चाँदनी समझा
भूल ही भूल जिस की आदत है इस जवानी को नाम क्या दे हम

रात सपना बहार का देखा दिन हुआ तो ग़ुबार सा देखा
बेवफ़ा वक़्त बेज़ुबाँ निकला बेज़ुबानी को नाम क्या दे हम

~ सुदर्शन फ़ाकिर
 

  Sep 3, 2012| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Thursday, April 2, 2015

पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम


पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम
पत्थर के ही इंसान पायें हैं
तुम शहर-ऐ-मोहब्बत कहते हो
हम जान बचा कर आए हैं

बुतखाना समझते हो जिसको
पूछो ना वहां क्या हालत है
हम लोग वहीँ से लौटे हैं
बस शुक्र करो लौट आए हैं

हम सोच रहे हैं मुद्दत से
अब उम्र गुजारें भी तो कहाँ
सेहरा में खुशी के फूल नहीं
शहरों में ग़मों के साए हैं

होठों पे तबस्सुम हल्का-सा
आँखों में नमी-सी ए फाकिर
हम अहल-ऐ-मोहब्बत पर अक्सर
ऐसे भी ज़माने आए हैं.

~ सुदर्शन फ़ाकिर,



  Oct 10, 2012| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Wednesday, April 1, 2015

वो मेरे है मुझे मिल जाऎगे


वो मेरे है मुझे मिल जाऎगे, आ जाऎगे
ऐसे बेकार खय़ालात ने दिल तोड़ दिया

wo mere hain mil jaaynege, aa jaayenge
aise bekaar khayalat ne dil tod diya

~ सुदर्शन फ़ाकिर

  Dec 9, 2012| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Monday, March 30, 2015

आज तुम से बिछड़ रहा हूँ


आज तुम से बिछड़ रहा हूँ
आज कहता हूँ फिर मिलूँगा तुम से
तुम मेरा इंतज़ार करती रहो
आज का ऐतबार करती रहो

लोग कहते हैं वक़्त चलता है
और इंसान भी बदलता है
काश रुक जाये वक़्त आज की रात
और बदले न कोई आज के बाद

वक़्त बदले, ये दिल न बदलेगा
तुम से रिश्ता कभी न टूटेगा
तुम ही ख़ुश्बू हो मेरी साँसों की
तुम ही मंज़िल हो मेरे सपनों की

लोग बोते हैं प्यार के सपने
और सपने बिखर भी जाते हैं
एक एहसास ही तो है ये वफ़ा
और एहसास मर भी जाते हैं

~ सुदर्शन फ़ाकिर


   Feb 24, 2013| e-kavya.blogspot.com 
   Submitted by: Ashok Singh

Saturday, November 29, 2014

ज़ख़्म जो आप की इनायत है



ज़ख़्म जो आप की इनायत है इस निशानी को नाम क्या दे हम
प्यार दीवार बन के रह गया है इस कहानी को नाम क्या दे हम

आप इल्ज़ाम धर गये हम पर एक एहसान कर गये हम पर
आप की ये मेहरबानी है मेहरबानी को नाम क्या दे हम

आपको यूँ ही ज़िन्दगी समझा धूप को हमने चाँदनी समझा
भूल ही भूल जिस की आदत है इस जवानी को नाम क्या दे हम

रात सपना बहार का देखा दिन हुआ तो ग़ुबार सा देखा
बेवफ़ा वक़्त बेज़ुबाँ निकला बेज़ुबानी को नाम क्या दे हम

~ सुदर्शन फ़ाकिर


   March 16, 2013 | e-kavya.blogspot.com
   Ashok Singh

Monday, November 24, 2014

ज़िन्दगी मेरे घर आना


 
ज़िन्दगी मेरे घर आना, आना ज़िन्दगी

मेरे घर का सीधा सा इतना पता है
ये घर जो है चारों तरफ से खुला है
न दस्तक ज़रूरी न आवाज़ देना
मेरे घर का दरवाज़ा कोई नहीं हैं
है दीवारें गुम और छत भी नहीं है
बड़ी धूप है दोस्त, कड़ी धूप है दोस्त
तेरे आँचल का साया चुराके
जीना है जीना, जीना ज़िन्दगी

मेरे घर का सीधा सा इतना पता है
मेरे घर के आगे मोहब्बत लिखा है
न दस्तक ज़रूरी, न आवाज़ देना
में साँसों की रफ़्तार से जान लूंगी
हवाओं की खुशबू से पहचान लूंगी
तेरी फूल हूँ दोस्त, तेरी धूल हूँ दोस्त
तेरे हाथों में चेहरा छुपा के
जीना है जीना, जीना ज़िन्दगी

मगर अब जो आना तो धीरे से आना,
यहाँ एक शहज़ादी सोयी हुई है
ये परियों की सपनों में खोई हुई है
बड़ी खूब है ये, तेरा रूप है ये
तेरे आँगन में, तेरे दामन में
ओ तेरी आँखों पे, तेरी पलकों पे
तेरे क़दमों में, इस को बिठा के
जीना है जीना, जीना ज़िन्दगी

~ सुदर्शन फ़ाकिर

   August 2, 2013

इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने

 

इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया
वर्ना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया

आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया

रोनेवालों से कह दो उनका भी रोना रोलें
जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया

तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था
तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया

एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें "फ़ाकिर"
हम को हर रोज़ के सदमात ने रोने न दिया

~ सुदर्शन फ़ाकिर

   August 9, 2013

Saturday, November 22, 2014

फ़ल्सफ़े इश्क़ में पेश आये



फ़ल्सफ़े इश्क़ में पेश आये सवालों की तरह
हम परेशाँ ही रहे अपने ख़यालों की तरह

शीशागर बैठे रहे ज़िक्र-ए-मसीहा लेकर
और हम टूट गये काँच के प्यालों की तरह

जब भी अंजाम-ए-मुहब्बत ने पुकार ख़ुद को
वक़्त ने पेश किया हम को मिसालों की तरह

ज़िक्र जब होगा मुहब्बत में तबाही का कहीं
याद हम आयेंगे दुनिया को हवालों की तरह

~
   Oct. 17, 2013

शैख़ जी थोड़ी सी पीकर



शैख़ जी थोड़ी सी पीकर आइये
मय है क्या शय फिर हमें बतलाइये

आप क्यों हैं सारी दुनिया से ख़फ़ा
आप भी दुश्मन मेरे बन जाइये

क्या है अच्छा क्या बुरा बंदा-नवाज़
आप समझें तो हमें समझाइये

जाने दीजे अक़्ल की बातें जनाब
दिल की सुनिये और पीते जाइये

~ सुदर्शन फ़ाकिर

   Nov 7, 2013