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Sunday, October 14, 2018

कोई हसरत भी नहीं

 
कोई हसरत भी नहीं कोई तमन्ना भी नहीं
दिल वो आँसू जो किसी आँख से छलका भी नहीं

रूठ कर बैठ गई हिम्मत-ए-दुश्वार-पसंद
राह में अब कोई जलता हुआ सहरा भी नहीं

आगे कुछ लोग हमें देख के हँस देते थे
अब ये आलम है कोई देखने वाला भी नहीं

दर्द वो आग कि बुझती नहीं जलती भी नहीं
याद वो ज़ख़्म कि भरता नहीं रिसता भी नहीं

बादबाँ खोल के बैठे हैं सफ़ीनों वाले
पार उतरने के लिए हल्का सा झोंका भी नहीं

~ अहमद राही

  Oct 14, 2018 | e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

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