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Sunday, October 28, 2018

एक दो पल तो ज़रा और रुको



एक दो पल तो ज़रा और रुको
ऐसी जल्दी भी भला क्या है चले जाना तुम
शाम महकी है अभी और न पलकों पे सितारे जागे
हम सर-ए-राह अचानक ही सही
मुद्दतों बा'द मिले हैं तो न मिलने की शिकायत कैसी

फ़ुर्सतें किस को मयस्सर हैं यहाँ
आओ दो-चार क़दम और ज़रा साथ चलें
शहर-ए-अफ़्सुर्दा के माथे पे बुझी शाम की राख
ज़र्द पत्तों में सिमटती देखें
फिर उसी ख़ाक-ब-दामाँ पल से
अपने गुज़रे हुए कल की ख़ुश-बू
लम्हा-ए-हाल में शामिल कर के
अपनी बे-ख़्वाब मसाफ़त का इज़ाला कर लें
अपने होने का यक़ीं
और न होने का तमाशा कर लें
आज की शाम सितारा कर लें

**सर-ए-राह=रास्ते पर; शहर-ए-अफ़्सुर्दा=उदास शहर; दामाँ=कोना; ज़र्द=पीली; लम्हा-ए-हाल=वर्तमान; मसाफ़त=यात्रा; इज़ाला=क्षतिपूर्ति

~ ख़ालिद मोईन


  Oct 28, 2018 | e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

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