Disable Copy Text

Showing posts with label नज़्म. Show all posts
Showing posts with label नज़्म. Show all posts

Wednesday, October 20, 2021

जो न मिल सके वो ही बेवफा

  

जो ना मिल सके वो ही बेवफा, ये बड़ी अजीब सी बात है
जो चला गया मुझे छोड़ कर, वो ही आज तक मेरे साथ है
जो न मिल सके वो ही बेवफा

जो किसी नज़र से अता हुई, वही रोशनी है ख़याल में
जो किसी नज़र से अता हुई, वही रोशनी है ख़याल में
वो ना आ सके रहु हूंतज़ार, ये खलिश कहा थे वे साल में
मेरी जूसतुजू को खबर नही, ना वो दिन रहे ना वो रात है
जो चला गया मुझे छोड़ कर, वो ही आज तक मेरे साथ है
जो न मिल सके वो ही बेवफा

करे प्यार लब पे गीला ना हो, ये किसी किसी का नसीब है
करे प्यार लब पे गीला ना हो, ये किसी किसी का नसीब है
ये करम है उसका जफ़ा नही, वो जुदा भी रह के करीब है
वोही आँख है मेरे रूबरू, उसी हाथ में मेरा हाथ है
जो चला गया मुझे छोड़ कर, वो ही आज तक मेरे साथ है
जो न मिल सके वो ही बेवफा

मेरा नाम तक जो ना ले सका, जो मुझे क़रार ना दे सका
मेरा नाम तक जो ना ले सका, जो मुझे क़रार ना दे सका
जिसे इकतियार तो था मगर, मुझे अपना प्यार ना दे सका
वोही शख़्श मेरी तलाश हैं, वोही दर्द मेरी हयात हैं
जो चला गया मुझे छोड़ कर, वो ही आज तक मेरे साथ हैं
जो न मिल सके वो ही बेवफा

~ ख़्वाजा परवेज़

Oct1 20, 2021 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Wednesday, March 17, 2021

दिल-ए-मजबूर तू मुझ को


दिल-ए-मजबूर तू मुझ को किसी ऐसी जगह ले चल
जहाँ महबूब महबूबा से आज़ादाना मिलता हो
किसी का नर्म-ओ-नाज़ुक हाथ अपने हाथ में ले कर
निकल सकता हो बे-खटके कोई सैर-ए-गुलिस्ताँ को

निगाहों के जहाँ पहरे न हों दिल के धड़कने पर
जहाँ छीनी न जाती हो ख़ुशी अहल-ए-मोहब्बत की
जहाँ अरमाँ भरे दिल ख़ून के आँसू न रोते हों
जहाँ रौंदी न जाती हो ख़ुशी अहल-ए-मोहब्बत की
*अहल-ए-मोहब्बत=मोहब्बत के लोग

जहाँ जज़्बात अहल-ए-दिल के ठुकराए न जाते हों
जहाँ बाग़ी न कहता हो कोई ख़ुद्दार इंसाँ को
जहाँ बरसाए जाते हों न कूड़े ज़ेहन-ए-इंसाँ पर
ख़यालों को जहाँ ज़ंजीर पहनाई न जाती हो
*अहल-ए-दिल=अच्छे दिल वाले लोग

कहाँ तक ऐ दिल-ए-नादाँ क़याम ऐसे गुलिस्ताँ में
जहाँ बहता हो ख़ून-ए-गर्म-ए-इंसाँ शाह-राहों पर
दरिंदों की जहाँ चाँदी हो ज़ालिम दनदनाते हों
झपट पड़ते हों शाहीं जिस जगह कमज़ोर चिड़ियों पर
*क़याम=ठहरना; शाह-राह=हाइ-वे

दिल-ए-मजबूर तू मुझ को किसी ऐसी जगह ले चल
जहाँ महबूब महबूबा से आज़ादाना मिलता हो

~ राजेन्द्र नाथ रहबर

Mar 17, 2021 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Tuesday, February 2, 2021

हमें मिट्टी ही रहने दो


गढ़ो मत चाक पे रख के
कोई कूज़ा सुराही या घड़ा प्याला
तुम्हारी सोच के ये नक़्श हैं सारे
तुम्हारी ख़्वाहिशों के रंग भर दिलकश
हमें मिट्टी ही रहने दो
हमें कब चाहिए ऐसी अता
बख़्शी हुई सूरत
हमें मिट्टी ही रहने दो
जो नम बारिश से हो
ज़रख़ेज़ हो फ़स्लें उगाती हो
ज़रा सी बीज को पौदा बनाती हो
कि वो पौदा शजर बन कर
तुम्हारी रहगुज़र को छाँव देता है
वही रस्ता तुम्हारी मंज़िलें आसान करता है
हमें मिट्टी ही रहने दो
नुमाइश के सजावट के
हमें सामान क्यूँ होना
नुमू से क्यूँ हमें महरूम करते हो
तुम्हारे पाँव के नीचे ज़मीं क़ाएम रहे जानाँ
हमें मिट्टी ही रहने दो

~ कहकशाँ तबस्सुम

Feb 02, 2021 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

 

Wednesday, December 16, 2020

कैसा सुनसान है दश्त-ए-आवारगी


कैसा सुनसान है दश्त-ए-आवारगी
हर तरफ़ धूप है हर तरफ़ तिश्नगी
कैसी बे-जान है मय-कदे की फ़ज़ा
जिस्म की सनसनी रूह की ख़स्तगी
इस दो-राहे पे खोए गए हौसले
इस अंधेरे में गुम हो गई ज़िंदगी
*तिश्नगी=प्यास;  ख़स्तगी=शिथिलता

ऐ ग़म-ए-आरज़ू मैं बहुत थक गया
मुझ को दे दे वही मेरी अपनी गली
छोटा-मोटा मगर ख़ूब-सूरत सा घर
घर के आँगन में ख़ुश्बू सी फैली हुई
मुँह धुलाती सवेरे की पहली किरन
साएबाँ पर अमर-बेल महकी हुई
खिड़कियों पर हवाओं की अटखेलियाँ
रौज़न-ए-दर से छनती हुई रौशनी
शाम को हल्का हल्का उठता धुआँ
पास चूल्हे के बैठी हुई लक्छमी
*साएबाँ=छज्जा; रौज़न-ए-दर=दरवाज़े की दरार

इक अँगीठी में कोयले दहकते हुए
बर्तनों की सुहानी मधुर रागनी
रस-भरे गीत मासूम से क़हक़हे
रात को छत पे छिटकी हुई चाँदनी
सुब्ह को अपने स्कूल जाते हुए
मेरे नन्हे के चेहरे पे इक ताज़गी
रिश्ते-नाते मुलाक़ातें मेहमानियाँ
दावतें जश्न त्यौहार शादी ग़मी

जी में है अपनी आज़ादियाँ बेच कर
आज ले लूँ ये पाबंदियों की ख़ुशी

~ ख़लील-उर-रहमान आज़मी 

Dec 16, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Monday, December 7, 2020

धीरे धीरे गिर रही थीं

 

धीरे धीरे गिर रही थीं नख़्ल-ए-शब से चाँदनी की पत्तियाँ
बहते बहते अब्र का टुकड़ा कहीं से आ गया था दरमियाँ
मिलते मिलते रह गई थीं मख़मलीं सब्ज़े पे दो परछाइयाँ
जिस तरह सपने के झूले से कोई अंधे कुएँ में जा गिरे 


*नख़्ल-ए-शब=रात के पेड़; अब्र=बादल; सब्ज़े=हरियाली

ना-गहाँ कजला गए थे शर्मगीं आँखों के नूरानी दिए
जिस तरह शोर-ए-जरस से कोई वामाँदा मुसाफ़िर चौंक उठे
यक-ब-यक घबरा के वो निकली थी मेरे बाज़ुओं की क़ैद से
अब सुलगते रह गए थे, छिन गया था जाम भी
और मेरी बेबसी पर हँस पड़ी थी चाँदनी 


*ना-गहाँ=अचानक; कजला=कुम्हला; शोर-ए-जरस=घंटी की आवाज़; वामाँदा=थका हुआ

आज तक एहसास की चिलमन से उलझा है ये मुबहम सा सवाल
उस ने आख़िर क्यूँ बुना था बहकी नज़रों से हसीं चाहत का जाल
 *चिलमन=परदा; मुबहम=धुँधला


~ शकेब जलाली

Dec 08, 2020| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
 

Friday, December 4, 2020

अजब समाँ है


अजब समाँ है
मैं बंद आँखों से तक रही हूँ
ख़ुमार-ए-शब में गुलाब-रुत की रफ़ाक़तों से महक रही हूँ
वो नर्म ख़ुशबू की तरह दिल में उतर रहा है
में क़ुर्ब-ए-जाँ की लताफ़तों से बहक रही हूँ
ये चाहतों की हसीन बारिश का मो'जिज़ा है
कि मेरी पोरें सुलग रही हैं
मैं क़तरा क़तरा पिघल रही हूँ
मैं रंग-ओ-ख़ुशबू का लम्स पा कर
वफ़ा के पैकर में ढल रही हूँ

न मैं ज़मीं पर
न आसमाँ में
वो ऐसा जादू जगा रहा है
गुलाबी बारिश सुनहरे सपनों के सारे मतलब वो धीरे धीरे सुझा रहा है
मुझे वो मुझ से चुरा रहा है

*ख़ुमार-ए-शब=रात का नशा; रफ़ाक़त=साथ; क़ुर्ब-ए-जाँ=जीवन का सामीप्य; लताफ़त=आनंद; मो’जिज़ा=चमत्कार; लम्स=स्पर्श; पैकर=आकार (शरीर)

~ नाज़ बट

Dec 04, 2020| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
 

Sunday, November 8, 2020

अपनी फ़ितरत की बुलंदी पे मुझे नाज़ है कब

 


अपनी फ़ितरत की बुलंदी पे मुझे नाज़ है कब

हाँ तिरी पस्त निगाही से गिला है मुझ को
तू गिरा देगी मुझे अपनी नज़र से वर्ना
तेरे क़दमों पे तो सज्दा भी रवा है मुझ को
*सज़्दा=सर झुकाना; रवा=मंज़ूर
 
तू ने हर आन बदलती हुई इस दुनिया में
मेरी पाइंदगी ए ग़म को तो देखा होता
कलियाँ बे ज़ार हैं शबनम के तलव्वुन से मगर
तू ने इस दीदा ए पुर नम को तो देखा होता
*पाइंदगी ए ग़म=हमेशा रहने वाला दुख; बेज़ार=उकताया; तलव्वुन=रंग बदलना; दीदा ए पुर नम=नम आँखें
 
हाए जलती हुई हसरत ये तिरी आँखों में
कहीं मिल जाए मोहब्बत का सहारा तुझ को
अपनी पस्ती का भी एहसास फिर इतना एहसास
कि नहीं मेरी मोहब्बत भी गवारा तुझ को

और ये ज़र्द से रुख़्सार ये अश्कों की क़तार
मुझ से बे ज़ार मिरी अर्ज़ ए वफ़ा से बे ज़ार
*ज़र्द=पीले; अर्ज़ ए वफ़ा =

~ मुईन अहसन जज़्बी

Nov 08, 2020| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
 

 

Sunday, October 11, 2020

रात के सुरमई अँधेरों में - तुम्हारी याद

 

रात के सुरमई अँधेरों में
साँस लेते हुए सवेरों में
आबजू के हसीं किनारों पर
ख़्वाब-आलूद रहगुज़ारों पर
*आबज़ू=नदी; ख़्वाब-आलूद=सपनों से मिश्रित

गुल्सितानों की सैर गाहों में
ज़िंदगी की हसीन राहों में
मय-ए-रंगीं का जाम उठाते वक़्त
रंज-ओ-ग़म की हँसी उड़ाते वक़्त

शादमानी में ग़म के तूफ़ाँ में
रौनक़-ए-शहर में बयाबाँ में
रक़्स करती हुई बहारों में
ख़ून-आशाम ख़ार-ज़ारों में
*शादमानी=ख़ुशी; रक़्स=नृत्य; ख़ून-आशाम=ख़ून से प्यासे; ख़ार-ज़ारों=कंटकी जगह

दोपहर हो कि नूर का तड़का
फ़स्ल-ए-गुल हो कि दौर पतझड़ का
सुब्ह के वक़्त शाम के हंगाम
बे-क़ुयूद-ए-मक़ाम बे-हंगाम
*हंगाम=जगहें; क़यूद=क़ैद (बहु-वचन)

दामन-ए-दिल को थाम लेती है
कितनी गुस्ताख़ है तुम्हारी याद

~ राजेन्द्र नाथ रहबर

Oct 11, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Sunday, September 27, 2020

श्यामल रंग

  

हज़ारों साल बीते
मिरी ज़रख़ेज़ (उपजाऊ) धरती के सिंघासन पर
बिराजे देवताओं के सरापे (रूप) साँवले थे
मगर उस वक़्त भी कुछ हुस्न का मेआ'र (स्तर) ऊँचा था
हिमाला की हसीं बेटी उन्हें भाई
बृन्दाबन की धरती पर
थिरकती नाचती राधा
बसी थी कृष्ण के दिल में
उन्हें भी हुस्न की मन-मोहनी मूरत पसंद आई
मगर उन को ख़ुदा होते हुए भी ये ख़बर कब थी
कि उन की आने वाली नस्ल पर उन का सरापा (सर से पाँव तक)
बहुत गहरा असर है छोड़ने वाला
हज़ारों साल बीते
मगर अब भी हमारी साँवली रंगत
तिरा वरदान हो गोया
हमारा हम-सफ़र भी किसी पारो
किसी राधा का अंधा ख़्वाब
आँखों में बसाए
लिए कश्कोल (भीख का कटोरा) हाथों में
फिरे बस्ती की गलियों में
हम अब किस ज़ो'म (घमंड) में पूजा की थाली में
दिए रख कर
तिरी चौखट पे आएँ
सर झुकाएँ
उतारें आरती तेरी
हमारे बख़्त (भाग्य) पर तेरा ये श्यामल रंग
इक आसेब (भूत-प्रेत) की सूरत मुसल्लत (लगातार) है
हम अब तो डर के मारे
आइनों से मुँह छुपाए फिर रहे हैं

~ कहकशाँ तबस्सुम

Sep 27, 2020| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
 

Thursday, September 24, 2020

क्यूँ मिरी तल्ख़-नवाई से ख़फ़ा होते हो

क्यूँ मिरी तल्ख़-नवाई से ख़फ़ा होते हो
ज़हर ही मुझ को मिला ज़हर पिया है मैं ने
कोई इस दश्त-ए-जुनूँ में मिरी वहशत देखे
अपने ही चाक-ए-गरेबाँ को सिया है मैं ने
*तल्ख़-नवाई=कड़वा कहना; वहशत=डर; फटा दामन

दैर ओ काबा में जलाए मिरी वहशत ने चराग़
मेरी मेहराब-ए-तमन्ना में अँधेरा ही रहा
रुख़-ए-तारीख़ पे है मेरे लहू का ग़ाज़ा
फिर भी हालात की आँखों में खटकता ही रहा
मैं ने खींची है ये मय मैं ने ही ढाले हैं ये जाम
पर अज़ल से जो मैं प्यासा था तो प्यासा ही रहा
ये हसीं अतलस-ओ-कम-ख़्वाब बुने हैं मैं ने
मेरे हिस्से में मगर दूर का जल्वा ही रहा

*दैर=मंदिर, काबा=मक्का का पवित्र स्थान; गाज़ा=मुँह पर मलने का पाउडर; अज़ल=आदि; अतलस-ओ-कम-ख़्वाब=रेशमी और बूटेदार

मुझ पे अब तक न पड़ी मेरे मसीहा की नज़र
मेरे ख़्वाबों की ये बेचैन ज़ुलेखाएँ हैं
जिन को ताबीर का वो यूसुफ़-ए-कनआँ न मिला
मैं ने हर लहजा में लोगों से कही बात मगर
जो मिरी बात समझता वो सुख़न-दाँ न मिला
कुफ़्र ओ इस्लाम की ख़ल्वत में भी जल्वत में भी
कोई काफ़िर न मिला कोई मुसलमाँ न मिला

*तासीर=सपने का अर्थ; सुख़न-दाँ=कविता समझने वाला; कुफ़्र=अविश्वास; ख़ल्वत=एकांत; जल्वत=प्रकट

मेरे माथे का अरक़ ढलता है टक्सालों में
पर मिरी जेब मिरे हाथ से शर्माई है
कभी मैं बढ़ के थपक देता हूँ रुख़्सार-ए-हयात
ज़िंदगी बैठ के मुझ को कभी समझाती है
रात ढलती है तो सन्नाटे की पगडंडी पर
अपने ख़्वाबों के तसव्वुर से हया आती है
*अरक़=पसीना; रुख़्सार-ए-हयात=जीवन का पहलू; तसव्वुर=कल्पना

क्यूँ मिरी तल्ख़-नवाई से ख़फ़ा होते हो
मेरी आवाज़ को ये ज़हर दिया है किस ने

~ राही मासूम रज़ा

Sep 23, 2020| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
 

Friday, July 3, 2020

ज़िंदगी है तो कोई बात नहीं


ज़िंदगी है तो कोई बात नहीं है ऐ दोस्त!

ज़िंदगी है तो बदल जाएँगे ये लैल ओ नहार
ये शब ओ रोज़, मह ओ साल गुज़र जाएँगे
हम से बे-मेहर ज़माने की नज़र के अतवार
आज बिगड़े हैं तो इक रोज़ सँवर जाएँगे
फ़ासलों मरहलों राहों की जुदाई क्या है
दिल मिले हैं तो निगाहों की जुदाई क्या है

*लैल ओ नहार=रात और दिन; बे-मेहर=प्यार रहित; अतवार=व्यवहार; मरहलों=पड़ाव

कुल्फ़त-ए-ज़ीस्त से इंसान परेशाँ ही सही
ज़ीस्त आशोब-ए-ग़म-ए-मर्ग का तूफ़ाँ ही सही
मिल ही जाता है सफ़ीनों को किनारा आख़िर
ज़िंदगी ढूँड ही लेती है सहारा आख़िर
इक न इक रोज़ शब-ए-ग़म की सहर भी होगी
ज़िंदगी है तो मसर्रत से बसर भी होगी

*कुल्फ़त-ए-ज़ीस्त=ज़िंदगी की परेशानियाँ; आशोब-ए-ग़म-ए-मर्ग=मृत्यु के दुख की उथल पुथल; सफ़ीना=नाव; शब-ए-ग़म=दुखों की रात; मसर्रत=ख़ुशी

ज़िंदगी है तो कोई बात नहीं है ऐ दोस्त!

~ सूफ़ी तबस्सुम

Jul 04, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Monday, June 1, 2020

वही प्यारे मधुर अल्फ़ाज़


वही प्यारे मधुर अल्फ़ाज़ मीठी रस-भरी बातें
वही रौशन रुपहले दिन वही महकी हुई रातें
वही मेरा ये कहना तुम बहुत ही ख़ूब-सूरत हो
तुम्हारे लब पे ये फ़िक़रा कि तुम ही मेरी क़िस्मत हो
वही मेरा पुराना गीत तुम बिन जी नहीं सकता
में उन होंटों की पी कर अब कोई मय पी नहीं सकता

ये सब कुछ ठीक है पर इस से जी घबरा भी जाता है
अगर मौसम न बदले आदमी उकता भी जाता है
कभी यूँ ही सही मैं और को अपना बना लेता
तुम्हारे दिल को ठुकराता तुम्हारी बद-दुआ लेता
कभी मैं भी ये सुनता तुम बड़े ही बे-मुरव्वत हो
कभी में भी ये कहता तुम तो सर-ता-पा हिमाक़त हो 
 
*सर-ता-पा=सर से पाँव तक; हिमाक़त=मूढ़ता

अब आओ ये भी कर देखें तो जीने का मज़ा आए
कोई खिड़की खुले इस घर की और ताज़ा हवा आए

~ ख़लील-उर-रहमान आज़मी

Jun 1, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Tuesday, May 12, 2020

सुनो हम दरख़्तों से

 
सुनो हम दरख़्तों से फल तोड़ते वक़्त
उन के लिए मातमी धुन बजाते नहीं
सुनो प्यार के क़हक़हों
और बोसों के मासूम लम्हों में हम
आँसुओं के दियों को जलाते नहीं
और तुम लम्स बोसों
सुलगती हुई गर्म साँसों में
आँसू मिलाने पे क्यूँ तुल गई हो

सुनो आँसुओं का मुक़द्दर
तुम्हारा मुक़द्दर नहीं
तुम अभी मौसमों से परे
अपनी रूदाद के सिलसिलों से परे
दूर तक जाओगी
कामराँ जाओगी
तुम न जाने कहाँ मेरी पर्वाज़ से
मेरी रफ़्तार से मेरी हर बात से
और भी दूर तक जाओगी
मैं कहीं राह में ख़ाक हो जाऊँगा
आँसुओं को बचा कर रखो
उन का भी एक समय आएगा

*लम्स=स्पर्श; रूदाद=कहानी; पर्वाज़=उड़ान; कामराँ=कामयाब

~ फ़ज़्ल ताबिश


May 12, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Sunday, March 22, 2020

हम



बिछी हुई है बिसात कब से
ज़माना शातिर है और हम
इस बिसात के ज़िश्त-ओ-ख़ूब-ख़ानों (कुरूप या सुघड़ दड़बों) में
दस्त-ए-नादीदा (अदृश्य हाथ) के इशारों पे चल रहे हैं
बिछी हुई है बिसात अज़ल (अनादि काल) से
बिछी हुई है बिसात जिस की न इब्तिदा है न इंतिहा है
बिसात (खेल की बाज़ी) ऐसा ख़ला (शून्य) है जो वुसअत-ए-तसव्वुर (कल्पना से) मावरा (परे) है
करिश्मा-ए-काएनात (सृष्टि का चमत्कार) क्या है
बिसात पर आते जाते मोहरों का सिलसिला है
बिसात साकित (चुप) है वक़्त-ए-मुतलक़ (सर्वोच्च)

बिसात बे-जुम्बिश (अचल) और बे-हिस (असंवेदन) है
अपने मोहरों से ला-तअल्लुक़ (सम्बंध) है
उस को इस से ग़रज़ नहीं है
कि कौन जीता है
और किस ने शिकस्त खाई
वजूद (अस्तित्व) हादिस (नया) वजूद मोहरे

बिसात-ए-साकित (बिसात/खेल बिछाने का कपड़ा) की वुस'अतों (क्षणों) में
ज़मीन अहल-ए-ज़मीन (धरती-वासी) अफ़्लाक (आसमान) अहल-ए-अफ़्लाक
अपनी अपनी मुअ'य्यना (पूर्व-निर्धारित) साअ'तों (समय) में ऐसे गुज़र रहे हैं
कि जैसे आँखों से ख़्वाब गुज़रें
बिसात पर जो भी है
वो होने की मोहलतों में असीर (बंदी)
पैहम (पहनावा) बदल रहा है
वजूद वो हिद्दत-ए-रवाँ (बहती हुई ऊर्जा) है
जो नित-नई हैअतों (रूपों) में बाक़ी है
और उस को फ़ना (विनाश) नहीं

जहाँ पहाड़ों के आसमाँ-बोस (गगन-चुम्बी) सिलसिले हैं
वहाँ कभी बहर (समुद्र) मौजज़न (प्रवाहित) थे
जहाँ बयाबाँ में रेत उड़ती है
बाद-ए-मस्मूम (विषैली हवा) गूँजती है
वहाँ कभी सब्ज़ा-ज़ार-ओ-गुल-गश्त (हरे भरे बाग़ में टहलने) का समाँ था
बुलंद-ओ-बाला (ऊँचे और बेहतर) हक़ीर-ओ-हेच (छोटे और छुद्र)
इस शिकस्त-ओ-ता'मीर (विनाश और सृजन) के तसलसुल (बहाव) में बह रहे हैं
शिकस्त-ओ-ता'मीर (विनाश और सृजन) के तसलसुल (बहाव) में तू है मैं हूँ

हम ऐसे मोहरे
जिन्हें इरादे दिए गए हैं
ये जन (अवाम) की तौफ़ीक़ (सामर्थ्य) पर हदें हैं
जिन्हें तमन्ना के रंग दिखला दिए गए हैं
मगर वसीलों (साधनों) पर क़दग़नें (प्रतिबंध)हैं
जिन्हें मोहब्बत के ढंग सिखला दिए गए हैं
प दस्त-ओ-पा (हाथ और पैर) में सलासिल-ए-नौ (नई जंज़ीरें) बनो
तो गर्दन में तौक़ (साँकल) पहना दिए गए हैं

जो है जो अब तक हुआ है जो हो रहा है
उस से किसे मफ़र है
कोई जो चाहे
कि अहद-ए-रफ़्ता (गुज़रे दिन) से एक पल फिर से लौट आए
कहा हुआ लफ़्ज़ अन-कहा हो सके
तो इस आरज़ू का हासिल वो जानता है
बहुत सही इख़्तियार-ओ-इम्काँ (नियंत्रण – सम्भावनाएँ)
बर्ग-ओ-ख़स (ख़स की पत्ती) की ताब-ओ-मजाल (ताक़त और हिम्मत) क्या है
नुमू-ए-ग़ुंचा (कली के उदय होने) में उस का अपना कमाल क्या है
तिरी निगाहों में तेरा ग़म कोह (पर्वत) से गिराँ-तर (ऊँचा) है
तू समझता है
तेरे सीने के सुर्ख़ लावे से
शहर-ओ-क़र्या (शहर – गाँव) पिघल रहे हैं
ख़िज़ाँ ज़मिस्ताँ (शीत ऋतु) तिरी उदासी के आइने हैं
तू मुश्तइ'ल (उत्तेजित) हो तो ज़लज़लों से ज़मीन काँपे
तुझे गुमाँ है
कि गुल खिले हैं तिरे तबस्सुम की पैरवी में
ये फूल को इख़्तियार कब था
कि कौन सी शाख़ पर खिले
कौन कुंज में मुस्कुराए
और किन फ़ज़ाओं में ख़ुशबुएँ बिखेरे
नहीफ़ (कोमल) शो'ला जमाल (सुंदरता) कोंपल
जो दस्त-ए-नाज़ुक (नर्म हाथों) की नर्म पोरों से धीरे धीरे
दरीचा-ए-शाख़ (शाख़ से दरार) खोल कर
सुब्ह की सफ़ेदी में झाँकती है
ये सोचती है
कि बाग़ सारा उसी के दम से महक रहा है
उसी के परतव (प्रतिबिम्ब) से गोशा गोशा (कोना कोना) दमक रहा है
उसी के दीदार में मगन
ख़ुशबुओं से बोझल हवाओं में
शोख़ तितलियाँ रक़्स (नृत्य) कर रही हैं

वो बे-ख़बर है
कि शातिर-ए-वक़्त (बेहद चालक वक़्त) की नज़र में
कोई इकाई
शजर (इंसान) हजर (वस्तु) हो कि ज़ी-नफ़्स (जीवित) हो
निज़ाम-ए-कुल (पूरे तंत्र) से अलग नहीं है
वो ये नहीं जानती कि हस्ती के कार-ख़ाने में
उस का होना न होना बे-नाम हादिसा है
और उस के हिस्से का कुल असासा (सम्पत्ति)
वो चंद लम्हे वो चंद साँसें हैं
जिन में वो ख़्वाब देखती है
सलीक़ा-ए-ज़ात (अपनी रीति) से चमन को सँवारने का
बहार-ए-जाँ (जीवन के वसंत) को निखारने का

~ ज़िया जालंधरी


Mar 22, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Saturday, March 21, 2020

आता है याद मुझ को गुज़रा हुआ ज़माना

Image may contain: plant, tree, flower, bridge, outdoor, nature and water


आता है याद मुझ को गुज़रा हुआ ज़माना 
वो बाग़ की बहारें वो सब का चहचहाना
आज़ादियाँ कहाँ वो अब अपने घोंसले की
अपनी ख़ुशी से आना अपनी ख़ुशी से जाना
लगती है चोट दिल पर आता है याद जिस दम
शबनम के आँसुओं पर कलियों का मुस्कुराना
वो प्यारी प्यारी सूरत वो कामनी सी मूरत
आबाद जिस के दम से था मेरा आशियाना
आती नहीं सदाएँ उस की मिरे क़फ़स में
होती मिरी रिहाई ऐ काश मेरे बस में

क्या बद-नसीब हूँ मैं घर को तरस रहा हूँ
साथी तो हैं वतन में मैं क़ैद में पड़ा हूँ
आई बहार कलियाँ फूलों की हंस रही हैं
मैं इस अँधेरे घर में क़िस्मत को रो रहा हूँ
इस क़ैद का इलाही दुखड़ा किसे सुनाऊँ
डर है यहीं क़फ़स में मैं ग़म से मर न जाऊँ

जब से चमन छुटा है ये हाल हो गया है
दिल ग़म को खा रहा है ग़म दिल को खा रहा है
गाना इसे समझ कर ख़ुश हों न सुनने वाले
दुखते हुए दिलों की फ़रियाद ये सदा है
आज़ाद मुझ को कर दे ओ क़ैद करने वाले
मैं बे-ज़बाँ हूँ क़ैदी तू छोड़ कर दुआ ले!

‍~ अल्लामा इक़बाल

Mar 21, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Sunday, March 15, 2020

क्या हाल कहें उस मौसम का


क्या हाल कहें उस मौसम का
जब जिंस-ए-जवानी सस्ती थी
जिस फूल को चूमो खुलता था
जिस शय को देखो हँसती थी
जीना सच्चा जीना था
हस्ती ऐन हस्ती थी
अफ़्साना जादू अफ़्सूँ था
ग़फ़लत नींदें मस्ती थी
उन बीते दिनों की बात है ये
जब दिल की बस्ती बस्ती थी

*जिंस-ए-जवानी=जवानी जैसी; अफ़्सूँ=जादुई; ग़फ़लत=असावधानी, बेपरवाही

ग़फ़लत नींदें हस्ती थी
आँखें क्या पैमाने थे
हर रोज़ जवानी बिकती थी
हर शाम-ओ-सहर बैआ'ने थे
हर ख़ार में इक बुत-ख़ाना था
हर फूल में सौ मय-ख़ाने थे
काली काली ज़ुल्फ़ें थीं
गोरे गोरे शाने थे
उन बीते दिनों की बात है ये
जब दिल की बस्ती बस्ती थी

*बैआ'ने=बयाना

गोरे गोरे शाने थे
हल्की-फुल्की बाँहें थीं
हर-गाम पे ख़ल्वत-ख़ाने थे
हर मोड़ पे इशरत-गाहें थीं
तुग़्यान ख़ुशी के आँसू थे
तकमील-ए-तरब की आहें थीं
इश्वे चुहलें ग़म्ज़े थे
पल्तीं ख़ुशियाँ चाहीं थीं
उन बीते दिनों की बात है ये
जब दिल की बस्ती बस्ती थी

*ख़ल्वत=निजी, गुप्त; इशरत-गाह=मज़े करने की जगह; तकमील-ए-तरब=उन्माद की चीखें; इश्वे=शोख़; ग़म्ज़े=शरारती इशारे

~ जोश मलीहाबादी


Mar 15, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Friday, March 13, 2020

अब सितारों में जवानी नहीं

 
अब सितारों में जवानी नहीं रक़्साँ कोई
चाँद के नूर में नग़्मात के सैलाब नहीं
दिल में बाक़ी नहीं उमडा हुआ तूफ़ाँ कोई
रूह अब हुस्न उचक लेने को बेताब नहीं

*रक़्साँ=नृत्य; सैलाब=बाढ़

अब फ़रोज़ाँ सी नहीं क़ौस-ए-क़ुज़ह की राहें
इन्ही राहों से उफ़ुक़ पार से घूम आते थे
मुंतज़िर अब नहीं फ़ितरत की गुलाबी बाहें
हम जिन्हें जा के शफ़क़-ज़ार से चूम आते थे

*फ़रोज़ाँ=रौशनी से भरी; क़ौस-ए-क़ुज़ह=इंद्रधनुष; उफ़ुक़=क्षितिज; मुंतज़िर=इंतज़ार; शफ़क़-ज़ार=उषा वर्ण

अब घटाओं में नहीं हौसले रिंदाना से
अब फ़ज़ाओं में हैं वलवले दीवाना से
रूह एहसास की तल्ख़ी से बुझी जाती है
ऐसे माहौल के ज़िंदाँ से रिहा कर मुझ को
वही पहले से हसीं ख़्वाब अता कर मुझ को

*रिंदाना=मतवालों; वलवले=ललक; ज़िंदाँ=जेल; अता=प्रदान

~ नज़ीर मिर्ज़ा बर्लास

Mar 13, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Sunday, February 16, 2020

घास भी मुझ जैसी है

Image may contain: 1 person, standing and outdoor

घास भी मुझ जैसी है
पाँव-तले बिछ कर ही ज़िंदगी की मुराद पाती है
मगर ये भीग कर किस बात गवाही बनती है
शर्मसारी की आँच की
कि जज़्बे की हिद्दत की
घास भी मुझ जैसी है

*मुराद=इच्छा; शर्मसारी=लज्जित; हिद्दत= तीव्रता

ज़रा सर उठाने के क़ाबिल हो
तो काटने वाली मशीन
उसे मख़मल बनाने का सौदा लिए
हमवार करती रहती है
औरत को भी हमवार करने के लिए
तुम कैसे कैसे जतन करते हो

*हमवार=समतल, सपाट

न ज़मीं की नुमू की ख़्वाहिश मरती है
न औरत की
मेरी मानो तो वही पगडंडी बनाने का ख़याल दुरुस्त था
जो हौसलों की शिकस्तों की आँच न सह सकें
वो पैवंद-ए-ज़मीं हो कर
यूँ ही ज़ोर-आवरों के लिए रास्ता बनाते हैं
मगर वो पर-ए-काह हैं
घास नहीं
घास तो मुझ जैसी है!

*नुमू=पैदावार; शिकस्त=पराजय; ज़ोर-आवरों=ज़बर्दस्त, ताक़तवर; पर-ए-काह=सूखी घास का बंडल

~ किश्वर नाहीद


Feb 16, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Saturday, February 8, 2020

जमाल-ए-बदन का ए'तिराफ़

Image may contain: 1 person, closeup

मुझे जमाल-ए-बदन का है ए'तिराफ़ मगर
मैं क्या करूँ कि वरा-ए-बदन भी देखता हूँ
ये काएनात फ़क़त एक रुख़ नहीं रखती
चमन भी देखता हूँ और बन भी देखता हूँ

*जमाल-ए-बदन=शरीर की सुंदरता; ए'तिराफ़=स्वीकार; वरा-ए-बदन=शरीर से परे; काएनात=सृष्टि

मिरी नज़र में हैं जब हुस्न के तमाम अंदाज़
मैं फ़न भी देखता हूँ फ़िक्र-ओ-फ़न भी देखता हूँ
निकल गया हूँ फ़रेब-ए-निगाह से आगे
मैं आसमाँ को शिकन-दर-शिकन भी देखता हूँ
वो आदमी कि सभी रोए जिन की मय्यत पर
मैं उस को ज़ेर-ए-कफ़न ख़ंदा-ज़न भी देखता हूँ

*शिकन=सिकुड़न; ज़ेर-ए-कफ़न=क़फ़न के नीचे[; ख़ंदा-ज़न=हँसने वाले

मैं जानता हूँ कि ख़ुर्शीद है जलाल-मआब
मगर ग़ुरूब से ख़ुद को रिहाई देता नहीं
मैं सोचता हूँ कि चाँद इक जमाल-पारा है
मगर वो रुख़ जो किसी को दिखाई देता नहीं

*ख़ुर्शीद=सूरज; जलाल-मआब=तेजस्वी; ग़ुरूब=अस्त; जमाल-पारा=सुंदरता की सीमा

मैं सोचता हूँ हक़ीक़त का ये तज़ाद है क्या
ख़ुदा जो देता है सब कुछ ख़ुदाई देता नहीं
वो लोग ज़ौक़ से आरी हैं जो ये कहते हैं
कि अश्क टूटता है और सुनाई देता नहीं
बदन भी आग है और रूह भी जहन्नम है
मिरा क़ुसूर ये है में दुहाई देता नहीं

*तजाद=विरोधाभास; ज़ौक़=आनंद; आरी=वंचित

~ अहमद नदीम क़ासमी


Feb 8, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Friday, February 7, 2020

एक उम्मीद

Image may contain: one or more people

दूर आँखों से बहुत दूर, कहीं
इक तसव्वुर है, जो बे-ज़ार किए रखता है
वो कोई ख़्वाब है या ख़्वाब का अंदेशा है
जो मिरे सोच को मिस्मार किए रखता है

*तसव्वुर=कल्पना; बे-ज़ार=उचाट; मिस्मार=तबाह

दूर, क़िस्मत की लकीरों से बहुत दूर, कहीं
एक चेहरा है, तिरे चेहरे से मिलता-जुलता
जो मुझे नींद में बेदार किए रखता है
दूर से, और बहुत दौर की आवाज़ों से
एक आवाज़ बुलाती है सर-ए-शाम मुझे
जानता हूँ मैं मोहब्बत की हक़ीक़त लेकिन
फिर भी आग़ोश-ए-तमन्ना में, तड़प उठता हूँ

*बेदार=जगाना; आग़ोश-ए-तमन्ना=आलिंगन की इच्छा

चेहरे चेहरे पे बिखरती हुई, आवाज़ों में
तेरी आवाज़ से आवाज़ कहाँ मिलती है
एक क़िंदील ख़यालों की मगर जलती है
तू मिरे पास, बहुत पास, कहीं रहती है
दूर है दूर बहुत दूर, मगर फिर भी, मुझे
एक उम्मीद सर-ए-शाम सजा रखती है
एक उलझन मुझे रातों को जगा रखती है

*किंदील=लैम्प

~ ख़ालिद मलिक साहि
ल

 Feb 7, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh