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Saturday, May 6, 2017

चाँद के साथ कई दर्द पुराने


चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले,
कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले।

हिज्र कि चोट अजब संग-शिकन होती है,
दिल की बेफ़ैज़ ज़मीनों से ख़ज़ाने निकले।
*हिज्र=जुदाई; बेफ़ैज़=बंजर

उम्र गुज़री है शब-ए-तार में आँखें मलते,
किस उफ़क़ से मेरा ख़ुर्शीद ना जाने निकले।
*शब-ए-तार=अंधेरी रात; उफ़क़=आसमान; ख़ुर्शीद=सूरज

कू-ए-क़ातिल में चले जैसे शहीदों का जुलूस,
ख़्वाब यूँ भीगती आँखों को सजाने निकले।
क़ू=गली

दिल ने इक ईंट से तामीर किया ताज महल,
तू ने इक बात कही लाख फ़साने निकले।
*तामीर=बनाया

मैंने 'अमजद' उसे बेवास्ता देखा ही नहीं,
वो तो ख़ुश्बू में भी आहट के बहाने निकले।
*बेवास्ता=बिना वज़ह

~ अमजद इस्लाम अमजद


  Apr 30, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

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