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Sunday, April 8, 2018

तुझ को मालूम नहीं


तुझ को मालूम नहीं तुझ को भला क्या मालूम

तेरे चेहरे के ये सादा से अछूते से नुक़ूश
मेरी तख़्ईल को क्या रंग अता करते हैं
तेरी ज़ुल्फ़ें तिरी आँखें तिरे आरिज़ तिरे होंट
कैसी अन-जानी सी मासूम ख़ता करते हैं

*नुक़ूश=चिन्ह; तख़्ईल=कल्पना; आरिज़=गाल

तेरे क़ामत का लचकता हुआ मग़रूर तनाव
जैसे फूलों से लदी शाख़ हवा में लहराए
वो छलकते हुए साग़र सी जवानी वो बदन
जैसे शो'ला सा निगाहों में लपक कर रह जाए

*क़ामत=क़द; मग़रूर=घमंडी

ख़ल्वत-ए-बज़्म हो या जल्वत-ए-तन्हाई हो
तेरा पैकर मिरी नज़रों में उभर आता है
कोई साअ'त हो कोई फ़िक्र हो कोई माहौल
मुझ को हर सम्त तिरा हुस्न नज़र आता है

*ख़ल्वत=एकांत; जल्वत=कोई रूप; पैकर=आकार; सा'अत=क्षण; सिम्त=तरफ

चलते चलते जो क़दम आप ठिठक जाते हैं
सोचता हूँ कि कहीं तू ने पुकारा तो नहीं
गुम सी हो जाती हैं नज़रें तो ख़याल आता है
इस में पिन्हाँ तिरी आँखों का इशारा तो नहीं

*पिन्हाँ=छुपा हुआ

धूप में साया भी होता है गुरेज़ाँ जिस दम
तेरी ज़ुल्फ़ें मिरे शानों पे बिखर जाती हैं
झुक के जब सर किसी पत्थर पे टिका देता हूँ
तेरी बाहें मिरी गर्दन में उतर आती हैं

*गुरेज़ाँ=पलायन; शाने=कंधों

आँख लगती है तो दिल को ये गुमाँ होता है
सर-ए-बालीं कोई बैठा है बड़े प्यार के साथ
मेरे बिखरे हुए उलझे हुए बालों में कोई
उँगलियाँ फेरता जाता है बड़े प्यार के साथ

*सर-ए-बालीं=छत पर

जाने क्यूँ तुझ से दिल-ए-ज़ार को इतनी है लगन
कैसी कैसी न तमन्नाओं की तम्हीद है तू
दिन में तू इक शब-ए-महताब है मेरी ख़ातिर
सर्द रातों में मिरे वास्ते ख़ुर्शीद है तू

*व्यथित हृदय; शब-ए-महताब=चाँदनी रात; ख़ुर्शीद=सूरज

अपनी दीवानगी-ए-शौक़ पे हँसता भी हूँ मैं
और फिर अपने ख़यालात में खो जाता हूँ
तुझ को अपनाने की हिम्मत है न खो देने का ज़र्फ़
कभी हँसते कभी रोते हुए सो जाता हूँ मैं
किस को मालूम मिरे ख़्वाबों की ताबीर है क्या
कौन जाने कि मिरे ग़म की हक़ीक़त क्या है

*ज़र्फ=सामर्थ्य; ख़्वाबों की ताबीर=सपनों का अर्थ

मैं समझ भी लूँ अगर इस को मोहब्बत का जुनूँ
तुझ को मालूम नहीं तुझ को न होगा मालूम

~ हिमायत अली शाएर

  Apr 8, 2018 | e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

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