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Friday, April 12, 2019

ओ देस से आने वाले बता

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ओ देस से आने वाला है बता
ओ देस से आने वाले बता, किस हाल में हैं यारान-ए-वतन
आवारा-ए-ग़ुर्बत को भी सुना, किस रंग में है कनआन-ए-वतन
वो बाग़-ए-वतन फ़िरदौस-ए-वतन, वो सर्व-ए-वतन रैहान-ए-वतन
ओ देस से आने वाले बता
ओ देस से आने वाले बता

क्या अब भी वहाँ के बाग़ों में, मस्ताना हवाएँ आती हैं
क्या अब भी वहाँ के पर्बत पर, घनघोर घटाएँ छाती हैं
क्या अब भी वहाँ की बरखाएँ, वैसे ही दिलों को भाती हैं
ओ देस से आने वाले बता, ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी वतन में वैसे ही, सरमस्त नज़ारे होते हैं
क्या अब भी सुहानी रातों को, वो चाँद सितारे होते हैं
हम खेल जो खेला करते थे, क्या अब वही सारे होते हैं
ओ देस से आने वाले बता
ओ देस से आने वाले बता

क्या अब भी शफ़क़ के सायों में, दिन रात के दामन मिलते हैं
क्या अब भी चमन में वैसे ही, ख़ुश-रंग शगूफ़े खिलते हैं
बरसाती हवा की लहरों से, भीगे हुए पौदे हिलते हैं
शादाब-ओ-शगुफ़्ता फूलों से, मामूर हैं गुलज़ार अब कि नहीं
बाज़ार में मालन लाती है, फूलों के गुँधे हार अब कि नहीं
और शौक़ से टूटे पड़ते हैं, नौ-उम्र ख़रीदार अब कि नहीं
ओ देस से आने वाले बता
ओ देस से आने वाले बता

क्या शाम पड़े गलियों में वही, दिलचस्प अँधेरा होता है
और सड़कों की धुँदली शम्ओं पर, सायों का बसेरा होता है
बाग़ों की घनेरी शाख़ों में, जिस तरह सवेरा होता है
क्या अब भी वहाँ वैसी ही जवाँ, और मध-भरी रातें होती हैं
क्या रात भर अब भी गीतों की, और प्यार की बातें होती हैं
वो हुस्न के जादू चलते हैं, वो इश्क़ की घातें होती हैं
ओ देस से आने वाले बता
ओ देस से आने वाले बता

क्या अब भी वहाँ के पनघट पर, पनहारियाँ पानी भरती हैं
अंगड़ाई का नक़्शा बन बन कर, सब माथे पे गागर धरती हैं
और अपने घरों को जाते हुए, हँसती हुई चुहलें करती हैं
बरसात के मौसम अब भी वहाँ, वैसे ही सुहाने होते हैं
क्या अब भी वहाँ के बाग़ों में, झूले और गाने होते हैं
और दूर कहीं कुछ देखते ही, नौ-उम्र दीवाने होते हैं
ओ देस से आने वाले बता
ओ देस से आने वाले बता

‍~ अख़्तर शीरानी


 Apr 12, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

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