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Sunday, April 7, 2019

देखना भी जुर्म है

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ज़िंदगी के जितने दरवाज़े हैं, मुझ पे बंद हैं
देखना हद्द-ए-नज़र से आगे बढ़ कर

देखना भी जुर्म है
सोचना अपने अक़ीदों (विश्वासों)
और यक़ीनों से निकल कर सोचना भी जुर्म है
आसमाँ-दर-आसमाँ असरार (रहस्य) की
परतें हटा कर झाँकना भी जुर्म है
क्यूँ भी कहना जुर्म है कैसे भी कहना जुर्म है

साँस लेने की तो आज़ादी मयस्सर है मगर
ज़िंदा रहने के लिए इंसान को
कुछ और भी दरकार (ज़रूरी) है
और इस कुछ और भी का
तज़्किरा (बात-चीत करना) भी जुर्म है
ऐ ख़ुदावंदान-ए-ऐवान-ए-अक़ाएद
(विश्वास के महलों के मसीहा)
ऐ हुनर-मन्दान-ए-आईन-ओ-सियासत
(व्यवस्था और राजनीति के सर्वज्ञ ज्ञाता)

ज़िंदगी के नाम पर बस इक इनायत (कृपा) चाहिए
मुझ को इन सारे जराएम (अपराध – बहुवचन) की इजाज़त चाहिए

~ अहमद नदीम क़ासमी


 Apr 07, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

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