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Saturday, July 13, 2019

इस पे भूले हो कि हर दिल को


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इस पे भूले हो कि हर दिल को कुचल डाला है
इस पे भूले हो कि हर गुल को मसल डाला है
और हर गोशा-ए-गुलज़ार में सन्नाटा है
*गोशा-ए-गुलज़ार=बाग के कोने कोने

किसी सीने में मगर एक फ़ुग़ाँ तो होगी
आज वो कुछ न सही कल को जवाँ तो होगी
*फ़ुग़ाँ=आह, फ़रियाद

वो जवाँ हो के अगर शोला-ए-जव्वाला बनी
वो जवाँ हो के अगर आतिश-ए-सद-साला बनी
*शोला-ए-जव्वाला=नाचता हुआ शोला; आतिश-ए-स्द-साल=सौ साल तक जलने वाली आग

ख़ुद ही सोचो कि सितम-गारों पे क्या गुज़रेगी
*सितम-गार=अत्याचारी

‍~ अली सरदार जाफ़री

 Jul 13, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

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