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Sunday, September 13, 2020

धीरे धीरे गिर रही थीं नख़्ल-ए-शब से

 

धीरे धीरे गिर रही थीं नख़्ल-ए-शब से चाँदनी की पत्तियाँ
बहते बहते अब्र का टुकड़ा कहीं से आ गया था दरमियाँ
मिलते मिलते रह गई थीं मख़मलीं सब्ज़े पे दो परछाइयाँ
जिस तरह सपने के झूले से कोई अंधे कुएँ में जा गिरे
ना-गहाँ कजला गए थे शर्मगीं आँखों के नूरानी दिए
जिस तरह शोर-ए-जरस से कोई वामाँदा मुसाफ़िर चौंक उठे
यक-ब-यक घबरा के वो निकली थी मेरे बाज़ुओं की क़ैद से
अब सुलगते रह गए थे, छिन गया था जाम भी
और मेरी बेबसी पर हँस पड़ी थी चाँदनी

*नख़्ल-ए-शब=रात का पेड़; अब्र=बादल; सब्ज़े=हरे-भरे; ना-गहाँ=अचानक; नूरानी=उज्ज्वल; शोर-ए-जरस=घंटी की आवाज़; वामादाँ=थका हुआ;

आज तक एहसास की चिलमन से उलझा है ये मुबहम सा सवाल
उस ने आख़िर क्यूँ बुना था बहकी नज़रों से हसीं चाहत का जाल 


*चिलमन=परदा; मुबहम=धुँधला;

‍~ शकेब जलाली

Sep 13, 2020| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
 

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