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Sunday, December 2, 2018

काली, जगमगाती, निराली रातें

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काली, जगमगाती, निराली रातें
रस भरी, मदमाती रातें
रात की रानी ख़ुश्बू से भरी
तारों की मद्धम नूरानी छाँव में
हल्की ठंडी रातें
बैसाखी हवाओं
''सारंगी की लम्बी अलकसी सिसकियों''
प्यार के राज़ों से बोझल
कहानी रातें
कहाँ खो गईं हैं या-रब?

खो जाएँ
तो फिर खो जाएँ
लेकिन वो मन-मोहक घड़ियाँ
ख़ून में जैसे घुल सी गई हैं
वो लड़खड़ाते, अधूरे, ना-मुकम्मल जुमले
अब भी साफ़ सुनाई देते हैं
अब्रुओं, पलकों माथे की शिकनों के
बाँके तिरछे पल पल बदलते ज़ावीए
जो क्या क्या कुछ कहते थे
दिखाई देते हैं
वो नित-नई अनोखी बे-इंतिहा ख़ुशियाँ
मौजूद भी हैं ज़िंदा भी
लेकिन दर्द-ओ-अलम की मौजें बन कर
दिल के गोशे गोशे में फैल गई हैं
ये तो सुना है ज़हर कभी अमृत बन जाता है
लेकिन जब अमृत ख़ुद ज़हरीला हो जाए
फिर आख़िर कोई कैसे जिए?

~ सज्जाद ज़हीर


 Dec 02, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, December 1, 2018

आज भी कितनी अन-गिनत शमएँ

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आज भी कितनी अन-गिनत शमएँ
मेरे सीने में झिलमिलाती हैं
कितने आरिज़ की झलकियाँ अब तक
दिल में सीमीं वरक़ लुटाती हैं
*आरिज़=गाल; सीमीं=चाँदी; वरक़=पन्ने

कितने हीरा-तराश जिस्मों की
बिजलियाँ दिल में कौंद जाती हैं
कितनी तारों से ख़ुश-नुमा आँखें
मेरी आँखों में मुस्कुराती हैं
कितने होंटों की गुल-फ़िशाँ आँचें
मेरे होंटों में सनसनाती हैं
कितनी शब-ताब रेशमी ज़ुल्फ़ें
मेरे बाज़ू पे सरसराती हैं
*गुल-फिशाँ=फूलों की बुहार; शब-ताब=जुगुनू

कितनी ख़ुश-रंग मोतियों से भरी
बालियाँ दिल में टिमटिमाती हैं
कितनी गोरी कलाइयों की लवें
दिल के गोशों में जगमगाती हैं
कितनी रंगीं हथेलियाँ छुप कर
धीमे धीमे कँवल जलाती हैं
कितनी आँचल से फूटती किरनें
मेरे पहलू में रसमसाती हैं
*गोशों=कोनों

कितनी पायल की शोख़ झंकारें
दिल में चिंगारियाँ उड़ाती हैं
कितनी अंगड़ाइयाँ धनक बन कर
ख़ुद उभरती हैं टूट जाती हैं
कितनी गुल-पोश नक़्रई बाँहें
दिल को हल्क़े में ले के गाती हैं
आज भी कितनी अन-गिनत शमएँ
मेरे सीने में झिलमिलाती हैं
*धनक=इंद्रधनुष; गुलपोश=फूलों से सजी; नक़ई=चाँदी

अपने इस जल्वा-गर तसव्वुर की
जाँ-फ़ज़ा दिलकशी से ज़िंदा हूँ
इन ही बीते जवान लम्हों की
शोख़-ताबिंदगी से ज़िंदा हूँ
यही यादों की रौशनी तो है
आज जिस रौशनी से ज़िंदा हूँ
आओ मैं तुम से ए'तिराफ़ करूँ
मैं इसी शाइरी से ज़िंदा हूँ
*जल्वा-गर=रौशन; जाँ-फ़ज़ाँ=ज़िंदगी बढ़ाने वाला; शोख़-ताबिंदगी=शरारती चका चौंध; ए’तिराफ़=स्वीकार करना

~ जाँ निसार अख़्तर


 Dec 01, 2018 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, November 30, 2018

तेरा चेहरा सादा काग़ज़

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तेरा चेहरा सादा काग़ज़
है तअस्सुर कोरा कोरा
दाग़ है कोई न कोई नक़्श है!
क्यूँ ये खिड़की बंद है?

*तअस्सुर=भाव, मुद्रा; नक़्स=चिन्ह

आ तुझे अपने लबों से चूम कर
तेरे चेहरे को बना दूँ एक अच्छी सी बयाज़
ताकि इस पर हरी घड़ी बनते रहें मिटते रहें
तेरे अंदर घूमते फिरते हुए
ना-शुनीदा और ना-गुफ़्ता हुरूफ़

*बयाज़=कविता लिखने की पुस्तिका; ना-शुनीदा=अन-सुने; ना-गुफ़्ता=अन-कहे; हुरूफ़=शब्द

आ ये खिड़की खोल दूँ
ताकि तेरा अंदरूँ
(तेरी पलकों की चिक़ों तक ही सही) बाहर तो आए
सादा काग़ज़ पर कोई तहरीर हो
चौखटे में कोई तो तस्वीर हो

*तहरीर=लिखावट

वर्ना ये बन जाएगा अख़बार
कारोबार-ए-ईन-ओ-आँ का इश्तिहार
वक़्त के तलवों से क़तरा क़तरा ख़ूँ
तेरे चेहरे पर टपकता जाएगा जम जाएगा
ना-शुनीदा और ना-गुफ़्ता हुरूफ़
गड्ड-मडा जाएँगे हो जाएँगे जम्बल-अप' बहम

*ईन-ओ-आँ=इनका और उनका; जम्बल-उप (jumple-up)=बेतरतीब; बहम=आपस में

बंद खिड़की के पटों पर शोख़ लड़के
कुछ का कुछ लिखते रहेंगे

~ अमीक़ हनफ़ी


 Nov 30, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, November 24, 2018

क़तरा क़तरा टपक रहा है लहू

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क़तरा क़तरा टपक रहा है लहू
लम्हा लम्हा पिघल रही है हयात
मेरे ज़ानू पे रख के सर अपना
रो रही है उदास तन्हाई
कितना गहरा है दर्द का रिश्ता
कितना ताज़ा है ज़ख्म-ए-रुस्वाई
हसरतों के दरीदा दामन में
जाने कब से छुपाए बैठा हूँ
दिल की महरूमियों का सरमाया
टूटे-फूटे शराब के साग़र
मोम-बत्ती के अध-जले टुकड़े
कुछ तराशे शिकस्ता नज़्मों के
उलझी उलझी उदास तहरीरें
गर्द-आलूद चंद तस्वीरें
मेरे कमरे में और कुछ भी नहीं
मेरे कमरे में और कुछ भी नहीं

*ज़ानू=घुटना; रुसवाई=बे-इज़्ज़ती; दरीदा=फटेहाल; महरूमियाँ=अभाव; शिकस्ता=(घसीट में लिखा हुआ), टूटा हुआ; गर्द-आलूद=धूल से भरी

वक़्त का झुर्रियों भरा चेहरा
काँपता है मिरी निगाहों में
खो गई है मुराद की मंज़िल
ग़म की ज़ुल्मत-फ़रोश राहों में
मेरे घर की पुरानी दीवारें
हर घड़ी देखती हैं ख़्वाब नए
पर मिरी रूह के ख़राबे में
कौन आएगा इतनी रात गए

*मुराद=इच्छा; ज़ुल्मत-फ़रोश=अत्याचारी; ख़राबे=बिगड़े हुए

ज़िंदगी मेहरबाँ नहीं तो फिर
मौत क्यूँ दर्द-आश्ना होगी
खटखटाया है किस ने दरवाज़ा
देखना सर-फिरी हवा होगी

~ प्रेम वरबारतोनी


 Nov 24, 2018 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, November 23, 2018

मेरे पास क्या कुछ नहीं है

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मेरे पास रातों की तारीकी* में
खिलने वाले फूल हैं
और बे-ख़्वाबी
दिनों की मुरझाई हुई रौशनी है
और बीनाई*
मेरे पास लौट जाने को एक माज़ी है
और याद...
मेरे पास मसरूफ़ियत की तमाम तर रंगा-रंगी है
और बे-मानवीयत
और इन सब से परे खुलने वाली आँख
मैं आसमाँ को ओढ़ कर चलता
और ज़मीन को बिछौना करता हूँ
जहाँ मैं हूँ
वहाँ अबदियत* अपनी गिरहें* खोलती है
जंगल झूमते हैं
बादल बरसते हैं
मोर नाचते हैं
मेरे सीने में एक समुंदर ने पनाह ले रक्खी है
मैं अपनी आग में जलता
अपनी बारिशों में नहाता हूँ
मेरी आवाज़ में
बहुत सी आवाज़ों ने घर कर रक्खा है
और मेरा लिबास
बहुत सी धज्जियों को जोड़ कर तय्यार किया गया है
मेरी आँखों में
एक गिरते हुए शहर का सारा मलबा है
और एक मुस्तक़िल इंतिज़ार
और आँसू
और इन आँसुओं से फूल खिलते हैं
तालाब बनते हैं
जिन में परिंदे नहाते हैं
हँसते और ख़्वाब देखते हैं
मेरे पास
दुनिया को सुनाने के लिए कुछ गीत हैं
और बताने के लिए कुछ बातें
मैं रद किए जाने की लज़्ज़त से आश्ना हूँ
और पज़ीराई* की दिल-नशीं मुस्कुराहट से
भरा रहता हूँ
मेरे पास
एक आशिक़ की वारफ़्तगी*
दर-गुज़र* और बे-नियाज़ी* है

तुम्हारी इस दुनिया में
मेरे पास क्या कुछ नहीं है
वक़्त और तुम पर इख़्तियार के सिवा?

*तारीकी=अंधेरा; अबदियत=नियमित रूप से; गिरहें=गाठें; मुस्तकिल=लगातार; पजीराई=स्वीकृति; वारफ़्तगी=अपनी ही धुन में; दर-गुज़र=क्षमा करना; बे-नियाज़ी=उपेक्षा का भाव

~ अबरार अहमद

 Nov 23, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Thursday, November 22, 2018

बिखरे हुए से ख़्वाब

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ख़्वाब कुछ बिखरे हुए से ख़्वाब हैं
कुछ अधूरी ख़्वाहिशें
तिश्ना-लब आवारगी के रोज़-ओ-शब
एक सहरा चार सू बिखरा हुआ
और क़दमों से थकन लिपटी हुई
एक गहरी बे-यक़ीनी के नुक़ूश
जाने कब से दो दिलों पर सब्त हैं
रात है और वसवसों की यूरिशें

*तिश्ना-लब=प्यासे होंठ; रोज़-ओ-शब=दिन और रात; चार सू=हर तरफ; नुक़ूश=नक़्श बहुवचन; सब्त=अंकित; वसवसों=सनक, झक; यूरिश=हमला

ये अचानक
ताक़ पे जलते दिए को क्या हुआ
सुब्ह होने में तो ख़ासी देर है
आइने और अक्स में दूरी है क्यूँ
रूह प्यासी है अज़ल से
दरमियाँ ताख़ीर का इक दश्त है
ना-गहाँ फिर ना-गहाँ
ये वही दस्तक वही आहट तो है

*अक्स=साया; अजल=आदिकाल; ताख़ीर=देर; दश्त=जंगल; ना-गहाँ=अचानक

हाँ मगर इन दूरियों मजबूरियों के दरमियाँ
कौन आएगा चलो फिर भी चलें
शायद उस को याद आए कोई भूली-बिसरी बात
वो दरीचा बंद है तो क्या हुआ
चाँद है उस बाम पर जागा हुआ

*दरीचा=खिड़की, झरोखा; बाम=छत

~ ख़ालिद मोईन

 Nov 22, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Wednesday, November 21, 2018

सोने वालो जागो

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सोने वालो जागो
जागो सोने वालो जागो
वक़्त के खोने वालो जागो

बाग़ में चिड़ियाँ बोल रही हैं
कलियाँ आँखें खोल रही हैं
फूल ख़ुशी से झूम रहे हैं
पत्तों का मुँह चूम रहे हैं
जाग उठे दरिया और नहरें
जाग उठीं मौजें और लहरें
नाव चलाने वाले जागे
पार लगाने वाले जागे
सारी दुनिया जाग रही है
काम की जानिब भाग रही है
लिखने पढ़ने वालो जागो
फूलने बढ़ने वालो जागो
वक़्त के खोने वालो जागो

मुँह धो-धा कर नाश्ता खाओ
बस्ता ले कर मदरसे जाओ
सुब्ह का सोना ख़ूब नहीं है
अच्छा ये उस्लूब नहीं है
जागो सोने वालो जागो
वक़्त के खोने वालो जागो

*उस्लूब=आचरण, व्यवहार

~ हफ़ीज़ जालंधरी


 Nov 21, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, November 18, 2018

वापसी की तमन्ना

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मैं ने सोचा तुम्हें मुद्दत से नहीं देखा है
दिल बहुत दिन से है बेचैन चलूँ घर हो आऊँ

दूर से घर नज़र आया रौशन
सारी बस्ती में मिला एक मिरा घर बे-ख़्वाब
पास पहुँचा तो वो देखा जो निगाहों में मिरी घूम रहा है अब तक
रौशन कमरे के अंदर,
और दहलीज़ पे तुम।

*बे-ख़्वाब=व्याकुल;

सुन के शायद मिरी चाप
तुम निकल आई थीं बिजली की तरह
और वहीं रुक सी गई थीं!
देर तक।

पाँव दहलीज़ पे चौखट पे रखे दोनों हाथ
बाल बिखराए हुए शानों पर
रौशनी पुश्त पे हाले की तरह
साँस की आमद-ओ-शुद थी न कोई जुम्बिश-ए-जिस्म
जैसे तस्वीर लगी हो
जैसे आसन पे खड़ी हो देवी

*शानो=कंधों; पुश्त=पीठ, हाले=halo; आमद-ओ-शुद=अस्तित्व; जुम्बिश-ए-जिस्म=हरकत

मैं ने सोचा अभी तुम ने मुझे पहचाना नहीं
बस इसी सोच में ले कर तुम्हें अंदर आया
पास बिठला के किया यूँही किसी बात का ज़िक्र
तुम ने बातें तो बहुत कीं मगर उन बातों में
कोई वाबस्तगी-ए-दिल
कोई मानूस इशारा
लब पे इज़हार-ए-ख़ुशी
न कोई ग़म की लकीर
अरे कुछ भी तो न था

*वाबस्तगी-ए-दिल=घनिष्टता; मानूस=अनौपचारिक

न वो हँसना, न वो रोना, न शिकायत, न गिला
न वो रग़बत की कोई चीज़ पकाने का ख़याल
न दरी ला के बिछाना न वो आँगन की लिपाई की कोई बात
न निगाहों में ये एहसास कि हम तुम दोनों
हैं कोई बीस बरस से इक साथ
लाख कोशिश पे भी तुम ने मुझे पहचाना नहीं
मैं ने जाना तुम्हें मैं ने भी नहीं पहचाना
एक इशारे में ज़माना ही बदल जाता है
सिलसिला उन्स ओ रिफ़ाक़त का कोई आज भी है
पर ये है और कोई
जिस से बाँधा है नया रिश्ता-ए-ज़ीस्त

*रगबत=दिलचस्पी; उन्स ओ रिफ़ाक़त=लगाव या दोस्ताना; रिश्ता-ए-ज़ीस्त=जीवन का रिश्ता

मैं भी हूँ और कोई, जिस के साथ
तुम भी हँस-बोल के रह लेती हो
वो भी थी और कोई
जो वहीं रुक गई उस चौखट पर
जैसे तस्वीर लगी हो
जैसे आसन पे खड़ी हो देवी

~ हबीब तनवीर 

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Saturday, November 17, 2018

जोगन, नैन मिले अनमोल

 
जोगन, नैन मिले अनमोल,
ओस कनों से कोमल सपने
पलकों-पलकों तौल!
जोगन, नैन मिले अनमोल!

इन सपनों की बात निराली,
दिन-दिन होली, रात दिवाली।
इनसे माँग नदी-झरनों के
मीठे-मीठे बोल !
जोगन, नैन मिले अनमोल!

सपनों का क्या ठौर-ठिकाना,
जाने कब आना, कब जाना।
नयन झरोखों से तू अपनी
दुनिया में रस घोल,
जोगन, नैन मिले अनमोल।

~ शतदल

  Nov 17, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, November 16, 2018

अल्ताफ़-ओ-करम

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अल्ताफ़-ओ-करम ग़ैज़-ओ-ग़ज़ब कुछ भी नहीं है
था पहले बहुत कुछ मगर अब कुछ भी नहीं है

*अल्ताफ़-ओ-करम=अनुग्रह व कृपा; ग़ैज़-ओ-ग़ज़ब=तमक और रोष

बरसात हो सूरज से समुंदर से उगे आग
मुमकिन है हर इक बात अजब कुछ भी नहीं है

दिल है कि हवेली कोई सुनसान सी जिस में
ख़्वाहिश है न हसरत न तलब कुछ भी नहीं है

अब ज़ीस्त भी इक लम्हा-ए-साकित है कि जिस में
हंगामा-ए-दिन गर्मी-ए-शब कुछ भी नहीं है

*जीस्त=जीवन; लम्हा-ए-साकित=एक चुप्पी भरा पल; हंगामा-ए-दिन=रौनकों से भरा दिन; गर्मी-ए-शब=लिप्सा से भरी रातें

सब क़ुव्वत-ए-बाज़ू के करिश्मात हैं 'राही'
क्या चीज़ है ये नाम-ओ-नसब कुछ भी नहीं है

*कुव्वत-ए-बाज़ू=बाज़ुओं की ताकत; नाम-ओ-नसब=नाम और कुल


~ महबूब राही, 

   Nov 16, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, November 11, 2018

अक्स

https://moderndaycontemplative.files.wordpress.com/2014/09/nature___rivers_and_lakes_flowering_trees_near_the_water_041725_.jpg

दरख़्तों! मुंतज़िर हो!
पानियों में झाँकते क्या हो?
खड़े हो साकित-ओ-जामिद
ख़ुद अपने अक्स की हैरानियों में गुम
तको इक दूसरे का मुँह
रहो यूँ ईस्तादा
पानियों को क्या
यूं हीं बहते रहेंगे

*मुंतज़िर=आशावान; चुपचाप और स्थिर; अक्स=प्रतिबिम्ब, ईस्ताद=खड़े

अक्स जो झलकेगा
सतह-ए-आब बस आईना बन कर जगमगाएगी
हवा जो मौज में आई
तो बस लहरों से खेलेगी!
तुम्हारे डगमगाते अक्स को
कोई सँभाला तक नहीं देगा!
तुम्हारे अपने पत्ते तालियाँ पीटेंगे
सन-सन सनसनाहट से हवा की
काँपती शाख़ें
करेंगी क्या
कनार-ए-आबजू मह-रू
तका करता था घंटों महवियत से
इश्तियाक़-ए-दीद का आलम
हर इक पत्ते की आँखों में
तुम्हारा दिलरुबा मह-रू
वो अब लौटे भला कैसे
दरख़्तो भूल सकती है कहाँ

*सतह-ए-आब=पानी की सतह; कनार-ए-आबजू=झरने का किनारा; मह-रू=चाँद सी शक्ल

वो शक्ल
जिस को देख कर पानी की आँखें
इस तरह से जगमगाती थीं
कि उस को देखने
क़ौस-ए-क़ुज़ह के रंग
हँसते खिलखिलाते
आ गले लगते थे लहरों से!

*क़ौस-ए-क़ुज़ह=इंद्रधनुष

कई इक बार तुम ने भी
उसी की चाह में
झुक कर
हवा-ए-तेज़ में भी
बे-ख़तर
चूमी थी पेशानी इसी पानी की
जो मिल कर हवाओं से
जड़ों में भर रहा है नम!
उसे किस बात का है ग़म
गिरोगे मुँह के बल तो
क़हक़हा पानी का सुन लेना!
तुम्हें अपनी तहों में यूँ छुपाएगा
ख़बर तक भी नहीं होगी किसी को
तुम यहाँ पर थे
बहा ले जाएगा
अंजान से उन साहिलों तक
और
वहाँ उन साहिलों पर
ख़स-ओ-ख़ाशाक में ढल कर
तुम्हारी मुंतज़िर आँखें सलामत रह गईं तो
देख लोगे ख़ुद
वही मह-रू
पलट कर जो कभी आया नहीं था!

*ख़स-ओ-ख़ाशाक =घास तिनके

~ आरिफ़ा शहज़ाद

  Nov 11, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, November 9, 2018

उजाला

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मेरी हमदम, मिरे ख़्वाबों की सुनहरी ताबीर
मुस्कुरा दे कि मिरे घर में उजाला हो जाए
आँख मलते हुए उठ जाए किरन बिस्तर से
सुब्ह का वक़्त ज़रा और सुहाना हो जाए

*ताबीर=स्पष्टीकरण

मेरे निखरे हुए गीतों में तिरा जादू है
मैं ने मेयार-ए-तसव्वुर से बनाया है तुझे
मेरी परवीन-ए-तख़य्युल, मिरी नसरीन-ए-निगाह
मैं ने तक़्दीस के फूलों से सजाया है तुझे

*मेयार-ए-तसव्वुर=कल्पना का ऊँचा स्तर; परवीन-ए-तख़य्युल=काल्पनिक कुशलता; नसरीन=जंगली गुलाब

दूध की तरह कुँवारी थी ज़मिस्ताँ की वो रात
जब तिरे शबनमी आरिज़ ने दहकना सीखा
नींद के साए में हर फूल ने अंगड़ाई ली
नर्म कलियों ने तिरे दम से चटकना सीखा
ज़मिस्ता=सर्दी; आरिज़=गाल

मेरी तख़्ईल की झंकार को साकित पा कर!
चूड़ियाँ तेरी कलाई में खनक उठती थीं
उफ़ मिरी तिश्ना-लबी तिश्ना-लबी तिश्ना-लबी!
कच्ची कलियाँ तिरे होंटों की महक उठती थीं

*तख़ईल=कल्पना; साकित=चुप

वक़्त के दस्त-ए-गिराँ-बार से मायूस न हो
किस को मालूम है क्या होना है और क्या हो जाए
मेरी हमदम, मिरे ख़्वाबों की सुनहरी ताबीर
मुस्कुरा दे कि मिरे घर में उजाला हो जाए

*दस्त-ए-गिराँ-बार=बोझ, भारी हाथों

~ मुस्तफ़ा ज़ैदी

  Nov 9, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Thursday, November 8, 2018

दीवाली, दिलों का मिलन

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घर की क़िस्मत जगी घर में आए सजन
ऐसे महके बदन जैसे चंदन का बन
आज धरती पे है स्वर्ग का बाँकपन
अप्सराएँ न क्यूँ गाएँ मंगलाचरण

ज़िंदगी से है हैरान यमराज भी
आज हर दीप अँधेरे पे है ख़ंदा-ज़न
उन के क़दमों से फूल और फुल-वारियाँ
आगमन उन का मधुमास का आगमन
*ख़ंदा-ज़न=हँसी उड़ाता हुआ

उस को सब कुछ मिला जिस को वो मिल गए
वो हैं बे-आस की आस निर्धन के धन
है दीवाली का त्यौहार जितना शरीफ़
शहर की बिजलियाँ उतनी ही बद-चलन

उन से अच्छे तो माटी के कोरे दिए
जिन से दहलीज़ रौशन है आँगन चमन
कौड़ियाँ दाँव की चित पड़ें चाहे पट
जीत तो उस की है जिस की पड़ जाए बन

है दीवाली-मिलन में ज़रूरी 'नज़ीर'
हाथ मिलने से पहले दिलों का मिलन

~ नज़ीर बनारसी


  Nov 8, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, November 3, 2018

कुछ इतने धुँधले साए हैं

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मत रोको इन्हें पास आने दो
ये मुझ से मिलने आए हैं
मैं ख़ुद न जिन्हें पहचान सकूँ
कुछ इतने धुँधले साए हैं

दो पाँव बने हरियाली पर
एक तितली बैठी डाली पर
कुछ जगमग जुगनू जंगल से
कुछ झूमते हाथी बादल से
ये एक कहानी नींद भरी
इक तख़्त पे बैठी एक परी
कुछ गिन गिन करते परवाने
दो नन्हे नन्हे दस्ताने
कुछ उड़ते रंगीं ग़ुबारे
बब्बू के दुपट्टे के तारे
ये चेहरा बन्नो बूढ़ी का
ये टुकड़ा माँ की चूड़ी का
ये मुझ से मिलने आए हैं
मैं ख़ुद न जिन्हें पहचान सकूँ
कुछ इतने धुँधले साए हैं

अलसाई हुई रुत सावन की
कुछ सौंधी ख़ुश्बू आँगन की
कुछ टूटी रस्सी झूले की
इक चोट कसकती कूल्हे की
सुलगी सी अँगीठी जाड़ों में
इक चेहरा कितनी आड़ों में
कुछ चाँदनी रातें गर्मी की
इक लब पर बातें नरमी की
कुछ रूप हसीं काशानों का
कुछ रंग हरे मैदानों का
कुछ हार महकती कलियों के
कुछ नाम वतन की गलियों के
मत रोको इन्हें पास आने दो
ये मुझ से मिलने आए हैं
मैं ख़ुद न जिन्हें पहचान सकूँ
कुछ इतने धुँधले साए हैं

कुछ चाँद चमकते गालों के
कुछ भँवरे काले बालों के
कुछ नाज़ुक शिकनें आँचल की
कुछ नर्म लकीरें काजल की
इक खोई कड़ी अफ़्सानों की
दो आँखें रौशन-दानों की
इक सुर्ख़ दुलाई गोट लगी
क्या जाने कब की चोट लगी
इक छल्ला फीकी रंगत का
इक लॉकेट दिल की सूरत का
रूमाल कई रेशम से कढ़े
वो ख़त जो कभी मैं ने न पढ़े
मत रोको इन्हें पास आने दो
ये मुझ से मिलने आए हैं
में ख़ुद न जिन्हें पहचान सकूँ
कुछ इतने धुँधले साए हैं

कुछ उजड़ी माँगें शामों की
आवाज़ शिकस्ता जामों की
कुछ टुकड़े ख़ाली बोतल के
कुछ घुँघरू टूटी पायल के
कुछ बिखरे तिनके चिलमन के
कुछ पुर्ज़े अपने दामन के
ये तारे कुछ थर्राए हुए
ये गीत कभी के गाए हुए
कुछ शेर पुरानी ग़ज़लों के
उनवान अधूरी नज़्मों के
टूटी हुई इक अश्कों की लड़ी
इक ख़ुश्क क़लम इक बंद घड़ी
मत रोको इन्हें पास आने दो
ये मुझ से मिलने आए हैं
मैं ख़ुद न जिन्हें पहचान सकूँ
कुछ इतने धुँधले साए हैं

कुछ रिश्ते टूटे टूटे से
कुछ साथी छूटे छूटे से
कुछ बिगड़ी बिगड़ी तस्वीरें
कुछ धुँदली धुँदली तहरीरें
कुछ आँसू छलके छलके से
कुछ मोती ढलके ढलके से
कुछ नक़्श ये हैराँ हैराँ से
कुछ अक्स ये लर्ज़ां लर्ज़ां से
कुछ उजड़ी उजड़ी दुनिया में
कुछ भटकी भटकी आशाएँ
कुछ बिखरे बिखरे सपने हैं
ये ग़ैर नहीं सब अपने हैं
मत रोको इन्हें पास आने दो
ये मुझ से मिलने आए हैं
मैं ख़ुद न जिन्हें पहचान सकूँ
कुछ इतने धुँधले साए हैं

~ जाँ निसार अख़्तर


  Nov 3, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, November 2, 2018

जिन्हें हम दोस्त कहते हैं



वो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैं
न कोई ख़ून का रिश्ता न कोई साथ सदियों का
मगर एहसास अपनों सा वो अनजाने दिलाते हैं
वो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैं

ख़फ़ा जब ज़िंदगी हो तो वो आ के थाम लेते हैं
रुला देती है जब दुनिया तो आ कर मुस्कुराते हैं 

अकेले रास्ते पे जब मैं खो जाऊँ तो मिलते हैं
सफ़र मुश्किल हो कितना भी मगर वो साथ जाते हैं
वो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैं

नज़र के पास हों न हों मगर फिर भी तसल्ली है
वही मेहमान ख़्वाबों के जो दिल के पास रहते हैं
मुझे मसरूर करते हैं वो लम्हे आज भी 'इरफ़ान'
कि जिन में दोस्तों के साथ के पल याद आते हैं
वो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैं

~ इरफ़ान अहमद मीर


  Nov 2, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, October 28, 2018

एक दो पल तो ज़रा और रुको



एक दो पल तो ज़रा और रुको
ऐसी जल्दी भी भला क्या है चले जाना तुम
शाम महकी है अभी और न पलकों पे सितारे जागे
हम सर-ए-राह अचानक ही सही
मुद्दतों बा'द मिले हैं तो न मिलने की शिकायत कैसी

फ़ुर्सतें किस को मयस्सर हैं यहाँ
आओ दो-चार क़दम और ज़रा साथ चलें
शहर-ए-अफ़्सुर्दा के माथे पे बुझी शाम की राख
ज़र्द पत्तों में सिमटती देखें
फिर उसी ख़ाक-ब-दामाँ पल से
अपने गुज़रे हुए कल की ख़ुश-बू
लम्हा-ए-हाल में शामिल कर के
अपनी बे-ख़्वाब मसाफ़त का इज़ाला कर लें
अपने होने का यक़ीं
और न होने का तमाशा कर लें
आज की शाम सितारा कर लें

**सर-ए-राह=रास्ते पर; शहर-ए-अफ़्सुर्दा=उदास शहर; दामाँ=कोना; ज़र्द=पीली; लम्हा-ए-हाल=वर्तमान; मसाफ़त=यात्रा; इज़ाला=क्षतिपूर्ति

~ ख़ालिद मोईन


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Saturday, October 27, 2018

तुम से शिकायत क्या करूँ

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होता जो कोई दूसरा
करता गिला मैं दर्द का
तुम तो हो दिल का मुद्दआ'
तुम से शिकायत क्या करूँ

देखो है बुलबुल नाला-ज़न
कहती है अहवाल-ए-चमन
मैं चुप हूँ गो हूँ पुर-मेहन
तुम से शिकायत क्या करूँ

*नाला-जन=विलाप-अवस्था; अहवाल-ए-चमन=चमन की हालत;
पुर-मेहन=बहुत उदास

माना कि मैं बेहोश हूँ
पर होश है पुर-जोश हूँ
ये सोच कर ख़ामोश हूँ
तुम से शिकायत क्या करूँ

*पुर-जोश=भरपूर जोश में

तुम से तो उल्फ़त है मुझे
तुम से तो राहत है मुझे
तुम से तो मोहब्बत है मुझे
तुम से शिकायत क्या करूँ

~ बहज़ाद लखनवी


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Friday, October 26, 2018

इक शहंशाह ने बनवा के

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इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल
सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है
इस के साए में सदा प्यार के चर्चे होंगे
ख़त्म जो हो न सकेगी वो कहानी दी है

ताज वो शम्अ है उल्फ़त के सनम-ख़ाने की
जिस के परवानों में मुफ़्लिस भी हैं ज़रदार भी हैं
संग-ए-मरमर में समाए हुए ख़्वाबों की क़सम
मरहले प्यार के आसाँ भी हैं दुश्वार भी हैं
दिल को इक जोश इरादों को जवानी दी है
*मुफ़्लिस=ग़रीब; अरदार=दौलमंद; मरहले= ठिकाने

ताज इक ज़िंदा तसव्वुर है किसी शाएर का
उस का अफ़्साना हक़ीक़त के सिवा कुछ भी नहीं
इस के आग़ोश में आ कर ये गुमाँ होता है
ज़िंदगी जैसे मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
ताज ने प्यार की मौजों को रवानी दी है
*तसव्वुर=कल्पना;

ये हसीं रात ये महकी हुई पुर-नूर फ़ज़ा
हो इजाज़त तो ये दिल इश्क़ का इज़हार करे
इश्क़ इंसान को इंसान बना देता है
किस की हिम्मत है मोहब्बत से जो इंकार करे
आज तक़दीर ने ये रात सुहानी दी है
*पुर-नूर=रौशन; फ़ज़ा=वातावरण

इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल
सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है

~ शकील बदायूँनी

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Sunday, October 21, 2018

ज़वाल पर थी बहार की रुत

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ज़वाल पर थी बहार की रुत
ख़िज़ाँ का मौसम उरूज पर था
उदासियाँ थीं हर एक शय पर
चमन से शादाबियाँ ख़फ़ा थीं
उन ही दिनों में थी मैं भी तन्हा
उदासी मुझ को भी डस रही थी
वो गिरते पत्तों की सूखी आहट
ये सहरा सहरा बिखरती हालत
हमी को मेरी कुचल रही थी
मैं लम्हा लम्हा सुलग रही थी
*जवाल=उतार; उरूज=चोटी; शादाब=ख़ुशी; सहरा=जंगल

मुझे ये इरफ़ान हो गया था
हक़ीक़त अपनी भी खुल रही थी
कि ज़ात अपनी है यूँ ही फ़ानी
जो एक झटका ख़िज़ाँ का आए
तो ज़िंदगी का शजर भी इस पुल
ख़मोश-ओ-तन्हा खड़ा मिलेगा
मिज़ाज और ख़ुश-रवी के पत्ते
दिलों में लोगों के मिस्ल-ए-सहरा
फिरेंगे मारे ये याद बन कर
कुछ ही दिनों तक
*इरफ़ान=ज्ञान; ज़ात=अस्तित्व; फ़ानी=नश्वर; शजर=पेड़;मिस्ल-ए-सहरा=जंगल जैसे

मगर मुक़द्दर है उन का फ़ानी
के लाख पत्ते ये शोर कर लें
मिज़ाज में सर-कशी भी रख लें
या गिर्या कर लें उदास हो लें
तो फ़र्क़ उसे ये बस पड़ेगा
ज़मीन उन को समेट लेगी
ज़रा सी फिर ये जगह भी देगी
करिश्मा क़ुदरत का है ये ऐसा
उरूज पर है ज़वाल अपना
हर एक को है पलट के जाना
*सर-कशी=विद्रोह; गिर्या=रोना-धोना;

~ असरा रिज़वी


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Saturday, October 20, 2018

उफ़ुक़ के उस तरफ़ कहते हैं

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उफ़ुक़ के उस तरफ़ कहते हैं इक रंगीन वादी है
वहाँ रंगीनियाँ कोहसार के दामन में सोती हैं
गुलों की निकहतें हर चार-सू आवारा होती हैं
वहाँ नग़्मे सबा की नर्म-रौ मौजों में बहते हैं
वहाँ आब-ए-रवाँ में मस्तियों के रक़्स रहते हैं

*उफ़ुक़=क्षितिज; कोहसार-पर्वतों; निकहत=ख़ुशबू; सू=दिशा; आब-ए-रवाँ=बहता पानी; रक़्स-नृत्य

वहाँ है एक दुनिया-ए-तरन्नुम आबशारों में
वहाँ तक़्सीम होता है तबस्सुम लाला-ज़ारों में
सुनहरी चाँद की किरनें वहाँ रातों को आती हैं
वहाँ परियाँ मोहब्बत के बे-ख़ौफ़ गीत गाती हैं

*आबशारों=झरने; तक़्सीम=बँटता; लाला-ज़ारों=फूलों के बाग़

वहाँ के रहने वालों को गुनह करना नहीं आता
ज़लील ओ मुब्तज़िल जज़्बात से डरना नहीं आता
वहाँ अहल-ए-मोहब्बत का न कोई नाम धरता है
वहाँ अहल-ए-मोहब्बत पर न कोई रश्क करता है

*ज़लील=अपमानित; मुब्तज़िल=अशिष्ट, अहल-ए-मोहब्बत=प्रेम के लोग; रश्क-ईर्ष्या

मोहब्बत करने वालों को वहाँ रुस्वा नहीं करते
मोहब्बत करने वालों का वहाँ चर्चा नहीं करते
हम अक्सर सोचते हैं तंग आ कर कहीं चल दें
मिरी जाँ! ऐ मिरे ख़्वाबों की दुनिया चल वहीं चल दें
*रुस्वा=अपमानित

उफ़ुक़ के उस तरफ़ कहते हैं इक रंगीन वादी है

~ नज़ीर मिर्ज़ा बर्लास

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Sunday, October 14, 2018

कोई हसरत भी नहीं

 
कोई हसरत भी नहीं कोई तमन्ना भी नहीं
दिल वो आँसू जो किसी आँख से छलका भी नहीं

रूठ कर बैठ गई हिम्मत-ए-दुश्वार-पसंद
राह में अब कोई जलता हुआ सहरा भी नहीं

आगे कुछ लोग हमें देख के हँस देते थे
अब ये आलम है कोई देखने वाला भी नहीं

दर्द वो आग कि बुझती नहीं जलती भी नहीं
याद वो ज़ख़्म कि भरता नहीं रिसता भी नहीं

बादबाँ खोल के बैठे हैं सफ़ीनों वाले
पार उतरने के लिए हल्का सा झोंका भी नहीं

~ अहमद राही

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Saturday, October 13, 2018

एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं

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एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं
उम्र भर आँसुओं ने उसे ही पढ़ा ।

गंध डूबा हुआ एक मीठा सपन
कर गया प्रार्थना के समय आचमन
जब कभी गुनगुनाने लगे बांसवन
और भी बढ़ गया प्यास का आयतन

पीठ पर काँच के घर उठाए हुए
कौन किसके लिए पर्वतों पर चढ़ा ।

जब कभी नाम देना पड़ा प्यास को
मौन ठहरे हुए नील आकाश को
कौन संकेत देता रहा क्या पता
होंठ गाते रहे सिर्फ़ आभास को

मोम के मंच पर अग्नि की भूमिका
एक नाटक यही तो समय ने गढ़ा ।

एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं
उम्र भर आँसुओं ने उसे ही पढ़ा ।

~ शतदल

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Friday, October 12, 2018

भले दिनों की बात है




भले दिनों की बात है
भली सी एक शक्ल थी
न ये कि हुस्न-ए-ताम हो
न देखने में आम सी
न ये कि वो चले तो
कहकशाँ सी रहगुज़र लगे
मगर वो साथ हो तो फिर
भला भला सफ़र लगे 


*हुस्न-ए-ताम=सुंदरता की पराकाष्ठा

कोई भी रुत हो उस की छब
फ़ज़ा का रंग-रूप थी
वो गर्मियों की छाँव थी
वो सर्दियों की धूप थी
न मुद्दतों जुदा रहे
न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो
न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद
न ये कि इज़्न-ए-आम हो 


*इज़्न-ए-आम=आम निमंत्रण

न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ
कि सादगी गिला करे
न इतनी बे-तकल्लुफ़ी
कि आइना हया करे
न इख़्तिलात में वो रम
कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें
न इस क़दर सुपुर्दगी
कि ज़च करें नवाज़िशें 


*इख़्तिलात= मेल-जोल; सुपुर्दगी=समर्पण

न आशिक़ी जुनून की
कि ज़िंदगी अज़ाब हो
न इस क़दर कठोर-पन
कि दोस्ती ख़राब हो
कभी तो बात भी ख़फ़ी
कभी सुकूत भी सुख़न
कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ
कभी उदासियों का बन 


*अज़ाब=यातना; सुकूत=चुप्पी; किश्त-ए-ज़ाफ़राँ=केसर की क्यारी

सुना है एक उम्र है
मुआमलात-ए-दिल की भी
विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या
फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी
सो एक रोज़ क्या हुआ
वफ़ा पे बहस छिड़ गई
मैं इश्क़ को अमर कहूँ
वो मेरी ज़िद से चिढ़ गई 


*विसाले-जाँ-फ़िजा=प्राण वर्धक मिलन;,फ़िराके-जाँ-गुसिल=जान लेवा दूरी


मैं इश्क़ का असीर था
वो इश्क़ को क़फ़स कहे
कि उम्र भर के साथ को
वो बद-तर-अज़-हवस कहे
शजर हजर नहीं कि हम
हमेशा पा-ब-गिल रहें
न ढोर हैं कि रस्सियाँ
गले में मुस्तक़िल रहें 


*असीर=क़ैदी; बद-तर-अज़-हवस=हवस से भी बुरा

मोहब्बतों की वुसअतें
हमारे दस्त-ओ-पा में हैं
बस एक दर से निस्बतें
सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं
मैं कोई पेंटिंग नहीं
कि इक फ़्रेम में रहूँ
वही जो मन का मीत हो
उसी के प्रेम में रहूँ 


*वुसअतें=विस्तार; दस्त-ओ-पा=हाथ व पैर; निस्बत=सम्बंध; सगान-ए-बा-वफ़ा=वफ़ादार कुत्ते

तुम्हारी सोच जो भी हो
मैं उस मिज़ाज की नहीं
मुझे वफ़ा से बैर है
ये बात आज की नहीं
न उस को मुझ पे मान था
न मुझ को उस पे ज़ोम ही
जो अहद ही कोई न हो
तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी 


*जोम=घमंड; अहद=वचन; ग़म-ए-शिकस्तगी=हार का दुख

सो अपना अपना रास्ता
हँसी-ख़ुशी बदल दिया
वो अपनी राह चल पड़ी
मैं अपनी राह चल दिया
भली सी एक शक्ल थी
भली सी उस की दोस्ती
अब उस की याद रात दिन
नहीं, मगर कभी कभी

~ अहमद फ़राज़


  Oct 12, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, October 7, 2018

रात फिर तेरे ख़यालों ने

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रात फिर तेरे ख़यालों ने जगाया मुझ को
टिमटिमाती हुई यादों का ज़रा सा शोला
आज भड़का तो फिर इक शोला-ए-जव्वाला बना
*जव्वाला=नाचता हुआ

अक़्ल ने तुझ को भुलाने के किए लाख जतन
ले गए मुझ को कभी मिस्र के बाज़ारों में
कभी इटली कभी एस्पेन के गुलज़ारों में
बेल्जियम के, कभी हॉलैंड के मय-ख़ानों में
कभी पैरिस, कभी लंदन के सनम-ख़ानों में
और मैं अक़्ल की बातों में कुछ ऐसा आया
मैं ये समझा कि तुझे भूल चुका हूँ शायद
*सनम-ख़ानों=मंदिरों

दिल ने तो मुझ से कई बार कहा वहम है ये
इस तरह तुझ को भुलाना कोई आसान नहीं
मैं मगर वहम में कुछ ऐसा गिरफ़्तार रहा
मैं ये समझा कि तुझे भूल चुका हूँ शायद
कल मगर फिर तिरी आवाज़ ने तड़पा ही दिया
आलम-ए-ख़्वाब से गोया मुझे चौंका ही दिया
और फिर तेरा हर इक नक़्श मिरे सामने था
*आलम-ए-ख़्वाब=सपनों की दुनिया

तिरी ज़ुल्फ़ें, तिरी ज़ुल्फ़ों की घटाओं का समाँ
तिरी चितवन, तिरी चितवन वही बातिन का सुराग़
तिरे आरिज़ वही ख़ुश-रंग महकते हुए फूल
तिरी आँखें वो शराबों के छलकते हुए जाम
तिरे लब जैसे सजाए हुए दो बर्ग-ए-गुलाब
तिरी हर बात का अंदाज़ तिरी चाल का हुस्न
तिरे आने का नज़ारा तिरे जाने का समाँ
*बातिन=अंदरूनी हालत; बर्ग-ए-गुलाब=गुलाब की पंखुड़ी

तिरा हर नक़्श तो क्या तू ही मिरे सामने थी
दिल ने जो बात कई बार कही थी मुझ से
शब के अनवार में भी दिन के अँधेरों में भी
मिरे एहसास में अब गूँज रही थी पैहम
इस तरह तुझ को भुलाना कोई आसान नहीं
दिल हक़ीक़त है कोई ख़्वाब-ए-परेशाँ तो नहीं
याद मानिंद-ए-ख़िरद मस्लहत-अंदेश नहीं
*अनवार=प्रकाश-पुंज; पैहम=लगातार; मानिंद-ए-ख़िरद=बुद्धिमानों जैसा; मस्लहत-अंदेश=सही ग़लत जानना

डूबती ये नहीं हॉलैंड के मय-ख़ानों में
गुम नहीं होती ये पैरिस के सनम-ख़ानों में
ये भटकती नहीं एस्पेन के गुलज़ारों में
भूलती राह नहीं मिस्र के बाज़ारों में
याद मानिंद-ए-ख़िरद मस्लहत-अंदेश नहीं
अक़्ल अय्यार है सौ भेस बना लेती है
याद का आज भी अंदाज़ वही है कि जो था
आज भी उस का है आहंग वही रंग वही
भेस है उस का वही तौर वही ढंग वही
*अय्यार=धूर्त; आहंग=राग, गायन

फिर इसी याद ने कल रात जगाया मुझ को
और फिर तेरा हर इक नक़्श मिरे सामने था

~ जगन्नाथ आज़ाद


  Oct 07, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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सीधा, सहल, साफ़ है रस्ता देखो

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किस क़दर सीधा, सहल, साफ़ है रस्ता देखो
न किसी शाख़ का साया है, न दीवार की टेक
न किसी आँख की आहट, न किसी चेहरे का शोर
दूर तक कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं

चंद क़दमों के निशाँ हाँ कभी मिलते हैं कहीं
साथ चलते हैं जो कुछ दूर फ़क़त चंद क़दम
और फिर टूट के गिर जाते हैं ये कहते हुए
अपनी तन्हाई लिए आप चलो, तन्हा अकेले

साथ आए जो यहाँ कोई नहीं, कोई नहीं
किस क़दर सीधा, सहल, साफ़ है रस्ता देखो

‍~ गुलज़ार

  Oct 06, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, October 5, 2018

अब क्यूँ उस दिन का ज़िक्र करो

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अब क्यूँ उस दिन का ज़िक्र करो
जब दिल टुकड़े हो जाएगा
और सारे ग़म मिट जाएँगे
जो कुछ पाया खो जाएगा
जो मिल न सका वो पाएँगे

ये दिन तो वही पहला दिन है
जो पहला दिन था चाहत का
हम जिस की तमन्ना करते रहे
और जिस से हर दम डरते रहे
ये दिन तो कई बार आया
सौ बार बसे और उजड़ गए
सौ बार लुटे और भर पाया

अब क्यूँ उस दिन का ज़िक्र करो
जब दिल टुकड़े हो जाएगा
और सारे ग़म मिट जाएँगे
तुम ख़ौफ़-ओ-ख़तर से दर-गुज़रो
जो होना है सो होना है
गर हँसना है तो हँसना है
गर रोना है तो रोना है

तुम अपनी करनी कर गुज़रो
जो होगा देखा जाएगा

~ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


  Oct 05, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, September 30, 2018

बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही

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बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया
मिरे दुख से किसी आवाज़ का रिश्ता निकल आया

वो सर से पाँव तक जैसे सुलगती शाम का मंज़र
ये किस जादू की बस्ती में दिल-ए-तन्हा निकल आया

जिन आँखों की उदासी में बयाबाँ साँस लेते हैं
उन्हीं की याद में नग़्मों का ये दरिया निकल आया
*बयाबाँ=जंगल

सुलगते दिल के आँगन में हुई ख़्वाबों की फिर बारिश
कहीं कोंपल महक उट्ठी कहीं पत्ता निकल आया

पिघल उठता है इक इक लफ़्ज़ जिन होंटों की हिद्दत से
मैं उन की आँच पी कर और भी सच्चा निकल आया
*हिद्दत=गर्मी

गुमाँ था ज़िंदगी बे-सम्त ओ बे-मंज़िल बयाबाँ है
मगर इक नाम पर फूलों-भरा रस्ता निकल आया
*बे-सम्त=दिशाहीन

~ बशर नवाज़


  Sep 30, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, September 29, 2018

नई रौशनी

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अव्वल चाचा नेहरू आए
नई रोशनी वे ही लाए

इन्दू बिटिया उनके बाद
नई रोशनी पाइन्दबाद

हुए सहायक संजय भाई
नई रोशनी जबरन आई

फिर आए भैया राजीव
डाली नई रोशनी की नींव

आगे बढीं सोनिया गाँधी
पीछे नई रोशनी की आँधी

सत्ता की वे नहीं लालची
मनमोहन उनके मशालची

राहुल ने तब तजा अनिश्चय
नई रोशनी की गूँजी जय

जब राहुल दुल्हन लाएँगे
नई रोशनियाँ हम पाएँगे

बहन प्रियंका अलग सक्रिय हैं
वड्रा जीजू सबके प्रिय हैं

ये खुद तो हैं नई रोशनी
इनकी भी हैं कई रोशनी

यह जो पूरा खानदान है
राष्ट्रीय रोशनीदान है

एकमात्र इसकी सन्तानें
नई रोशनी लाना जानें

क्या इसमें अब भी कुछ शक़ है
नई रोशनी इसका ही हक़ है

जब तक सूरज चान्द रहेगा
यह न कभी भी मान्द रहेगा

बीच बीच में नई रोशनी के आए दीगर सौदागर
लेकिन इस अन्धियारे को ही वे कर गए दुबारा दूभर

हर दफ़ा इसी कुनबे से गरचे है नई रोशनी सारी
फिर भी अन्धकार यह बार-बार क्यों हो जाता है भारी?

इनकी ऐसी नई रोशनी में जीवन जीना पड़ता है
यह क्लेश कलेजे में जंग-लगे कीले-सा हर पल गड़ता है

क्या हमीं नहीं मिलकर खींचें अपने हाथों की रेखाएँ
पहचानें नित नई रोशनी सबकी, उसे ख़ुद लेकर आएँ?

~ विष्णु खरे


  Sep 29, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, September 28, 2018

नहीं मैं यूँ नहीं कहता

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नहीं मैं यूँ नहीं कहता
कि ये दुनिया जहन्नम और हम सब इस का ईंधन हैं,
नहीं यूँ भी नहीं कहता
कि हम जन्नत के बासी हैं -
सरों पर ला-जवर्दी (नीले रंग के) शामियाने और पैरों में
निराले ज़ाएक़ों (स्वाद) वाले फलों के पेड़ शीर (दूध) ओ शहद की नहरें मचलती हैं
मुझे तो बस यही कुछ आम सी कुछ छोटी छोटी बातें कहनी हैं
मुझे कहना है
इस धरती पे गुलशन भी हैं सहरा (वीराना) भी
महकती नर्म मिट्टी भी
और उस की कोख में ख़्वाबों का जादू आने वाली नित नई फ़सलों की ख़ुशबू भी
चटख़ती और तपती सख़्त बे-हिस (संवेदन रहित) ख़ून की प्यासी चटानें भी
मुझे कहना है
हम सब अपनी धरती की
बुराई और भलाई सख़्तियों और नरमियों अच्छाइयों कोताहियों (कमियों) हर रंग
हर पहलू के मज़हर (अभिव्यक्ति)हैं
हमें इंसान की मानिंद
ख़ैर ओ शर (कुशल-मंगल व बुराई) मोहब्बत और नफ़रत दुश्मनी और दोस्ती के साथ जीना है
इसी धरती का शहद ओ सम (ज़हर)
इसी धरती के खट-मिठ जाने पहचाने मज़े का जाम पीना है
मुझे बस इतना कहना है
कि हम को आसमानों या ख़लाओं (शून्य या आसमानी) की कोई मख़्लूक़ (जीव) मत समझो

*ला-जवर्दी=नीले रंग का कीमती पत्थर

~ बशर नवाज़

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Sunday, September 23, 2018

डरो

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कहो तो डरो, कि हाय यह क्यों कह दिया
न कहो तो डरो, कि पूछेंगे चुप क्यों हो।
सुनो तो डरो, कि अपना कान क्यों दिया
न सुनो तो डरो, कि सुनना लाजिमी तो नहीं था।

देखो तो डरो कि एक दिन तुम पर भी यह न हो
न देखो तो डरो कि गवाही में बयान क्या दोगे।
सोचो तो डरो कि वह चेहरे पर न झलक आया हो
न सोचो तो डरो कि सोचने को कुछ दे न दें।

पढ़ो तो डरो कि पीछे से झाँकने वाला कौन है
न पढ़ो तो डरो कि तलाशेंगे क्या पढ़ते हो।
लिखो तो डरो कि उसके कई मतलब लग सकते हैं
न लिखो तो डरो कि नई इबारत सिखाई जाएगी

डरो तो डरो कि कहेंगे डर किस बात का है,
न डरो तो डरो कि हुक़्म होगा कि डर।

~ विष्णु खरे


  Sep 23, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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