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Wednesday, May 30, 2018

उसकी चूड़ी, उसकी बेंदी

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उसकी चूड़ी, उसकी बेंदी, उसकी चुनर से अलग।
मैं सफर में भी न हो पाया कभी घर से अलग।

गो कि मेरी ‘पास-बुक’ से भी बड़े थे उनके ख्वाब
फिर भी उसने पाँव फैलाये न चादर से अलग।

मुझसे वो अक्सर लड़ा करती है, मतलब साफ है
वो न भीतर से अलग है, वो न बाहर से अलग।

पत्रिकायें उसके पढ़ने की मैं लाया था कई
फिर भी उसने कुछ न देखा मेरे स्वेटर से अलग।

सोच में उसके भरी हैं मेरी लापरवाहियाँ
यों वो सोने जा रही हैं मेरे बिस्तर से अलग।

उम्र ढलते ही बनेगा कौन मेरा आइना
हो न पाया मैं कभी उससे इसी डर से अलग।

दोस्तों, हर प्रश्न का उत्तर तुम्हें मिल जायेगा
सोचना कुछ देर घर को अपने दफ्तर से अलग।

~ उर्मिलेश शंखधर


  May 30, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Monday, May 28, 2018

कोई ये कैसे बताए

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कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ है
वो जो अपना था वही और किसी का क्यूँ है
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यूँ है
यही होता है तो आख़िर यही होता क्यूँ है

इक ज़रा हाथ बढ़ा दें तो पकड़ लें दामन
उन के सीने में समा जाए हमारी धड़कन
इतनी क़ुर्बत है तो फिर फ़ासला इतना क्यूँ है
*क़ुर्बत=नजदीकी

दिल-ए-बर्बाद से निकला नहीं अब तक कोई
इस लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई
आस जो टूट गई फिर से बंधाता क्यूँ है

तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यूँ है
*मसर्रत=ख़ुशी

~ कैफ़ी आज़मी

  May 28, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, May 25, 2018

अब तो नींद नहीं आएगी

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अब तो नींद नहीं आएगी
देख सिरहाने याद तुम्हारी

हमने तो रिश्ता बोया था
प्यार न जाने कब उग आया
कब सींचा कब हरा हो गया
कैसे कर दी शीतल छाया
अब इस दिल को कौन संभाले
ना कांधा ना बांह तुम्हारी

कब जाना था साथ बंधे तो
दूर-दूर हो अलग चलेंगे
सातों कसमें खाने वाले
दो बातों तक को तरसेंगे
आधी रातें घनी चाँदनी
आँगन सूना मौसम भारी

दुनिया छोटी है, सुनते थे
दूर न कोई जा पाता है
समय लगा कर पंख, कहा था
पल भर में ही उड़ जाता है
पर पल भी युग बन जाता है
नहीं पता थी यह लाचारी

~ पूर्णिमा वर्मन

  May 27, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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काश मैं तेरे बुन-ए-गोश में बुंदा होता

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काश मैं तेरे बुन-ए-गोश (कान) में बुंदा होता
रात को बे-ख़बरी में जो मचल जाता मैं
तो तिरे कान से चुप-चाप निकल जाता मैं
सुब्ह को गिरते तिरी ज़ुल्फ़ों से जब बासी फूल
मेरे खो जाने पे होता तिरा दिल कितना मलूल (दुखी)

तू मुझे ढूँढती किस शौक़ से घबराहट में
अपने महके हुए बिस्तर की हर इक सिलवट में
जूँ ही करतीं तिरी नर्म उँगलियाँ महसूस मुझे
मिलता इस गोश (कान) का फिर गोशा-ए-मानूस (परिचित हिस्सा) मुझे
कान से तू मुझे हरगिज़ न उतारा करती
तू कभी मेरी जुदाई न गवारा करती

यूँ तिरी क़ुर्बत-ए-रंगीं(रंगीनियों से नज़दीकी) के नशे में मदहोश
उम्र भर रहता मिरी जाँ मैं तिरा हल्क़ा-ब-गोश (आदी)
काश मैं तेरे बुन-ए-गोश में बुंदा होता

~ मजीद अहमद

  May 25, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, May 18, 2018

जब तवक़्क़ो ही उठ गई

जब तवक़्क़ो ही उठ गई 'ग़ालिब'
क्यूँ किसी का गिला करे कोई
*तवक़्क़ो=उम्मीद
~ मिर्ज़ा ग़ालिब

جب توقع ہی اٹھ گئی غالبؔ
کیوں کسی کا گلہ کرے کوئی
مرزا غالب ~  

  May 10, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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देर लगी आने में तुम को

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देर लगी आने में तुम को शुक्र है फिर भी आए तो
आस ने दिल का साथ न छोड़ा वैसे हम घबराए तो

शफ़क़ धनक महताब घटाएँ तारे नग़्मे बिजली फूल
इस दामन में क्या क्या कुछ है दामन हाथ में आए तो
*शफ़क़=साँझ का धुँधलका; धनक=इंद्रधनुष; महताब=चाँद

चाहत के बदले में हम तो बेच दें अपनी मर्ज़ी तक
कोई मिले तो दिल का गाहक कोई हमें अपनाए तो

क्यूँ ये मेहर-अंगेज़ तबस्सुम मद्द-ए-नज़र जब कुछ भी नहीं
हाए कोई अंजान अगर इस धोके में आ जाए तो
*मेहर-अंगेज़=मोहब्बत से भरी; तबस्सुम=मुस्कान; मद्द-ए-नज़=आँखों के सामने

सुनी-सुनाई बात नहीं ये अपने उपर बीती है
फूल निकलते हैं शो'लों से चाहत आग लगाए तो

झूट है सब तारीख़ हमेशा अपने को दोहराती है
अच्छा मेरा ख़्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो
*ख़्वाब-ए-जवानी=जवानी के सपने

नादानी और मजबूरी में यारो कुछ तो फ़र्क़ करो
इक बे-बस इंसान करे क्या टूट के दिल आ जाए तो

~ अंदलीब शादानी


  May 18, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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किन ख़यालात में यूँ रहती हो

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किन ख़यालात में यूँ रहती हो खोई खोई
चाय का पानी पतीली में उबल जाता है
राख को हाथ लगाती हो तो जल जाता है
एक भी काम सलीक़े से नहीं हो पाता

एक भी बात मोहब्बत से नहीं कहती हो
अपनी हर एक सहेली से ख़फ़ा रहती हो
रात भर नाविलें पढ़ती हो न जाने किस की
एक जंपर नहीं सी पाई हो कितने दिन से
भाई का हाथ भी ग़ुस्से से झटक देती हो
मेज़ पर यूँ ही किताबों को पटक देती हो

किन ख़यालात में यूँ रहती हो खोई खोई

~ कफ़ील आज़र अमरोहवी


  May 16, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, May 6, 2018

तुम अधूरी बात सुनकर चल दिए

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तुम अधूरी बात सुनकर चल दिए!
जो कहा मैंने अभी तक, अनकहा इससे अधिक है
जो सुना तुमने अभी तक, अनसुना इससे अधिक है

मैं तुम्हारी और अपनी ही कहानी लिख रहा था
वक़्त ने जो की थी मुझ पे मेहरबानी लिख रहा था
पत्र मेरा अन्त तक पढ़ते तो ये मालूम होता
मैं तुम्हारे नाम अपनी ज़िन्दगानी लिख रहा था
तुम अधूरा पत्र पढ़कर चल दिए-
जो पढ़ा तुमने अभी तक, अनपढ़ा इससे अधिक है

प्रार्थना में लग रहा कोई कमी फिर रह गई है
हँस रहा हूँ किन्तु पलकों पर नमी फिर रह गई है
फिर तुम्हारी ही क़सम ने इस क़दर बेबस किया
ज़िन्दगी हैरान मुझको देखती फिर रह गई है
भाग्य-रेखाओं में मेरी आज तक-
जो लिखा तुमने अभी तक, अनलिखा इससे अधिक है

हो ग़मों की भीड़ फिर भी मुस्कुराऊँ, सोचता हूँ
मैं किसी को भूलकर भी याद आऊँ, सोचता हूँ
कोई मुझको आँसुओं की तरह पलकों पर सजाए
और करे कोई इशारा, टूट जाऊँ सोचता हूँ
ज़िन्दगी मुझसे मिली कहने लगी-
जो गुना तुमने अभी तक, अनगुना इससे अधिक है

यूँ तो शिखरों से बड़ी ऊँचाईयों को छू लिया है
छूने को पाताल-सी गहराईयों को छू लिया है
विष भरी बातें हँसी जब बींध कर मेरे ह्रदय को
ख़ुश्बुएँ छू कर लगा अच्छाईयों को छू लिया है
तुम मिले जिस पल मुझे ऐसा लगा-
जो छुआ मैंने अभी तक, अनछुआ इससे अधिक है

तुम अधूरी बात सुनकर चल दिए!
जो कहा मैंने अभी तक, अनकहा इससे अधिक है
जो सुना तुमने अभी तक, अनसुना इससे अधिक है

~ दिनेश रघुवंशी


  May 6, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, May 5, 2018

फल जाए मोहब्बत तो

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फल जाए मोहब्बत तो मोहब्बत है मोहब्बत
और रास न आए तो मुसीबत है मोहब्बत

सरमाया-ए-दीवाना-ए-उल्फ़त है मोहब्बत
ऐ उल्टे हुए दिल तिरी क़ीमत है मोहब्बत
*सरमाया-=धन; उल्फ़त=प्रेम

है हम ही तलक ख़ैर ग़नीमत है मोहब्बत
हो जाए उन्हें भी तो क़यामत है मोहब्बत

रो रो के वो पोछेंगे मिरी आँख से आँसू
आएँगे वो दिन भी जो सलामत है मोहब्बत

बदनाम किया लाख तुझे ख़ुद-ग़रज़ों ने
फिर भी तिरी दुनिया को ज़रूरत है मोहब्बत

दुनिया कहे कुछ है मगर ईमान की ये बात
होने की तरह हो तो इबादत है मोहब्बत

है जिन से उन आँखों की क़सम खाता हूँ 'मंज़र'
मेरे लिए परवाना-ए-जन्नत है मोहब्बत
*परवाना=अनुमति

~ मंज़र लखनवी


  May 5, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, May 4, 2018

मेरा मन इक ख़्वाब-नगर है

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मेरा मन इक ख़्वाब-नगर है
मेरे मन की गलियों, बाज़ारों और चौराहों में
लफ़्ज़ों, रंगों और ख़ुशबुओं की
हल्की हल्की बारिश होती रहती है

मेरा मन इक ख़्वाब-नगर है
मेरे मन में
चाह के चश्मे
अम्न की नहरें
आस के दरिया
प्यार समुंदर
हर सू बहते रहते हैं
जिन में नहा कर
अपने भी बेगाने भी
दानाई (बुद्धिमत्ता )की धूप में लेटे
सेहर-ज़दा (वशी-भूत) से रहते हैं

मेरा मन इक ख़्वाब-नगर है
मेरे मन में
दरवेशों का डेरा भी है
इस डेरे पर
शाएर, सूफ़ी, पापी, दाना सब आते हैं
कुछ सपने वो ले जाते हैं
कुछ सपने वो दे जाते हैं
इन सपनों की धरती से जब
ग़ज़लों, नज़्मों, गीतों के कुछ
फूल खुलीं तो बरसों फिर वो
ख़्वाब-नगर को महकाते हैं

मेरा मन इक ख़्वाब-नगर है
मेरे मन की गलियों, बाज़ारों और चौराहों पर
लफ़्ज़ों, रंगों और ख़ुशबुओं की
हल्की हल्की बारिश होती रहती है

~ ख़ालिद सुहैल


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Sunday, April 29, 2018

मेरे सँग सँग चल दिया चाँद!

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मैंने देखा, मैं जिधर चला,
मेरे सँग सँग चल दिया चाँद!

घर लौट चुकी थी थकी साँझ;
था भारी मन दुर्बल काया,
था ऊब गया बैठे बैठे
मैं अपनी खिड़की पर आया।
टूटा न ध्यान, सोचता रहा
गति जाने अब ले चले किधर!
थे थके पाँव, बढ गए किंतु
चल दिये उधर, मन हुआ जिधर!

पर जाने क्यों, मैं जिधर चला
मेरे सँग सँग चल दिया चाँद!
पीले गुलाब-सा लगता था
हल्के रंग का हल्दिया चाँद!

साथी था, फिर भी मन न हुआ
हल्का, हो गया भार दूना।
वह भी बेचारा एकाकी
उसका भी जीवन-पथ सूना!

क्या कहते, दोनों ही चुप थे,
अपनी अपनी चुप सहते थे!
दुख के साथी बस देख देख
बिन कहे हृदय की कहते थे!

था ताल एक; मैं बैठ गया,
मैंने संकेत किया, आओ,
रवि-मुकुर! उतर आओ अस्थिर
कवि-उर को दर्पण बन जाओ।

मैं उठा, उठा वह; जिधर चला,
मेरे सँग सँग चल दिया चाँद!
मैं गीतों में; वह ओसों में
बरसा औ' रोया किया चाँद!

क्या पल भर भी कर सकी ओट
झुरमुट या कोई तरु ड़ाली,
पीपल के चमकीले पत्ते...
या इमली की झिलमिल जाली?

मैं मौन विजन में चलता था,
वह शून्य व्योम में बढता था;
कल्पना मुझे ले उड़ती थी,
वह नभ में ऊँचा चढ़्ता था!

मैं ठोकर खाता, रुकता वह;
जब चला, साथ चल दिया चाँद!
पल भर को साथ न छोड़ सका
एसा पक्का कर लिया चाँद!

अस्ताचलगामी चाँद नहीं क्या
मेरे ही टूटे दिल सा?
टूटी नौका सा डूब रहा,
जिसको न निकट का तट मिलता!

वह डूबा ज्यौं तैराक थका,
मैं भी श्रम से, दुख से टूटा!
थे चढे साथ, हम गिरे साथ,
पर फिर भी साथ नहीं छूटा!

अस्ताचल में ओझल होता शशि
मैं निद्रा के अंचल में,
वह फिर उगता, मैं फिर जगता
घटते बढते हम प्रतिपल में!

मैनें फिर-फिर अजमा देखा
मेरे सँग सँग चल दिया चाँद!
वह मुझसा ही जलता बुझता
बन साँझ-सुबह का दिया चाँद!

~ नरेन्द्र शर्मा


  Apr 29, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, April 28, 2018

तेरा परस्तार

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वो जो कहलाता था दीवाना तिरा
वो जिसे हिफ़्ज़ (याद) था अफ़्साना तिरा
जिस की दीवारों पे आवेज़ां (सजायी) थीं
तस्वीरें तिरी,
वो जो दोहराता था
तक़रीरें (प्रस्तुति) तिरी,
वो जो ख़ुश था तिरी ख़ुशियों से
तिरे ग़म से उदास,
दूर रह के जो समझता था
वो है तेरे पास,
वो जिसे सज्दा (सर झुकाना) तुझे करने से
इंकार न था,
उस को दर-अस्ल कभी तुझ से
कोई प्यार न था,

उस की मुश्किल थी
कि दुश्वार थे उस के रस्ते,
जिन पे बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर (बिना भय)
घूमते रहज़न थे
सदा उस की अना (अहम) के दर पे,
उस ने घबरा के
सब अपनी अना की दौलत
तेरी तहवील (निष्ठा) में रखवा दी थी,
अपनी ज़िल्लत (अपमान) को वो दुनिया की नज़र
और अपनी भी निगाहों से छुपाने के लिए,
कामयाबी को तिरी,
तिरी फ़ुतूहात (विजय),
तिरी इज़्ज़त को,
वो तिरे नाम तिरी शोहरत को,
अपने होने का सबब जानता था,
है वजूद उस का जुदा तुझ से
ये कब मानता था।

वो मगर
पुर-ख़तर (जोख़िम भरे) रास्तों से आज निकल आया है,
वक़्त ने तेरे बराबर न सही
कुछ न कुछ अपना करम उस पे भी फ़रमाया है,
अब उसे तेरी ज़रूरत ही नहीं,
जिस का दावा था कभी
अब वो अक़ीदत (विश्वास) ही नहीं,
तेरी तहवील (निष्ठा) में जो रक्खी थी कल
उस ने अना
आज वो माँग रहा है वापस
बात इतनी सी है
ऐ साहिब-ए-नाम-ओ-शोहरत (नाम और प्रसिद्धि प्राप्त इंसान)
जिस को कल
तेरे ख़ुदा होने से इंकार न था,
वो कभी तेरा परस्तार (श्रद्धालु) न था।

~ जावेद अख़्तर


  Apr 28, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, April 27, 2018

मर्द बदलने वाली लड़की

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मैं उन लड़कियों में से नहीं
जो अपने जीवन की शुरूआत
किसी एक मर्द से करती है
और उस मर्द के छोड़ जाने को
जीवन का अन्त समझ लेती हैं
मैं उन तमाम सती-सावित्रीनुमा
लड़कियों में से तो बिल्कुल नहीं हूँ

मैंने अपने यौवन के शुरूआत से ही
उम्र के अलग-अलग पड़ावों पर
अलग-अलग मानसिकता के
पुरुष मित्र बनाए हैं
हरेक के साथ
बड़ी शिद्दत से निभाई है दोस्ती

यहाँ तक कि कोई मुझे उन क्षणों में देखता
तो समझ सकता था
राधा, अनारकली या हीर-सी कोई रूमानी प्रेमिका

इस बात को स्वीकार करने में मुझे
न तो किसी तरह की लाज है
न झिझक
बेशक कोई कह दे मुझे
छिनाल, तिरिया-चरित्र या कुलटा वगैरह-वगैरह

चूँकि मैं मर्द बदलने वाली लड़की हूँ
इसलिए 'सभ्य' समाज के खाँचे में
लगातार मिसफ़िट होती रही हूँ
पतिव्रता टाइप लड़कियाँ या पत्नीव्रता लड़के
दोनों ही मान लेते हैं मुझे ‘आउटसाइडर’
पर मुझे इन सब की ज़रा भी परवाह नहीं
क्योंकि मैं उन लड़कियों में से नहीं
आलोचना और उलहाने सुनते ही
जिनके हाथ-पैर काँपने लगते हैं
बहने लगते हैं हज़ारों मन टसुए
जो क्रोध को पी जाती हैं
प्रताड़ना को सह लेती हैं
और फिर भटकती हैं इधर-उधर
अबला बनकर धरती पर

चूँकि मैं मर्द बदलने वाली लड़की हूँ
इसलिए मैंने वह सब देखा है
जो सिर्फ़ लड़कियों को सहेली बनाकर
कभी नहीं देख-जान पाती
मैंने औरतों और मर्दों दोनों से दोस्ती की
इस बात पर थोड़ा गुमान भी है
गाहे-बगाहे मैं ख़ुद ही ढिंढोरा पिटवा लेती हूँ
कि यह है ‘मर्द बदलने वाली लड़की’

यह वाक्य
अब मेरा उपनाम-सा हो गया है

~ नेहा नरुका


  Apr 27, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, April 22, 2018

पता नहीं वो कौन था

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पता नहीं वो कौन था
जो मेरे हाथ
मोगरे की डाल पँख मोर का थमा के चल दिया

पता नहीं वो कौन था
हवा के झोंके की तरह जो आया और गुज़र गया
नज़र को रंग दिल को निकहतों के दुख से भर गया

मैं कौन हूँ
गुज़रने वाला कौन था
ये फूल पँख क्या हैं क्यूँ मिले
ये सोचते ही सोचते तमाम रंग एक रंग में उतरते गए
......स्याह रंग
तमाम निकहतें इधर उधर बिखर गईं
.........ख़लाओं में

यक़ीन है..... नहीं नहीं गुमान है
वो कोई मेरा दुश्मन-ए-क़दीम था
दिखा के जो सराब मेरी प्यास और बढ़ा गया
मैं बे-हिसाब आरज़ूओं का शिकार
इंतिहा-ए-शौक़ में फ़रेब उस का खा गया

गुमान.... नहीं नहीं यक़ीन है
वो कोई मेरा दोस्त था
जो दो घड़ी के वास्ते ही क्यूँ न हो
नज़र को रंग दिल को निकहतों से भर गया
पता नहीं किधर गया

मैं इस को ढूँढता हुआ
तमाम काएनात में
उधर उधर बिखर गया

*निकहत=ख़ुशबू; ख़ला=शून्य; क़दीम=पुराना; सराब=मृग-तृष्णा

~ बशर नवाज़


  Apr 22, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, April 21, 2018

कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल

कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल
कोई क्या किसी से लगाए दिल
वो जो बेचते थे दवा-ए-दिल
वो दुकान अपनी बढ़ा गए

~ बहादुर शाह ज़फ़र



  Apr 20, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Monday, April 16, 2018

हुस्न पर दस्तरस की बात न कर

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हुस्न पर दस्तरस की बात न कर
ये हवस है हवस की बात न कर
*दस्तरस=पहुँच

पूछ अगले बरस में क्या होगा
मुझ से पिछले बरस की बात न कर

ये बता हाल क्या है लाखों का
मुझ से दो चार दस की बात न कर

ये बता क़ाफ़िले पे क्या गुज़री
महज़ बाँग-ए-जरस की बात न कर
*बाँग=(आवाज़ देना); जरस=घंटी

इश्क़-ए-जान आफ़रीं का हाल सुना
हुस्न-ए-ईसा नफ़स की बात न कर
*इश्क़-ए-जान=शारीरिक; आफ़रीं=प्रशंसा; नफ़स=आत्मा

ये बता 'अर्श' सोज़ है कितना
साज़ पर दस्तरस की बात न कर
*सोज़=जोश, उत्साह; साज़=सम्बंध; दस्तरस=पहुँच

~ अर्श मलसियानी


  Apr 16, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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शिव-लिंग

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ऐसा क्या किया था शिव तुमने
रची थी कौन-सी लीला,
जो इतना विख्यात हो गया तुम्हारा लिंग
माताएँ बेटों के यश, धन व पुत्रादि के लिए
पतिव्रताएँ पति की लम्बी उम्र के लिए
अच्छे घर-वर के लिए कुवाँरियाँ
पूजती है तुम्हारे लिंग को,

दूध-दही-गुड़-फल-मेवा वगैरह
अर्पित होता है तुम्हारे लिंग पर
रोली, चन्दन, महावर से
आड़ी-तिरछी लकीरें काढ़कर,
सजाया जाता है उसे
फिर ढोक देकर बारम्बार
गाती हैं आरती
उच्चारती हैं एक सौ आठ नाम

तुम्हारे लिंग को दूध से धोकर
माथे पर लगाती है टीका
जीभ पर रखकर
बड़े स्वाद से स्वीकार करती हैं
लिंग पर चढ़े हुए प्रसाद को

वे नहीं जानती कि यह
पार्वती की योनि में स्थित
तुम्हारा लिंग है,
वे इसे भगवान समझती हैं,
अवतारी मानती हैं,
तुम्हारा लिंग गर्व से इठलाता
समाया रहता है पार्वती-योनि में,
और उससे बहता रहता है
दूध, दही और नैवेद्य...
जिसे लाँघना निषेध है
इसलिए वे औरतें
करतीं हैं आधी परिक्रमा

वे नहीं सोच पातीं
कि यदि लिंग का अर्थ
स्त्रीलिंग या पुल्लिंग दोनों है
तो इसका नाम पार्वती-लिंग क्यों नहीं?
और यदि लिंग केवल पुरूषांग है
तो फिर इसे पार्वती-योनि भी
क्यों न कहा जाए?

लिंगपूजकों ने
चूँकि नहीं पढ़ा ‘कुमारसम्भव’
और पढ़ा तो ‘कामसूत्र’ भी नहीं होगा,
सच जानते ही कितना हैं?
हालाँकि पढ़े-लिखे हैं

कुछ ने पढ़ी है केवल स्त्री-सुबोधिनी
वे अगर पढ़ते और जान पाते
कि कैसे धर्म, समाज और सत्ता
मिलकर दमन करते हैं योनि का,

अगर कहीं वेद-पुराण और इतिहास के
महान मोटे ग्रन्थों की सच्चाई!
औरत समझ जाए
तो फिर वे पूछ सकती हैं
सम्भोग के इस शास्त्रीय प्रतीक के--
स्त्री-पुरूष के समरस होने की मुद्रा के--
दो नाम नहीं हो सकते थे क्या?
वे पढ़ लेंगी
तो निश्चित ही पूछेंगी,
कि इस दृश्य को गढ़ने वाले
कलाकारों की जीभ
क्या पितृसमर्पित सम्राटों ने कटवा दी थी
क्या बदले में भेंट कर दी गईं थीं
लाखों अशर्फियाँ,
कि गूंगे हो गए शिल्पकार
और बता नहीं पाए
कि सम्भोग के इस प्रतीक में
एक और सहयोगी है
जिसे पार्वती-योनि कहते हैं।

~ नेहा नरुका


  Apr 15, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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उन के लहजे में वो कुछ लोच

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उन के लहजे में वो कुछ लोच वो झंकार वो रस
एक बे-क़स्द तरन्नुम के सिवा कुछ भी न था
*बे-क़स्द=प्रयाह-हीन; तरन्नुम=गीत जैसा

काँपते होंटों में उलझे हुए मुबहम फ़िक़रे
वो भी अंदाज़-ए-तकल्लुम के सिवा कुछ भी न था
*मुबहम=अस्पष्ट; फिक़रे=वाक्य; अंदाज़-ए-तकल्लुम=बात करने का तरीका

सैकड़ों टीसें नज़र आती थीं जिस में मुझ को
वो भी इक सादा तबस्सुम के सिवा कुछ भी न था
*तबस्सुम=मुस्कुराहट

सर्द ओ ताबिंदा सी पेशानी वो मचले हुए अश्क
दिन में नूर-ए-माह-ओ-अंजुम के सिवा कुछ भी न था
*सर्द=निर्जीव; ताबिंदा=चमकते हुए; नूर-ए-माह-ओ-अंजुम=चाँद और सितारों की रौशनी

तुंद आहों के दबाने में वो सीने का उभार
एक यूँ ही से तलातुम के सिवा कुछ भी न था
*तुंद=तेज; तलातुम=लहर

मैं ने जो देखा था, जो सोचा था, जो समझा था
हाए 'जज़्बी' वो तवहहुम के सिवा कुछ भी न था
*तवह्हुम=अंध-विश्वास

~ मुईन अहसन जज़्बी


  Apr 14, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, April 13, 2018

दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ

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दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
शोरिश से भागता हूँ दिल ढूँडता है मेरा
ऐसा सुकूत जिस पर तक़रीर भी फ़िदा हो
*अंजुमन=महफ़िल; शोरिश=शोर; सुकूत=शांति

मरता हूँ ख़ामुशी पर ये आरज़ू है मेरी
दामन में कोह के इक छोटा सा झोंपड़ा हो
आज़ाद फ़िक्र से हूँ उज़्लत में दिन गुज़ारूँ
दुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया हो
*कोह=पहाड़; उज़्लत=अकेलापन

लज़्ज़त सरोद की हो चिड़ियों के चहचहों में
चश्मे की शोरिशों में बाजा सा बज रहा हो
गुल की कली चटक कर पैग़ाम दे किसी का
साग़र ज़रा सा गोया मुझ को जहाँ-नुमा हो
*लज़्ज़त=आनंद; जहाँ-नुमा=विहंगम दृश्य

हो हाथ का सिरहाना सब्ज़े का हो बिछौना
शरमाए जिस से जल्वत ख़ल्वत में वो अदा हो
मानूस इस क़दर हो सूरत से मेरी बुलबुल
नन्हे से दिल में उस के खटका न कुछ मिरा हो
*सब्ज़े=हरियाली; जल्वत=दिखावट; ख़ल्वत=एकांत

सफ़ बाँधे दोनों जानिब बूटे हरे हरे हों
नद्दी का साफ़ पानी तस्वीर ले रहा हो
हो दिल-फ़रेब ऐसा कोहसार का नज़ारा
पानी भी मौज बन कर उठ उठ के देखता हो
*सफ़=कतार; कोहसार=पर्वतों की श्रंखला

आग़ोश में ज़मीं की सोया हुआ हो सब्ज़ा
फिर फिर के झाड़ियों में पानी चमक रहा हो
पानी को छू रही हो झुक झुक के गुल की टहनी
जैसे हसीन कोई आईना देखता हो
*सब्ज़ा=हरियाली

मेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन को
सुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा हो
रातों को चलने वाले रह जाएँ थक के जिस दम
उम्मीद उन की मेरा टूटा हुआ दिया हो
*क़बा=पहनावा;

बिजली चमक के उन को कुटिया मिरी दिखा दे
जब आसमाँ पे हर सू बादल घिरा हुआ हो
पिछले पहर की कोयल वो सुब्ह की मोअज़्ज़िन
मैं उस का हम-नवा हूँ वो मेरी हम-नवा हो
*मोअज़्ज़िन=प्रार्थना के लिये आवाज़ देने वाली; हम-नवा=साथ देने वाला

कानों पे हो न मेरे दैर ओ हरम का एहसाँ
रौज़न ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा हो
फूलों को आए जिस दम शबनम वज़ू कराने
रोना मिरा वज़ू हो नाला मिरी दुआ हो
*दैर, हरम=मंदिर मस्जिद; रौज़न=छोटी खिड़की; सहर-नुमाँ=जादुई

इस ख़ामुशी में जाएँ इतने बुलंद नाले
तारों के क़ाफ़िले को मेरी सदा दिरा हो
हर दर्दमंद दिल को रोना मिरा रुला दे
बेहोश जो पड़े हैं शायद उन्हें जगा दे
*नाले=पुकार; सदा=आवाज़; दिरा=ज्ञात

~ अल्लामा इक़बाल


  Apr 13, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, April 8, 2018

तुझ को मालूम नहीं


तुझ को मालूम नहीं तुझ को भला क्या मालूम

तेरे चेहरे के ये सादा से अछूते से नुक़ूश
मेरी तख़्ईल को क्या रंग अता करते हैं
तेरी ज़ुल्फ़ें तिरी आँखें तिरे आरिज़ तिरे होंट
कैसी अन-जानी सी मासूम ख़ता करते हैं

*नुक़ूश=चिन्ह; तख़्ईल=कल्पना; आरिज़=गाल

तेरे क़ामत का लचकता हुआ मग़रूर तनाव
जैसे फूलों से लदी शाख़ हवा में लहराए
वो छलकते हुए साग़र सी जवानी वो बदन
जैसे शो'ला सा निगाहों में लपक कर रह जाए

*क़ामत=क़द; मग़रूर=घमंडी

ख़ल्वत-ए-बज़्म हो या जल्वत-ए-तन्हाई हो
तेरा पैकर मिरी नज़रों में उभर आता है
कोई साअ'त हो कोई फ़िक्र हो कोई माहौल
मुझ को हर सम्त तिरा हुस्न नज़र आता है

*ख़ल्वत=एकांत; जल्वत=कोई रूप; पैकर=आकार; सा'अत=क्षण; सिम्त=तरफ

चलते चलते जो क़दम आप ठिठक जाते हैं
सोचता हूँ कि कहीं तू ने पुकारा तो नहीं
गुम सी हो जाती हैं नज़रें तो ख़याल आता है
इस में पिन्हाँ तिरी आँखों का इशारा तो नहीं

*पिन्हाँ=छुपा हुआ

धूप में साया भी होता है गुरेज़ाँ जिस दम
तेरी ज़ुल्फ़ें मिरे शानों पे बिखर जाती हैं
झुक के जब सर किसी पत्थर पे टिका देता हूँ
तेरी बाहें मिरी गर्दन में उतर आती हैं

*गुरेज़ाँ=पलायन; शाने=कंधों

आँख लगती है तो दिल को ये गुमाँ होता है
सर-ए-बालीं कोई बैठा है बड़े प्यार के साथ
मेरे बिखरे हुए उलझे हुए बालों में कोई
उँगलियाँ फेरता जाता है बड़े प्यार के साथ

*सर-ए-बालीं=छत पर

जाने क्यूँ तुझ से दिल-ए-ज़ार को इतनी है लगन
कैसी कैसी न तमन्नाओं की तम्हीद है तू
दिन में तू इक शब-ए-महताब है मेरी ख़ातिर
सर्द रातों में मिरे वास्ते ख़ुर्शीद है तू

*व्यथित हृदय; शब-ए-महताब=चाँदनी रात; ख़ुर्शीद=सूरज

अपनी दीवानगी-ए-शौक़ पे हँसता भी हूँ मैं
और फिर अपने ख़यालात में खो जाता हूँ
तुझ को अपनाने की हिम्मत है न खो देने का ज़र्फ़
कभी हँसते कभी रोते हुए सो जाता हूँ मैं
किस को मालूम मिरे ख़्वाबों की ताबीर है क्या
कौन जाने कि मिरे ग़म की हक़ीक़त क्या है

*ज़र्फ=सामर्थ्य; ख़्वाबों की ताबीर=सपनों का अर्थ

मैं समझ भी लूँ अगर इस को मोहब्बत का जुनूँ
तुझ को मालूम नहीं तुझ को न होगा मालूम

~ हिमायत अली शाएर

  Apr 8, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, April 7, 2018

अंजलि के फूल

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अंजलि के फूल गिरे जाते हैं
आये आवेश फिरे जाते हैं।

चरण-ध्वनि पास-दूर कहीं नहीं
साधें आराधनीय रही नहीं
उठने, उठ पड़ने की बात रही
साँसों से गीत बे-अनुपात रही

बागों में पंखनियाँ झूल रहीं
कुछ अपना, कुछ सपना भूल रहीं
फूल-फूल धूल लिये मुँह बाँधे
किसको अनुहार रही चुप साधे

दौड़ के विहार उठो अमित रंग
तू ही `श्रीरंग' कि मत कर विलम्ब
बँधी-सी पलकें मुँह खोल उठीं
कितना रोका कि मौन बोल उठीं

आहों का रथ माना भारी है
चाहों में क्षुद्रता कुँआरी है
आओ तुम अभिनव उल्लास भरे
नेह भरे, ज्वार भरे, प्यास भरे

अंजलि के फूल गिरे जाते हैं
आये आवेश फिरे जाते हैं।।

~ माखनलाल चतुर्वेदी


  Apr 7, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Wednesday, April 4, 2018

अदा आई जफ़ा आई

अदा आई जफ़ा आई ग़ुरूर आया हिजाब आया
हज़ारों आफ़तें ले कर हसीनों पर शबाब आया

*जफ़ा=अत्याचार, ज़ुल्म; हिजाब= लज्जा

~ नूह नारवी


  Apr 2, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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ख़त के आख़िर में सभी

ख़त के आख़िर में सभी यूँ ही रक़म करते हैं,
उस ने रस्मन ही लिखा होगा तुम्हारा अपना

‍~ निदा फ़ाज़ली


  Apr 1, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, March 25, 2018

कहीं पे दूर किसी अजनबी सी घाटी में

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कहीं पे दूर किसी अजनबी सी घाटी में
किसी का एक हसीं शाहकार हो जैसे
मुसव्विरी की इक उम्दा मिसाल लगती थी
कोई इनायत-ए-परवर-दिगार हो जैसे
*शाहकार= अति उत्तम रचना; मुसव्विरी=पेंटिंग़

ये ज़िंदगी की हर इक रंग से थी बेगानी
ख़याल ओ ख़्वाब की बातों से थी वो अनजानी
बनाने वाले ने उस को बना के छोड़ा था
और उस के चेहरे पे इक नाम लिख के छोड़ा था
न दी ज़बाँ न कोई आईना दिया उस को
बना के बुत यूँ ज़मीं पर सजा दिया उस को
उसे ज़माने की बातों से कुछ गिला ही न था
सिवाए जिस्म के एहसास कुछ मिला ही न था

फिर एक रोज़ किसी नर्म नर्म झोंके ने
कहा ये कान में आ कर बहुत ही चुपके से
ज़रा सा आँखों को खोलो तो तुम को दिखलाऊँ
महकती ज़िंदगी कैसे है तुम को सिखलाऊँ
कहाँ से आई हो कब से यहाँ खड़ी हो तुम
मिरे वजूद के हर रंग से जुड़ी हो तुम
ये गुनगुनाती हुई वादियाँ ये गुल-कारी
नदी की झूमती गाती हुई ये किलकारी
ये धूप छाँव के बादल ये मख़मली एहसास
मचल रहे हैं बहुत प्यार से तुम्हारे पास
महकते दिल हैं यहाँ ख़ुशबू-ए-मोहब्बत से
ख़ुदा के नूर से पैदा हुई हरारत से
*गुल-कारी= बेल-बूटे; नूर=प्रकाश

हवा का झोंका जो कानों में उस के बोल गया
तो उस ने चौंक के पलकों को अपनी खोल दिया
ये वादियों का हसीं रंग उस ने जब देखा
हुई ये सोच के हैरान उस ने अब देखा
बदन में जितने थे एहसास वो मचलने लगे
नज़ारे उस की निगाहों के साथ चलने लगे

ये रंग ओ नूर के क़िस्से समझ में आने लगे
हसीन आँखों में कुछ ख़्वाब झिलमिलाने लगे
और ऐसे हो के मुकम्मल वो हुस्न की मूरत
किसी के प्यार की ख़ुश्बू से बन गई औरत

~ अलीना इतरत

  Mar 25, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, March 24, 2018

मिट्टी को देख फूल हँस पड़ा

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मिट्टी को देख फूल हँस पड़ा
मस्ती से लहरा कर पंखुरियाँ
बोला वह मिट्टी से–
उफ मिट्टी!
पैरों के नीचे प्रतिक्षण रौंदी जा कर भी
कैसे होता है संतोष तुम्हें?
उफ मिट्टी!
मैं तो यह सोच भी नहीं सकता हूं क्षणभर‚
स्वर में कुछ और अधिक बेचैनी बढ़ आई‚
ऊंचा उठ कर कुछ मृदु–पवन झकोरों में

उत्तेजित स्वर में‚
वह कहता, कहता ही गया–
कब से पड़ी हो ऐसे?
कितने युग बीत गये?
तेरे इस वक्ष पर ही सृजन मुस्कुराए‚
कितने ताण्डव इठलाए?
किंतु तुम पड़ी थीं जहां‚
अब भी पड़ी हो वहीं‚
कोइ विद्रोह नहीं मन में तुम्हारे उठा‚
कोई सौंदर्य भाव पलकों पर नहीं जमा।
अधरों पर कोई मधु–कल्पना न आई कभी‚
कितनी नीरस हो तुम‚
कितनी निष्क्रिय हो तुम‚
बस बिलकुल ही जड़ हो!

मिट्टी बोली–प्रिय पुष्प
किसके सौंदर्य हो तुम?
किसके मधु–गान हो?
किसकी हो कल्पना‚ प्रिय?
किसके निर्माण हो?
किसकी जड़ता ने तुम्हें चेतना सुरभि दी है?
किसकी ममता ने जड़ें और गहरी कर दी हैं?
नित–नित विकसो‚ महको
पवन चले लहराओ‚
पंखुरिया सुरभित हों‚
किरन उगे मुस्काओ‚
लेकिन घबरा कर संघर्षों से जब–जब‚
मुरझा तन–मन लेकर मस्तक झुकाओगे‚
तब–तब ओ रूपवान!
सुरभि–वान!
कोमल–तन!
मिट्टी की गोद में ही चिर–शांति पाओगे।

∼ वीरबाला भावसार


  Mar 24, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, March 23, 2018

तेरे महल में कैसे बसर हो

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तेरे महल में कैसे बसर हो इस की तो गीराई बहुत है
मैं घर की अँगनाई में ख़ुश हूँ मेरे लिए अँगनाई बहुत है
*गीराई=कमी, अकाल

अपनी अपनी ज़ात में गुम हैं अहल-ए-दिल भी अहल-ए-नज़र भी
महफ़िल में दिल क्यूँ कर बहले महफ़िल में तन्हाई बहुत है

ग़र्क़-ए-दरिया होना यारो 'ग़ालिब' ने क्यूँ चाहा आख़िर
ऐसी मर्ग-ए-ला-वारिस में सोचो तो रुस्वाई बहुत है
*ग़र्क़-ए-दरिया=नदी में डूबना; मर्ग =मृत्यु

दुश्मन से घबराना अबस है ग़ैर से डरना भी ला-हासिल
कुल का घातक घर का भेदी एक विभीषण भाई बहुत है
*अबस= व्यर्थ

बरसों में इक जोगी लौटा जंगल में फिर जोत जगाई
कहने लगा ऐ भोले शंकर शहरों में महँगाई बहुत है

अपनी धरती ही के दुख-सुख हम इन शेरों में कहते हैं
हम को हिमाला से क्या मतलब उस की तो ऊँचाई बहुत है

पुर्सिश-ए-ग़म को ख़ुद नहीं आए उन का मगर पैग़ाम तो आया
हिज्र की रुत में जान-ए-हज़ीं को दूर की ये शहनाई बहुत है
*पुर्सिश-ए-ग़म= दुख का हाल चाल; हिज्र=जुदाई; जान-ए-हज़ीं=दुखी जीवन

दिल की किताबें पढ़ नहीं सकता लेकिन चेहरे पढ़ लेता हूँ
ढलती उम्र की धूप में 'साहिर' इतनी भी बीनाई बहुत है

~ साहिर होशियारपुरी

  Mar 23, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Wednesday, March 21, 2018

ऐ मिरे नूर-ए-नज़र लख़्त-ए-जिगर

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ऐ मिरे नूर-ए-नज़र लख़्त-ए-जिगर जान-ए-सुकूँ
नींद आना तुझे दुश्वार नहीं है सो जा
*नूर=रौशनी; लख़्त=टुकड़ा;

ऐसे बद-बख़्त ज़माने में हज़ारों होंगे
जिन को लोरी भी मयस्सर नहीं आती होगी
मेरी लोरी से तिरी भूक नहीं मिट सकती
मैं ने माना कि तुझे भूक सताती होगी
*बद-बख़्त=अभागे

लेकिन ऐ मेरी उमीदों के हसीं ताज-महल
मैं तिरी भूक को लोरी ही सुना सकती हूँ
तेरा रह रह के ये रोना नहीं देखा जाता
अब तुझे दूध नहीं ख़ून पिला सकती हूँ

भूक तो तेरा मुक़द्दर है ग़रीबी की क़सम
भूक की आग में जल जल के ये रोना कैसा
तू तो आदी है इसी तरह से सो जाने का
भूक की गोद में फिर आज न सोना कैसा

आज की रात फ़क़त तू ही नहीं तेरी तरह
और कितने हैं जिन्हें भूक लगी है बेटे
रोटियाँ बंद हैं सरमाए के तह-ख़ानों में
भूक इस मुल्क के खेतों में उगी है बेटे
*सरमाए=धन

लोग कहते हैं कि इस मुल्क के ग़द्दारों ने
सिर्फ़ महँगाई बढ़ाने को छुपाया है अनाज
ऐसे नादार भी इस मुल्क में सो जाते हैं
हल चलाए हैं जिन्हों ने नहीं पाया है अनाज
*नादार=गरीब

तू ही इस मुल्क में नादार नहीं है सो जा
ऐ मिरे नूर-ए-नज़र लख़्त-ए-जिगर जान-ए-सुकूँ
नींद आना तुझे दुश्वार नहीं है सो जा

‍ ~ कफ़ील आज़र अमरोहवी


  Mar 21, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, March 18, 2018

मन! कितना अभिनय शेष रहा

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मन!
कितना अभिनय शेष रहा
सारा जीवन जी लिया, ठीक
जैसा तेरा आदेश रहा!

बेटा, पति, पिता, पितामह सब
इस मिट्टी के उपनाम रहे
जितने सूरज उगते देखो
उससे ज्यादा संग्राम रहे
मित्रों मित्रों रसखान जिया
कितनी भी चिंता, क्लेश रहा!

हर परिचय शुभकामना हुआ
दो गीत हुए सांत्वना बना
बिजली कौंधी सो आँख लगीं
अँधियारा फिर से और लगा
पूरा जीवन आधा–आधा
तन घर में मन परदेश रहा!

आँसू–आँसू संपत्ति बने
भावुकता ही भगवान हुई
भीतर या बाहर से टूटे
केवल उनकी पहचान हुई
गीत ही लिखो गीत ही जियो
मेरा अंतिम संदेश रहा!

~ भारत भूषण


  Mar 18, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, March 17, 2018

मिरे साक़िया मुझे भूल जा

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मिरे साक़िया मुझे भूल जा
मिरे दिलरुबा मुझे भूल जा

न वो दिल रहा न वो जी रहा
न वो दौर-ए-ऐश-ओ-ख़ुशी रहा
न वो रब्त-ओ-ज़ब्त-ए-दिली रहा
न वो औज-ए-तिश्ना-लबी रहा
न वो ज़ौक़-ए-बादा-कशी रहा
मैं अलम-नवाज़ हूँ आज-कल
मैं शिकस्ता-साज़ हूँ आज-कल
मैं सरापा राज़ हूँ आज-कल
मुझे अब ख़याल में भी न मिला
मुझे भूल जा मुझे भूल जा

*रब्त-ओ-ज़ब्त=मेल-जोल और संग-साथ; अलमनवाज़::सहानुभूति; शिकस्ता-साज़=टूटा हुआ वाद्य; सरापा=सर से पाँव तक

मुझे ज़िंदगी से अज़ीज़-तर
फ़क़त एक तेरी ही ज़ात थी
तिरी हर निगाह मिरे लिए
सबब-ए-सुकून-ए-हयात थी
मिरी दास्तान-ए-वफ़ा कभी
तिरी शरह-ए-हुस्न-ए-सिफ़ात थी
मगर अब तो रंग ही और है
न वो तर्ज़ है न वो तौर है
ये सितम भी क़ाबिल-ए-ग़ौर है
तुझे अपने हुस्न का वास्ता
मुझे भूल जा मुझे भूल जा

*ज़ात=व्यक्तित्व; शरह=स्पष्ट रूप से, सिफ़ात=तारीफ़;

क़सम इज़्तिराब-ए-हयात की
मुझे ख़ामुशी में क़रार है
मिरे सहन-ए-गुलशन-ए-इश्क़ में
न ख़िज़ाँ है अब न बहार है
यही दिल था रौनक़-ए-अंजुमन
यही दिल चराग़-ए-मज़ार है
मुझे अब सुकून-ए-दिगर न दे
मुझे अब नवेद-ए-सहर न दे
मुझे अब फ़रेब-ए-नज़र न दे
न हो वहम-ए-इश्क़ में मुब्तला
मुझे भूल जा मुझे भूल जा

*इज़्तिराब-ए-हयात=ज़िंदगी की बेचैनी; सहन=आँगन; दिगर=दूसरा; नवेद-ए-सहर=(सुबह की) अच्छी ख़बर; मुब्तला=फँसना

~ शकील बदायूँनी


  Mar 17, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, March 16, 2018

मलयानिल नाचा करती है

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जब से जग के दुःख-दर्दों का
फूलों से शृंगार किया है
तब से मेरे मन-आँगन में, मलयानिल नाचा करती है।

पर्वत जैसी पीर हुई, पर
मैंने उसको तन पर झेला
झंझाओं के विकट व्यूह में
मैं आखिर तक लड़ा अकेला ।
जब से तपन जेठ की लेकर
घन-सावन से प्यार किया है
तब से वासंती मनुहारें, मधुर छंद बाँचा करती हैं।

जो भी मिला सभी का माना
विष तो क्या अमृत ही बाँटा
कभी न सोचा इस विनिमय में
कितना लाभ कि कितना घाटा ?
जब से पर्वत सा मन लेकर
क्षितिजों को विस्तार दिया है
तब से जीवन की क्षमताएँ, पग-पग को साँचा करती हैं।

संबंधों के लिए आज तक
सम्मानों के दीप जलाए,
घोर वर्जना, अविनय के पथ
मैंने अनगिन जाल बिछाए ।
जब से तम से रण करने में
मैंने मन-दिनमान दिया है
तब से जग की उज्ज्वल आशा, रह-रहकर जाँचा करती है।

*मलयानिल=मलय पर्वत की ओर से आने वाली चन्दन सी सुगंधित हवा

~ देवेन्द्र आर्य


  Mar 16, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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