
प्रियतम इस पथ में पांव न दो,
चलते -चलते थक जाओगे।
मैं तुम से प्रियतम कहती हूँ
तुम प्यार नहीं कर पाओगे।
मैं आज प्रणय-पथ में आयी,
मन में सुख के सपने लायी,
पर इसका कुछ भी ठीक नहीं-
कल कौन तुम्हारे मन भायी?
यह ज्ञात नहीं, इस जीवन में
तुम किस-किस के कहलाओगे?
मैं तुम से प्रियतम कहती हूँ ,
तुम प्यार नहीं कर पाओगे।
मानव का मन है ही चंचल,
अपने से भी करता है छल,
दो छींटों से बुझ जाता है,
विक्षिप्त धधकता विरहानल
तुम भी तृणवत् मन की गति
के, हलकोरों में बह जाओगे।
मैं तुम से प्रियतम कहती हूँ
तुम प्यार नहीं कर पाओगे।
तुम मेरे प्राणों से बढ़कर
मैं तुमको प्रियतम कहती हूँ
जीवंत प्रणय के बंधन को,
पर मानो तो भ्रम कहती हूँ
तुम सुख के सुन्दर धोखे में
उर को कब तक उलझाओगे?
जब ख़ुद नश्वर, तो भावों में
अमरत्व कहां से लाओगे?
मैं तुम से प्रियतम कहती हूँ
तुम प्यार नहीं कर पाओगे।
~ 'गोरख नाथ'
Sep 27, 2015| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh