
ग़ैर को मुंह लगा के देख लिया
झूठ-सच आज़मा के देख लिया
कितनी फ़रहत-फ़ज़ा थी बू-ए-वफ़ा
उसने दिल को जला के देख लिया
*फ़रहत-फ़ज़ा=सुहानी; बू-ए-वफ़ा=वफ़ा की सुगंध
जाओ भी, क्या करोगे मेह्रो-वफ़ा
बारहा, आज़मा के देख लिया
*मेह्रो-वफ़ा=कृपा व प्रेम निर्वाह
है इधर आइना, उधर दिल है
जिसको चाहा, उठा के देख लिया
उसने सुबहे-शबे-विसाल मुझे
जाते जाते भी आ के देख लिया
*सुबहे-शबे-विसाल=मिलन रात्रि के बाद का सवेरा
'दाग़' ने ख़ूब आशिक़ी का मज़ा
जल के देखा, जला के देख लिया
~ दाग़ देहलवी
Nov 5, 2015| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
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