Disable Copy Text

Saturday, June 22, 2019

बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम



बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से
तो मुझ को ख़ुदा रा ग़लत मत समझना
कि मेरी ज़रूरत हो तुम
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी
हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी
जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ
सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी
नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना
किसी और से देखो दिल मत लगाना
कि मेरी अमानत हो तुम
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा
है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा
और इस पर ये काली घटाओं का पहरा
गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है
ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है
बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल
फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल
वो पाकीज़ा मूरत हो तुम
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर
शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर
जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे
जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के
छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए
भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए
वो पहली मोहब्बत हो तुम
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

~ ताहिर फ़राज़


 Jun 22, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, June 21, 2019

शैलेंद्र

Image may contain: 1 person, closeup


गीतकार शैलेंद्र के प्रति

'गीतों के जादूगर का मैं छंदों से तर्पण करता हूँ।'

सच बतलाऊँ तुम प्रतिभा के ज्योतिपुत्र थे,छाया क्या थी,
भली-भाँति देखा था मैंने, दिल ही दिल थे, काया क्या थी।

जहाँ कहीं भी अंतर्मन से, ॠतुओं की सरगम सुनते थे,
ताज़े कोमल शब्दों से तुम रेशम की जाली बुनते थे।

जन मन जब हुलसित होता था, वह थिरकन भी पढ़ते थे तुम,
साथी थे, मज़दूर-पुत्र थे, झंडा लेकर बढ़ते थे तुम।

युग की अनुगुंजित पीड़ा ही घोर घन-घटा-सी छाई
प्रिय भाई शैलेन्द्र, तुम्हारी पंक्ति-पंक्ति नभ में लहराई।

तिकड़म अलग रही मुस्काती, ओह, तुम्हारे पास न आई,
फ़िल्म-जगत की जटिल विषमता, आख़िर तुमको रास न आई।

ओ जन मन के सजग चितेरे, जब-जब याद तुम्हारी आती,
आँखें हो उठती हैं गीली, फटने-सी लगती है छाती

~ नागार्जुन

 Jun 21, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, June 9, 2019

अब के दीवार में दरवाज़ा रखूँ

Image may contain: one or more people, people standing, tree, grass, sky, plant, outdoor and nature


अब के दीवार में दरवाज़ा रखूँ या न रखूँ
अजनबी फिर न कोई दरपय-ए-आज़ार आ जाए
एक दस्तक में मिरी सारी फ़सीलें ढा जाए
अब के दीवार में दरवाज़ा रक्खूँ या न रखूँ

*आज़ार=रोग, तक़लीफ़; फ़सीलें=किले की दीवारें

एक अहराम न चुन लूँ सिफ़त-ए-दूद-ए-हरीर
कोई आए तो बस इक गुम्बद-ए-दर-बस्ता मिले
राज़-ए-सर-बस्ता मिले
लाख सर फोड़े सदा कोई न मुझ तक पहुँचे
क़ासिद-ए-मौज-ए-हवा कोई न मुझ तक पहुँचे
अब के दीवार में दरवाज़ा रक्खूँ या न रखूँ

*अहराम=पिरामिड; सिफ़त-ए-दूद-ए-हरीर=रेशमी धुयें से बना; गुम्बद-ए-दर-बस्ता=बंद दरवाज़ों वाला गुम्बद; क़ासिद-ए-मौज-ए-हवा=संदेश वाहक या हवा का झोंका सारे अंदेशे मगर एक तरफ़

एक तरफ़ तेरी उम्मीद
जाने किस वक़्त इधर तेरी सवारी आ जाए
अजनबी लाख कोई मेरी फ़सीलें ढा जाए
मुझ को दीवार में दरवाज़ा लगाना होगा


~ ख़ुर्शीद रिज़वी

 Jun 9, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, June 2, 2019

मैं तिरी उल्फ़त में फ़ना

Image may contain: 1 person, closeup


तू मिरे पास रहे मैं तिरी उल्फ़त में फ़ना (बरबाद)

जैसे अँगारों पे छींटों से धुआँ
बिंत-ए-महताब (चाँद की बेटी) को हाले (हैलो) में लिए
तू फ़रोज़ाँ (प्रकाशमान) हो मगर सारी तपिश मेरी हो
फैले अफ़्लाक (आसमानों) में बे-सम्त (दिशाहीन) सफ़र
साथ में वक़्त का रहवार (घोड़ा) लिए
जिस तरफ़ मौज-ए-तमन्ना कह दे
जुस्तुजू (इच्छा) शौक़ का पतवार लिए
गुफ़्तुगू रब्त (सम्बंध) के एहसास से दूर
ख़ामुशी रंज-ए-मुकाफ़ात (प्रतिशोध) से दूर
चाँदनी की कभी सरगोशी (काना-फूँसी) सी

फूल के नर्म लबों को चूमे
गर्द अंदेशा को शबनम धो दे
क़हक़हे फूटीं तअम्मुल (सोच) के बग़ैर
नूर उबले कभी फ़व्वारों में
और नुक़्ते (बिंदु) में सिमट आए कभी
तह-ब-तह खोले रिदा (चादर) ज़ुल्मत की
अपनी बेबाक निगाहों से मुनव्वर (रौशन) कर दे
नुक़्ता-ए-वस्ल (मिलन बिंदु) ये मिटता हुआ धब्बा ही सही
होश बहता है तो बह जाने दे

तू मिरे पास रहे मैं तिरी उल्फ़त में फ़ना

~ अबरारूल हसन

 Jun 2, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, June 1, 2019

रुख़्सत


तुम ने जो फूल
मुझे रुख़्सत होते वक़्त दिया था
वो नज़्म मैं ने
तुम्हारी यादों के साथ
लिफ़ाफ़े में बंद कर के रख दी थी

आज दिनों बाद
बहुत अकेले में उसे खोल कर देखा है
फूल की नौ पंखुड़ियाँ हैं
नज़्म के नौ मिसरे।
यादें भी कैसी अजीब होती हैं
पहली पंखुड़ी याद दिलाती है उस लम्हे की जब मैं ने
पहली बार तुम्हें भरी महफ़िल में
अपनी तरफ़ मुसलसल तकते हुए देख लिया था

दूसरी पंखुड़ी,
जब हम पहली बार एक दूसरे को कुछ कहे बग़ैर
बस यूँही जान बूझ कर नज़र बचाते हुए
एक राहदारी से गुज़र गए थे

~ इफ़्तिख़ार आरिफ़


 Jun 1, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, May 25, 2019

हम जहाँ हैं वहीं से आगे बढ़ेंगे

Image may contain: 1 person, standing, sky, cloud, outdoor and nature

हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे।
देश के बंजर समय के
बाँझपन में
याकि अपनी लालसाओं के
अंधेरे सघन वन में

या अगर हैं
परिस्थितियों की तलहटी में
तो वहीं से बादलों के रूप में
ऊपर उठेंगे।
हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे।

यह हमारी नियति है
चलना पड़ेगा
रात में दीपक
दिवस में सूर्य बन जलना पड़ेगा।

जो लड़ाई पूर्वजों ने छोड़ दी थी
हम लड़ेंगे
हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे।

~ ओम प्रभाकर


 May 25, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, May 24, 2019

सिंहासन खाली करो

Image may contain: one or more people, crowd and outdoor

सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता, हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

जनता, हां,लंबी - बडी जीभ की वही कसम,
"जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।"
"सो ठीक,मगर,आखिर,इस पर जनमत क्या है?"
'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?"

मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;
अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार
बीता गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं
यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।

सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो
अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।

आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

~ रामधारी सिंह दिनकर



 May 24, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, May 19, 2019

मन्जिल दूर नहीं है

Image may contain: 1 person, standing, sitting, child and outdoor


यह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है

चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से
चमक रहे पीछे मुड देखो चरण-चिनह जगमग से
शुरू हुई आराध्य भूमि यह क्लांत नहीं रे राही;
और नहीं तो पाँव लगे हैं क्यों पड़ने डगमग से
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है

अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का,
सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश निर्मम का।
एक खेप है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ;
वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा,
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही,
अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है।
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

~ रामधारी सिंह दिनकर

 May 18, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, May 17, 2019

अर्पित तुमको मेरी आशा

Image may contain: 1 person, smiling

अर्पित तुमको मेरी आशा और निराशा और पिपासा।

एक तुम्हारे बतलाए थे,
विचरण को सौ ठौर, बसेरे
को केवल गलबाँह तुम्हारी,
अर्पित तुमको मेरी आशा और निराशा और पिपासा।

ऊँचे-ऊँचे लक्ष्य बनाकर
जब जब उनको छूकर आता,
हर्ष तुम्हारे मन का मेरे
मन का प्रतिद्वंदी बन जाता,
और जहाँ मेरी असफलता
मेरी विह्वलता बन जाती,
वहाँ तुम्हारा ही दिल बनता मेरे दिल का एक दिलासा
अर्पित तुमको मेरी आशा और निराशा और पिपासा।

~ हरिवंशराय बच्चन

 May 17, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, May 12, 2019

बेसन की सौंधी रोटी पर - माँ

Image may contain: one or more people, ocean, sky, twilight, outdoor, water and nature

बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका बासन चिमटा फुकनी जैसी माँ

बाँस की खर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी थकी दो-पहरी जैसी माँ

चिड़ियों की चहकार में गूँजे राधा मोहन अली अली
मुर्ग़े की आवाज़ से बजती घर की कुंडी जैसी माँ

बीवी बेटी बहन पड़ोसन थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी माँ

बाँट के अपना चेहरा माथा आँखें जाने कहाँ गई
फटे पुराने इक एल्बम में चंचल लड़की जैसी माँ

~ निदा फ़ाज़ली


 May 12, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, May 11, 2019

शाम ही नहीं होती


Image may contain: bicycle, sky, tree, plant, grass, cloud, outdoor and nature

छुटपुटे के ग़ुर्फ़े में 
लम्हे अब भी मिलते हैं 
सुब्ह के धुँदलके में 
फूल अब भी खिलते हैं 
अब भी कोहसारों पर 
सर-कशीदा हरियाली
पत्थरों की दीवारें
तोड़ कर निकलती है
अब भी आब-ज़ारों पर
कश्तियों की सूरत में
ज़ीस्त की तवानाई
ज़ाविए बदलती है 

*छुटपुटे=जल्दबाज़ी); ग़ुर्फ़े=ख़िड़की; कोहसारों=पर्वतों; सर-कशीदा=ऊँची; आब-ज़ारों=झरने; ज़ीस्त=जीवन; तवानाई=ताक़त; ज़ाविए=दृष्टि-कोण

अब भी घास के मैदाँ
शबनमी सितारों से
मेरे ख़ाक-दाँ पर भी
आसमाँ सजाते हैं
अब भी खेत गंदुम के
तेज़ धूप में तप कर
इस ग़रीब धरती को
ज़र-फ़िशाँ बनाते हैं 

*ख़ाक-दाँ=घर; गंदुम=गेहूँ; ज़र-फ़िशाँ=सुनहरा

साए अब भी चलते हैं
सूरज अब भी ढलता है
सुब्हें अब भी रौशन हैं
रातें अब भी काली हैं
ज़ेहन अब भी चटयल (उजाड़) हैं
रूहें अब भी बंजर हैं
जिस्म अब भी नंगे हैं
हाथ अब भी ख़ाली हैं
अब भी सब्ज़ फ़सलों में
ज़िंदगी के रखवाले
ज़र्द ज़र्द चेहरों पर
ख़ाक ओढ़े रहते हैं
अब भी उन की तक़दीरें
मुंक़लिब नहीं होतीं
मुंक़लिब नहीं होंगी
कहने वाले कहते हैं
गर्दिशों की रानाई
आम ही नहीं होती
अपने रोज़-ए-अव्वल की
शाम ही नहीं होती

*चटयल=उजाड़; ज़र्द=पीले; मुंक़लिब=बदली; रानाई=सुंदरता;  रोज़-ए-अव्वल=पहले दिन

~
अहमद नसीम क़ासमी

 May 11, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, May 10, 2019

अब के हम बिछड़े तो शायद


अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें,
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
।

ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती,
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें
।

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो,
नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें
।

तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा,
दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें
।
*हिजाब=परदा

आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर,
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें
।
*दार=सूली; निसाब=पाठ्यक्रम

अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़',
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
।
*माज़ी=गुज़रा हुआ; सराब=मृग मरीचिका

~ अहमद फ़राज़


 May 10, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, May 5, 2019

ज़िंदगी को देखा है



ज़िंदगी को देखा है ज़िंदगी से भागे हैं
रौशनी के आँचल में तीरगी के धागे हैं
तीरगी के धागों में ख़ून की रवानी है
दर्द है मोहब्बत है हुस्न है जवानी है
*तीरगी=अंधेरा

हर तरफ़ वही अंधा खेल है अनासिर का
तैरता चले साहिल डूबता चले दरिया
चाँद हो तो काकुल की लहर और चढ़ती है
रात और घटती है बात और बढ़ती है
*अनासिर=(पंच) तत्व; काकुल=बालों की लट

ये कशिश मगर क्या है रेशमी लकीरों में
शाम कैसे होती है नाचते जज़ीरों में
हर क़दम नई उलझन सौ तरह की ज़ंजीरें
फ़लसफ़ों के वीराने दूसरों की जागीरें
*ज़ज़ीरे=द्वीप;

आँधियाँ उजालों की घन-गरज सियासत की
काँपते हैं सय्यारे रात है क़यामत की
जंग से जले दुनिया चाँद को चले पागल
आँख पर गिरे बिजली कान में पड़े काजल
*सय्यारे=ग्रह

दौर है परिंदों का छेड़ है सितारों से
काएनात आजिज़ है हम गुनाहगारों से
*काएनात=सृष्टि

~ महबूब ख़िज़ां


 May 05, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, May 4, 2019

संदलीं जिस्म की ख़ुशबू से महकती...


संदलीं जिस्म की ख़ुशबू से महकती हुई रात
मुझ से कहती है यहीं आज बसेरा कर ले
गर तिरी नींद उजालों की परस्तार नहीं
अपने एहसास पे ज़ुल्फ़ों का अँधेरा कर ले

*परस्तार=पूजने वाला

मैं कि दिन भर की चका-चौंद से उकताया हुआ
किसी ग़ुंचे की तरह धूप में कुम्हलाया हुआ
इक नई छाँव में सुस्ताने को आ बैठा हूँ
गर्दिश-ए-दहर के आलाम से घबराया हुआ
सोचता हूँ कि यहीं आज बसेरा कर लूँ

*गर्दिश-ए-दहर=धरती की डोलना

सुब्ह के साथ कड़ी धूप खड़ी है सर पर
क्यूँ न इस अब्र को कुछ और घनेरा कर लूँ
जाने ये रात अकेले में कटे या न कटे
क्यूँ न कुछ देर शबिस्ताँ में अँधेरा कर लूँ

*अब्र=बादल; शबिस्ताँ=रात में रुकने का स्थान

लेकिन इस रात की ये बात न बढ़ जाए कहीं
तुझ से मिल कर ये मिरे दिल को लगा है धड़का
राख हो जाऊँगा मैं सुब्ह से पहले पहले
खुल के सीने में जो एहसास का शोला भड़का

‍~ क़तील शिफ़ाई 

 May 04, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, May 3, 2019

नया शिवाला

Image may contain: one or more people, sky, outdoor, nature and water

सच कह दूँ ऐ बरहमन गर तू बुरा न माने
तेरे सनम-कदों के बुत हो गए पुराने
अपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखा
जंग-ओ-जदल सिखाया वाइज़ को भी ख़ुदा ने
तंग आ के मैं ने आख़िर दैर ओ हरम को छोड़ा
वाइज़ का वाज़ छोड़ा छोड़े तिरे फ़साने
पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है
ख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है
*सनम-कदों=जा घरों; जंग-ओ-जदल=लड़ाई; वाइज़=उपदेशक; दैर ओ हरम=मंदिर-मस्जिद; वाज़=सलाह; ख़ाक-ए-वतन=देश की मिट्टी

आ ग़ैरियत के पर्दे इक बार फिर उठा दें
बिछड़ों को फिर मिला दें नक़्श-ए-दुई मिटा दें
सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्ती
आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें
दुनिया के तीरथों से ऊँचा हो अपना तीरथ
दामान-ए-आसमाँ से इस का कलस मिला दें
हर सुब्ह उठ के गाएँ मंतर वो मीठे मीठे
सारे पुजारियों को मय पीत की पिला दें
शक्ति भी शांति भी भगतों के गीत में है
धरती के बासीयों की मुक्ती भी प्रीत में है

*ग़ैरियत=अपना-पराया; नक़्शे-दुई=दोगलापन

~ अल्लामा इक़बाल 

 May 03, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, April 28, 2019

मेरी आहट गूँज रही है


मेरी आहट गूँज रही है
दुनिया की हर राहगुज़र में
ऊषा मेरे नक़्श-ए-क़दम पर
ख़ुशबू की पिचकारी ले कर
रंग छिड़कती जाती है
सूरज के अलबेले मुग़न्नी
जुम्बिश पा के सरगम पर
संगीत सुनाते जाते हैं
सजी-सजाई शाम की दुल्हन
शब की सियह-अंदाम अभागन
मेरे मन की नाज़ुक धड़कन
एक ही ताल पे लहराती हैं

*राहगुज़र=रास्ते; मुग़न्नी=गायक; जुम्बिश=गति; शब की सियह-अंदाम (धुंधले रंग की)

कोहरे की बाँहों में साए
गर्द-ए-कफ़-ए-पा के सय्यारे
एक ही गत पर नाच रहे हैं
मेरी आहट गूँज रही है
दुनिया की हर राहगुज़र में
फिर भी यूँ लगता है जैसे
ये गीती बा-वस्फ़-ए-वुसअत
एक अकेली बस्ती है
और जैसे हर बज़्म-आराई
इक इज़हार-ए-तंहाई है
और जैसे ये चाँद सितारे
सूरज, दरिया, सहरा
मौसम बर्र-ए-आज़म
सब मौहूम धुँदलके हैं
सब मेरी पाइंदा अना के जलते बुझते हाले हैं
सब आवाज़ें फ़ानी हैं
इक मेरी आहट लाफ़ानी है

*सरकश=विद्रोही; गर्द-ए-कफ़-ए-पा=पैरों के तलवों पर चिपकी धूल; सय्यारे=ग्रह; गीती=ज़िंदगी; बा-वस्फ़-ए-वुसअत=जिसे मापा जा सके; बज़्म-आराई (ख़ुशी से भरी महफिलें); इज़हार-ए-तंहाई (अकलेपन का भाव); बर्र-ए-आज़म (द्वीप); मौहूम=काल्पनिक; पाइंदा=चिरकाल; अना=अहम्; फ़ानी=नश्वर; लाफ़ानी=अ-नश्वर

~ अज़ीज़ तमन्नाई

 Apr 28, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, April 27, 2019

बरसों बैठ के सोचें फिर भी

Image may contain: plant and outdoor

बरसों बैठ के सोचें फिर भी
हाथ के आगे पड़ा निवाला
आप हल्क़ के पार न जाए
ये अदना नाख़ुन भी शायद
बढ़ते बढ़ते जाल बिछाए
ज्ञान नगर बेहद दिलकश है
लेकिन उस के रस्ते में जो ख़ार पड़े हैं
कौन हटाए

सदियों की सोचों का मुरक़्क़ा' (अलबम)
टूटे हुए उस बुत को देखो
हरे-भरे ख़ुद-रौ (निरंकुश) सब्ज़े (हरियाली) ने घेर रखा है
फ़र्क़ कुशादा (खुला हुआ) से चिड़ियों की याद-दहानी (याद दिलाना)
चाह-ए-ज़क़न (ठुड्ढी के डिम्पल) पे काई जमी है
हो सकता है शायद उस को ज्ञान मिला हो
हो सकता है

~ अबरारूल हसन

 Apr 27, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, April 26, 2019

मुझे जाना है

Image may contain: 1 person, closeup

मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर
अभी फिर दर्द टपकेगा मिरी आवाज़ से आख़िर
अभी फिर आग उट्ठेगी शिकस्ता साज़ से आख़िर
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*बज़्म-ए-नाज़=शोख़ महफिल; शिकस्ता=टूटे हुए

अभी तो हुस्न के पैरों पे है जब्र-ए-हिना-बंदी
अभी है इश्क़ पर आईन-ए-फ़र्सूदा की पाबंदी
अभी हावी है अक़्ल ओ रूह पर झूटी ख़ुदावंदी
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*जब्र=मजबूरी; आईन-ए-फ़र्सूदा=पुराना आईना

अभी तहज़ीब-ए-अदल-ओ-हक़ की कश्ती खे नहीं सकती
अभी ये ज़िंदगी दाद-ए-सदाक़त दे नहीं सकती
अभी इंसानियत दौलत से टक्कर ले नहीं सकती
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*तहज़ीब-ए-अदल-ओ-हक़=सभ्यता, न्याय और सच; दाद-ए-सदाक़त=सच की तारीफ़

अभी तो काएनात औहाम का इक कार-ख़ाना है
अभी धोका हक़ीक़त है हक़ीक़त इक फ़साना है
अभी तो ज़िंदगी को ज़िंदगी कर के दिखाना है
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*काएनात-सृष्टि; औहाम=धोखा

अभी हैं शहर की तारीक गलियाँ मुंतज़िर मेरी
अभी है इक हसीं तहरीक-ए-तूफ़ाँ मुंतज़िर मेरी
अभी शायद है इक ज़ंजीर-ए-ज़िंदाँ मुंतज़िर मेरी
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*तारीक=अंधेरी; मुंतज़िर=प्रतीक्षा-रत; तहरीक-ए-तूफाँ=तूफान का शुरू होना; ज़न्हजीर-ज़िंदाँ=क़ैद खाने की ज़ंजीर

अभी तो फ़ाक़ा-कश इंसान से आँखें मिलाना है
अभी झुलसे हुए चेहरों पे अश्क-ए-ख़ूँ बहाना है
अभी पामाल-ए-जौर आदम को सीने से लगाना है
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*फ़ाक़ा-कश=भूखे; पामाल-ए-ज़ौर=अन्याय से पीड़ित

अभी हर दुश्मन-ए-नज़्म-ए-कुहन के गीत गाना है
अभी हर लश्कर-ए-ज़ुल्मत-शिकन के गीत गाना है
अभी ख़ुद सरफ़रोशान-ए-वतन के गीत गाना है
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*दुश्मन-ए-नज़्म-ए-कुहन=पुराने गीतों का बैरी; लश्कर=सेना; सरफ़रोशान-ए-वतन=देश के लिए जान देने का जज़्बा

कोई दम में हयात-ए-नौ का फिर परचम उठाता हूँ
ब-ईमा-ए-हमिय्यत जान की बाज़ी लगाता हूँ
मैं जाऊँगा मैं जाऊँगा मैं जाता हूँ में जाता हूँ
मुझे जाना है इक दिन तेरी बज़्म-ए-नाज़ से आख़िर

*हयात-ए-नौ=नया जीवन; परचम=झंडा; ब-ईमा-ए-हमिय्यत=जो पावन है, और रक्षा करने योग्य है

~ असरार-उल-हक़ मजाज़


 Apr 26, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, April 21, 2019

ज़ालिम की हिमायत न करेंगे

Image may contain: 1 person

मर जाएँगे ज़ालिम की हिमायत न करेंगे
अहरार कभी तर्क-ए-रिवायत न करेंगे

*हिमायत=पक्षपात; अहरार=आज़ाद लोग; तर्क-ए-रिवायत=परम्परा से अलग जा कर कुछ करना

क्या कुछ न मिला है जो कभी तुझ से मिलेगा
अब तेरे न मिलने की शिकायत न करेंगे

शब बीत गई है तो गुज़र जाएगा दिन भी
हर लहज़ा जो गुज़री वो हिकायत न करेंगे

ये फ़क़्र दिल-ए-ज़ार का एवज़ाना बहुत है
शाही नहीं माँगेंगे विलायत न करेंगे

*फ़क़्र=ग़रीब; दिल-ए-ज़ार=व्यथित हृदय; एवज़ाना=हर्ज़ाना

हम शैख़ न लीडर न मुसाहिब न सहाफ़ी
जो ख़ुद नहीं करते वो हिदायत न करेंगे

*मुसाहिब=बड़े आदमियों के साथ बैठने वाला; सहाफ़ी=पत्रकार

~ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


 Apr 21, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, April 20, 2019

दिल-ओ-दिमाग़ को रो लूँगा

Image may contain: one or more people, stripes and closeup

दिल-ओ-दिमाग़ को रो लूँगा आह कर लूँगा
तुम्हारे इश्क़ में सब कुछ तबाह कर लूँगा
अगर मुझे न मिलीं तुम तुम्हारे सर की क़सम
मैं अपनी सारी जवानी तबाह कर लूँगा

मुझे जो दैर-ओ-हरम में कहीं जगह न मिली
तिरे ख़याल ही को सज्दा-गाह कर लूँगा
जो तुम से कर दिया महरूम आसमाँ ने मुझे
मैं अपनी ज़िंदगी सर्फ़-ए-गुनाह कर लूँगा
*दैर-ओ-हरम=मंदिर-मस्जिद; सज्दा-गाह=इबादत की जगह

रक़ीब से भी मिलूँगा तुम्हारे हुक्म पे मैं
जो अब तलक न किया था अब आह कर लूँगा
तुम्हारी याद में मैं काट दूँगा हश्र से दिन
तुम्हारे हिज्र में रातें सियाह कर लूँगा

सवाब के लिए हो जो गुनह वो ऐन सवाब
ख़ुदा के नाम पे भी इक गुनाह कर लूँगा
हरीम-ए-हज़रत-ए-सलमा की सम्त जाता हूँ
हुआ न ज़ब्त तो चुपके से आह कर लूँगा
* हरीम-ए-हज़रत-ए-सलमा=हज़रत सलमा के घर; ज़ब्त=ख़ुद पर काबू

ये नौ-बहार ये अबरू, हवा ये रंग शराब
चलो जो हो सो हो अब तो गुनाह कर लूँगा
किसी हसीने के मासूम इश्क़ में 'अख़्तर'
जवानी क्या है मैं सब कुछ तबाह कर लूँगा
*नौ-बहार=वसंत; अबरू=भौंह

~ अख़्तर शीरानी


 Apr 20, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, April 19, 2019

प्राण, पहले तो हृदय तुमने चुराया

Image may contain: 1 person

प्राण, पहले तो हृदय तुमने चुराया
छीन ली अब नींद भी मेरे नयन की।

बीत जाती रात हो जाता सबेरा,
पर नयन-पंक्षी नहीं लेते बसेरा,
बन्द पंखों में किये आकाश-धरती
खोजते फिरते अँधेरे का उजेरा,
पंख थकते, प्राण थकते, रात थकती
खोजने की चाह पर थकती न मन की।
छीन ली अब नींद भी मेरे नयन की।

स्वप्न सोते स्वर्ग तक अंचल पसारे,
डाल कर गल-बाँह भू, नभ के किनारे
किस तरह सोऊँ मगर मैं पास आकर
बैठ जाते हैं उतर नभ से सितारे,
और हैं मुझको सुनाते वह कहानी,
है लगा देती झड़ी जो अश्रु-घन की।

सिर्फ क्षण भर तुम बने मेहमान घर में,
पर सदा को बस गये बन याद उर में,
रूप का जादू किया वह डाल मुझ पर
आज मैं अनजान अपने ही नगर में,
किन्तु फिर भी मन तुम्हें ही प्यार करता
क्या करूँ आदत पड़ी है बालपन की।
छीन ली अब नींद भी मेरे नयन की।

पर न अब मुझको रुलाओ और ज़्यादा,
पर न अब मुझको मिटाओ और ज़्यादा,
हूँ बहुत मैं सह चुका उपहास जग का
अब न मुझ पर मुस्कराओ और ज़्यादा,
धैर्य का भी तो कहीं पर अन्त है प्रिय !
और सीमा भी कहीं पर है सहन की।
प्राण, पहले तो हृदय तुमने चुराया
छीन ली अब नींद भी मेरे नयन की।

~ गोपालदास नीरज


 Apr 19, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Wednesday, April 17, 2019

चलो, कहीं हम सेज बिछाएँ

Image may contain: tree, plant, outdoor and nature

फूलों के बिस्तर पर
नींद क्यों नहीं आती,
चलो, कहीं सूली पर, सेज हम बिछाएँ ।

दूर-दूर तक कोई
नदी नहीं दिखती है ।
हिरणों की आँखों में
रेत प्यास लिखती है ।
घाटी में हँसते हैं,
बुत ही बुत पत्थर के,
चलो, कहीं सूने में, ख़ुद से बतियाएँ ।

आग हुई धुआँ-धुआँ
अँधियारा गहराया ।
पेड़ों पर पसर गया
गाढ़ा काला साया ।
आगे है मोड़ों पर
बियाबान सन्नाटा
चलो, कहीं पिछली पगडण्डी गुहराएँ ।

तुम से जो मुमकिन था
अभिनय वह ख़ूब किया ।
वह देखो सूर्यध्वज
जुगनू ने थाम लिया ।
मंच पर उभरने को
एक भीड़ आतुर है,
चलो, कहीं पर्दे के पीछे छिप जाएँ ।

~ देवेन्द्र शर्मा इन्द्र


 Apr 17, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, April 14, 2019

दुआ दुआ वो चेहरा

Image may contain: 1 person, smiling, closeup

दुआ दुआ वो चेहरा
हया हया वो आँखें
सबा सबा वो ज़ुल्फ़ें
चले लहू गर्दिश में
रहे आँख में दिल में
बसे मिरे ख़्वाबों में
जले अकेले-पन में
मिले हर इक महफ़िल में
दुआ दुआ वो चेहरा

कभी किसी चिलमन के पीछे
कभी दरख़्त के नीचे
कभी वो हाथ पकड़ते
कभी हवा से डरते
कभी वो बारिश अंदर
कभी वो मौज समुंदर
कभी वो सूरज ढलते
कभी वो चाँद निकलते
कभी ख़याल की रौ में
कभी चराग़ की लौ में
दुआ दुआ वो चेहरा

कभी बाल सुखाए आँगन में
कभी माँग निकाले दर्पन में
कभी चले पवन के पाँव में
कभी हँसे धूप में छाँव में
कभी पागल पागल नैनों में
कभी छागल छागल सीनों में
कभी फूलों फूल वो थाली में
कभी दियों भरी दीवाली में
कभी सजा हुआ आईने में
कभी दुआ बना वो ज़ीने में

कभी अपने-आप से जंगों में
कभी जीवन मौज-तरंगों में
कभी नग़्मा नूर-फ़ज़ाओं में
कभी मौला हुज़ूर दुआओं में
कभी रुके हुए किसी लम्हे में
कभी दुखे हुए किसी चेहरे में
वही चेहरा बोलता रहता हूँ
वही आँखें सोचता रहता हूँ
वही ज़ुल्फ़ें देखता रहता हूँ
दुआ दुआ वो चेहरा
हया हया वो आँखें
सबा सबा वो ज़ुल्फ़ें

~ उबैदुल्लाह अलीम


 Apr 14, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, April 13, 2019

मन बेचारा

Image may contain: tree, sky, night and outdoor

मन बेचारा एक-वचन
लेकिन
दर्द हज़ार-गुने
चाँदी की चम्मच ले कर
जन्मे नहीं हमारे दिन
अँधियारी रातों के घर
रह आए भावुक-पल छिन
चंदा से सौ बातें कीं
सूरज ने जब घातें कीं
किंतु एक नक्कार-गह में
तूती की ध्वनि
कौन सुने

बिके अभावों के हाथों
सपने खेल-बताशों के
भरे नुकीले शूलों से
आँगन
खेल तमाशों के
कुछ को चूहे काट गए
कुछ को झींगुर चाट गए
नए नए संकल्पों के
जो भी हम ने जाल बुने

~ कुँवर बेचैन


 Apr 13, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, April 12, 2019

ओ देस से आने वाले बता

Image may contain: 1 person, smiling

ओ देस से आने वाला है बता
ओ देस से आने वाले बता, किस हाल में हैं यारान-ए-वतन
आवारा-ए-ग़ुर्बत को भी सुना, किस रंग में है कनआन-ए-वतन
वो बाग़-ए-वतन फ़िरदौस-ए-वतन, वो सर्व-ए-वतन रैहान-ए-वतन
ओ देस से आने वाले बता
ओ देस से आने वाले बता

क्या अब भी वहाँ के बाग़ों में, मस्ताना हवाएँ आती हैं
क्या अब भी वहाँ के पर्बत पर, घनघोर घटाएँ छाती हैं
क्या अब भी वहाँ की बरखाएँ, वैसे ही दिलों को भाती हैं
ओ देस से आने वाले बता, ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी वतन में वैसे ही, सरमस्त नज़ारे होते हैं
क्या अब भी सुहानी रातों को, वो चाँद सितारे होते हैं
हम खेल जो खेला करते थे, क्या अब वही सारे होते हैं
ओ देस से आने वाले बता
ओ देस से आने वाले बता

क्या अब भी शफ़क़ के सायों में, दिन रात के दामन मिलते हैं
क्या अब भी चमन में वैसे ही, ख़ुश-रंग शगूफ़े खिलते हैं
बरसाती हवा की लहरों से, भीगे हुए पौदे हिलते हैं
शादाब-ओ-शगुफ़्ता फूलों से, मामूर हैं गुलज़ार अब कि नहीं
बाज़ार में मालन लाती है, फूलों के गुँधे हार अब कि नहीं
और शौक़ से टूटे पड़ते हैं, नौ-उम्र ख़रीदार अब कि नहीं
ओ देस से आने वाले बता
ओ देस से आने वाले बता

क्या शाम पड़े गलियों में वही, दिलचस्प अँधेरा होता है
और सड़कों की धुँदली शम्ओं पर, सायों का बसेरा होता है
बाग़ों की घनेरी शाख़ों में, जिस तरह सवेरा होता है
क्या अब भी वहाँ वैसी ही जवाँ, और मध-भरी रातें होती हैं
क्या रात भर अब भी गीतों की, और प्यार की बातें होती हैं
वो हुस्न के जादू चलते हैं, वो इश्क़ की घातें होती हैं
ओ देस से आने वाले बता
ओ देस से आने वाले बता

क्या अब भी वहाँ के पनघट पर, पनहारियाँ पानी भरती हैं
अंगड़ाई का नक़्शा बन बन कर, सब माथे पे गागर धरती हैं
और अपने घरों को जाते हुए, हँसती हुई चुहलें करती हैं
बरसात के मौसम अब भी वहाँ, वैसे ही सुहाने होते हैं
क्या अब भी वहाँ के बाग़ों में, झूले और गाने होते हैं
और दूर कहीं कुछ देखते ही, नौ-उम्र दीवाने होते हैं
ओ देस से आने वाले बता
ओ देस से आने वाले बता

‍~ अख़्तर शीरानी


 Apr 12, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, April 7, 2019

देखना भी जुर्म है

Image may contain: one or more people, people standing, ocean, sky and outdoor

ज़िंदगी के जितने दरवाज़े हैं, मुझ पे बंद हैं
देखना हद्द-ए-नज़र से आगे बढ़ कर

देखना भी जुर्म है
सोचना अपने अक़ीदों (विश्वासों)
और यक़ीनों से निकल कर सोचना भी जुर्म है
आसमाँ-दर-आसमाँ असरार (रहस्य) की
परतें हटा कर झाँकना भी जुर्म है
क्यूँ भी कहना जुर्म है कैसे भी कहना जुर्म है

साँस लेने की तो आज़ादी मयस्सर है मगर
ज़िंदा रहने के लिए इंसान को
कुछ और भी दरकार (ज़रूरी) है
और इस कुछ और भी का
तज़्किरा (बात-चीत करना) भी जुर्म है
ऐ ख़ुदावंदान-ए-ऐवान-ए-अक़ाएद
(विश्वास के महलों के मसीहा)
ऐ हुनर-मन्दान-ए-आईन-ओ-सियासत
(व्यवस्था और राजनीति के सर्वज्ञ ज्ञाता)

ज़िंदगी के नाम पर बस इक इनायत (कृपा) चाहिए
मुझ को इन सारे जराएम (अपराध – बहुवचन) की इजाज़त चाहिए

~ अहमद नदीम क़ासमी


 Apr 07, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, April 5, 2019

मैं नहीं मानता

Image may contain: 1 person, closeup

दीप जिस का महल्लात ही में जले
चंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चले
वो जो साए में हर मस्लहत के पले
ऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर को
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

*महल्लात=महल; मस्लहत=देख-भाल कर काम करना; सुब्ह-बे-नूर=बिना रौशनी की सुबह

मैं भी ख़ाइफ़ नहीं तख़्ता-ए-दार से
मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़्यार से
क्यूँ डराते हो ज़िंदाँ की दीवार से
ज़ुल्म की बात को जहल की रात को
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

*ख़ाइफ़=डरा; तख़्ता-ए-दार=जहाँ फाँसी लगाई जाती है; मंसूर=विजेता; अग्यार=गैर लोग
ज़िंदाँ=जेल; जहल=जड़ता

फूल शाख़ों पे खिलने लगे तुम कहो
जाम रिंदों को मिलने लगे तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे तुम कहो
इस खुले झूट को ज़ेहन की लूट को
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

तुम ने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ
अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फ़ुसूँ
चारागर दर्द-मंदों के बनते हो क्यूँ
तुम नहीं चारागर कोई माने मगर
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

*चारागर=चिकित्सक

~ हबीब जालिब


 Apr 05, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh