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Friday, August 4, 2017

तेरे वादों पे अब इस तरह

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तेरे वादों पे अब इस तरह गुज़र करना है,
काग़ज़ी नाव है दरिया में सफ़र करना है।

और कब तक तुम्हें इस दिल में बसाकर रक्खूँ,
हसरतो आओ तुम्हें शह्र-बदर करना है।

तेरे चेहरे पे अभी से हैं थकन के आसार,
ज़िंदगी तुझ्को तो सदियों का सफ़र करना है।

भाई की ज़िद है उठे सेह्न में ऊंची दीवार,
मेरा ये अज़्म है दीवार में दर करना है।
*अज़्म=प्रण

पहले हमसाए के हक़ में ही दुआ माँगूँगा,
यूँ मुझे पैदा दुआओं में असर करना है।

तरबियत तुमको इस अंदाज़ से दी है बच्चो,
ज़िंदगी कोहे-मसाईल है जो सर करना है।
*तरबियत=प्सीख; कोहे-मसाईल=मुश्किलों का पहाड़; सर=जीतना

अब तो बस अपनी ही इस्लाह करूँगा ‘राशिद’,
लाख दुश्वार हो यह काम मगर करना है।
*इस्लाह=परामर्श

~ बिरजीस राशिद आरफ़ी

  Jul 10 , 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

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