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Tuesday, June 20, 2017

चिड़ियाँ रे,

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चिड़ियाँ रे,
चिड़ियाँ होने का अर्थ फाड़ दो
मछली रे मछली होने का अर्थ काट दो
लड़की चिंदी चिंदी कर दो - 
लड़की होने के अर्थ को

बकुल के फूल, बकुल के फूल होने के अर्थ को
अपने से थोड़ा अलग करो,
और कमल के फूल की रूप छवियों में
नाभियों अपने लिए जगह माँगो,

पृथ्वी के नीचे फैली जड़ों,
पेड़ों के बिंब में अपने प्रति होने वाले
अन्याय के खिलाफ रख दो माँग पत्र
पत्तियों! उठो और कहो
कि फूल के बनाने में तुम भी शामिल हो

सभ्यताओं के तत्वों सब मिलकर
सभ्यताओं का अर्थ ही बदल डालो,
रागों में पूरबी राग,
अपने लिए शास्त्रीय संगीत में जगह माँगो

और फूट नोटो, तुमसे मैं कहते कहते थक गया,
कि उठो और धीरे धीरे पहुँच जाओ
लेखों के बीच मे।

~ बद्री नारायण


  May 22, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

उल्फ़त का जब किसी ने लिया नाम



उल्फ़त का जब किसी ने लिया नाम रो पड़े 
अपनी वफ़ा का सोच के अंजाम रो पड़े 

हर शाम ये सवाल मोहब्बत से क्या मिला 
हर शाम ये जवाब कि हर शाम रो पड़े 

राह-ए-वफ़ा में हम को ख़ुशी की तलाश थी
दो गाम ही चले थे कि हर गाम रो पड़े
*गाम=क़दम

रोना नसीब में है तो औरों से क्या गिला
अपने ही सर लिया कोई इल्ज़ाम रो पड़े

~ सुदर्शन फ़ाकिर


  May 21, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Tuesday, June 13, 2017

हम हैं सर-ता-बा-पा तमन्ना

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हम हैं सर-ता-बा-पा तमन्ना 
कैसी उम्मीद क्या तमन्ना 
*सर-ता-बा-पा=सर से पाँव तक

हो कितनी ही ख़ुश-गवार फिर भी 
है दिल के लिए बला तमन्ना
*बला=मुसीबत

देते हो पयाम-ए-आरज़ू तुम
जब तर्क मैं कर चुका तमन्ना
*पयाम= संदेश; तर्क=त्याग

दुनिया को फ़रेब दे रही है
जल्वा है सराब का तमन्ना
*सराब=मरीचिका

अपनी मंज़िल पे हम न पहुँचे
जब तक रही रहनुमा तमन्ना
*रहनुमा=राह दिखाने वाली

उलझा रहा आरज़ू में ग़ाफ़िल
क्यूँ ख़ुद ही न बन गया तमन्ना

आवाज़ तो दो किसे पुकारूँ
तुम हो मिरे दिल में या तमन्ना

~ सीमाब अकबराबादी


  May 20, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

उन्मद यौवन से उभर


उन्मद यौवन से उभर
घटा सी नव असाढ़ की सुन्दर,
अति श्याम वरण,
श्लथ, मंद चरण,
इठलाती आती ग्राम युवति
वह गजगति
सर्प डगर पर!

सरकाती-पट,
खिसकाती-लट, -
शरमाती झट
वह नमित दृष्टि से देख उरोजों के युग घट!
हँसती खलखल
अबला चंचल
ज्यों फूट पड़ा हो स्रोत सरल
भर फेनोज्वल दशनों से अधरों के तट!

वह मग में रुक,
मानो कुछ झुक,
आँचल सँभालती, फेर नयन मुख,
पा प्रिय पद की आहट;
आ ग्राम युवक,
प्रेमी याचक,
जब उसे ताकता है इकटक,
उल्लसित,
चकित,
वह लेती मूँद पलक पट।

पनघट पर
मोहित नारी नर!-
जब जल से भर
भारी गागर
खींचती उबहनी वह, बरबस
चोली से उभर उभर कसमस
खिंचते सँग युग रस भरे कलश;-
जल छलकाती,
रस बरसाती,
बल खाती वह घर को जाती,
सिर पर घट
उर पर धर पट!

कानों में गुड़हल
खोंस,-धवल
या कुँई, कनेर, लोध पाटल;
वह हरसिंगार से कच सँवार,
मृदु मौलसिरी के गूँथ हार,
गउओं सँग करती वन विहार,
पिक चातक के सँग दे पुकार,-
वह कुंद, काँस से,
अमलतास से,
आम्र मौर, सहजन, पलाश से,
निर्जन में सज ऋतु सिंगार।

तन पर यौवन सुषमाशाली,
मुख पर श्रमकण, रवि की लाली,
सिर पर धर स्वर्ण शस्य डाली,
वह मेड़ों पर आती जाती,
उरु मटकाती,
कटि लचकाती,
चिर वर्षातप हिम की पाली
धनि श्याम वरण,
अति क्षिप्र चरण,
अधरों से धरे पकी बाली।

रे दो दिन का
उसका यौवन!
सपना छिन का
रहता न स्मरण!
दुःखों से पिस,
दुर्दिन में घिस,
जर्जर हो जाता उसका तन!
ढह जाता असमय यौवन धन!
बह जाता तट का तिनका
जो लहरों से हँस-खेला कुछ क्षण!!

~ सुमित्रानंदन पंत

  May 19, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

बन भोले क्यों भोले

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बन भोले क्यों भोले भाले कहलावें,
सब भूलें पर अपने को भूल न जावें।
क्या अब न हमें है आन बान से नाता,
क्या कभी नहीं है चोट कलेजा खाता।
क्या लहू आँख में उतर नहीं है आता,
क्या खून हमारा खौल नहीं है पाता।
क्यों पिटें लुटें मर मिटें ठोकरें खावें,
सब भूलें पर अपने को भूल न जावें।

पड़ गया हमारे लहू पर क्यों पाला,
क्यों चला रसातल गया हौसला आला।
है पड़ा हमें क्यों सूर बीर का ठाला,
क्यों गया सूरमापन का निकल दिवाला।
सोचें समझें सँभलें उमंग में आवें,
सब भूलें पर अपने को भूल न जावें।

छिन गये अछूतों के क्यों दिन दिन छीजें,
क्यों बेवों से बेहाथ हुए कर मीजें।
क्यों पास पास वालों का कर न पसीजें,
क्यों गाल आँसुओं से अपनों के भीजें।
उठ पड़ें अड़ें अकड़ें बच मान बचावें,
सब भूलें पर अपने को भूल न जावें।

क्यों तरह दिये हम जायँ बेतरह लूटे,
हीरा हो कर बन जायँ कनी क्यों फूटे।
कोई पत्थर क्यों काँच की तरह टूटे,
क्यों हम न कूट दें उसे हमें जो कूटे।
आपे में रह अपनापन को न गँवावें,
सब भूलें पर अपने को भूल न जावें।

सैकड़ों जातियों को हमने अपनाया,
लाखों लोगों को करके मेल मिलाया।
कितने रंगों पर अपना रंग चढ़ाया,
कितने संगों को मोम बना पिघलाया।
निज न्यारे गुण को गिनें गुनें अपनावें,
सब भूलें पर अपने को भूल न जावें।

सारे मत के रगड़ों झगड़ों को छोड़ें,
नाता अपना सब मतवालों से जोड़ें।
काहिली कलह कोलाहल से मुँह मोड़ें,
मिल जुल मिलाप-तरु के न्यारे फल तोड़ें।
जग जायँ सजग हो जीवन ज्योति जगावें,
सब भूलें पर अपने को भूल न जावें।

~ अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'


  May 18, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

फिर कर लेने दो प्यार प्रिये

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फिर कर लेने दो प्यार प्रिये

अब अंतर में अवसाद नहीं
चापल्य नहीं उन्माद नहीं
सूना-सूना सा जीवन है
कुछ शोक नहीं आल्हाद नहीं,

तव स्वागत हित हिलता रहता
अंतरवीणा का तार प्रिये
फिर कर लेने दो प्यार प्रिये

इच्छाएँ मुझको लूट चुकी
आशाएं मुझसे छूट चुकी
सुख की सुन्दर-सुन्दर लड़ियाँ
मेरे हाथों से टूट चुकी

खो बैठा अपने हाथों ही
मैं अपना कोष अपार प्रिये
फिर कर लेने दो प्यार प्रिये

~ दुष्यंत कुमार


  May 17, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

देखना है मुझ को तो नज़दीक

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देखना है मुझ को तो नज़दीक आकर देखिये
प्यार भी हो जायेगा नज़रें मिलाकर देखिये।

नीड़ चिड़ियों का नहीं मधुमक्खियों का घर है ये
आप इसका एक भी तिनका हटाकर देखिये।

आपके गीतों से यह माहौल बदलेगा ज़रूर
जान अपना ख़ून शब्दों को पिलाकर देखिये।

आपको लेना है गर सावन के मौसम का मज़ा
जाइये बादल के नीचे घर बनाकर देखिये।

आपकी महफ़िल में अपना भी तो कुछ हक है ज़रुर
एक पल मेरी तरफ़ भी मुस्कुराकर देखिये।

ये अंधेरा इसलिए है ख़ुद अँधेरे में हैं आप
आप अपने दिल को इक दीपक बनाकर देखिये।

किस तरह सुर और सरगम से महक उठते हैं घर
गीत नीरज के किसी दिन गुनगुनाकर देखिये।

~ गोपालदास नीरज


  May 16, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

क्यों वह प्रिय आता पार नहीं।

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क्यों वह प्रिय आता पार नहीं।

शशि के दर्पण देख देख,
मैंने सुलझाये तिमिर-केश,
गूँथे चुन तारक-पारिजात
अवगुण्ठन कर किरणें अशेष।

क्यों आज रिझा पाया उसको,
मेरा अभिनव श्रृंगार नहीं?

स्मित से कर फीके अधर अरुण
गति के जावक से चरण लाल,
स्वप्नों से गीली पलक आँज
सीमन्त तजा ली अश्रु-माल।

स्पन्दन मिस प्रतिपल भेज रही,
क्या युग युग से मनुहार नहीं?

मैं आज चुपा आई चातक
मैं आज सुला आई कोकिल,
कण्टकित मौलश्री हरसिंगार,
रोके हैं अपने शिथिल।

सोया समीर नीरव जग पर,
स्मृतियों का भी मृदु भार नहीं!

रूँधे हैं, सिहरा सा दिगन्त
नत पाटलदल से मृदु बादल,
उस पार रुका आलोक-यान
इस पार प्राण का कोलाहल।

बेसुध निद्रा है आज बुने-
जाते श्वासों के तार नहीं।

दिन-रात पथिक थक गए लौट
फिर गए मना निमिष हार,
पाथेय मुझे सुधि मधुर एक
है विरह पंथ सूना अपार।

फिर कौन कह रहा है सूना,
अब तक मेरा अभिसार नहीं?

~ महादेवी वर्मा


  May 15, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

माँ! तुम्हारे सज़ल आँचल ने

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माँ!
तुम्हारे सज़ल आँचल ने
धूप से हमको बचाया है।
चाँदनी का घर बनाया है।

तुम अमृत की धार प्यासों को
ज्योति-रेखा सूरदासों को
संधि को आशीष की कविता
अस्मिता, मन के समासों को

माँ!
तुम्हारे तरल दृगजल ने
तीर्थ-जल का मान पाया है
सो गए मन को जगाया है।

तुम थके मन को अथक लोरी
प्यार से मनुहार की चोरी
नित्य ढुलकाती रहीं हम पर
दूध की दो गागरें कोरी

माँ!
तुम्हारे प्रीति के पल ने
आँसुओं को भी हँसाया है
बोलना मन को सिखाया है।

~ कुँअर बेचैन


  May 14, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Monday, June 12, 2017

वअ'दा सच्चा है कि झूटा

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वअ'दा सच्चा है कि झूटा मुझे मालूम न था
कल बदल जाएगी दुनिया मुझे मालूम न था

हुस्न है मश्ग़ला-ए-ज़ुल्म को गहरा पर्दा
पस-ए-पर्दा है अंधेरा मुझे मालूम न था 
*मश्गला=मन बहलाव; पस-ए-पर्दा=परदे के पीछे

इश्क़ वो शय है कि चरके भी मज़ा देते हैं
वर्ना क़ातिल हैं हसीं क्या मुझे मालूम न था
*चरके=घाव, चीरा

दिल की ज़िद इस लिए रख ली थी कि आ जाए क़रार
कल ये कुछ और कहेगा मुझे मालूम न था

झूटी उम्मीदों ने क्या क्या न हरे बाग़ लगाए
वक़्त झोंका है हवा का मुझे मालूम न था

जितने क़िस्मत के सहारे थे वो झूटे निकले
है बंधी मुट्ठियों में क्या मुझे मालूम न था

बरसों भटका किया और फिर भी न उन तक पहुँचा
घर तो मालूम था रस्ता मुझे मालूम न था

राज़-ए-ग़म फ़ाश न हो इस लिए रोकी थी ज़बाँ
चुप भी रह कर यही होगा मुझे मालूम न था

दिल मज़े लेता है जिस ग़म के वो है काहिश-ए-जाँ
ज़हर भी होता है मीठा मुझे मालूम न था
*काहिश=व्यग्रता

इश्क़-आबाद के नाके ही से रुख़्सत हुए होश
है ये दीवानों की दुनिया मुझे मालूम न था

होगा इमरोज़ की सूरत में ज़ुहूर-ए-फ़र्दा
वअ'दा यूँ रोज़ टलेगा मुझे मालूम न था
*इमरोज़=आज; ज़ुहूर=जो दिखाइ पड़े; फ़र्दा=कल( आने वाला)

आरज़ू हाँ भी हसीनों की नहीं होती है
इन की हर बात है धोका मुझे मालूम न था

~ आरज़ू लखनवी

  May 13, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

जान सकता हूँ अगर साहस करूं

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जान सकता हूँ अगर साहस करूं
श्रृंखला वह जो पवन में, वह्नि में, तूफान में है
और चल उत्ताल सागर में ।

जान सकता हूँ अगर साहस करूं
चेतना का रुप वह जिसमें
वृक्ष से झर का मही पर पत्र गिरते हैं ।

वायु में सुराख है,
सर्वत्र ही कब्रें खुली हैं
हम मनुष्यों को गरसने के लिए ।

सातवें के बाद
और पहले रंग के पहले
अंधेरा ही अंधेरा है ।

शब्द के उपरान्त केवल स्तब्धता है ।
गूँज उसकी जतुक सुनते हैं
कि सुनते मीन सागर के हदय के ।

इन्द्रियों को स्पर्श-रेखा के परे
घूमते हैं चक्र अणुओं, तारकों, परमाणुओं के,
जिन्दगी जिनसे बुनी जाती।

जिन अगम गहराइयों से भागते हैं,
छोड़ कर उनको कहीं आश्रय नहीं मिलता ।

गूँजती शंका जभी जीवन-गुफा में,
गूँज उठता है अमरता के परे का व्योम भी ।

और निद्रा में
अमित अव्यक्त भावों के
सहस्रों स्वप्न चलते हैं ।
ये सहस्रों स्वप्न जो अपने नहीं हैं ।

~ रामधारी सिंह 'दिनकर'

  May 12, 2017| e-kavya.blogspot.com
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तुम नहीं होते अगर

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तुम नहीं होते अगर जीवन विजन सा द्वीप होता।

मैं किरण भटकी हुई सी थी तिमिर में,
काँपती सी एक पत्ती ज्यों शिशिर में,
भोर का सूरज बने तुम पथ दिखाया,
ऊष्मा से भर नया जीवन सिखाया,

तुम बिना जीवन निठुर मोती रहित इक सीप होता।

चंद्रिका जैसे बनी है चंद्र रमणी,
प्रणय मदिरा पी गगन में फिरे तरुणी,
मन हुआ गर्वित मगर फिर क्यों लजाया,
हृद-सिंहासन पर मुझे तुम ने सजाया,

तुम नहीं तो यही जीवन लौ बिना इक दीप होता।

शुक्र का जैसे गगन में चाँद संबल
मील का पत्थर बढ़ाता पथिक का बल
दी दिशा चंचल नदी को कूल बन कर
तुम मिले किस प्रार्थना के फूल बन कर

जो नहीं तुम यह हृदय-प्रासाद बिना महीप होता।

‍~ मानोशी


  May 11, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

अरे कहीं देखा हैं तुमने

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अरे कहीं देखा हैं तुमने
मुझे प्यार करने वाले को?
मेरी आँखों में आकर फिर
आँसू बन ढरने वाले को ?

सूने नभ में आग जलाकर
यह सुवर्ण-सा हृदय गलाकर
जीवन सन्ध्या को नहला कर
रिक्त जलधि भरने वाले को ?

रजनी के लघु-तम कन में
जगती की ऊष्मा के वन में
उस पर पड़ते तुहिन सघन में
छिप, मुझसे डरने वाले को ?

निष्ठुर खेलों पर जो अपने
रहा देखता सुख के सपने
आज लगा है क्या वह कँपने
देख मौन मरने वाले को ?

~ जयशंकर प्रसाद


  May 10, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

आप जिन के क़रीब होते हैं

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आप जिन के क़रीब होते हैं 
वो बड़े ख़ुश-नसीब होते हैं 

जब तबीअ'त किसी पर आती है 
मौत के दिन क़रीब होते हैं 

मुझ से मिलना फिर आप का मिलना
आप किस को नसीब होते हैं

ज़ुल्म सह कर जो उफ़ नहीं करते
उन के दिल भी अजीब होते हैं

इश्क़ में और कुछ नहीं मिलता
सैकड़ों ग़म नसीब होते हैं

'नूह' की क़द्र कोई क्या जाने
कहीं ऐसे अदीब होते हैं

~ नूह नारवी


  May 9, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

हर पुराना पत्र

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हर पुराना पत्र
सौ–सौ यादगारों का पिटारा खोलता है।
मीत कोई दूर का, बिछड़ा हुआ सा,
पास आता है, लिपटता, बोलता है।
कान में कुछ फुसफुसाता है,
हृदय का भेद कोई खोलता है।

हर पुरान पत्र है इतिहास
आँसू या हँसी का
चाँदनी की झिलमिलाहट
या अन्धेरे की घड़ी का
आस का, विश्वास का,
या आदमी की बेबसी का।

ये पुराने पत्र
जीवन के सफर के मील के पत्थर समझ लो
मर चुका जो भाग जीवन का
उसी के चिन्ह ये अक्षर समझ लो
आप, तुम या तू,
इन्हीं संबोधनों ने स्नेह का आँचल बुना है।
स्नेह – यह समझे नहीं तो
क्या लिखा है? क्या पढ़ा है? क्या गुना है?

ये पुराने पत्र
जैसे स्नेह के पौधे बहुत दिन से बिना सींचे पड़े हों।
काल जिनके फूल–फल सब चुन गया है,
इन अभागों को भला अब कौन सींचे!
रीत यह संसार की सदियों पुरानी,
इन पुरानी पातियों का क्या करूँ फिर?

क्या जला दूँ पातियाँ ये?
जिंदगी के गीत की सौ–सौ धुनें जिनमें छिपी हैं।
फूँक दूँ यह स्वर्ण? लेकिन सोच लूँ फिर,
भस्म इसकी और भी मँहगी पड़ेगी।
तब? जलाऊँगा नहीं मैं पातियाँ ये।
जिंदगी भर की सँजोई थातियाँ ये।
साथ ही मेरी चिता के
ये जलेंगी।

~ रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’


  May 8, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Wednesday, June 7, 2017

इत्तिफ़ाक़ अपनी जगह

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इत्तिफ़ाक़ अपनी जगह ख़ुश-क़िस्मती अपनी जगह
ख़ुद बनाता है जहाँ में आदमी अपनी जगह

कह तो सकता हूँ मगर मजबूर कर सकता नहीं
इख़्तियार अपनी जगह है बेबसी अपनी जगह 
*इख़्तियार=अधिकार

कुछ न कुछ सच्चाई होती है निहाँ हर बात में
कहने वाले ठीक कहते हैं सभी अपनी जगह
*निहाँ=छुपा हुआ/हुई

सिर्फ़ उस के होंट काग़ज़ पर बना देता हूँ मैं
ख़ुद बना लेती है होंटों पर हँसी अपनी जगह

दोस्त कहता हूँ तुम्हें शाएर नहीं कहता 'शऊर'
दोस्ती अपनी जगह है शाएरी अपनी जगह

~ अनवर शऊर

  May 7, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Saturday, May 6, 2017

तुम अंडर-ग्रेजुएट हो सुन्दर

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तुम अंडर-ग्रेजुएट हो सुन्दर
मैं भी हूँ बी. ए. पास प्रिये,
तुम बीबी हो जाओ 'ला-फुल'
मैं हो जाऊँ पति ख़ास प्रिये।

मैं नित्य दिखाऊँगा सिनेमा
होगा तुमको उल्लास प्रिये,
घर मेरा जब अच्छा न लगे
होटल में करना वास प्रिये।

'सर्विस' न मिलेगी जब कोई
तब 'ला' की है एक आस प्रिये,
उसमें भी 'सकसेस' हो न अगर
रखना मत दिल में त्रास प्रिये।

बनिया का उपवन एक बड़ा
है मेरे घर के पास प्रिये,
फिर सांझ सबेरे रोज वहाँ
हम तुम छीलेंगे घास प्रिये।

मैं ताज तुम्हें पहनाऊँगा
खुद बांधूगा चपरास प्रिये,
तुम मालिक हो जाओ मेरी
मैं हो जाऊँगा दास प्रिये।

मैं मानूँगा कहना सारा
रखो मेरा विश्वास प्रिये,
अपने कर में रखना हरदम
तुम मेरे मुख की रास प्रिये।

यह तनमयता की वेला है
दिनकर कर रहा प्रवास प्रिये,
आओ हम-तुम मिलकर पीलें
'जानी-वाकर' का ग्लास प्रिये।

अब भागो मुझसे दूर नहीं
आ जाओ मेरे पास प्रिये,
अपने को तुम समझो गाँधी
मुझको हरिजन रैदास प्रिये।

(श्री भगवतीचरण वर्मा के 'प्रेम संगीत' की पैरोडी)

~ बेढब बनारसी


  May 6, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

तन हुए शहर के

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तन हुए शहर के
पर‚ मन जंगल के हुए।
शीश कटी देह लिये
हम इस कोलाहल में
घूमते रहे लेकर
विष–घट छलके हुए।

छोड़ दीं स्वयं हमने सूरज की उंगलियां
आयातित अंधकार के पीछे दौड़कर।
देकर अंतिम प्रणाम धरती की गोद को
हम जिया किए केवल खाली आकाश पर।
ठंडे सैलाब में बहीं बसंत–पीढ़ियां‚
पांव कहीं टिके नहीं
इतने हलके हुए।

लूट लिये वे मेले घबराकर ऊब ने
कड़वाहट ने मीठी घड़ियां सब मांग लीं।
मिटे हुए हस्ताक्षर भी आदिम गंध के
बुझी हुई शामें कुछ नजरों ने टांग लीं।
हाथों में दूध का कटोरा
चंदन–छड़ी –
वे सारे सोन प्रहार
रिसते जल के हुए।

कहां गये बड़ी बुआ वाले वे आरते
कहां गये गेरू–काढ़े वे सतिये द्वार के
कहां गये थापे वे जीजी के हाथों के
कहां गये चिकने पत्ते बन्दनवार के
टूटे वे सेतु जो रचे कभी अतीत ने
मंगल त्योहार–वार
बीते कल के हुए।

∼ सोम ठाकुर


  May 5, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

स्वजन दीखता न विश्व में अब

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स्वजन दीखता न विश्व में अब,
न बात मन में समाय कोई।
पड़ी अकेली विकल रो रही,
न दुःख में है सहाय कोई।।

पलट गए दिन स्नेह वाले,
नहीं नशा, अब रही न गर्मी ।
न नींद सुख की, न रंगरलियाँ,
न सेज उजला बिछाए सोई ।।

बनी न कुछ इस चपल चित्त की,
बिखर गया झूठ गर्व जो।
था असीम चिन्ता चिता बनी है,
विटप कँटीले लगाए रोई ।।

क्षणिक वेदना अनन्त सुख बस,
समझ लिया शून्य में बसेरा ।
पवन पकड़कर पता बताने
न लौट आया न जाए कोई।।

~ जयशंकर प्रसाद


  May 4, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

दर्द दिया है, अश्रु स्नेह है

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दर्द दिया है, अश्रु स्नेह है, बाती बैरिन श्वास है,
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !

मैं ज्वाला का ज्योति-काव्य
चिनगारी जिसकी भाषा,
किसी निठुर की एक फूँक का
हूँ बस खेल-तमाशा
पग-तल लेटी निशा, भाल पर
बैठी ऊषा गोरी,
एक जलन से बाँध रखी है
साँझ-सुबह की डोरी
सोये चाँद-सितारे, भू-नभ, दिशि-दिशि स्वप्न-मगन है
पी-पीकर निज आग जग रही केवल मेरी प्यास है !
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !!

विश्व न हो पथ - भ्रष्ट इसलिए
तन - मन आग लगाई,
प्रेम न पकड़े बाँह शलभ की
खुद ही चिता जलाई
रोम-रोम से यज्ञ रचाया
आहुति दी जीवन की,
फिर भी जब मैं बुझा
न कोई आँख बरसने आई
किसे दिखाऊँ दहन-दाह, किस अंचल में सो जाऊँ
पास बहुत है पतझर मुझसे, दूर बहुत मधुमास है !
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !!

यह शलभों का प्यार, किसी
के नयनों की यह छाया,
केवल तब तक है, जब तक
बस एक न झोंका आया
बुझते ही यह लौ, चुकते ही
यह सनेह, यह बाती
सृष्टि मुझे भूलेगी जैसे
तुमने मुझे भुलाया
बुझे दिये का मोल नहीं कुछ क्यों मिट्टी के घर में?
सोच-सोच रो रहा गगन, औ' धरती पडी उदास है!
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !!

सीनाज़ोरी हवा कर रही
है नाराज़ अंधेरा,
इतना तो जल चुका मगर
है अब भी दूर सवेरा
तिल-तिल घुलती देह, रिस
रहा बूँद-बूँद जीवन-घट,
कुछ क्षण के ही लिए और है
अपना रैन - बसेरा
यद्यपि हूँ लाचार सभी विधि निठुर नियति के आगे
फिर भी दुनिया को सूरज दे जाने की अभिलाष है !
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !!

मुझे लगा है शाप, न जब तक
रात प्रात बन जाये,
तब तक द्वार-द्वार मेरी लौ
दीपक - राग सुनाये
जब तक खुलती नहीं बाग़ की
पलकें फूलों वाली
तब तक पात-पात पर मेरी
किरन सितार बजाये
आये-जाये साँस कि चाहे रोये-गाये पीड़ा
मैं जागूँगा जब तक आती धूप न सबके पास है !
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !!

~ गोपालदास नीरज


  May 3, 2017| e-kavya.blogspot.com
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फ़क़त निगाह से

फ़क़त निगाह से
होता है फ़ैसला दिल का,
न हो निगाह में शोख़ी
तो दिलबरी क्या है

~ अल्लामा इक़बाल

  May 2, 2017| e-kavya.blogspot.com
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बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने


बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

ताते जल नहा, पहन श्वेत वसन आई
खुले लॉन बैठ गई दमकती लुनाई
सूरज खरगोश धवल गोद उछल आया।
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

नभ के उद्यान­ छत्र ­तले मेघ टीला
पड़ा हरा फूल कढ़ा मेजपोश पीला
वृक्ष खुली पुस्तक हर पृष्ठ फड़फड़ाया
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

पैरों में मखमल की जूती­ सी क्यारी
मेघ ऊन का गोला बुनती सुकुमारी–
डोलती सलाई, हिलता जल लहराया
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

बोली कुछ नहीं, एक कुरसी की खाली
हाथ बढ़ा छज्जे की छाया सरका ली
बाहं छुड़ा भागा, गिर बर्फ हुई छाया
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

∼ सर्वेश्वर दयाल सक्सेना


  May 1, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

चाँद के साथ कई दर्द पुराने


चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले,
कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले।

हिज्र कि चोट अजब संग-शिकन होती है,
दिल की बेफ़ैज़ ज़मीनों से ख़ज़ाने निकले।
*हिज्र=जुदाई; बेफ़ैज़=बंजर

उम्र गुज़री है शब-ए-तार में आँखें मलते,
किस उफ़क़ से मेरा ख़ुर्शीद ना जाने निकले।
*शब-ए-तार=अंधेरी रात; उफ़क़=आसमान; ख़ुर्शीद=सूरज

कू-ए-क़ातिल में चले जैसे शहीदों का जुलूस,
ख़्वाब यूँ भीगती आँखों को सजाने निकले।
क़ू=गली

दिल ने इक ईंट से तामीर किया ताज महल,
तू ने इक बात कही लाख फ़साने निकले।
*तामीर=बनाया

मैंने 'अमजद' उसे बेवास्ता देखा ही नहीं,
वो तो ख़ुश्बू में भी आहट के बहाने निकले।
*बेवास्ता=बिना वज़ह

~ अमजद इस्लाम अमजद


  Apr 30, 2017| e-kavya.blogspot.com
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मैं कितनी सदियों से

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मैं कितनी सदियों से तक रहा हूँ
ये काएनात और इस की वुसअत (वुसअत=विस्तार, फैलाव)
तमाम हैरत तमाम हैरत
ये क्या तमाशा ये क्या समाँ है
ये क्या अयाँ है ये क्या निहाँ है (अयाँ=स्पष्ट; निहाँ=छुपा हुआ)
अथाह साग़र है इक ख़ला का
न जाने कब से न जाने कब तक
कहाँ तलक है
हमारी नज़रों की इंतिहा है
जिसे समझते हैं हम फ़लक है

ये रात का छलनी छलनी सा काला आसमाँ है
कि जिस में जुगनू की शक्ल में
बे-शुमार सूरज पिघल रहे हैं
शहाब-ए-साक़िब है (शहाब-ए-साक़िब=चमकते सितारे)
या हमेशा की ठंडी काली फ़ज़ाओं में
जैसे आग के तीर चल रहे हैं
करोड़-हा नूरी बरसों के फ़ासलों में फैली (नूरी=प्रकाशित; ख़ला=स्पेस)
ये कहकशाएँ (आकाश गंगा)
ख़ला घेरे हैं
या ख़लाओं की क़ैद में है
ये कौन किस को लिए चला है
हर एक लम्हा
करोड़ों मीलों की जो मसाफ़त है
इन को आख़िर कहाँ है जाना
अगर है इन का कहीं कोई आख़िरी ठिकाना
तो वो कहाँ है

जहाँ कहीं है
सवाल ये है
वहाँ से आगे कोई ज़मीं है
कोई फ़लक है
अगर नहीं है
तो ये नहीं कितनी दूर तक है

मैं कितनी सदियों से तक रहा हूँ
ये काएनात और इस की वुसअत
तमाम हैरत तमाम हैरत
सितारे जिन की सफ़ीर किरनें
करोड़ों बरसों से राह में है
ज़मीं से मिलने की चाह में है
कभी तो आ के करेंगी ये मेरी आँखें रौशन
कभी तो आएगी मेरे हाथों में रौशनी का एक ऐसा दामन
कि जिस को थामे मैं जा के देखूँगा इन ख़लाओं के
फैले आँगन
कभी तो मुझ को ये काएनात अपने राज़ खुल के
सुना ही देगी
ये अपना आग़ाज़ अपना अंजाम
मुझ को इक दिन बता ही देगी

अगर कोई वाइज़ अपने मिम्बर से
नख़वत-आमेज़ लहज़े में ये कहे
कि तुम तो कभी समझ ही नहीं सकोगे
कि इस क़दर है ये बात गहरी
तो कोई पूछे
जो मैं न समझा
तो कौन समझाएगा
और जिस को कभी न कोई समझ सके
ऐसी बात तो फिर फ़ुज़ूल ठहरी

~ जावेद अख़्तर


  Apr 29, 2017| e-kavya.blogspot.com
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हो जवानी में आर पीने से

हो जवानी में आर पीने से
मौत अच्छी है ऐसे जीने से,
मयकशों, एहतिरामे-साक़ी में
जामो-मीना धरो क़रीने से।

कोई मौसम हो कोई साक़ी हो,
हमको मतलब फक़त है पीने से,
मेरी तौबा ने टूट कर ये कहा,
ज़िंदगानी बढ़ेगी पीने से।

क्यों न हो शौक़े-जाम सावन में
मय को निसबत है इस महीने से।

*आर=शर्म; एहतिरामे-साक़ी में=साक़ी के सम्मान में; जामो-मीना=प्याला और सुराही; फक़त=केवल; निसबत=सम्बंध

~ अर्श मल्सियानी

  Apr 28, 2017| e-kavya.blogspot.com
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दाग़ दुनिया ने दिए

दाग़ दुनिया ने दिए ज़ख़्म ज़माने से मिले,
हम को तोहफ़े ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले।

~ कैफ़ भोपाली


  Apr 25, 2017| e-kavya.blogspot.com
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वह कैसी थी, अब न बता पाऊंगा

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वह कैसी थी,
अब न बता पाऊंगा
वह जैसी थी।
प्रथम प्रणय की आँखों से था उसको देखा,
यौवन उदय, प्रणय की थी वह प्रथम सुनहली रेखा।

ऊषा का अवगुंठन पहने,
क्या जाने खग पिक के कहने,
मौन मुकुल सी, मृदु अंगो में,
मधुऋतु बंदी कर लाई थी!
स्वप्नों का सौंदर्य, कल्पना का माधुर्य
हृदय में भर, आई थी।
वह कैसी थी,
वह न कथा गाऊंगा
वह जैसी थी।

क्या है प्रणय? एक दिन बोली, उसका वास कहाँ है
इस समाज में? देह मोह का,
देह डोह का त्रास कहाँ है?
देह नहीं है परिधि प्रणय की,
प्रणय दिव्य है, मुक्ति हृदय की
यह अनहोनी रीति,
देह वेदी हो प्राणो के परिणय की।

बंध कर दृद्य मुक्त होते है,
बंध कर देह यातना सहती,
नारी के प्राणों में ममता
बहती रहती, बहती रहती।
नारी का तन माँ का तन है,
जाती वृद्धि के लिए विनिर्मित,
पुरुष प्रणय अधिकार प्रणय है,
सुख विलास के हित उत्कंठित।

तुम हो स्वप्न लोक के वासी,
तुम को केवल प्रेम चाहिए,
प्रेम तुम्हें देती मैं अबला,
मुझको घर की क्षेम चाहिए।
हृदय तुम्हें देती हूँ प्रियतम
देह नहीं दे सकती,
जिसे देह दूंगी अब निश्चित
स्नेह नहीं दे सकती।

अतः विदा दो मन के साथी,
तुम नभ के मैं भू की वासी,
नारी तन है, तन है, तन है,
हे मन प्राणो के अभिलाषी।
नारी देह शिखा है जो
नभ देहो के नव दीप संजोती,
जीवन कैसे देही होता
जो नारीमय देह न होती।

तुम हो सपनो के दृष्टा तुम
प्रेम ज्ञान औ सत्य प्रकाशी,
नारी है सौंदर्य प्राण,
नारी है रूप सृजन की प्यासी।

तुम जग की सोचो मैं घर की,
तुम अपने प्रभु, मैं निज दासी,
लज्जा पर न तुम्हें आती,
वन सकते नहीं प्रेम सन्यासी।
विदा! विदा!
शायद मिल जाएँ यदा कदा।

मैं बोला तुम जाओ,
प्रसन्न मन जाओ मेरा आशी,
उसके नयनों में आंसू थे,
अधरों पर निश्छल हंसी।
वह क्या समझ सकी थी, उस पर
क्यों रीझ था यह आत्मतुर
स्वप्न लोक का वासी?

मैं मौन रहा,
फिर स्वतः कहा,
बहती जाओ, बहती जाओ,
बहती जीवन धारा में,
शायद कभी लौट आओ तुम,
प्राण, बन सका अगर सर्वहारा मैं।

∼ सुमित्रानंदन पंत


  Apr 27, 2017| e-kavya.blogspot.com
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नदी के पार से मुझको बुलाओ

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नदी के पार से मुझको बुलाओ मत!
हमारे बीच में विस्तार है जल का
कि तुम गहराइयों को भूल जाओ मत!

कि तुम हो एक तट पर एक पर मैं हूं
बहुत हैरान दूरी देख कर मैं हूं‚
निगाहें हैं तुम्हारी पास तक आतीं
कि बाहें हैं स्वयं मेरी फड़क जातीं!
गगन में ऊंघती तारों भरी महफिल
न रुकती है‚ नदी की धार है चंचल
न आहों से मुझे तुम पास ला सकतीं
न बाहों में नदी को चीरने का बल!

कि रेशम–सी मिलन की डोर टूटी है
निगाहों में मुझे अब तुम झुलाओ मत।
नदी के पार से मुझको बुलाओ मत!!

नदी है यह समय की जो मचलती है
चिरंतन है नदी‚ धारा बदलती है
नदी है तो किनारे भी अलग होंगे
मिलेंगे भी अगर हम–तुम‚ विलग होंगे
मनुज निज में सदा से ही इकाई है
मिलन की बात झूठों नें बनाई है
तटों के बीच में दूरी रहेगी ही
कभी जल नें घटाई है बढ़ाई है!

मिलन है कांच से कच्चा कि अब इस पर
रतन से लोचनों को तुम रुलाओ मत!
नदी के पार से मुझको बुलाओ मत!!

मिलन मिथ्या कि मिलनातुर हृदय सच है
हृदय सच है‚ हृदय–तल का प्रणय सच है
प्रणय के सामने दूरी नहीं कुछ भी
प्रणय कब देखता सुनता कहीं कुछ भी।
चमन में बज रही है फूल की पायल
सुरभि के स्वर पवन को कर रहे चंचल‚
किरण्–कलियां गगन से फेंकती कोई
किसी का हिल रहा लहरों–भरा अंचल!

हृदय की भावना है मप दूरी की
मुझे अपने हृदय से तुम भुलाओ मत!
नदी के पार से मुझको बुलाओ मत!!

प्रणय का लो तुम्हें बदला चुकाता हूं
सितारों को गवाही में बुलाता हूं
जगत करता नदी में दीप अर्पित है।
लहर पर तो हृदय–दीपक विसर्जित है।
अगर तुम तक बहा ले जाए जल का क्रम
इसे निज चम्पई कर में उठा कर तुम‚
रची मंहदी न जिसकी देख मैं पाया
उसी कोमल हथेली में छुपा लो तुम!

हवा आए‚ बुझा जाए न कोई भय
यही काफी है कि अंचल से बुझाओ मत!
नदी के पार से मुझको बुलाओ मत!!

~ राजनारायण बिसरिया


  Apr 26, 2017| e-kavya.blogspot.com
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हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार

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हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह
उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह
*मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार=गली और बाज़ार की चीज़

इस कू-ए-तिश्नगी में बहुत है कि एक जाम
हाथ आ गया है दौलत-ए-बेदार की तरह
*कू-ए-तिश्नगी=प्यास की सड़क; दौलत-ए-बेदार=अचानक आयी दौलत

वो तो कहीं है और मगर दिल के आस-पास
फिरती है कोई शय निगह-ए-यार की तरह

सीधी है राह-ए-शौक़ पे यूँ ही कहीं कहीं
ख़म हो गई है गेसू-ए-दिलदार की तरह
*ख़म=घुमावदार; गेसू-ए-दिलदार=प्रेयसी की ज़ुल्फें

बे-तेशा-ए-नज़र न चलो राह-ए-रफ़्तगाँ
हर नक़्श-ए-पा बुलंद है दीवार की तरह
*तेशा = कुल्हाड़ी; रफ्तगां = गुज़रे हुए लोग

अब जा के कुछ खुला हुनर-ए-नाख़ून-ए-जुनूँ
ज़ख़्म-ए-जिगर हुए लब-ओ-रुख़्सार की तरह

'मजरूह' लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह

~ मजरूह सुल्तानपुरी


  Apr 25, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

सागर के उर पर नाच नाच...

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सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

जगती के मन को खींच खींच
निज छवि के रस से सींच सींच
जल कन्यांएं भोली अजान
सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

प्रातः समीर से हो अधीर
छू कर पल पल उल्लसित तीर
कुसुमावली सी पुलकित महान
सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

संध्या से पा कर रुचिर रंग
करती सी शत सुर चाप भंग
हिलती नव तरु दल के समान
सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

करतल गत उस नभ की विभूति
पा कर शशि से सुषमानुभूति
तारावलि सी मृदु दीप्तिमान
सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

तन पर शोभित नीला दुकूल
है छिपे हृदय में भाव फूल
आकर्षित करती हुई ध्यान
सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

हैं कभी मुदित, हैं कभी खिन्न,
हैं कभी मिली, हैं कभी भिन्न,
हैं एक सूत्र से बंधे प्राण,
सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

∼ ठाकुर गोपाल शरण सिंह


  Apr 24, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh