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Saturday, December 23, 2017

इत्तिफ़ाक़ अपनी जगह


इत्तिफ़ाक़ अपनी जगह ख़ुश-क़िस्मती अपनी जगह
ख़ुद बनाता है जहाँ में आदमी अपनी जगह

कह तो सकता हूँ मगर मजबूर कर सकता नहीं
इख़्तियार अपनी जगह है बेबसी अपनी जगह
*इख़्तियार=काबू; नियंत्रण

कुछ न कुछ सच्चाई होती है निहाँ हर बात में
कहने वाले ठीक कहते हैं सभी अपनी जगह
*निहाँ=छुपा हुआ/हुई

सिर्फ़ उस के होंट काग़ज़ पर बना देता हूँ मैं
ख़ुद बना लेती है होंटों पर हँसी अपनी जगह

दोस्त कहता हूँ तुम्हें शाएर नहीं कहता 'शुऊर'
दोस्ती अपनी जगह है शाएरी अपनी जगह

~ अनवर शऊर

  Dec 23, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Friday, December 22, 2017

मैं भी काफ़िर, तू भी क़ाफ़िर


मैं भी काफ़िर, तू भी क़ाफ़िर
फूलों की खुशबू भी काफ़िर
शब्दों का जादू भी काफ़िर
यह भी काफिर, वह भी काफिर
फ़ैज़ भी और मंटो भी काफ़िर

नूरजहां का गाना काफिर
मैकडोनैल्ड का खाना काफिर
बर्गर काफिर, कोक भी काफ़िर
हंसी गुनाह, जोक भी काफ़िर
तबला काफ़िर, ढोल भी काफ़िर
प्यार भरे दो बोल भी काफ़िर
सुर भी काफिर, ताल भी काफ़िर
भांगरा, नाच, धमाल भी काफ़िर
दादरा, ठुमरी, भैरवी काफ़िर
काफी और खयाल भी काफ़िर

वारिस शाह की हीर भी काफ़िर
चाहत की ज़ंजीर भी काफ़िर
जिंदा-मुर्दा पीर भी काफ़िर
भेंट नियाज़ की खीर भी काफ़िर
बेटे का बस्ता भी काफ़िर
बेटी की गुड़िया भी काफ़िर
हंसना-रोना कुफ़्र का सौदा
गम काफ़िर, खुशियां भी काफ़िर
जींस भी और गिटार भी काफ़िर

टखनों से नीचे बांधो तो
अपनी यह सलवार भी काफ़िर
कला और कलाकार भी काफ़िर
जो मेरी धमकी न छापे
वह सारे अखबार भी काफ़िर
यूनिवर्सिटी के अंदर काफ़िर
डार्विन भाई का बंदर काफ़िर
फ्रायड पढ़ने वाले काफ़िर
मार्क्स के सब मतवाले काफ़िर

मेले-ठेले कुफ़्र का धंधा
गाने-बाजे सारे फंदा
मंदिर में तो बुत होता है
मस्जिद का भी हाल बुरा है
कुछ मस्जिद के बाहर काफ़िर
कुछ मस्जिद में अंदर काफ़िर
मुस्लिम देश के अक्सर काफ़िर
काफ़िर काफ़िर मैं भी काफ़िर
काफ़िर काफ़िर तू भी काफ़िर

~ सलमान हैदर


  Dec 22, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

आए तो यूँ कि जैसे

आए तो यूँ कि जैसे
हमेशा थे मेहरबान
भूले तो यूँ कि गोया
कभी आश्ना न थे

~ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  Dec 20, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

क्या बात निराली है मुझ में

 
क्या बात निराली है मुझ में किस फ़न में आख़िर यकता हूँ
क्यूँ मेरे लिए तुम कुढ़ते हो मैं ऐसा कौन अनोखा हूँ
*यकता=अद्वितीय

वो लम्हा याद करो जब तुम इस क़ल्ब-सरा में आए थे
उस रोज़ से अपना हाल है ये कभी हँसता हूँ कभी रोता हूँ
*क़ल्ब=हृदय;सरा=सराय

कुछ भूली-बिसरी यादों का अलबेला शहर बसाया है
कोई वक़्त मिले तो आ निकलो यहीं मिलता हूँ यहीं रहता हूँ

कुछ और बढ़े इस रस्ते में अन्फ़ास-ए-रिफ़ाक़त की ख़ुश्बू
तुम साथ सही हमराह सही मैं फिर भी तन्हा तन्हा हूँ
*अन्फ़ास-ए-रिफ़ाक़त=साँसों का साथ

मैं ख़ाक-बसर मैं अर्श-नशीं मैं सब कुछ हूँ मैं कुछ भी नहीं
मैं तेरे गुमाँ से पत्थर हूँ मैं तेरे यक़ीं से हीरा हूँ
*ख़ाक-बसर =धूल मे पड़ा हुआ; अर्श-नशीं=आसमान पर बैठने वाला

~ अतहर नफ़ीस


  Dec 19, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ख़्वाहिश परी की है

ख़्वाहिश परी की है न तमन्ना है हूर की
आँखों के आगे बस रहे सूरत हुज़ूर की

~ हमदम अकबराबादी

  Dec 18, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Sunday, December 17, 2017

दर्द

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दर्द का कोई
वर्ग नहीं होता
प्रजाति नहीं होती
जाति नहीं होती
दर्द, बस दर्द होता है

एक-सा स्वाद सबको देता है
सब पर एक-सा असर करता है
चाहे नज़ाकत से करे
या पूरी शिद्दत से
कोई फर्क नहीं करता
हाथ या गहरे कहीं पीठ में
कसमसाते दांत मरोड़ खाते पेट या धकधकाते दिल में
आंख ही रोती है हर दर्द के लिए
सीना ही हिलकता है हर दर्द के लिए

दर्द उठता हो कहीं भी
साझा होता है पूरे आकार में
चाहना एक ही जगाता है सब में
कि बस ढीले हो जाएं बेतरह खिंचे तंतु
बंधनहीन हों मज्जा के गुच्छे
ढूंढता है शरीर
आराम की कोई मुद्रा
इत्मीनान की एक मुद्रा

जीवन दर्द की एक यात्रा है
सैकड़ों दर्द के पड़ावों से गुजरते हैं हम
जैसे पहाड़ों पर मील के पत्थर गिनते
पार करते ऊपर उठते हैं हम
दर्द की यह यात्रा
हर एक की अपनी है
अकेली है
कुव्वत है, काबिलियत है, चाहत है

कहते हैं, दर्द को दर्द से ही राहत है
याद आता है तो रहता है
भटका दो उसे, भुला दो उसे
उलझा दो उसे दुनिया के किसी शगल में
वह भोला रम जाता है उसी में
भुला देता है वह मुझे, मैं उसे
मगर फिर शाम होते-होते जहाज का पंछी
लौट आता है अपने ठौर
ज्यादा अधिकार के साथ
गहराता है, अंधेरे के साथ अथाह सागर सा
तभी कौंधता है एक मोती गुम होने से ठीक पहले
दर्द-रहित मिलती है एक झपकी
सबसे असावधान मुद्रा में
असतर्क, समर्पण की स्थिति में
वह छोटी झपकी
आंखें खुलती हैं और
दर्द से फिर एकाकार
सतर्कता की एक और मुद्रा
राहत पाने की एक और कोशिश
दर्द की एक और मुद्रा

‍ ~ आर. अनुराधा

  Dec 17, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ग़ुनूदगी सी रही तारी

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ग़ुनूदगी सी रही तारी उम्र भर हम पर
ये आरज़ू ही रही थोड़ी देर सो लेते
ख़लिश मिली है मुझे और कुछ नहीं अब तक
तिरे ख़याल से ऐ काश दर्द धो लेते
*ग़ुनूदगी=सुस्ती, नींद; तारी=छायी; ख़लिश=दर्द

मिरे अज़ीज़ो मिरे दोस्तो गवाह रहो
बिरह की रात कटी आमद-ए-सहर न हुई
शिकस्ता-पा ही सही हम-सफ़र रहा फिर भी
उम्मीद टूटी कई बार मुंतशिर न हुई
*आमद-ए-सहर=सुबह का आगमन; शिकस्ता=टूटा हुआ; मुंतशिर=बिखरी

हयूला कैसे बदलता है वक़्त हैराँ हूँ
फ़रेब और न खाए निगाह डरता हूँ
ये ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी है पल पल में
हज़ार बार सँभलता हूँ और मरता हूँ
*हयूला=धातु, तत्व

वो लोग जिन को मुसाफ़िर-नवाज़ कहते थे
कहाँ गए कि यहाँ अजनबी हैं साथी भी
वो साया-दार शजर जो सुना था राह में हैं
सब आँधियों ने गिरा डाले अब कहाँ जाएँ
ये बोझ और नहीं उठता कुछ सबील करो
चलो हँसेंगे कहीं बैठ कर ज़माने पर
*सबील= उपाय; युक्ति

~ अख़्तर-उल-ईमान

  Dec 16, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Friday, December 15, 2017

माई री! मैं कासे कहूँ

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"माई री! मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की, माई री"
जब भी सुनती हूँ मैं गीत, आपका मीरा बाई,
सोच में पड़ जाती हूँ, वो क्या था
जो माँ से भी आपको कहते नहीं बनता था,

हालांकि संबोधन गीतों का
अकसर वह होती थीं!

वर्किंग विमेन्स हॉस्टल में पिछवाड़े का ढाबा!
दस बरस का छोटू प्यालियाँ धोता-चमकाता
क्या सोचकर अपने उस खटारा टेप पर
बार-बार ये ही वाला गीत आपका बजाता है!

लक्षण तो हैं उसमें
क्या वह भी मनमोहन पुरुष बनेगा,
किसी नन्ही-सी मीरा का मनचीता.
अड़ियल नहीं, ज़रा मीठा!

वर्किंग विमेन्स हॉस्टल की हम सब औरतें
ढूँढती ही रह गईं कोई ऐसा
जिन्हें देख मन में जगे प्रेम का हौसला!

लोग मिले - पर कैसे-कैसे -
ज्ञानी नहीं, पंडिताऊ,
वफ़ादार नहीं, दुमहिलाऊ,
साहसी नहीं, केवल झगड़ालू,
दृढ़ प्रतिज्ञ कहाँ, सिर्फ जिद्दी,
प्रभावी नहीं, सिर्फ हावी,
दोस्त नहीं, मालिक,
सामजिक नहीं, सिर्फ एकांत भीरु
धार्मिक नहीं, केवल कट्टर

कटकटाकर हरदम पड़ते रहे वे
अपने प्रतिपक्षियों पर -
प्रतिपक्षी जो आखिर पक्षी ही थे,
उनसे ही थे.
उनके नुचे हुए पंख
और चोंच घायल!

ऐसों से क्या खाकर हम करते हैं प्यार!
सो अपनी वरमाला
अपनी ही चोटी में गूंथी
और कहा खुद से -
"एकोहऽम बहुस्याम"

वो देखो वो -
प्याले धोता नन्हा घनश्याम!
आत्मा की कोख भी एक होती है, है न!
तो धारण करते हैं
इस नयी सृष्टि की हम कल्पना

जहाँ ज्ञान संज्ञान भी हुआ करे,
साहस सद्भावना!

~ अनामिका


  Dec 15, 2017| e-kavya.blogspot.com
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मिलाते हो उसी को ख़ाक में

मिलाते हो उसी को ख़ाक में
जो दिल से मिलता है,
मिरी जाँ चाहने वाला
बड़ी मुश्किल से मिलता है

~ दाग़ देहलवी



  Dec 10, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Sunday, December 10, 2017

तुम भी रहने लगे ख़फ़ा

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तुम भी रहने लगे ख़फ़ा साहब
कहीं साया मिरा पड़ा साहब

है ये बंदा ही बेवफ़ा साहब
ग़ैर और तुम भले भला साहब

क्यूँ उलझते हो जुम्बिश-ए-लब से
ख़ैर है मैं ने क्या किया साहब
*जुम्बिश-ए-लब=होठों की कम्पन

क्यूँ लगे देने ख़त्त-ए-आज़ादी
कुछ गुनह भी ग़ुलाम का साहब
*ख़त्त-ए-आज़ादी=आज़ादी नामा

हाए री छेड़ रात सुन सुन के
हाल मेरा कहा कि क्या साहब

दम-ए-आख़िर भी तुम नहीं आते
बंदगी अब कि मैं चला साहब

सितम आज़ार ज़ुल्म ओ जौर ओ जफ़ा
जो किया सो भला किया साहब
*आज़ार=बीमारी

किस से बिगड़े थे किस पे ग़ुस्सा था
रात तुम किस पे थे ख़फ़ा साहब

किस को देते थे गालियाँ लाखों
किस का शब ज़िक्र-ए-ख़ैर था साहब

नाम-ए-इश्क़-ए-बुताँ न लो 'मोमिन'
कीजिए बस ख़ुदा ख़ुदा साहब

~ मोमिन

  Dec 10, 2017| e-kavya.blogspot.com
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आती बहुत क़रीब से

आती बहुत क़रीब से ख़ुश्बू है यार की
जारी इधर उधर ही कहीं दौर-ए-जाम है

~ अब्दुल हमीद अदम

  Dec 09, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Saturday, December 9, 2017

सूरज डूब चुका है

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सूरज डूब चुका है,
मेरा मन दुनिया से ऊब चुका है ।

सुबह उषा-किरनों ने मुझको यों दुलराया,
जैसे मेरा तन उनके मन को हो भाया,
शाम हुई तो फेरी सब ने अपनी बाँहें,
खत्म हुईं दिन-भर की मेरी सारी चाहें
धरती पर फैला अँधियाला,
रंग-बिरंगी आभा वाला,
सूरज डूब चुका है।

फूलों ने अपनी मुस्कान बिखेरी भू पर
दिया मुझे खुश रहने का सन्देश निरन्तर,
ज़िन्दा रहने की साधें मुझ तक भी आयीं,
शाम हुई, सरसिज की पाँखें क्या मुरझायीं-
मन का सारा मिटा उजाला,
धरती का श्रृंगार निराला,
सूरज डूब चुका है।

सुरभि,फूल,बादल,विहगों के गीत सजीले,
बीते दिन में देखे कितने स्वप्न सजीले,
दिन भर की खुशियों के साथी चले गये यों,
बने और बिगड़े आँखों में ताश-महल ज्यों,
घिरा रात का जादू काला,
राख बनी किरनों की ज्वाला,
सूरज डूब चुका है।

~ अजित कुमार


  Dec 09, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Friday, December 8, 2017

किसे जाना कहाँ है...

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किसे जाना कहाँ है मुनहसिर होता है इस पर भी
भटकता है कोई बाहर तो कोई घर के भीतर भी
*मुनहसिर=निर्भर

किसी को आस बादल से कोई दरियाओं का तालिब
अगर है तिश्ना-लब सहरा तो प्यासा है समुंदर भी

शिकस्ता ख़्वाब की किर्चें पड़ी हैं आँख में शायद
नज़र में चुभता है जब तब अधूरा सा वो मंज़र भी
*शिकस्ता=टूटी हुई;किर्चें=छोटे छोटे टुकड़े

सुराग़ इस से ही लग जाए मिरे होने न होने का
गुज़र कर देख ही लेता हूँ अपने में से हो कर भी

जिसे परछाईं समझे थे हक़ीक़त में न पैकर हो
परखना चाहिए था आप को उस शय को छू कर भी
* पैकर=आकार

पलट कर मुद्दतों बअ'द अपनी तहरीरों से गुज़रूँ तो
लगे अक्सर कि हो सकता था इस से और बेहतर भी
*तहरीर=लिखावट

~ अखिलेश तिवारी


  Dec 08, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Sunday, December 3, 2017

पहले- पहले प्यार में

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आँखों में फागुन की मस्ती
होठों पर वासंती हलचल
मतवाला मन भीग रहा है
बूंदों के त्यौहार में,
शायद ऐसा ही होता है
पहले- पहले प्यार में।

पैरों की पायल छनकी, कंगन खनका
हर आहट पर चौंक-चौंक जाना मन का
साँसों का देहरी छू - छूकर आ जाना
दर्पण का खुद दर्पण से ही शरमाना
और धड़कना हर धड़कन का
सपनों के संसार में।

भंग चढ़ाकर बौराया बादल डोले
नदिया में दो पाँव हिले हौले-हौले
पहली-पहली बार कोई नन्ही चिड़िया
अम्बर में उड़ने को अपने पर खोले
हिचकोले खाती है नैया
मस्ती से मझधार में।

जिन पैरों में उछला करता था बचपन
कैसी बात हुई कि बदल गया दरपन
होता है उन्मुक्त अनोखा ये बन्धन
रोम रोम पूजा साँसे चन्दन-चन्दन
बिन माँगे सब कुछ मिल जाता
आँखों के व्यापार में।

~ कीर्ति काले

  Dec 03, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Saturday, December 2, 2017

तमन्नाओं को ज़िंदा

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तमन्नाओं को ज़िंदा आरज़ूओं को जवाँ कर लूँ
ये शर्मीली नज़र कह दे तो कुछ गुस्ताख़ियाँ कर लूँ

बहार आई है बुलबुल दर्द-ए-दिल कहती है फूलों से
कहो तो मैं भी अपना दर्द-ए-दिल तुम से बयाँ कर लूँ

हज़ारों शोख़ अरमाँ ले रहे हैं चुटकियाँ दिल में
हया उन की इजाज़त दे तो कुछ बेबाकियाँ कर लूँ

कोई सूरत तो हो दुनिया-ए-फ़ानी में बहलने की
ठहर जा ऐ जवानी मातम-ए-उम्र-ए-रवाँ कर लूँ
*दुनिया-ए-फ़ानी=न:श्वर दुनिया; मातम-ए-उम्र-ए-रवाँ=गुज़रती जा रही उम्र का अफ़सोस

चमन में हैं बहम परवाना ओ शम्अ ओ गुल ओ बुलबुल
इजाज़त हो तो मैं भी हाल-ए-दिल अपना बयाँ कर लूँ
*बहम=मिले हुये

किसे मालूम कब किस वक़्त किस पर गिर पड़े बिजली
अभी से मैं चमन में चल कर आबाद आशियाँ कर लूँ

बर आएँ हसरतें क्या क्या अगर मौत इतनी फ़ुर्सत दे
कि इक बार और ज़िंदा शेवा-ए-इश्क़-ए-जवाँ कर लूँ
*शेवा=आदत

मुझे दोनों जहाँ में एक वो मिल जाएँ गर 'अख़्तर'
तो अपनी हसरतों को बे-नियाज़-ए-दो-जहाँ कर लूँ
*बे-नियाज़-ए-दो-जहाँ =दोनो लोकों की इच्छाओं से मुक्त

‍~ अख़्तर शीरानी


  Dec 02, 2017| e-kavya.blogspot.com
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इधर फ़लक को है ज़िद


इधर फ़लक को है ज़िद बिजलियाँ गिराने की
उधर हमें भी है धुन आशियाँ बनाने की

~ नामालूम

  Dec 01, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Friday, December 1, 2017

तारों से सोना बरसा था

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तारों से सोना बरसा था, चश्मों से चांदी बहती थी
फूलों पर मोती बिखरे थे, जर्रों की किस्मत चमकी थी
कलियों के लब पर नग्मे थे, शाखों पै वज्द सा तारी था
खुशबू के खजाने लुटते थे, और दुनिया बहकी बहकी थी
ऐ दोस्त तुझे शायद वह दिन अब याद नहीं, अब याद नहीं

सूरज की नरम सुआओं से कलियों के रूप निखरते हों
सरसों की नाजुक शाखों पर सोने के फूल लचकते हों
जब ऊदे-ऊदे बादल से अमृत की धारें बहती थीं
और हल्की-हल्की खुनकी में दिल धीरे-धीरे तपते थे
ऐ दोस्त तुझे शायद वह दिन अब याद नहीं, अब याद नहीं

फूलों के सागर अपने थे, शबनम की सहबा अपनी थी
जर्रों के हीरे अपने थे, तारों की माला अपनी थी
दरिया की लहरें अपनी थीं, लहरों का तरन्नुम अपना था
जर्रों से लेकर तारों तक यह सारी दुनिया अपनी थी
ऐ दोस्त तुझे शायद वह दिन अब याद नहीं, अब याद नहीं

~ 'अज्ञात'


  Dec 01, 2017| e-kavya.blogspot.com
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ये मुमकिन है कि मिल जाएँ

 
ये मुमकिन है कि मिल जाएँ तिरी खोई हुई चीज़ें 
क़रीने से सजा कर रखा ज़रा बिखरी हुई चीज़ें

कभी यूँ भी हुआ है हँसते हँसते तोड़ दी हम ने
हमें मालूम था जुड़ती नहीं टूटी हुई चीज़ें

ज़माने के लिए जो हैं बड़ी नायाब और महँगी
हमारे दिल से सब की सब हैं वो उतरी हुई चीज़ें

दिखाती हैं हमें मजबूरियाँ ऐसे भी दिल अक्सर
उठानी पड़ती हैं फिर से हमें फेंकी हुई चीज़ें

किसी महफ़िल में जब इंसानियत का नाम आया है
हमें याद आ गई बाज़ार में बिकती हुई चीज़ें

~ हस्तीमल हस्ती

  Nov 30, 2017| e-kavya.blogspot.com
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आहट हुई देखो ज़रा

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आहट हुई देखो ज़रा
कोई नहीं, कोई नहीं!

आना जिन्हें था, आ चुके
गठरी सुखों की लादकर
कुछ द्वार से आए
कई दीवार ऊँची फाँदकर
लेकिन है कोई और ही
जिसकी प्रतीक्षा है मुझे
यों ही गईं रातें कई
मैं नींद भर सोई नहीं!

मेले यहाँ सजते रहे
हँसती रहीं रंगीनियाँ
सादी हँसी को गेह की
डँसती रहीं रंगीनियाँ
बनते गए सब अजनबी
पागल हवस की होड़ में
इक दर्द मेरे साथ था
मैं भीड़ में खोई नहीं!

मेरी चमन की वास
उसके घर गई, अच्छा लगा
उसके अजिर के अश्रु से
मैं भर गई, अच्छा लगा
लेकिन चुभे जब खार
अपने ही दुखों के देह में
आँसू उमड़ भीतर उठे
पर चुप रही, रोई नहीं!

आहट हुई देखो ज़रा
कोई नहीं, कोई नहीं!

~ रामदरश मिश्र


  Nov 23, 2017| e-kavya.blogspot.com
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मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे

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मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे
मुक़द्दर में चलना था चलते रहे

मिरे रास्तों में उजाला रहा
दिए उस की आँखों में जलते रहे

कोई फूल सा हाथ काँधे पे था
मिरे पाँव शो'लों पे जलते रहे

सुना है उन्हें भी हवा लग गई
हवाओं के जो रुख़ बदलते रहे

वो क्या था जिसे हम ने ठुकरा दिया
मगर उम्र भर हाथ मलते रहे

मोहब्बत अदावत वफ़ा बे-रुख़ी
किराए के घर थे बदलते रहे

लिपट कर चराग़ों से वो सो गए
जो फूलों पे करवट बदलते रहे

~ बशीर बद्र


  Nov 19, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Saturday, November 18, 2017

जनम के सिरजे हुए दुख

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जनम के सिरजे हुए दुख
उम्र बन-बनकर कटेंगे
ज़िन्दगी के दिन घटेंगे

कुआँ अँधा बिना पानी
घूमती यादें पुरानी
प्यास का होना वसंती
तितलियों से छेड़खानी
झरे फूलों से पहाड़े
गंध के कब तक रटेंगे?
ज़िन्दगी के दिन घटेंगे

चढ़ गये सारे नसेड़ी
वक़्त की मीनार टेढ़ी
'गिर रही है- गिर रही है'
हवाओं ने तान छेड़ी
मचेगी भगदड़ कि कितने स्वप्न
लाशों से पटेंगे
ज़िन्दगी के दिन घटेंगे

परिंदे फिर चमन में
खेत बागों में कि वन में
चहचहायेंगे
नदी बहती रहेगी उसी धुन में
चप्पुओं के स्वर लहर बनकर
कछारों तक उठेंगे
ज़िन्दगी के दिन घटेंगे

~ दिनेश सिंह


  Nov 18, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Friday, November 17, 2017

यार को मैं ने मुझे यार ने


यार को मैं ने मुझे यार ने सोने न दिया
रात भर ताला'-ए-बेदार ने सोने न दिया
*ताला'-ए-बेदार=जागा हुआ नसीब

ख़ाक पर संग-ए-दर-ए-यार ने सोने न दिया
धूप में साया-ए-दीवार ने सोने न दिया
*संग-ए-दर-ए-यार=यार की दहलीज़ का पत्थर;

शाम से वस्ल की शब आँख न झपकी ता-सुब्ह
शादी-ए-दौलत-ए-दीदार ने सोने न दिया
*शादी-ए-दौलत-ए-दीदार=तेखने की खुशी की दौलत

एक शब बुलबुल-ए-बेताब के जागे न नसीब
पहलु-ए-गुल में कभी ख़ार ने सोने न दिया

जब लगी आँख कराहा ये कि बद-ख़्वाब किया
नींद भर कर दिल-ए-बीमार ने सोने न दिया

दर्द-ए-सर शाम से उस ज़ुल्फ़ के सौदे में रहा
सुब्ह तक मुझ को शब-ए-तार ने सोने न दिया
*शब-ए-तार=काली रात

रात भर कीं दिल-ए-बेताब ने बातें मुझ से
रंज ओ मेहनत के गिरफ़्तार ने सोने न दिया

सैल-ए-गिर्या से मिरी नींद उड़ी मर्दुम की
फ़िक्र-ए-बाम-ओ-दर-ओ-दीवार ने सोने न दिया
*सैल-ए-गिर्या=रोने से आयी बाढ़; मर्दुम=लोग

बाग़-ए-आलम में रहीं ख़्वाब की मुश्ताक़ आँखें
गर्मी-ए-आतिश-ए-गुलज़ार ने सोने न दिया
*बाग़-ए-आलम=दुनिया के बग़ीचे; मुश्ताक़=इच्छुक; गर्मी-ए-आतिश-ए-गुलज़ार=बाग़ीचे के आग की गर्मी

सच है ग़म-ख़्वारी-ए-बीमार अज़ाब-ए-जाँ है
ता-दम-ए-मर्ग दिल-ए-ज़ार ने सोने न दिया
*ग़म-ख़्वारी-ए-बीमार=बीमार से हमदर्दी; अज़ाब-ए-जाँ=कष्ट; ता-दम-ए-मर्ग=आख़िरी समय तक

तकिया तक पहलू में उस गुल ने न रक्खा 'आतिश'
ग़ैर को साथ कभी यार ने सोने न दिया

~ हैदर अली आतिश

  Nov 17, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Sunday, November 12, 2017

देखो, चली जाए न यों ढलकर



देखो,
चली जाए न यों ढलकर।

थमाओ हाथ, बाहर घास ने
कालीन डाला है,
किरन ने कुनकुने जलसे
अभी तो मुँह उजाला है,
हवाएँ यों निकल जाएँ न
हम दो बात तो कर लें,
खिली है ऋतु सुहानी
आँजुरी में, फूल कुछ भर लें।
लताओं से विटप की,
अनकही बातें सुनें चलकर!

पुलकते तट, उठी लहरें
सिमट कर बाँह में सोई,
कमल-दल फूल कर महके
मछलियाँ डूब कर खोई,
लिखी अभिसार की गाथा
कपोती ने मुँडेली पर,
मदिर मधुमास लेकर
घर गई सरसों- हथेली पर।
महकता है कहीं महुआ
किसी, कचनार में घुलकर।

उलझती ऊन सुलझा कर
नया स्वेटर बनाओ तुम,
बिखरते गीत के
खोए हुए-फिर बंध जोड़े हम,
बहुत दिन हो गए हैं
डूब कर जीना नहीं जाना,
कभी तुमने कभी हमने
कोई मौसम नहीं माना।
बहे फिर प्यार की इस
उष्णता में कुहरिका गलकर!

~ यतीन्द्र राही


  Nov 12, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Saturday, November 11, 2017

बना हूँ मैं आज तेरा मेहमाँ

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बना हूँ मैं आज तेरा मेहमाँ कोई अदू को ख़बर न कर दे
उठा के वो तेरी अंजुमन से कहीं मुझे दर-ब-दर न कर दे
*अदू=दुश्मन

ये वस्ल की रात है ख़ुदारा नक़ाब चेहरे से मत हटाओ
तुम्हारे चेहरे का ये उजाला सहर से पहले सहर न कर दे
*ख़ुदारा=ईश्वर के लिये; सहर=सवेरा

क़सम जिसे ज़ब्त-ए-ग़म की दे कर उठा दिया अपने दर से तू ने
कहीं वो दीवाना उम्र अपनी बग़ैर तेरे बसर न कर दे
*ज़ब्त-ए-ग़म=सहनशीलता

बड़े मज़े से मैं पी रहा हूँ मिरी तरफ़ तुम अभी न देखो
मुझे ये डर है नज़र तुम्हारी शराब को बे-असर न कर दे

सताया जिस को हमेशा तू ने सदा अकेला जो छुप के रोया
वो दिल-जला अपने आँसुओं से तुम्हारा दामन भी तर न कर दे

'क़तील' ये वस्ल के ज़माने हसीन भी हैं तवील भी हैं
मगर लगा है ये, दिल को धड़का इन्हें कोई मुख़्तसर न कर दे
*तवील=लम्बे; मुख्तसर=संक्षिप्त

~ क़तील शिफ़ाई


  Nov 11, 2017| e-kavya.blogspot.com
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पहले इस में इक अदा थी

पहले इस में इक अदा थी नाज़ था अंदाज़ था
रूठना अब तो तिरी आदत में शामिल हो गया

~ आग़ा शाएर क़ज़लबाश

  Nov 10, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Friday, November 10, 2017

मेरे पाँव तुम्हारी गति हो


मेरे पाँव तुम्हारी गति हो
फिर चाहे जो भी परिणति हो

*परिणति= किसी प्रकार के परिवर्तन के कारण बननेवाला नया रूप

कोई चलता कोई थमता
दुनिया तो सडकों का मेला
जैसे कोई खेल रहा हो
सीढ़ी और साँप का खेला
मेरे दाँव तुम्हारी मति हो
फिर चाहे जय हो या क्षति हो

पल-पल दिखते पल-पल ओझल
सारे सफर पडावों के छल
जैसे धूप तले मरुथल में
हर प्यासे के हिस्से मृगजल
मेरे नयन तुम्हारी द्युति हो
फिर कोई आकृति अनुकृति हो

*आकृति=स्वरूप; अनुकृति= किसी वस्तु की हूबहू नक़ल

क्या राजाघर क्या जलसाघर
मैं अपनी लागी का चाकर
जैसे भटका हुआ पुजारी
ढूँढ रहा अपना पूजाघर
मेरे प्राण तुम्हारी रति हो
फिर कैसी भी सुरति-निरति हो
*सुरति=युगल का वह प्रेम जो शारीरिक सम्बंध की तृप्ति से उत्पन्न होता है; निरति= आसक्ति

ये सन्नाटे ये कोलाहल
कविता जन्मे साँकल-साँकल
जैसे दावानल में हँस दे
कोई पहली-पहली कोंपल
मेरे शब्द तुम्हारी श्रुति हो
यह मेरी अन्तिम प्रतिश्रुति हो

*श्रुति=सुनने की क्रिया; प्रतिश्रुति=प्रतिध्वनि

~ तारा प्रकाश जोशी


  Nov 10, 2017| e-kavya.blogspot.com
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मिरे वहम-ओ-गुमाँ से


मिरे वहम-ओ-गुमाँ से भी ज़ियादा टूट जाता है
ये दिल अपनी हदों में रह के इतना टूट जाता है
*सनक और काल्पनिक

मैं रोऊँ तो दर-ओ-दीवार मुझ पर हँसने लगते हैं
हँसूँ तो मेरे अंदर जाने क्या क्या टूट जाता है
*दर=दरवाज़ा

मैं जिस लम्हे की ख़्वाहिश में सफ़र करता हूँ सदियों का
कहीं पाँव-तले आ कर वो लम्हा टूट जाता है

मिरे ख़्वाबों की बस्ती से जनाज़े उठते जाते हैं
मिरी आँखें जिसे छू लें वो सपना टूट जाता है

न जाने कितनी मुद्दत से है दिल में ये अमल जारी
ज़रा सी ठेस लगती है ज़रा सा टूट जाता है
*अमल=काम

दिल-ए-नादाँ हमारी तो नुमू ही ना-मुकम्मल थी
तो हैरत क्या जो बनते ही इरादा टूट जाता है
*नुमू=बढ़त; ना-मुकम्मल=अधूरी

मुक़द्दर में मिरे 'सागर' शिकस्त-ओ-रेख़्त इतनी है
मैं जिस को अपना कह दूँ वो सितारा टूट जाता है
*शिकस्त-ओ-रेख़्त=बनना और बिगड़ना

~ सलीम साग़र

  Nov 6, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Sunday, November 5, 2017

इतना दूर मुझे मत कर दो

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इतना दूर मुझे मत कर दो
लौटूँ तो पहचान न पाओ।

तन की दूरी दूरी मन की
अग्नि से इच्छा अग्नि शमन की
ध्वनियों की व्याकुलता से ही
उभरी हैं ध्वनियाँ निर्जन की
इतना मान नहीं रखना मन
लोगों से सम्मान न पाओ।

स्वयं से बढ़ के स्वयं से छोटा
सागर बनना बनना लोटा
सपनों ने विस्तार दिए हैं
सपनों ने ही हमें कचोटा
इतना ज्ञान न अर्जित करना
ख़ुद को ही तुम छान न पाओ।

गोद में सुख है गोद में दुख है
गोद का अपना भी एक रुख है
निर्भर करता सफ़र इसी पर
आमुख क्या है क्या सम्मुख है
इतना ऊँचा भी मत होना
नमी ओस की जान न पाओ।

~ देवेन्द्र आर्य


  Nov 5, 2017| e-kavya.blogspot.com
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आपसी बातों को अख़बार न

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आपसी बातों को अख़बार नहीं होने दिया
हम ने ये कमरा हवा-दार नहीं होने दिया

बद-गुमानी को किया चाय पिला कर रुख़्सत
नाश्ते का भी तलबगार नहीं होने दिया
*बद-गुमानी= शंका, सन्देह

दिल के ज़ख़्मों की ख़बर होने न दी अश्कों को
ग़म का आँखों से सरोकार नहीं होने दिया

सख़्त लफ़्ज़ों में भी देती है मज़ा बात उस की
उस ने लहजे को दिल-आज़ार नहीं होने दिया
*दिल-आज़ार=दिल दुखाने वाला

रख दिए होंटों पे उँगली की तरह होंट उस ने
एक शिकवा भी नुमूदार नहीं होने दिया
*नुमूदार=अंकुरित, उगने देना

उस ने नादान हो, कह कर हमें उकसाया था
उम्र भर उस को समझदार नहीं होने दिया

चाहतें पाईं हैं 'मन्नान' वफ़ाओं के तुफ़ैल
जज़्बा-ए-इश्क़ को अय्यार नहीं होने दिया
*तुफ़ैल= बीच बिचाव; अय्यार=चालाक

~ मन्नान बिजनोरी


  Nov 4, 2017| e-kavya.blogspot.com
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तुम कनक किरन के अंतराल में

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तुम कनक किरन के अंतराल में
लुक छिप कर चलते हो क्यों ?

नत मस्तक गर्व वहन करते
यौवन के घन रस कन झरते
हे लाज भरे सौंदर्य बता दो
मौन बने रहते हो क्यो?

अधरों के मधुर कगारों में
कल कल ध्वनि की गुंजारों में
मधु सरिता सी यह हंसी तरल
अपनी पीते रहते हो क्यों?

बेला विभ्रम की बीत चली
रजनीगंधा की कली खिली
अब सांध्य मलय आकुलित दुकूल
कलित हो यों छिपते हो क्यों?

~ जयशंकर प्रसाद


  Nov 3, 2017| e-kavya.blogspot.com
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