Disable Copy Text

Saturday, February 29, 2020

इश्क़ से पैदा नवा-ए-ज़िंदगी

Image may contain: sky, tree, cloud, outdoor and nature


इश्क़ से पैदा नवा-ए-ज़िंदगी में ज़ेर-ओ-बम 
इश्क़ से मिट्टी की तस्वीरों में सोज़-ए-दम-ब-दम

* नवा-ए-ज़िंदगी=ज़िंदगी की आवाज़; ज़ेर-ओ-बम;उतार-चढ़ाव; सोज़-ए-दम-ब-दम= हलचल

आदमी के रेशे रेशे में समा जाता है इश्क़
शाख़-ए-गुल में जिस तरह बाद-ए-सहर-गाही का नम

* बाद-ए-सहर-गाही=सुबह के बाद

अपने राज़िक़ को न पहचाने तो मुहताज-ए-मुलूक
और पहचाने तो हैं तेरे गदा दारा ओ जम

*राज़िक=अन्नदाता; मुहताज-ए-मुलूक=राजपद से वंचित; गदा=भिखारी; दारा=राजा,ईश्वर; जम=रजा जमशेद

दिल की आज़ादी शहंशाही शिकम सामान-ए-मौत
फ़ैसला तेरा तिरे हाथों में है दिल या शिकम

*शिकम=पेट

ऐ मुसलमाँ अपने दिल से पूछ मुल्ला से न पूछ
हो गया अल्लाह के बंदों से क्यूँ ख़ाली हरम

~ अल्लामा इक़बाल

Feb 29, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Saturday, February 22, 2020

चाँद हवा और मैं

 
घूम रहे हैं आँगन आँगन चाँद हवा और मैं
ढूँड रहे हैं बिछड़ा बचपन चाँद हवा और मैं

भूला-बिसरा अफ़्साना हैं आज उस के नज़दीक
कल तक थे जिस दिल की धड़कन चाँद हवा और मैं

ख़्वाबों से बे-नाम जज़ीरों में घूमे सौ बार
यादों का थामे हुए दामन चाँद हवा और मैं
*जज़ीरों=द्वीपों

अपने ही घर में हैं या सहरा में गर्म-ए-सफ़र
क्यूँकर सुलझाएँ ये उलझन चाँद हवा और मैं

आज के दौर में अपनी ही पहचान हुई दुश्वार
देख रहे हैं वक़्त का दर्पन चाँद हवा और मैं

रंग का हाला ख़ुशबू का इक झोंका कुछ तो मिले
कब से हैं आवारा-ए-गुलशन चाँद हवा और मैं

परछाईं के पीछे भागे खोए ख़लाओं में
निकले आप ही अपने दुश्मन चाँद हवा और मैं
*ख़लाओं=शून्य, अंतराल

जाने किस की कौन है मंज़िल फिर भी हैं इक साथ
घूम रहे हैं तीनों बन बन चाँद हवा और मैं

उर्यानी का दोश किसे दें अपनी है तक़दीर
ख़ुद ही जला बैठे पैराहन चाँद हवा और मैं
*उर्यानी=वस्त्रहीन होने की अवस्था; पैराहन=वस्त्र

~ हामिद यज़दानी

Feb 22, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh


Friday, February 21, 2020

जय शिवशंकर, जय गंगाधर

Image may contain: 2 people, cloud, sky and outdoor

जय शिवशंकर, जय गंगाधर, करुणा-कर करतार हरे,
जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशि, सुख-सार हरे
जय शशि-शेखर, जय डमरू-धर जय-जय प्रेमागार हरे,
जय त्रिपुरारी, जय मदहारी, अमित अनन्त अपार हरे,
निर्गुण जय जय, सगुण अनामय, निराकार साकार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

जय रामेश्वर, जय नागेश्वर वैद्यनाथ, केदार हरे,
मल्लिकार्जुन, सोमनाथ, जय, महाकाल ओंकार हरे,
त्र्यम्बकेश्वर, जय घुश्मेश्वर भीमेश्वर जगतार हरे,
काशी-पति, श्री विश्वनाथ जय मंगलमय अघहार हरे,
नील-कण्ठ जय, भूतनाथ जय, मृत्युंजय अविकार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

जय महेश जय जय भवेश, जय आदिदेव महादेव विभो,
किस मुख से हे गुरातीत प्रभु! तव अपार गुण वर्णन हो,
जय भवकार, तारक, हारक पातक-दारक शिव शम्भो,
दीन दुःख हर सर्व सुखाकर, प्रेम सुधाधर दया करो,
पार लगा दो भव सागर से, बनकर कर्णाधार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

जय मन भावन, जय अति पावन, शोक नशावन,
विपद विदारन, अधम उबारन, सत्य सनातन शिव शम्भो,
सहज वचन हर जलज नयनवर धवल-वरन-तन शिव शम्भो,
मदन-कदन-कर पाप हरन-हर, चरन-मनन, धन शिव शम्भो,
विवसन, विश्वरूप, प्रलयंकर, जग के मूलाधार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

भोलानाथ कृपालु दयामय, औढरदानी शिव योगी, सरल हृदय,
अतिकरुणा सागर, अकथ-कहानी शिव योगी, निमिष में देते हैं,
नवनिधि मन मानी शिव योगी, भक्तों पर सर्वस्व लुटाकर, बने मसानी
शिव योगी, स्वयम्‌ अकिंचन,जनमनरंजन पर शिव परम उदार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

आशुतोष! इस मोह-मयी निद्रा से मुझे जगा देना,
विषम-वेदना, से विषयों की मायाधीश छड़ा देना,
रूप सुधा की एक बूँद से जीवन मुक्त बना देना,
दिव्य-ज्ञान- भंडार-युगल-चरणों को लगन लगा देना,
एक बार इस मन मंदिर में कीजे पद-संचार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

दानी हो, दो भिक्षा में अपनी अनपायनि भक्ति प्रभो,
शक्तिमान हो, दो अविचल निष्काम प्रेम की शक्ति प्रभो,
त्यागी हो, दो इस असार-संसार से पूर्ण विरक्ति प्रभो,
परमपिता हो, दो तुम अपने चरणों में अनुरक्ति प्रभो,
स्वामी हो निज सेवक की सुन लेना करुणा पुकार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

तुम बिन व्याकुल हूँ प्राणेश्वर, आ जाओ भगवन्त हरे,
चरण शरण की बाँह गहो, हे उमारमण प्रियकन्त हरे,
विरह व्यथित हूँ दीन दुःखी हूँ दीन दयालु अनन्त हरे,
आओ तुम मेरे हो जाओ, आ जाओ श्रीमंत हरे,
मेरी इस दयनीय दशा पर कुछ तो करो विचार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

~ अज्ञात


Feb 22, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Sunday, February 16, 2020

घास भी मुझ जैसी है

Image may contain: 1 person, standing and outdoor

घास भी मुझ जैसी है
पाँव-तले बिछ कर ही ज़िंदगी की मुराद पाती है
मगर ये भीग कर किस बात गवाही बनती है
शर्मसारी की आँच की
कि जज़्बे की हिद्दत की
घास भी मुझ जैसी है

*मुराद=इच्छा; शर्मसारी=लज्जित; हिद्दत= तीव्रता

ज़रा सर उठाने के क़ाबिल हो
तो काटने वाली मशीन
उसे मख़मल बनाने का सौदा लिए
हमवार करती रहती है
औरत को भी हमवार करने के लिए
तुम कैसे कैसे जतन करते हो

*हमवार=समतल, सपाट

न ज़मीं की नुमू की ख़्वाहिश मरती है
न औरत की
मेरी मानो तो वही पगडंडी बनाने का ख़याल दुरुस्त था
जो हौसलों की शिकस्तों की आँच न सह सकें
वो पैवंद-ए-ज़मीं हो कर
यूँ ही ज़ोर-आवरों के लिए रास्ता बनाते हैं
मगर वो पर-ए-काह हैं
घास नहीं
घास तो मुझ जैसी है!

*नुमू=पैदावार; शिकस्त=पराजय; ज़ोर-आवरों=ज़बर्दस्त, ताक़तवर; पर-ए-काह=सूखी घास का बंडल

~ किश्वर नाहीद


Feb 16, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Saturday, February 8, 2020

जमाल-ए-बदन का ए'तिराफ़

Image may contain: 1 person, closeup

मुझे जमाल-ए-बदन का है ए'तिराफ़ मगर
मैं क्या करूँ कि वरा-ए-बदन भी देखता हूँ
ये काएनात फ़क़त एक रुख़ नहीं रखती
चमन भी देखता हूँ और बन भी देखता हूँ

*जमाल-ए-बदन=शरीर की सुंदरता; ए'तिराफ़=स्वीकार; वरा-ए-बदन=शरीर से परे; काएनात=सृष्टि

मिरी नज़र में हैं जब हुस्न के तमाम अंदाज़
मैं फ़न भी देखता हूँ फ़िक्र-ओ-फ़न भी देखता हूँ
निकल गया हूँ फ़रेब-ए-निगाह से आगे
मैं आसमाँ को शिकन-दर-शिकन भी देखता हूँ
वो आदमी कि सभी रोए जिन की मय्यत पर
मैं उस को ज़ेर-ए-कफ़न ख़ंदा-ज़न भी देखता हूँ

*शिकन=सिकुड़न; ज़ेर-ए-कफ़न=क़फ़न के नीचे[; ख़ंदा-ज़न=हँसने वाले

मैं जानता हूँ कि ख़ुर्शीद है जलाल-मआब
मगर ग़ुरूब से ख़ुद को रिहाई देता नहीं
मैं सोचता हूँ कि चाँद इक जमाल-पारा है
मगर वो रुख़ जो किसी को दिखाई देता नहीं

*ख़ुर्शीद=सूरज; जलाल-मआब=तेजस्वी; ग़ुरूब=अस्त; जमाल-पारा=सुंदरता की सीमा

मैं सोचता हूँ हक़ीक़त का ये तज़ाद है क्या
ख़ुदा जो देता है सब कुछ ख़ुदाई देता नहीं
वो लोग ज़ौक़ से आरी हैं जो ये कहते हैं
कि अश्क टूटता है और सुनाई देता नहीं
बदन भी आग है और रूह भी जहन्नम है
मिरा क़ुसूर ये है में दुहाई देता नहीं

*तजाद=विरोधाभास; ज़ौक़=आनंद; आरी=वंचित

~ अहमद नदीम क़ासमी


Feb 8, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Friday, February 7, 2020

एक उम्मीद

Image may contain: one or more people

दूर आँखों से बहुत दूर, कहीं
इक तसव्वुर है, जो बे-ज़ार किए रखता है
वो कोई ख़्वाब है या ख़्वाब का अंदेशा है
जो मिरे सोच को मिस्मार किए रखता है

*तसव्वुर=कल्पना; बे-ज़ार=उचाट; मिस्मार=तबाह

दूर, क़िस्मत की लकीरों से बहुत दूर, कहीं
एक चेहरा है, तिरे चेहरे से मिलता-जुलता
जो मुझे नींद में बेदार किए रखता है
दूर से, और बहुत दौर की आवाज़ों से
एक आवाज़ बुलाती है सर-ए-शाम मुझे
जानता हूँ मैं मोहब्बत की हक़ीक़त लेकिन
फिर भी आग़ोश-ए-तमन्ना में, तड़प उठता हूँ

*बेदार=जगाना; आग़ोश-ए-तमन्ना=आलिंगन की इच्छा

चेहरे चेहरे पे बिखरती हुई, आवाज़ों में
तेरी आवाज़ से आवाज़ कहाँ मिलती है
एक क़िंदील ख़यालों की मगर जलती है
तू मिरे पास, बहुत पास, कहीं रहती है
दूर है दूर बहुत दूर, मगर फिर भी, मुझे
एक उम्मीद सर-ए-शाम सजा रखती है
एक उलझन मुझे रातों को जगा रखती है

*किंदील=लैम्प

~ ख़ालिद मलिक साहि
ल

 Feb 7, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, February 2, 2020

वक़्त की खेती हैं हम

 
वक़्त की खेती हैं हम
वक़्त बोता है उगाता पालता है
और बढ़ने के मवाक़े भी हमें देता है वक़्त

*मवाक़े=मौके

सब्ज़ को ज़र्रीं बताने की इजाज़त मर्हमत करता है और
नाचने देता है बाद-ए-शोख़ की मौजों के साथ
झूमने देता है सूरज की किरन की हम-दमी में
चाँदनी पी कर हमें ब-दस्त पाता है तो ख़ुश होता है वक़्त

*सब्ज़=हरा; ज़री=सुनहरा; मर्हमत=प्रदान; बाद-ए-शोख़=नटखट हवा; ब-दस्त=हाथ में

फूलने फलने की तदबीरें बताता है हमें
हाँ मगर अंजाम कार
काट लेना है हमें
हम बिल-आख़िर उस के नग़्मे
हम बिल-आख़िर उस की फ़स्ल

*तदबीरें=उपाय; बिल-आख़िर-अंत में

‍~ अमीक़ हनफ़ी


 Feb 2, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, February 1, 2020

वही जो कुछ सुन रहा हूँ

Image may contain: 1 person, night

वही जो कुछ सुन रहा हूँ कोकिलों में,
वही जो कुछ हो रहा तय कोपलों में,
वही जो कुछ ढूँढ़ते हम सब दिलों में,
वही जो कुछ बीत जाता है पलों में,
बोल दो यदि...

कीच से तन-मन सरोवर के ढँके हैं,
प्यार पर कुछ बेतुके पहरे लगे हैं,
गाँठ जो प्रत्यक्ष दिखलाई न देती-
किन्तु हम को चाह भर खुलने न देती,
खोल दो यदि...

बहुत सम्भव, चुप इन्हीं
अमराइयों में गान आ जाये,
अवांछित, डरी-सी
परछाइयों में जान आ जाये,
बहुत सम्भव है इसी
उन्माद में बह दीख जाये
जिसे हम-तुम चाह कर भी
कह न पाये

वायु के रंगीन आँचल में भरी
अँगड़ाइयाँ बेचैन फूलों की सतातीं
तुम्हीं बढ़ कर एक प्याला
धूप छलका दो अँधेरे हृदय में
कि नाचे बेझिझक हर दृश्य
इन मदहोश आँखों में
तुम्हारा स्पर्श मन में सिमट आये
इस तरह ज्यों एक मीठी धूप में
कोई बहुत ही शोख़ चेहरा
खिलखिला कर सैकड़ों सूरजमुखी-सा
दृष्टि की हर वासना से
लिपट जाये

~ कुँवर नारायण


 Feb 1, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, January 31, 2020

बसंत

Image may contain: plant, flower, tree, sky, outdoor and nature


लाल लाल टेसू फूलि रहे हैं बिलास संग,
स्याम रंग मयी मानो मसि में मिलाए हैं।
तहाँ मधु-काज आइ बैठे मधुकर पुंज,
मलय पवन उपवन - बन धाए हैं।
‘सेनापति’ माधव महीना में पलाश तरु,
देखि देखि भाव कविता के मन आये हैं।
आधे अंग सुलगि सुलगि रहे, आधे मानो
विरही धन काम क्वैला परचाये हैं।

--

धरयौ है रसाल मोर सरस सिरच रुचि,
उँचे सब कुल मिले गलत न अंत है।
सुचि है अवनि बारि भयौ लाज होम तहाँ,
भौंरे देखि होत अलि आनंद अनंत है।
नीकी अगवानी होत सुख जन वासों सब,
सजी तेल ताई चैंन मैंन भयंत है।
सेनापति धुनि द्विज साखा उच्चतर देखौ,
बनौ दुलहिन बनी दुलह बसंत है।

~ सेनापति

 Jan 31, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Wednesday, January 29, 2020

फिर भी बहार आएगी

Image may contain: one or more people, people standing, sky, mountain, nature and outdoor

रोज़-ओ-शब
हल्क़ा-ए-आफ़ात हैं
हर लहज़ा जवाँ
सिलसिला वक़्त की गर्दिश का यहाँ
सब हैं पाबंदी-ए-औक़ात-ए-ज़माना में मगन
जान-ओ-तन फ़हम-ओ-ख़िरद होश-ओ-गुमाँ
तुम ही तन्हा नहीं इस सैल-ए-रवाँ में मजबूर
मैं भी जीती हूँ यहाँ ख़ुद से गुरेज़ाँ हो कर

*रोज़-ओ-शब=दिन और रात; हल्क़ा-ए-आफ़ात=विषम चक्र; पाबंदी-ए-औक़ात-ए-ज़माना=समय और युग की नियमितता; फ़हम-ओ-ख़िरद=समझ और बुद्धि; सैल-ए-रवाँ=निरंतर बहाव

फिर भी इक लम्हे की फ़ुर्सत जो मयस्सर आए
दिल वहीं चुपके से धड़कन को जगा देता है
तार-रातों में बिखरती हैं रुपहली किरनें
चाँदनी पिछली मुलाक़ातों के आईने में
रोज़-ए-आइंदा से मिलती है गले

*मयस्सर=प्राप्त; रोज़-ए-आइंदा=आने वाले दिन

कहती है
अन-कही बातों की ख़ुश्बू से मोअ'त्तर रखना
अपनी आवाज़ अभी
ज़िंदगी कितनी ही बे-मेहर सहमी
फिर भी बहार आएगी
आँखों में बसाए रखना मेरे अंदाज़ अभी

*मोअत्तर=ख़ुशबू से भरा हुआ; बे-मेहर=प्रेम विहीन

~ माह तलअत ज़ाहिदी


 Jan 29, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, January 26, 2020

छब्बीस जनवरी है

Image may contain: outdoor



गुलशन में रुत नई है
हर सम्त बे-ख़ुदी है
हर गुल पे ताज़गी है
मसरूर ज़िंदगी है
सरचश्मा-ए-ख़ुशी है
छब्बीस जनवरी है

*सिम्त=तरफ; मसरूर=आनंदित; सरचश्मा-ए-ख़ुशी=ख़ुशियों की बहार

हर सू ख़ुशी है छाई
सब ने मुराद पाई
फिर जनवरी ये आई
यौम-ए-सुरूर लाई
साअ'त मुराद की है
छब्बीस जनवरी है

*हर सू=चारों तरफ; यौम=दिन; सा’अत=क्षण

आँखों में रंग-ए-नौ है
बातिल से जंग-ए-नौ है
साज़ और चंग-ए-नौ है
हर दर पे संग-ए-नौ है
पुर-कैफ़ ज़िंदगी है
छब्बीस जनवरी है

*रंग-ए-नौ=नया रंग; बातिल=बुराई; पुर-कैफ़=उन्माद से भरपूर

मैं गुनगुना रहा हूँ
मस्ती में गा रहा हूँ
ख़ुशियाँ मना रहा हूँ
आलम पे छा रहा हूँ
दिल महव-ए-बे-ख़ुदी है
छब्बीस जनवरी है

*महव-ए-बे-ख़ुदी=ख़ुद को भूला हुआ

हिन्दोस्तान ख़ुश है
हर पासबान ख़ुश है
हर नौ-जवान ख़ुश है
सारा जहान ख़ुश है
एक जोश-ए-सरमदी है
छब्बीस जनवरी है

*पासबान=रक्षक; जोश-ए-सरमदी=उल्लास

~ कँवल डिबाइवी

 Jan 26, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, January 25, 2020

जो चाँद पर गया है.. आदमी

Image may contain: one or more people, beard and outdoor

जो चाँद पर गया है सो है वो भी आदमी
जो गप उड़ा रहा है सो है वो भी आदमी
जो हँस हँसा रहा है सो है वो भी आदमी
जो जी जला रहा है सो है वो भी आदमी
हैं आदमी के सारे ज़माने में रंग-रूप
हैं आदमी ही चाँदनी और आदमी ही धूप

है आदमी हज़ारों का और एक पाई का
आधा है अपनी माँ का तो आधा है दाई का
पेशा भी आदमी ने सँभाला गदाई का
दावा भी आदमी ने किया है ख़ुदाई का
गोरा भी आदमी है तो काला भी आदमी
बुज़दिल भी आदमी है जियाला भी आदमी

*गदाई=भीख माँगने का काम; जियाला=बहादुर

जब आदमी के दिल को चुराता है आदमी
सीने से अपने उस को लगाता है आदमी
और इस तरह से उम्र बढ़ाता है आदमी
मुश्किल से इस जहान से जाता है आदमी
जाता कहाँ है ख़ुद वो पकड़वाया जाता है
यानी फ़रिश्ता भेज के बुलवाया जाता है

डाला है आदमी ने हर इक आदमी पे जाल
'है आदमी बजाए ख़ुद इक महशर-ए-ख़याल'
निकला तमाम उम्र की कोशिश का ये मआल
आया था रोता पीटता जाता है ख़स्ता-हाल
इस पर ये हाल है कि अकड़ता है आदमी
ग़ैरों से और अपनों से लड़ता है आदमी

*मशहर-क़यामत; मआल=नतीज़ा

ये आदमी लड़ाई को वियतनाम में गया
वो कोरिया गया कभी आसाम में गया
वो तिल-अबीब ओ क़ाहिरा ओ शाम में गया
ये आदमी ही मुत्तहिद-अक़्वाम में गया
फिर आदमी को अम्न सिखाता है आदमी
भैंसों के आगे बीन बजाता है आदमी

*मुत्तहिद-अक़्वाम=युनाइटेड नेशन्स

इबलीस को फ़रेब सिखाता रहा है वो
और शोबदे हज़ार दिखाता रहा है वो
आलम को उँगलियों पे नचाता रहा है वो
हम को जज़ा सज़ा से डराता रहा है वो
दोज़ख़ से वाज़ कह के बचाता है आदमी
पर ख़ुद कभी कभी वहीं जाता है आदमी

*इबलीस=शैतान; शोबदे=तरक़ीबें; जज़ा=बदला; वाज़=सलाह

है आदमी जो करता है सब सीना-ज़ोरियाँ
करता है लूटने के लिए नफ़अ-ख़ोरियाँ
भरता है इस बहाने से अपनी तिजोरियां
दुश्मन को बेच खाता है गंदुम की बोरियाँ
चीज़ों की क़ीमतों को बढ़ाता है आदमी
और गाहकों को ख़ून रुलाता है आदमी

~ सय्यद मोहम्मद जाफ़री


 Jan 25, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, January 24, 2020

बड़ी लम्बी कहानी है



बड़ी लम्बी कहानी है सुनोगे?

सहर की आँख खुलने भी न पाई थी
मिरे तरकश ने लाखों तीर बरसाए शुआओं के
किसी ने आफ़्ताबाना हर इक ज़र्रे को चमकाया
किसी ने माहताबी चादरें हर सम्त फैलाईं
कोई जुगनू की सूरत झिलमिलाया
इन्हीं बिखरे हुए तीरों के ज़ेर-ए-साया
मैं चलता रहा
हर मोड़ पे कोई न कोई वाक़िआ
कोई न कोई हादसा

*शुआओं=किरणों; ज़ेर-ए-साया=साये के नीचे; वाक़िआ=घटना

मेरे उजाले को लिपट कर चाट कर
दीमक-ज़दा करता रहा लेकिन
सफ़र की धुन सलामत
जुम्बिश-ए-पा आगे बढ़ती ही रही
कोह-ए-गिराँ पिसते रहे
सागर की लहरें दम-ब-ख़ुद होती रहीं
मैं बढ़ते बढ़ते सरहद-ए-इमरोज़ तक आ पहुँचा

*जुम्बिश-ए-पा=पैरों की हरकत; कोह-ए-गिराँ=बड़े पर्वत; सरहद-ए-इमरोज़=आज की हद

ये माना दूर है मंज़िल
ये माना आबला-पा हूँ
ग़ुबार-ए-गर्दिश-ए-अय्याम में लिपटा हुआ
लेकिन अभी फैला हुआ है सिलसिला मेरे उजालों का
अभी तरकश में लाखों तीर बाक़ी हैं
अभी मेरी कहानी ख़त्म को पहुँची नहीं है
ये बड़ी लम्बी कहानी है
*आबला-पा=पाँव में छाले; दिन=बहुत दिन

~ अज़ीज़ तमन्नाई


 Jan 24, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, January 19, 2020

तुम्हारे नाम तुम्हारे निशाँ से

Image may contain: 1 person, closeup

तुम्हारे नाम तुम्हारे निशाँ से बे-सरोकार
तुम्हारी याद के मौसम गुज़रते जाते हैं
बस एक मन्ज़र-ए-बे-हिज्र-ओ-विसाल है जिस में
हम अपने आप ही कुछ रंग भरते जाते हैं

*जुदाई और मिलन से परे

न वो नशात-ए-तसव्वुर कि लो तुम आ ही गए
न ज़ख़्म-ए-दिल की है सोज़िश कोई जो सहनी हो
न कोई वा'दा-ओ-पैमाँ की शाम है न सहर
न शौक़ की है कोई दास्ताँ जो कहनी हो

*नशात-ए-तसव्वुर=काल्पिनकता का आनंद; सोज़िश=जलन

नहीं जो महमिल-ए-लैला-ए-आरज़ू सर-ए-राह
तो अब फ़ज़ा में फ़ज़ा के सिवा कुछ और नहीं
नहीं जो मौज-ए-सबा में कोई शमीम-ए-पयाम
तो अब सबा में सबा के सिवा कुछ और नहीं

*महमिल-ए-लैला-ए-आरज़ू=ऊँट पर बैठी हुई लैला; सर-ए-राह=रास्ते पर

उतार दे जो किनारे पे हम को कश्ती-ए-वहम
तो गिर्द-ओ-पेश को गिर्दाब ही समझते हैं
तुम्हारे रंग महकते हैं ख़्वाब में जब भी
तो ख़्वाब में भी उन्हें ख़्वाब ही समझते हैं

न कोई ज़ख़्म न मरहम कि ज़िंदगी अपनी
गुज़र रही है हर एहसास को गँवाने में
मगर ये ज़ख़्म ये मरहम भी कम नहीं शायद
कि हम हैं एक ज़मीं पर और इक ज़माने में

~ जौन एलिया


 Jan 19, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, January 18, 2020

नारी एक कला है

Image may contain: one or more people and closeup


कुशल तूलिका वाले कवि की नारी एक कला है।

फूलों से भी अधिक सुकोमल
नरम अधिक नवनी से,
प्रतिपल पिछल-पिछल उठने वाली
अति इन्दु मनी से,
नवल शक्ति भरने वाली वह कभी नहीं अबला है।

तनया-प्रिया-जननि के
अवगुण्ठन में रहने वाली,
सत्यं शिवम् सुन्दरम् सी
जीवन में बहने वाली,
विरह मिलन की धूप-छाँह में पलती शकुन्तला है।

है आधार-शिला सुन्दरता की
मधु प्रकृति-परी सी,
शुभ संसृति का बीज लिये,
मनु की उस तरुण-तरी सी,
तिमिरावृत्त जीवन के श्यामल पट पर चंद्र्कला है।

करुणा की प्रतिमा वियोग की
मूर्ति-मधुर-अलबेली
निज में ही परिपूर्ण प्रेममय
जग आधार अकेली,
सारी संसृति टिकी हुई ऐसी सुन्दर अचला है।

अमृत-सिन्धु ,अमृतमयी
जग की कल्याणी वाणी।
अब भी चम-चम चमक रही हैं
तेरी चरण निशानी,
तेरे ही प्रकाश से जगमग दीप जला है।

नारी एक कला है॥

~ केदारनाथ पाण्डेय

 Jan 18, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, January 17, 2020

हम उन को छीन कर लाए हैं

Image may contain: 1 person, closeup


हम उन को छीन कर लाए हैं कितने दावेदारों से
शफ़क़ से चाँदनी-रातों से फूलों से सितारों से
शफ़क़= सवेरे या शाम की लालिमा

हमारे ज़ख़्म-ए-दिल दाग़-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं
गुलों से गुल-रुख़ों से महवशों से माह-पारों से
*गुल-रुख़ों=बहुत सुंदर; महवशों=चंद्रमुखी; माह-पारों=चाँद सी सूरत

ज़माने में कभी भी क़िस्मतें बदला नहीं करतीं
उमीदों से भरोसों से दिलासों से सहारों से

सुने कोई तो अब भी रौशनी आवाज़ देती है
गुफाओं से पहाड़ों से बयाबानों से ग़ारों से
*ग़ारों=गुफ़ाओं

बराबर एक प्यासी रूह की आवाज़ आती है
कुओं से पन-घटों से नद्दियों से आबशारों से
*आबशारों=झरनों

कभी पत्थर के दिल ऐ 'कैफ़' पिघले हैं न पिघलेंगे
मुनाजातों से फ़रियादों से चीख़ों से पुकारों से
*मुनाजातों=प्रार्थना

~ कैफ़ भोपाली

 Jan 17, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, January 12, 2020

एक रक़्क़ासा थी



एक रक़्क़ासा थी किस किस से इशारे करती
आँखें पथराई अदाओं में तवाज़ुन न रहा
डगमगाई तो सब अतराफ़ से आवाज़ आई
फ़न के इस औज पे इक तेरे सिवा कौन गया

*रक़्क़ासा=नर्तकी; तवाजुन=संतुलन; फ़न=कला; औज=ऊँचाई

फ़र्श-ए-मरमर पे गिरी गिर के उठी उठ के झुकी
ख़ुश्क होंटों पे ज़बाँ फेर के पानी माँगा
ओक उठाई तो तमाशाई सँभल कर बोले
रक़्स का ये भी इक अंदाज़ है अल्लाह अल्लाह

*ओक=अंजुरी; रक़्स=नृत्य

हाथ फैले ही रहे सिल गई होंटों से ज़बाँ
एक रक़्क़ास किसी सम्त से नागाह बढ़ा!
पर्दा सरका तो मअन फ़न के पुजारी गरजे
रक़्स क्यूँ ख़त्म हुआ? वक़्त अभी बाक़ी था

*रक़्क़ास=नर्तकी; नागाह=अचानक; मअन=बहुत तेज़ी से

~ अहमद नदीम क़ासमी


 Jan 12, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, January 11, 2020

हँसती आँखें हँसता चेहरा



हँसती आँखें हँसता चेहरा इक मजबूर बहाना है
चाँद में सच-मुच नूर कहाँ है चाँद तो इक वीराना है

नाज़ परस्तिश बन जाएगा सब्र ज़रा ऐ शोरिश-ए-दिल
उल्फ़त की दीवाना-गरी से हुस्न अभी बेगाना है
*नाज़=गर्व(सुंदरता का); परस्तिश=पूजा’; शोरिश-ए-दिल=बेचैनी

मुझ को तन्हा छोड़ने वाले तू न कहीं तन्हा रह जाए
जिस पर तुझ को नाज़ है उतना उस का नाम ज़माना है

तुम से मुझ को शिकवा क्यूँ हो आख़िर बासी फूलों को
कौन गले का हार बनाए कौन ऐसा दीवाना है

एक नज़र में दुनिया भर से एक नज़र में कुछ भी नहीं
चाहत में अंदाज़ नज़र ही चाहत का पैमाना है

ख़ुद तुम ने आग़ाज़ किया था जिस का एक तबस्सुम से
महरूमी के आँसू बन कर ख़त्म पे वो अफ़्साना है
*महरूमी=नाउम्मीदी

यूँ है उस की बज़्म-ए-तरब में इक दिल ग़म-दीदा जैसे
चारों जानिब रंग-महल हैं बीच में इक वीराना है
*बज़्म-ए-तरब=ख़ुशी की महफ़िल; ग़म-दीदा=शोक संतप्त

‍~ 
अंदलीब शादानी

 Jan 11, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, January 10, 2020

हिंदी के चेहरे पर चाँदी की चमक है

Image may contain: 2 people, people smiling, outdoor


कहने को जनता की कितनी मुँहबोली है
सुख-दुख में शामिल है सबकी हमजोली है
कामकाज में लेकिन रत्‍ती-भर धमक है
हिंदी के चेहरे पर चाँदी की चमक है.

ऊँचे आदर्शों के सपनों में खोई है
किये रतजगे कितनी रात नहीं सोई है
आजादी की खातिर बलिदानी वीरों की
यादों में यह कितनी घुट-घुट कर रोई है.
यों तो यह भोली है, युग की रणभेरी है
लेकिन अंग्रेजी की, भृत्या है, चेरी है
हाथों में संविधान फिर भी है तुच्‍छ मान
आंखों में लेकिन पटरानी-सी ललक है
हिंदी के चेहरे पर चाँदी की चमक है.

कितने ईनाम और कितने प्रोत्‍साहन हैं
फिर भी मुखमंडल पर कोरे आश्‍वासन हैं.
जेबों में सोने के सिक्‍कों की आमद है
फाइल पर हिंदी की सिर्फ हिनहिनाहट है.
बैठक में चर्चा है दो जो भी देना है.
महामहिम के हाथो पुरस्‍कार लेना है.
कितना कुछ निष्‍प्रभ है, समारोह लकदक है
शील्‍ड लिये हाथों में क्‍या शाही लचक है!
हिंदी के चेहरे पर चांदी की चमक है.

इत्रों के फाहे हैं, टाई की चकमक है
हिंदी की देहरी पर हिंग्‍लिश की दस्‍तक है.
ऊँची दूकानों के फीके पकवान हैं
बॉस मगर हिंदी के परम ज्ञानवान हैं.
शाल औ दुशाला है पान औ मसाला है.
उबा रहे भाषण हैं यही कार्यशाला है.
हिंदी की बिंदी की होती चिंदी-चिंदी
गायब होता इसके चेहरे का नमक है.
हिंदी के चेहरे पर चॉंदी की चमक है.

हिंदी के तकनीकी शब्‍द बहुत भारी हैं
शब्‍दकोश भी जैसे बिल्‍कुल सरकारी हैं.
भाषा यह रंजन की और मनोरंजन की
इस भाषा में दिखते कितने व्‍यापारी हैं.
बेशक इस भाषा का ऑंचल मटमैला है
राष्‍ट्रप्रेम का केवल शुद्ध झाग फैला है.
दाग़ धुलें कैसे इस दाग़दार चेहरे के
नकली मुस्कानें हैं, बेमानी ठसक है.
हिंदी के चेहरे पर चांदी की चमक है.

हिंदी की सेवा है, हिंदी अधिकारी हैं
खाते सब मेवा हैं, गाते दरबारी हैं
एक दिवस हिंदी का, एक शाम हिंदी की
बाकी दिन कुर्सी पर अंग्रेजी प्‍यारी है.
कैसा यह स्‍वाभिमान अपना भारत महान !
हिंदी अपने ही घर दीन-हीन,मलिन-म्‍लान

पांवों के नीचे है इसके दलदल ज़मीन
नित प्रति बुझती जाती सत्‍ता की हनक है.
हिंदी के चेहरे पर चॉंदी की चमक है.

~ ओम निश्‍चल

 Jan 10, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Wednesday, January 8, 2020

न जाने रूठ के बैठा है

न जाने रूठ के बैठा है दिल का चैन कहाँ
मिले तो उस को हमारा कोई सलाम कहे
~ कलीम आजिज़

 Jan 08, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, January 4, 2020

इस नाज़ इस अंदाज़ से तुम


इस नाज़ इस अंदाज़ से तुम हाए चलो हो
रोज़ एक ग़ज़ल हम से कहलवाए चलो हो

रखना है कहीं पाँव तो रक्खो हो कहीं पाँव
चलना ज़रा आया है तो इतराए चलो हो

दीवाना-ए-गुल क़ैदी-ए-ज़ंजीर हैं और तुम
क्या ठाट से गुलशन की हवा खाए चलो हो

मय में कोई ख़ामी है न साग़र में कोई खोट
पीना नहीं आए है तो छलकाए चलो हो

हम कुछ नहीं कहते हैं कोई कुछ नहीं कहता
तुम क्या हो तुम्हीं सब से कहलवाए चलो हो

ज़ुल्फ़ों की तो फ़ितरत ही है लेकिन मिरे प्यारे
ज़ुल्फ़ों से ज़ियादा तुम्हीं बल खाए चलो हो

वो शोख़ सितमगर तो सितम ढाए चले है
तुम हो कि 'कलीम' अपनी ग़ज़ल गाए चलो हो

~ कलीम आजिज़


 Jan 04, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Wednesday, January 1, 2020

नया साल

Image may contain: 6 people, people smiling, crowd

2020 - नये साल की मुबारक बाद - नूतन वर्षाभिनंदन

दुआएँ और दुआओं से भरी
बे-अंत तहरीरें*
मुझे हर साल के इन आख़िरी
लम्हों में मिलती हैं

मेरे अहबाब* के नामों में
अक्सर दर्ज होता है
ख़ुदा महफ़ूज़* रक्खे
साल भर मुझ को बलाओं से
मुझे अब ज़हर में लिपटी हवाएँ
छू के न गुज़रें
मुझे मौजूद और आने वाले
साल के लम्हे
मुबारक दर मुबारक हों

यही तहरीर मैं अहबाब को
वापस लुटाता हूँ
यही जज़्बात मेरे दोस्तों
के नाम होते हैं
मगर फिर वक़्त के हाथों

न जाने क्या गुज़रती है
कि जो भी तीर आता है
उसी जानिब से आता है
जहाँ से इत्र में डूबा हुआ
पैग़ाम आया था
जहाँ से साल भर
महफ़ूज़ रहने का
हसीं मलफ़ूफ़
मेरे नाम आया था

*तहरीर=लिखावटें; अहबाब=मित्र-गण; महफ़ूज़=सुरक्षित; मलफ़ूफ़=लिफ़ाफ़े में बंद खत

‍~ इक़बाल नाज़िर


 Jan 01, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, December 29, 2019

मेरे जीवन के पतझड़ में

Image may contain: 1 person, outdoor and closeup

मेरे जीवन के पतझड़ में
ऋतुपति अब आए भी तो क्या?

ऋतुराज स्वयं है पीत-वर्ण
मेरी आहों को छू-छू कर,
मेरे अंतर में चाहों की
है चिता धधकती धू-धू कर,
मेरे अतीत पर वर्तमान
अब यदि पछताए भी तो क्या?

मधुमास न देखा जिस तस्र ने
फिर उसको ग्रीष्म जलाती क्यों ?
मधु-मिलन न जाना हो जिसने
विरहाग्नि उसे झुलसाती क्यों ?
निर्झर ने चाहा बलि होना
सरिता की विगलित ममता पर,
हँस दी तब सरिता की लहरें
निर्झर की उस भावुकता पर,
यदि सरिता को उस निर्झर की
अब याद सताए भी तो क्या?

जिसकी निश्च्छलता पर मेरे
अरमान निछावर होते थे,
जिसकी अलसाई पलकों पर
मेरे सुख सपने सोते थे,
मेरे जीवन के पृष्ठ किसी
निष्ठुर की आँखों से ओझल,
शैशव की कारा में बंदी
मेरे नव-यौवन की हलचल।
अब कोई यदि मेरे पथ पर
दृग-सुमन बिछाए भी तो क्या?

दु:ख झंझानिल में भी मैंने
था अपना पथ निर्माण किया,
पथ के शूलों को भी मैंने
था फूलों सा सम्मान किया,
प्यासों की प्यास बुझाना ही
निर्झर ने जाना जीवन भर,
सागर के खारे पानी में
घुल गया उधर सरिता का उर।
जिसके अपनाने में मैंने
अपनेपन की परवाह न की,
उसने मेरे अपनेपन का
क्रंदन सुनकर भी आह न की।

अब दुनिया मेरे गीतों में
अपनापन पाए भी तो क्या?

~ बलबीर सिंह 'रंग'


 Dec 29, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Wednesday, December 25, 2019

आया है त्यौहार क्रिसमस

Image may contain: one or more people

आया है त्यौहार क्रिसमस
बाँटे सब को प्यार क्रिसमस

मैं लाया हूँ प्यारे तोहफ़े
देखो कितने सारे तोहफ़े
गुड़िया कैसी आली लाया
गुड्डा दाढ़ी वाला लाया
जिस के पास हों पैसे ले लो
जी चाहे तो वैसे ले लो

तोहफ़े पा कर सब बोलेंगे
आए यूँ हर बार क्रिसमस
बाँटे सब को प्यार क्रिसमस

रंगीले ग़ुब्बारे ले लो
गोया चाँद सितारे ले लो
चलती फिरती मोटर ले लो
ढोल बजाता बंदर ले लो
देखो आ कर ख़ूब तमाशा
आओ जाने आओ 'पाशा'
अगले साल मैं फिर आउँगा

जब आएगा यार क्रिसमस
बाँटे सब को प्यार क्रिसमस

~ हैदर बयाबानी

 Dec 25, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, December 22, 2019

हम बंजारे दिल वाले हैं

Image may contain: 1 person, smiling, closeup

हम बंजारे दिल वाले हैं
और पैंठ में डेरे डाले हैं
तुम धोका देने वाली हो?
हम धोका खाने वाले हैं

इस में तो नहीं शर्माओगी?
क्या धोका देने आओगी?
सब माल निकालो, ले आओ
ऐ बस्ती वालो ले आओ
ये तन का झूटा जादू भी
ये मन की झूटी ख़ुश्बू भी
ये ताल बनाते आँसू भी
ये जाल बिछाते गेसू भी
ये लर्ज़िश डोलते सीने की
पर सच नहीं बोलते सीने की
ये होंट भी, हम से क्या चोरी
क्या सच-मुच झूटे हैं गोरी?

*लर्ज़िश=कम्पन

इन रम्ज़ों में इन घातों में
इन वादों में इन बातों में
कुछ खोट हक़ीक़त का तो नहीं?
कुछ मैल सदाक़त का तो नहीं?
ये सारे धोके ले आओ
ये प्यारे धोके ले आओ
क्यूँ रक्खो ख़ुद से दूर हमें
जो दाम कहो मंज़ूर हमें

*रम्ज़ों=रहस्य; सदाकत=यथार्थ

इन काँच के मनकों के बदले
हाँ बोलो गोरी क्या लोगी?
तुम एक जहान की अशरफ़ियाँ?
या दिल और जान की अशरफ़ियाँ?

~ इब्न-ए-इंशा


 Dec 22, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, December 14, 2019

तुझे इज़हार-ए-मोहब्बत से

Image may contain: 1 person, standing


तुझे इज़हार-ए-मोहब्बत से अगर नफ़रत है
तू ने होंटों को लरज़ने से तो रोका होता
बे-नियाज़ी से मगर काँपती आवाज़ के साथ
तू ने घबरा के मिरा नाम न पूछा होता

*इज़हार-ए-मोहब्बत=प्रेम की अभिव्यक्ति; लरज़ना=कंपकपी; बे-नियाज़ी=उपेक्षा

तेरे बस में थी अगर मशअ'ल-ए-जज़्बात की लौ
तेरे रुख़्सार में गुलज़ार न भड़का होता
यूँ तो मुझ से हुईं सिर्फ़ आब-ओ-हवा की बातें
अपने टूटे हुए फ़िक़्रों को तो परखा होता

*मशअ'ल=मसाल; आब-ओ-हवा=मौसम; फ़िक़्रों=तानों

यूँही बे-वज्ह ठिठकने की ज़रूरत क्या थी
दम-ए-रुख़्सत मैं अगर याद न आया होता
तेरा ग़म्माज़ बना ख़ुद तिरा अंदाज़-ए-ख़िराम
दिल न सँभला था तो क़दमों को सँभाला होता

*दम-ए-रुख़्सत=विदाई के क्षण; ग़म्माज़=चुगली करने वाला; अंदाज़-ए-ख़िराम=धीरे धीरे चलने का अंदाज़

अपने बदले मिरी तस्वीर नज़र आ जाती
तू ने उस वक़्त अगर आइना देखा होता
हौसला तुझ को न था मुझ से जुदा होने का
वर्ना काजल तिरी आँखों में न फैला होता

~ अहमद नदीम क़ासमी

 Dec 14, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, December 13, 2019

तग़ाफ़ुल और करम दोनों

Image may contain: 5 people, people smiling, selfie and closeup



तग़ाफ़ुल और करम दोनों बराबर काम करते थे
जिगर के ज़ख़्म भरते थे तो दिल के दाग़ उभरते थे
*तग़ाफ़ुल=उपेक्षा; करम=कृपा

ख़ुदा जाने हमें क्या था कि फिर भी उन पे मरते थे
जो दिन भर में हज़ारों वा'दे करते थे मुकरते थे

न पूछो उन की तस्वीर-ए-ख़याली की सजावट को
उधर दिल रंग देता था इधर हम रंग भरते थे
*तस्वीर-ए-ख़याली=काल्पनिक छवि

मोहब्बत का समुंदर उस की मौजें ऐ मआ'ज़-अल्लाह
दिल इतना डूबता जाता था जितना हम उभरते थे
*मआ'ज़-अल्लाह=ईश्वर रक्षा करे

अजब कुछ ज़िंदगानी हो गई थी हिज्र में अपनी
न हँसते थे न रोते थे न जीते थे न मरते थे
*हिज्र=वियोग

शहीदान-ए-वफ़ा की मंज़िलें तो ये अरे तो ये
वो राहें बंद हो जातीं थीं जिन पर से गुज़रते थे
*शहीदान-ए-वफ़ा=शहीदों की वफ़ा

न पूछो उस की बज़्म-ए-नाज़ की कैफ़िय्यतें 'मंज़र'
हज़ारों बार जीते थे हज़ारों बार मरते थे
*बज़्म-ए-नाज़=शोख़ लोगों की महफ़िल; कैफ़िय्यत=अवस्था

~ मंज़र लखनवी

 Dec 13, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

चलने का हौसला नहीं

चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया
इश्क़ के इस सफ़र ने तो मुझ को निढाल कर दिया।

~ परवीन शाकिर


 Dec 11, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, December 1, 2019

अंजाम-ए-मोहब्बत से बेगाना

Image may contain: 1 person, outdoor

अंजाम-ए-मोहब्बत से मैं बेगाना नहीं हूँ
दीवाना बना फिरता हूँ दीवाना नहीं हूँ

दम भर में जो हो ख़त्म वो अफ़्साना नहीं हूँ
इंसान हूँ इंसान मैं परवाना नहीं हूँ

साक़ी तिरी आँखों को सलामत रक्खे अल्लाह
अब तक तो मैं शर्मिंदा-ए-पैमाना नहीं हूँ

हो बार न ख़ातिर पे तो नासेह कहूँ इक बात
समझा लें जिसे आप वो दीवाना नहीं हूँ

बर्बादियों का ग़म नहीं ग़म है तो ये ग़म है
मिट कर भी मैं ख़ाक-ए-दर-ए-जानाना नहीं हूँ

*ख़ाक-ए-दर-ए-जानाना=प्रेमिका के घर की धूल

तौबा तिरे दामन पे जुनूँ-ख़ेज़ निगाहें
हूँ तो मगर अब इतना भी दीवाना नहीं हूँ

*जुनूँ-ख़ेज़=उन्माद से भरी

सब कुछ मिरे साक़ी ने दिया है मुझे 'मंज़र'
मोहताज-ए-मय-ओ-शीशा-ओ-पैमाना नहीं हूँ

~ मंज़र लखनवी


 Dec 1, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, November 30, 2019

मैं ज़िंदगी के अज़ाब लिक्खूँ

Image may contain: one or more people and people standing


मिरे ख़ुदाया
मैं ज़िंदगी के अज़ाब लिक्खूँ कि ख़्वाब लिक्खूँ
ये मेरा चेहरा ये मेरी आँखें
बुझे हुए से चराग़ जैसे
जो फिर से चलने के मुंतज़िर हों
*अज़ाब=तकलीफ़; मुंतज़िर=प्रतीक्षा करने वाला

वो चाँद-चेहरा सितारा-आँखें
वो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ें
जिन्हों ने पैमाँ किए थे मुझ से
रफ़ाक़तों के मोहब्बतों के
कहा था मुझ से कि ऐ मुसाफ़िर रह-ए-वफ़ा के
जहाँ भी जाएगा हम भी आएँगे साथ तेरे
बनेंगे रातों में चाँदनी हम तो दिन में साए बिखेर देंगे
*पैमाँ=वादे; रफ़ाक़त=मित्रता; रह-ए-वफ़ा=वफ़ा की राह पर

वो चाँद-चेहरा सितारा-आँखें
वो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ें
वो अपने पैमाँ रफ़ाक़तों के मोहब्बतों के
शिकस्त कर के
न जाने अब किस की रहगुज़र का मनारा-ए-रौशनी हुए हैं
मगर मुसाफ़िर को क्या ख़बर है
वो चाँद-चेहरा तो बुझ गया है
सितारा-आँखें तो सो गई हैं
वो ज़ुल्फ़ें बे-साया हो गई हैं
वो रौशनी और वो साए मिरी अता थे
सो मेरी राहों में आज भी हैं
कि मैं मुसाफ़िर रह-ए-वफ़ा का
*शिकस्त=हार कर; मनारा=मीनार; अता=उपहार

वो चाँद-चेहरा सितारा-आँखें
वो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ें
हज़ारों चेहरों हज़ारों आँखों
हज़ारों ज़ुल्फ़ों का एक सैलाब-ए-तुंद ले कर
मिरे तआक़ुब में आ रहे हैं
*सैलाब-ए-तुंद=ज़ोर से आती हुई बाढ़; तआक़ुब=पीछे

हर एक चेहरा है चाँद-चेहरा
हैं सारी आँखें सितारा-आँखें
तमाम हैं
मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ें
मैं किस को चाहूँ मैं किस को चूमूँ
मैं किस के साए में बैठ जाऊँ
बचूँ कि तूफ़ाँ में डूब जाऊँ
न मेरा चेहरा न मेरी आँखें
मिरे ख़ुदाया
मैं ज़िंदगी के अज़ाब लिक्खूँ कि ख़्वाब लिक्खूँ

~ उबैदुल्लाह अलीम

 Nov 30, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh