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Sunday, July 16, 2017

ये जो तीतर और चकोर है

ये जो तीतर और चकोर है
वही पकड़ें उन को जो चोर है,
मैं चकोर-अकोर का क्या करूँ
मिरी फ़ाख़्ता कोई और है

~ दिलावर फ़िगार

  Jun 17, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

कभी ख़ुदा कभी ख़ुद से सवाल

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कभी ख़ुदा कभी ख़ुद से सवाल करते हुए
मैं जी रहा हूँ मुसलसल मलाल करते हुए
*मुसलसल=लगातार; मलाल=अफसोस

मगन था कार-ए-मोहब्बत में इस तरह कि मुझे
ख़बर न हो सकी अपना ये हाल करते हुए
*कार-ए-मोहब्बत=प्रेम के काम में

किसे बताऊँ गुज़ारा है मैं ने भी इक दौर
मिसाल होते हुए और मिसाल करते हुए
*मिसाल=उदाहरण

वो जज़्ब-ओ-शौक़ ही आख़िर अज़ाब-ए-जाँ ठहरा
हराम हो गया जीना हलाल करते हुए
*जज़्ब=भावना; अज़ाब-ए-जाँ=तक़लीफ

न कोई रंज उन आँखों में था दम-ए-रुख़्सत
न थी ज़बान में लुक्नत सवाल करते हुए
*दम-ए-रुख़्सत=जुदाइ के वक़्त; लुक्नत=(ज़बान की) लड़खड़ाहट

ये काम उस के लिए जैसे मसअला ही न था
वो पुर-सुकून था कार-ए-मुहाल करते हुए
*मसअला=मामला; पुर-सुकून=शांत; कार-ए-मुहाल=मुश्किल काम

तमाम उम्र जो लौ दें मुझे रखें आबाद
गया वो ऐसे ग़मों से निहाल करते हुए

~ मुबीन मिर्ज़ा


  Jun 17, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

होगा भी क्या बात अब तो ख़त्म करिए

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होगा भी क्या बात अब तो ख़त्म करिए
बढ़ गई तो ख़बर होगी, अपनी इज़्ज़त को तो डरिए
जो हुआ उसका हमें भी खेद है।
क्या करें आकाश में ही छेद है।।

जानते हैं हुआ क्या था?
इंद्र ने फिर आ के धोखे से अहिल्या को छुआ था
किन्तु अबकी दोष गौतम ने अहिल्या को न देकर
इंद्र के मत्थे मढ़ा था।
हाय तौबा बस इसी पर
रुष्ट सारे भद्र जन हैं स्वर्ग में चर्चा भयंकर
व्यवस्था का प्रश्न अबला की चुनौती
पड़ गया ख़तरे में शायद वेद है।।

सत्य होता है सनातन
जिल्द बदली है क़िताबों की नहीं बदला है दर्शन
किंग होते थे कभी राजन कभी जिल्लेसुभानी
सांसद अब हैं महाजन।
वही कुर्सी वही चंदन
मूल्य सारे दो तरह के वही चीख़ें वही शोषण।
आँख सबकी एक होती है मगर
आँसुओं और आँसुओं में भेद है।

~ देवेन्द्र आर्य

  Jun 16, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

सन्ध्या के बस दो बोल

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सन्ध्या के बस दो बोल सुहाने लगते हैं
सूरज की सौ-सौ बात नहीं भाती मुझको

बोल-बोल में बोल उठी मन की चिड़िया
नभ के ऊँचे पर उड़ जाना है भला-भला!
पंखों की सर-सर कि पवन की सन-सन पर
चढ़ता हो या सूरज होवे ढला-ढला !

यह उड़ान, इस बैरिन की मनमानी पर
मैं निहाल, गति स्र्द्ध नहीं भाती मुझको।।
सन्ध्या के बस दो बोल सुहाने लगते हैं
सूरज की सौ-सौ बात नहीं भाती मुझको।।

सूरज का संदेश उषा से सुन-सुनकर
गुन-गुनकर, घोंसले सजीव हुए सत्वर
छोटे-मोटे, सब पंख प्रयाण-प्रवीण हुए
अपने बूते आ गये गगन में उतर-उतर

ये कलरव कोमल कण्ठ सुहाने लगते हैं
वेदों की झंझावात नहीं भाती मुझको।।
सन्ध्या के बस दो बोल सुहाने लगते हैं।।
सूरज की सौ-सौ बात नहीं भाती मुझको।।

जीवन के अरमानों के काफिले कहीं, ज्यों
आँखों के आँगन से जी घर पहुँच गये
बरसों से दबे पुराने, उठ जी उठे उधर
सब लगने लगे कि हैं सब ये बस नये-नये।

जूएँ की हारों से ये मीठे लगते हैं
प्राणों की सौ सौगा़त नहीं भाती मुझको।।
सन्ध्या के बस दो बोल सुहाने लगते हैं।।
सूरज की सौ-सौ बात नहीं भाती मुझको।।

ऊषा-सन्ध्या दोनों में लाली होती है
बकवासनि प्रिय किसकी घरवाली होती है
तारे ओढ़े जब रात सुहानी आती है
योगी की निस्पृह अटल कहानी आती है।

नीड़ों को लौटे ही भाते हैं मुझे बहुत
नीड़ो की दुश्मन घात नहीं भाती मुझको।।
सन्ध्या के बस दो बोल सुहाने लगते हैं
सूरज की सौ-सौ बात नहीं भाती मुझको।।

‍~ माखनलाल चतुर्वेदी


  Jun 15, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

पहले वह रंग थी

पहले वह रंग थी
फिर रूप बनी
रूप से जिस्म में तब्दील हुई
और फिर...
जिस्म से बिस्तर बन के
घर के कोने में लगी रहती है
जिसको कमरे में घुटा सन्नाटा
वक़्त बेवक़्त उठा लेता है
खोल लेता है बिछा लेता है।

~ निदा फ़ाज़ली


  Jun 14, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

उलझा है पाँव यार का

उलझा है पाँव यार का
ज़ुल्फ़-ए-दराज़ में,
लो आप अपने दाम में
सय्याद आ गया।

*ज़ुल्फ़-ए-दराज़=लम्बी ज़ुल्फें; दाम=जाल; सय्याद=शिकारी

~ मोमिन ख़ाँ मोमिन

  Jun 14, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

जियो उस प्यार में



जियो उस प्यार में
जो मैं ने तुम्हें दिया है,
उस दु:ख में नहीं, जिसे
बेझिझक मैं ने पिया है।

उस गान में जियो
जो मैं ने तुम्हें सुनाया है,
उस आह में नहीं, जिसे
मैं ने तुम से छिपाया है।
उस द्वार से गुजरो
जो मैं ने तुम्हारे लिए खोला है,
उस अन्धकार से नहीं
जिस की गहराई को
बार-बार मैं ने तुम्हारी रक्षा की
भावना से टटोला है।
वह छादन तुम्हारा घर हो

जिस मैं असीसों से बुनता हूँ, बुनूँगा
वे काँटे-गोखरू तो मेरे हैं
जिन्हें मैं राह से चुनता हूँ, चुनूँगा।
वह पथ तुम्हारा हो
जिसे मैं तुम्हारे हित बनाता हूँ, बनाता रहूँगा
मैं जो रोड़ा हूँ उसे हथौड़े से तोड़-तोड़
मैं जो कारीगर हूँ, करीने से
सँवारता-सजाता हूँ, सजाता रहूँगा।

सागर के किनारे तक
तुम्हें पहुँचाने का
उदार उद्यम ही मेरा हो
फिर वहाँ जो लहर हो, तारा हो,
सोन-तरी हो, अरुण सवेरा हो,
वह सब, ओ मेरे वर्ग
तुम्हारा हो, तुम्हारा हो, तुम्हारा हो।

~ अज्ञेय


  Jun 14, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

ये अलग बात कि चलते रहे





































ये अलग बात कि चलते रहे सब से आगे
वर्ना देखा ही नहीं तेरी तलब से आगे

ये मोहब्बत है इसे देख तमाशा न बना
मुझ से मिलना है तो मिल हद्द-ए-अदब से आगे
*श्रद्धा की सीमा

ये अजब शहर है क्या क़हर है ऐ दिल मेरे
सोचता कोई नहीं ख़्वाब-ए-तरब से आगे
*क़हर=; ख़्वाब-ए-तरब=संतुष्टि का सपना

अब नए दर्द पस-ए-अश्क-ए-रवाँ जागते हैं
हम कि रोते थे किसी और सबब से आगे
*पस-ए-अश्क-ए-रवाँ=बहते हुए आँसुओँ के बाद

'शाज़' यूँ है कि कोई पल भी फ़ुसूँ-कार नहीं
ध्यान आते थे मिरे दिल में अजब से आगे
*फ़ुसूँ-कार=जादुई

~ ज़करिय़ा शाज़


  Jun 13, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

कुछ अजब आन से लोगों में

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कुछ अजब आन से लोगों में रहा करते थे
हम ख़फ़ा हो के भी आपस में मिला करते थे

इतनी तहज़ीब-ए-रह-ओ-रस्म तो बाक़ी थी कि वो
लाख रंजिश सही वादा तो वफ़ा करते थे
*तहज़ीब-ए-रह-ओ-रस्म=सभ्यता और रिवाज़

उस ने पूछा था कई बार मगर क्या कहते
हम मिज़ाजन ही परेशान रहा करते थे
*मिज़ाजन=दिमागी तौर से

ख़त्म था हम पे मोहब्बत का तमाशा गोया
रूह और जिस्म को हर रोज़ जुदा करते थे

एक चुप-चाप लगन सी थी तिरे बारे में
लोग आ आ के सुनाते थे सुना करते थे

तेरी सूरत से ख़ुदा से भी शनासाई थी
कैसे कैसे तिरे मिलने की दुआ करते थे
*शनासाई=जान पहचान

उस को हम-राह लिए आते थे मेरी ख़ातिर
मेरे ग़म-ख़्वार मिरे हक़ में बुरा करते थे
*ग़म-ख़्वार=दिलासा देने वाले

ज़िंदगी हम से तिरे नाज़ उठाए न गए
साँस लेने की फ़क़त रस्म अदा करते थे

हम बरस पड़ते थे 'शाज़' अपनी ही तन्हाई पर
अब्र की तरह किसी दर से उठा करते थे
*अब्र=बादल

~ शाज़ तमकनत

  Jun 13, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Saturday, July 15, 2017

किसी के आने से

किसी के आने से
साक़ी के ऐसे होश उड़े,
शराब सीख़ पे डाली
कबाब शीशे में

~ मीर नाज़िर हुसैन नाज़िम


  Jun 12, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

डूब गया दिन

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डूब गया दिन
जब तक पहुँचे तेरे द्वारे।

एक धुँधलका छाया ओर-पास
धूप गाँव-बाहर की छूट गई,
छप्पर-बैठक सब बिल्कुल उदास
पगडंडी दरवाज़े टूट गई,

भारी था मन
हम थे काफ़ी टूटे-हारे।

सूना आँगन, सूनी तिद्वारी
तुलसी का चौरा सूना-सूना।
ऐसे सूनेपन में हमें हुआ
ख़ुद साँसें लेते में दुख दूना।

चौका-बासन
छतें, छज्जे सब अँधियारे।

धीरे-धीरे आँचल ओट किए
भीतर से दीप लिए तुम आईं।
संग-संग एक मौन ज्योति-पुंज
संग-संग एक मलिन परछाईं।

सिहरा आँगन
सिहरे हम, सिहरे गलियारे।

‍~ ओम प्रभाकर


  Jun 12, 2017| e-kavya.blogspot.com
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ऐसी तो कोई बात नहीं जीवन में

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तुमसे भी छिपा सकूँ जो मै
ऐसी तो कोई बात नहीं जीवन में |

मन दिया तुम्हें मैंने ही अपने मन से
रंग दिया तुम्हें मैंने अपने जीवन से
बीते सपनो में आए बिना तुम्हारे
ऐसी तो कोई रात नहीं जीवन में ।

जल का राजा सागर कितना लहराया
पर मेरे मन की प्यास बुझा कब पाया
जो बूँद बूँद बन प्यास तुम्हारी पी ले
ऐसी कोई बरसात नहीं जीवन में ।

कलियों के गाँवों में भौंरे गाते है
गाते-गाते वह अक्सर मर जाते हैं
मरने वाले को जो मरने से रोके
ऐसी कोई सौगात नहीं जीवन में।

‍~ रमानाथ अवस्थी


  Jun 11, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

पवन सामने है नहीं गुनगुनाना

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पवन सामने है नहीं गुनगुनाना
सुमन ने कहा पर भ्रमर ने न माना

गगन से धरा पर सुबह छन रही है
किरन डोर खींचे बिना तन रही है
दिए बुझ गए हैं नए जल गए हैं
सपन उठ गए हैं नयन मिल गए हैं
हवा देख कर ही सुनाना तराना
सुमन ने कहा पर भ्रमर ने न माना

जरा साँस ले दूर तट का ठिकाना
तरणि ने कहा पर लहर ने न माना

मुझे रात भर तू बहाती रही है
थकी और मुझको थकाती रही है
वहाँ सामने बस यही शब्द तेरे
वही झूठ वो भी सवेरे-सवेरे
मुझे पार जाना नहीं डूब जाना
तरणि ने कहा पर लहर ने न माना

ठहर कर मुझे मंज़िलों तक चलाना
पथिक ने कहा पर डगर ने न माना
अभी है सुबह और आरम्भ मेरा
भरोसा न है यह चरण दम्भ मेरा
गगन धूप छाँही धरा धूप छाँही
कली देख सकती न तू किन्तु राही
मुझे फूल देकर तुझे है सजाना
पथिक ने कहा पर डगर ने न माना

अधूरे प्रणय का कथानक न माना
हृदय ने कहा पर अधर ने न माना
डगर पार जाए वही तो पथिक है
अगर हार जाए कहाँ वो श्रमिक है
नहीं छोड़ता कवि कभी गीत आधा
अधूरी समर्पित हुई थी न राधा
समझ सोच गाना बुरा है जमाना
हृदय ने कहा पर अधर ने न माना

~ वीरेंद्र मिश्र

  Jun 10, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

सुख के साथी मिले हजारों ही

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सुख के साथी मिले हजारों ही, लेकिन
दुःख में साथ निभानेवाला नहीं मिला ।

जब तक रही बाहर उमर की बगिया में,
जो भी आया द्वार चांद लेकर आया,
पर जिस दिन झर गई गुलाबों की पंखुरी,
मेरा आंसू मुझ तक आते शरमाया,
जिसने चाहा, मेरे फूलों को चाहा,
नहीं किसी ने लेकिन शूलों को चाहा,
मेला साथ दिखानेवाले मिले बहुत,
सूनापन बहलानेवाला नहीं मिला।
सुख के साथी मिले हजारों ही, लेकिन
दुःख में साथ निभानेवाला नहीं मिला।

कोई रंग-बिरंगे कपड़ों पर रीझा,
मोहा कोई मुखड़े की गोराई से,
लुभा किसी को गई कंठ की कोयलिया,
उलझा कोई केशों की घुंघराई से,
जिसने देखी, बस मेरी डोली देखी,
नहीं किसी ने पर दुल्हन भोली देखी,
तन के तीर तैरनेवाले मिले सभी,
मन के घाट नहानेवाला नहीं मिला।
सुख के साथी मिले हजारों ही, लेकिन
लेकिन दुःख में साथ निभानेवाला नहीं मिला।

मैं जिस दिन सोकर जागा, मैंने देखा,
मेरे चारों ओर ठगों का जमघट है,
एक इधर से एक उधर से लूट रहा,
छिन-छिन रीत रहा मेरा जीवन-घट है,
सबकी आंख लगी थी गठरी पर मेरी,
और मची थी आपस में मेरा-तेरी,
जितने मिले, सभी बस धन के चोर मिले,
लेकिन हृदय चुरानेवाला नहीं मिला।
सुख के साथी मिले हजारों ही, लेकिन
दुःख में साथ निभानेवाला नहीं मिला।

रूठी सुबह डिठौना मेरा छुड़ा गयी,
गयी ले गयी, तरुणायी सब दोपहरी,
हंसी खुशी सूरज चंदा के बांट पड़ी,
मेरे हाथ रही केवल रजनी गहरी,
आकर जो लौटा कुछ लेकर ही लौटा,
छोटा और हो गया यह जीवन छोटा,
चीर घटानेवाले ही सब मिले यहां,
घटता चीर बढ़ानेवाला नहीं मिला
सुख के साथी मिले हजारों ही लेकिन
दुःख में साथ निभानेवाला नहीं मिला।

उस दिन जुगनू एक अंधेरी बस्ती में,
भटक रहा था इधर-उधर भरमाया-सा,
आसपास था अंतहीन बस अंधियारा,
केवल था सिर पर निज लौ का साया-सा,
मैंने पूछाः तेरी नींद कहां खोयी?
वह चुप रहा, मगर उसकी ज्वाला रोयी-
नींद चुरानेवाले ही तो मिले यहां,
कोई गोद सुलानेवाला नहीं मिला।
सुख के साथी मिले हजारों ही, लेकिन
दुःख में साथ निभानेवाला नहीं मिला।

~ गोपालदास नीरज

  Jun 9, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Wednesday, June 28, 2017

कभी जब याद आ जाते



कभी जब याद आ जाते

नयन को घेर लेते घन,
स्वयं में रह न पाता मन
लहर से मूक अधरों पर
व्यथा बनती मधुर सिहरन ।

न दुःख मिलता, न सुख मिलता
न जाने प्रान क्या पाते,
कभी जब याद आ जाते।

तुम्हारा प्यार बन सावन,
बरसता याद के रसकन
कि पाकर मोतियों का धन
उमड़ पड़ते नयन निर्धन ।

विरह की घाटियों में भी
मिलन के मेघ मंडराते,
कभी जब याद आ जाते।

झुका-सा प्रान का अम्बर,
स्वयं ही सिन्धु बन-बनकर
ह्रदय की रिक्तता भरता
उठा शत कल्पना जलधर ।

ह्रदय-सर रिक्त रह जाता
नयन घट किन्तु भर आते,
कभी जब याद आ जाते ।

‍~ नामवर सिंह


  Jun 8, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Wednesday, June 21, 2017

कभी मु़ड़ के फिर इसी राह पर


कभी मु़ड़ के फिर इसी राह पर न तो आए तुम न तो आए हम
कभी फ़ासलों को समेट कर न तो आए तुम न तो आए हम

जो तुम्हें है अपनी अना पसंद तो मुझे भी शर्त का पास है
ये ज़िदों के सिलसिले तोड़ कर न तो आए तुम न तो आए हम

इन्हीं चाहतों में बँधे हुए अभी तुम भी हो अभी हम भी हैं
है कशिश दिलों में बहुत मगर न तो आए तुम न तो आए हम

शब-ए-वस्ल भी शब-ए-हिज्र है शब-ए-हिज्र अब तो है मुस्तक़िल
यही सोचने में हुई सहर न तो आए तुम न तो आए हम

वो झरोके पर्दों में बंद हैं वो तमाम गलियाँ उदास हैं
कभी ख़्वाब में सर-ए-रह-गुज़र न तो आए तुम न तो आए हम

इसी शहर की इसी राह पर थे हमारे घर भी क़रीब तर
यूँही घूमते रहे उम्र भर न तो आए तुम न तो आए हम

कभी इत्तिफ़ाक़ से मिल गए किसी शहर के किसी मोड़ पर
तो ये कह उठेगी नज़र नज़र क्यूँ न आए तुम क्यूँ न आए हम

~ इन्दिरा वर्मा


  Jun 7, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh



जिन के गुनाह मेरी नज़र से निहाँ नहीं

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जिन के गुनाह मेरी नज़र से निहाँ नहीं 
रहते हैं मुझ से दिल में ख़फ़ा किस क़दर वो लोग 
*निहाँ=छिपे हुये

मंज़िल जिन्हें अज़ीज़ न रह-रव जिन्हें अज़ीज़ 
कहलाते हैं हमारे यहाँ राहबर वो लोग
*रह-रव=रास्ता; राहबर=रास्ता दिखाने वाले

अंजाम-ए-कारवाँ था इसी बात से अयाँ
मंज़िल थी जिन की और बने हम-सफ़र वो लोग
*अयाँ=प्रत्यक्ष

अपना समझ सकें न जिन्हें ग़ैर कह सकें
मिलते हैं हर क़दम पे सर-ए-रह-गुज़र वो लोग
*सर-ए-रह-गुज़र=राह में

तेरा कलाम सुन के जो ख़ामोश हैं 'नज़ीर'
उन का गिला न कह कि हैं अहल-ए-नज़र वो लोग
*अहल-ए-नज़र=दूर दृष्टि वाले

‍~ नज़ीर सिद्दीक़ी


  Jun 6, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो

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मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो
मुझे तुम कभी भी भुला ना सकोगे
न जाने मुझे क्यों यकीं हो चला है
मेरी याद को तुम मिटा ना सकोगे

मेरी याद होगी जिधर जाओगे तुम
कभी नग़मा बन के, कभी बन के आंसू
तड़पता मुझे हर तरफ़ पाओगे तुम
शमा जो जलायी मेरी वफ़ा ने
बुझाना भी चाहो बुझा ना सकोगे

कभी नाम बातों में आया जो मेरा
तो बेचैन हो-हो के दिल थाम लोगे
निगाहों में छायेगा ग़म का अँधेरा
किसी ने जो पूछा सबब आंसुओं का
बताना भी चाहो बता ना सकोगे

मेरे दिल की धड़कन बनी है जो शोला
सुलगते हैं अरमाँ, यूँ बन-बन के आँसू
कभी तो तुम्हें भी ये अहसास होगा
मगर हम ना होंगे, तेरी ज़िन्दगी में
बुलाना भी चाहो, बुला ना सकोगे

‍~‍ मसरूर अनवर

  Jun 5, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

यहीं कहीं एक कच्ची सड़क थी

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सुनो ! सुनो !
यहीं कहीं एक कच्ची सड़क थी
जो मेरे गाँव को जाती थी।

नीम की निबोलियाँ उछालती,
आम के टिकोरे झोरती,
महुआ, इमली और जामुन बीनती
जो तेरी इस पक्की सड़क पर घरघराती
मोटरों और ट्रकों को अँगूठा दिखाती थी,
उलझे धूल भरे केश खोले
तेज धार सरपत की कतारों के बीच
घूमती थी, कतराती थी, खिलखिलाती थी।
टीलों पर चढ़ती थी
नदियों में उतरती थी
झाऊ की पट्टियों में खो जाती थी,
खेतों को काटती थी
पुरवे बाँटती थी
हरी–धकी अमराई में सो जाती थी।

सुनो ! सुनो !
यहीं कहीं एक कच्ची सड़क थी
जो मेरे गाँव को जाती थी।

गुदना गुदाए, स्वस्थ मांसल पिंडलियाँ थिरकाती
ढोल, मादल, बाँसुरी पर नाचती थी,
पलक झुका गीले केश फैलाए,
रामायण की कथा बाँचती थी,
ठाकुरद्वारे में कीर्तन करती थी,
आरती–सी दिपती थी
चंदन–सी जुड़ती थी
प्रसाद–सी मिलती थी
चरणामृत–सी व्याकुल होंठों से लगकर
रग–रग में व्याप जाती थी।

सुनो ! सुनो !
यहीं कहीं एक कच्ची सड़क थी
जो मेरे गाँव को जाती थी।
अब वह कहाँ गयी।

किसी ने कहा उसे पक्की सड़क में बदल दो?
उसकी छाती बेलौस कर दो
स्याह कर दो यह नैसर्गिक छटा
विदेशी तारकोल से।
किसी ने कहा कि उसके हृदय पर
चोर बाज़ार का सामान ले जाने वाले
भारी भारी ट्रक चलें,
उसके मस्तिष्क में
चमचमाती मोटरों, स्कूटरों की भाग दौड़ हो
किसने कहा
कि वह पाकेटमार–सी मिले
दुर्घटना–सी याद रहे
तीखे विष–सी
ओठों से लगते ही रग–रग में फैल जाए।

सुनो ! सुनो !
यहीं कहीं एक कच्ची सड़क थी
जो मेरे गाँव को जाती थी।
आह! वह कहाँ गयी।

∼ सर्वेश्वरदयाल सक्सेना


  Jun 4, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

हम उस को भूल बैठे हैं

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हम उस को भूल बैठे हैं अँधेरे हम पे तारी हैं
मगर उस के करम के सिलसिले दुनिया पे जारी हैं
*तारी=छाये हुये

करें ये सैर कारों में कि उड़ लें ये जहाज़ों में 
फ़रिश्ता मौत का कहता है ये मेरी सवारी हैं

न उन के क़ौल ही सच्चे न उन के तोल ही सच्चे
ये कैसे देश के ताजिर हैं कैसे ब्योपारी हैं
*ताज़िर=धंधे वाले

हमारी मुफ़्लिसी आवारगी पे तुम को हैरत क्यूँ
हमारे पास जो कुछ है वो सौग़ातें तुम्हारी हैं
*मुफ़्लिसी=गरीबी

नसब के ख़ून के रिश्ते हों या पीने पिलाने के
कलाई पर बंधे धागे के रिश्ते सब पे भारी हैं
*नसब=नस्ल

ये अपनी बेबसी है या कि अपनी बे-हिसी यारो
है अपना हाथ उन के सामने जो ख़ुद भिकारी हैं
*बे-हिसी=बेपरवाही

हमें भी देख ले दुनिया की रौनक़ देखने वाले
तिरी आँखों में जो आँखें हैं वो आँखें हमारी हैं

अज़ीज़-ए-ना-तवाँ के सामने कोहसार-ए-ग़म हल्का
मगर एहसान के तिनके अज़ल से उन पे भारी हैं
*ना-तवाँ=कमज़ोर; कोहसार=पर्वत; अज़ल=आदिकाल

~ अज़ीज़ अन्सारी

  Jun 3, 2017| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

माटी का पलंग मिला

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माटी का पलंग मिला राख का बिछौना।
जिंदगी मिली कि जैसे कांच का खिलौना।

एक ही दुकान में सजे हैं सब खिलौने।
खोटे–खरे, भले–बुरे, सांवरे सलोने।
कुछ दिन तक दिखे सभी सुंदर चमकीले।
उड़े रंग, तिरे अंग, हो गये घिनौने।
जैसे–जैसे बड़ा हुआ होता गया बौना।
जिंदगी मिली कि जैसे कांच का खिलौना।

मौन को अधर मिले अधरों को वाणी।
प्राणों को पीर मिली पीर की कहानी।
मूठ बांध आये चले ले खुली हथेली।
पांव को डगर मिली वह भी आनी जानी।
मन को मिला है यायावर मृग–छौना।
जिंदगी मिली कि जैसे कांच का खिलौना।

शोर भरी भोर मिली बावरी दुपहरी।
सांझ थी सयानी किंतु गूंगी और बहरी।
एक रात लाई बड़ी दूर का संदेशा।
फैसला सुनाके ख़त्म हो गई कचहरी।
औढ़ने को मिला वही दूधिया उढ़ौना।
जिंदगी मिली कि जैसे कांच का खिलौना।

~ आत्म प्रकाश शुक्ल


  Jun 2, 2017| e-kavya.blogspot.com
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Tuesday, June 20, 2017

किसने आज नदी के तट पर

किसने आज नदी के तट पर यौवन पुष्प बिखेरे हैं
सारा जंगल महक उठा है, संदल-संदल चौतरफा

बौराए मौसम के जुगनू दहक रहे हैं पलकों पर
अमराई में छनक उठी है, पायल पायल चौतरफा

नफ़रत बोने वालो सोचो, कैसी फ़सलें काटोगे
झुलस गए हैं माँ-बहनों के, आँचल आँचल चौतरफा

~ 
मनोज अबोध

  Jun 1, 2017| e-kavya.blogspot.com
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सोने के दिल मिट्टी के घर

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सोने के दिल मिट्टी के घर पीछे छोड़ आए हैं 
वो गलियाँ वो शहर के मंज़र पीछे छोड़ आए हैं 

अपने आईनों को हम ने रोग लगा रक्खा है 
क्या क्या चेहरे हम शीशागर पीछे छोड़ आए हैं 

तुम अपने दरिया का रोना रोने आ जाते हो
हम तो अपने सात समुंदर पीछे छोड़ आए हैं

देखो हम ने अपनी जानों पर क्या ज़ुल्म किया है
फूल सा चेहरा चाँद सा पैकर पीछे छोड़ आए हैं

हम भी क्या पागल थे अपने प्यार की सारी पूँजी
उस की इक इक याद बचा कर पीछे छोड़ आए हैं

मंज़िल से अब दूर निकल आए हैं 'क़ैस' तो ख़ुश हैं
हम-साए के कुत्ते का डर पीछे छोड़ आए हैं

~ सईद क़ैस


  Jun 1, 2017| e-kavya.blogspot.com
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तुम्हें मधुमास की सौगंध है


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तुम्हें मधुमास की सौगंध है,
दो दिन ठहर जाओ!

अभी ही तो लदी ही आम की डाली,
अभी ही तो बही है गंध मतवाली;
अभी ही तो उठी है तान पंचम की,
लगी अलि के अधर से फूल की प्याली;
दिये कर लाल जिसने गाल कलियों के –
तुम्हें उस हास की सौगंध है,
दो दिन ठहर जाओ!

हृदय में हो रही अनजान–सी धड़कन,
रगों में बह रही रंगीन–सी तड़पन;
न जाने किस लिये है खो गई सुधबुध,
न जाने किस नशे में झूमता है मन;
छलकती है उनींदे लोचनों से जो –
तुम्हें उस प्यार की सौगंध है,
दो दिन ठहर जाओ!

ठहर जाओ न उभरा प्यार ठुकराओ,
न मेरे प्राण का उपहार ठुकराओ!
उधर देखो लता तरु से लिपटती है,
न यह बढ़ता हुआ भुजहार ठुकराओ!
तुम्हे है आन धरती और सागर की
तुम्हें आकाश की सौगंध है,
दो दिन ठहर जाओ!

तुम्हें मधुमास की सौगंध है,
दो दिन ठहर जाओ!

∼ रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’


  May 31, 2017| e-kavya.blogspot.com
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भरे जंगल के बीचो बीच,

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भरे जंगल के बीचो बीच,
न कोई आया गया जहां,
चलो हम दोनों चलें वहां।

जहां दिन भर महुआ पर झूल,
रात को चू पड़ते हैं फूल,
बांस के झुरमुट में चुपचाप,
जहां सोये नदियों के कूल।

हरे जंगल के बीचो बीच,
न कोई आया गया जहां,
चलो हम दोनों चलें वहां।

विहंग मृग का ही जहां निवास,
जहां अपने धरती आकाश,
प्रकृति का हो हर कोई दास,
न हो पर इसका कुछ आभास।

खरे जंगल के के बीचो बीच,
न कोई आया गया जहां,
चलो हम दोनों चलें वहां।

∼ पंडित नरेंद्र शर्मा


  May 29, 2017| e-kavya.blogspot.com
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एक चिरैया बोले, हौले आँगन

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एक चिरैया बोले, हौले आँगन डोले,
मन ऐसा अकुलाया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया।

चन्दन धूप लिपा दरवाज़ा, चौक पूरी अँगनाई,
बड़े सवेरे कोयल कुहुकी, गूंज उठी शहनाई,
भोर किरण क्या फूटी, मेरी निंदिया टूटी
मन ऐसा अकुलाया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया।

झर झर पात जहर रहे मन के, एकदम सूना सूना,
कह तो देती मन ही पर, दुःख हो जाता है दूना,
एक नज़र क्या अटकी, जाने कब तक भटकी,
मन ऐसा घबराया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया।

सांझ घिरी बदली पावस की, कुछ उजली कुछ काली,
टप टप बूँद गिरे आँचल में, रात मोतियों वाली,
कैसा घिरा अँधेरा, सब घर आँगन घेरा,
मन ऐसा भटकाया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया।

तन सागर तट बैठा, मन का पंथी विरह गाये,
गूंजे कोई गीत की मुझको, एक लहर छु जाये,
मेरा तन मन पार्स जीवन मधुर बरसे,
मन ऐसा भर आया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया।

यह जाड़ो की धुप हिरनिया, खेतों खेतों डोले,
यह उजलाई हंसी चाँद की, नैनो नैनों डोले,
यह संदेश हरकारा, अब तक रहा कुंवारा,
तुमको नही पठाया, रहा रह ध्यान तुम्हारा आया।

चंदा की बारात सजी है, तारों की दीवाली,
एक बहुरिया नभ से उतरी, सोने रूपए वाली,
कैसा जाड़ो फेरा, मन भी हुआ अनेरा,
पर न कहीं कुछ पाया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया।

फूली है फुलवारी जैसे, महके केसर प्यारी,
यह बयार दक्खिन से आई, ले अँखियाँ मतवारी,
यह फूलो का डोला, उस पर यह अनबोला,
रास न मुझको आया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया।

∼ डॉ. वीरबाला भावसार


  May 28, 2017| e-kavya.blogspot.com
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एक आशा जगाती रही भोर तक,

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एक आशा जगाती रही भोर तक,
चाँदनी मुस्कुराती रही भोर तक।
माधुरी-सी महकती रही यामिनी,
और मन को जलाती रही भोर तक।

आगमन की प्रतीक्षा किए रात भर,
चौंकते ही रहे बात ही बात पर,
भावना की लहर ने बहाया वहीं
डूबते ही रहे घात-प्रतिघात पर,
शब्द उन्मन अधर से निकलते रहे,
वेदनायें सताती रहीं भोर तक।

प्रेम की पूर्णता के हवन के लिए,
अनकहे नेह के दो वचन के लिए,
प्राण करता रहा है जतन पे जतन,
वेग उद्वेग ही के शमन के लिए,
एक तिनके-सा मन कंपकंपाता रहा,
प्रीत उसको बहाती रही भोर तक।

धूप-सी उम्र चढ़ती उतरती रही,
ज़िंदगी में कई रंग भरती रही,
और निष्फल हुई हार कर कामना
एक अंधे डगर से गुज़रती रही
जो हृदय में सुलगती रही आँच-सी
वो तृषा ही जलाती रही भोर तक।

~ अजय पाठक


  May 27, 2017| e-kavya.blogspot.com
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काग़ज़ की नाव क्या हुई

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काग़ज़ की नाव क्या हुई दरिया किधर गया 
बचपन को जो मिला था वो लम्हा किधर गया 

मादूम सब हुईं वो तजस्सुस की बिजलियाँ 
हैरत में डाल दे वो तमाशा किधर गया 
*मादूम=गायब; तजस्सुस=ढूंढ ढांढ

फिर यूँ हुआ कि लोग मशीनों में ढल गए
वो दोस्त लब पे ले के दिलासा किधर गया

क्या दश्त-ए-जाँ की सोख़्ता-हाली कहें इसे
चाहत में चाँद छूने का जज़्बा किधर गया
* दश्त-ए-जाँ=ज़िंदगी का रेगिस्तान; सोख़्ता-हाली=(पानी या जीवन) सोख लेने की हालत

तारीकियाँ हैं साथ मिरे और सफ़र मुदाम
कल तक था हम-क़दम जो फ़रिश्ता किधर गया
*मुदाम=लालसा, हमेशा

जो रहनुमा थे मेरे कहाँ हैं वो नक़्श-ए-पा
मंज़िल पे छोड़ता था जो रस्ता किधर गया
*नक़्श-ए-पा=पाँव के निशान

~ जावेद नदीम


  May 26, 2017| e-kavya.blogspot.com
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दूर होती जा रही है कल्पना

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दूर होती जा रही है कल्पना
पास आती जा रही है ज़िंदगी
चाँद तो आकाश में है तैरता
स्वप्न के मृगजाल में है घेरता
उठ रहा तूफान सागर में यहाँ
डगमगाती जा रही है ज़िंदगी

साथ में लेकर प्रलय की चाँदनी
चीखते हो तुम कला की रागिनी
दे रहा धरना यहाँ संघर्ष है
तिलमिलाती जा रही है ज़िंदगी

स्वप्न से मेरा कभी संबंध था
बात यह बीती कि जब मैं मंद था
आज तो गतिमय‚ मुझे कटुसत्य के
पास लाती जा रही है ज़िंदगी

तुम अँधेरे को उजाला मानते
होलिका को दीपमाला मानते
पर यहाँ नवयुग सवेरा हो रहा
जगमगाती जा रही है ज़िंदगी

आज आशा ही नहीं‚ विश्वास भी
आज धरती ही नहीं‚ आकाश भी
छेड़ते संगीत नव निर्माण का
गुनगुनाती जा रही है ज़िंदगी

भ्रम नहीं यह टूटती जंजीर है
और ही भूगोल की तस्वीर है
रेशमी अन्याय की अर्थी लिये
मुस्कुराती जा रही है ज़िंदगी

चक्रव्यूही पर्वतों के गाँव में
दूर काले बादलों की छाँव में
बीहड़ों में मौत को ललकारती
पथ बनाती जा रही है ज़िंदगी

दूर होती जा रही है कल्पना
पास आती जा रही है ज़िंदगी

∼ वीरेंद्र मिश्र


  May 25, 2017| e-kavya.blogspot.com
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जिधर तुम जा रहीं थीं


जिधर तुम जा रहीं थीं
उस तरफ मुझको न जाना था
बनाया साथ पाने के लिये
झूठा बहाना था
न कुछ सोचा विचारा था
कि क्या कहना–कहाना था
मुझे तो बस अकेले
साथ में चलना–चलाना था!

रुकीं दो पल चले दोनों
सभी कुछ तो सुहाना था
मगर बतिया नहीं पाए
कि चुप्पी का ज़माना था!

बहुत धीमे कहा कुछ था
कि जब मुड़ना–मुड़ाना था
इशारा था कि मुझको
इम्तिहां में बैठ जाना था

मगर मैंने शुरू से ही
करूँगा शोध ठाना था
अभी से नौकरी मुझको
अभी पढ़ना–पढाना था!

न तुम ज्यादा सयानी थीं
न मैं ज्यादा सयाना था
डरे कमज़ोर बच्चे थे
न कुछ होना–हुवाना था!

बड़ी बेकार कोुशश थी
नया पौधा लगाना था
उगा करता रहा यह खुद
अभी यह सच अजाना था!

~ राजनारायण बिसारिया


  May 24, 2017| e-kavya.blogspot.com
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