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Saturday, September 22, 2018

दोस्त मायूस न हो

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दोस्त मायूस न हो
सिलसिले बनते बिगड़ते ही रहे हैं अक्सर
तेरी पलकों पे ये अश्कों के सितारे कैसे
तुझ को ग़म है तिरी महबूब तुझे मिल न सकी
और जो ज़ीस्त तराशी थी तिरे ख़्वाबों ने
जब पड़ी चोट हक़ाएक़ की तो वो टूट गई
*ज़ीस्त=ज़िंदगी; हक़ाएक=हक़ीक़त' का बहुवचन, हक़ीक़ते

तुझ को मालूम है मैं ने भी मोहब्बत की थी
और अंजाम-ए-मोहब्बत भी है मालूम तुझे
तुझ से पहले भी बुझे हैं यहाँ लाखों ही चराग़
तेरी नाकामी नई बात नहीं दोस्त मेरे

किस ने पाई है ग़म-ए-ज़ीस्त की तल्ख़ी से नजात
चार-ओ-नाचार ये ज़हराब सभी पीते हैं
जाँ लुटा देने के फ़र्सूदा फ़सानों पे न जा
कौन मरता है मोहब्बत में सभी जीते हैं
*ग़म-ए-ज़ीस्त=जीन के दुख; नजात-छुटकारा; नाचार=बेबसी; फ़र्सूदा=पुराने

वक़्त हर ज़ख़्म को हर ग़म को मिटा देता है
वक़्त के साथ ये सदमा भी गुज़र जाएगा
और ये बातें जो दोहराई हैं मैं ने इस वक़्त
तू भी इक रोज़ इन्ही बातों को दोहराएगा

दोस्त मायूस न हो!
सिलसिले बनते बिगड़ते ही रहे हैं अक्सर

~ अहमद राही


  Sep 22, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, September 21, 2018

आज की शब तो किसी तौर

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आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी

रात गहरी है मगर चाँद चमकता है अभी
मेरे माथे पे तिरा प्यार दमकता है अभी
मेरी साँसों में तिरा लम्स महकता है अभी
मेरे सीने में तिरा नाम धड़कता है अभी
ज़ीस्त करने को मिरे पास बहुत कुछ है अभी
आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी!
*लम्स=स्पर्श; जीस्त=ज़िंदगी

तेरी आवाज़ का जादू है अभी मेरे लिए
तेरे मल्बूस की ख़ुश्बू है अभी मेरे लिए
तेरी बाँहें तिरा पहलू है अभी मेरे लिए
सब से बढ़ कर मिरी जाँ तू है अभी मेरे लिए
ज़ीस्त करने को मिरे पास बहुत कुछ है अभी
आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी!
आज के ब'अद मगर रंग-ए-वफ़ा क्या होगा
इश्क़ हैराँ है सर-ए-शहर-ए-सबा क्या होगा
मेरे क़ातिल तिरा अंदाज़-ए-जफ़ा क्या होगा!
*मल्बूस=कपड़ों; सर-ए-शहर-ए-सबा=शहर में चलने वाली पुरवैया; अंदाज़-ए-जफ़ा=ज़ुल्म करने का तरीका

आज की शब तो बहुत कुछ है मगर कल के लिए
एक अंदेशा-ए-बेनाम है और कुछ भी नहीं
देखना ये है कि कल तुझ से मुलाक़ात के ब'अद
रंग-ए-उम्मीद खिलेगा कि बिखर जाएगा
वक़्त परवाज़ करेगा कि ठहर जाएगा
जीत हो जाएगी या खेल बिगड़ जाएगा
ख़्वाब का शहर रहेगा कि उजड़ जाएगा
*अंदेशा-ए-बेनाम =व्यग्रता; परवाज़=उड़ान

~ परवीन शाकिर

  Sep 21, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, September 16, 2018

समुंदर चाँदनी में रक़्स करता है

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समुंदर चाँदनी में रक़्स करता है
परिंदे बादलों में छुप के कैसे गुनगुनाते हैं
ज़मीं के भेद जैसे चाँद तारों को बताते हैं
हवा सरगोशियों के जाल बुनती है
तुम्हें फ़ुर्सत मिले तो देखना;

लहरों में इक कश्ती है
और कश्ती में इक तन्हा मुसाफ़िर है
मुसाफ़िर के लबों पर वापसी के गीत
लहरों की सुबुक-गामी में ढलते
दास्ताँ कहते
जज़ीरों में कहीं बहते
पुराने साहिलों पर गूँजते रहते
किसी माँझी के नग़्मों से गले मिल कर पलटते हैं
तुम्हारी याद का सफ़्हा उलटते हैं

अभी कुछ रात बाक़ी है
तुम्हारा और मेरा साथ बाक़ी है
अंधेरों में छुपा इक रौशनी का हाथ बाक़ी है
चले आना
कि हम उस आने वाली सुब्ह को इक साथ देखेंगे

*रक़्स=नृत्य; सरगोशी=कानाफूसी; सुबुक-गामी=तेज़ी से; जज़ीरों=द्वीपों; सफ़्हा=पन्ना

~ सलीम कौसर


  Sep 15, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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गुज़र रहे हैं शब ओ रोज़

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गुज़र रहे हैं शब ओ रोज़ तुम नहीं आतीं
रियाज़-ए-ज़ीस्त है आज़ुरदा-ए-बहार अभी
मिरे ख़याल की दुनिया है सोगवार अभी
जो हसरतें तिरे ग़म की कफ़ील हैं प्यारी 


अभी तलक मिरी तन्हाइयों में बस्ती हैं
तवील रातें अभी तक तवील हैं प्यारी
उदास आँखें तिरी दीद को तरसती हैं
बहार-ए-हुस्न पे पाबंदी-ए-जफ़ा कब तक
ये आज़माइश-ए-सब्र-ए-गुरेज़-पा कब तक 


क़सम तुम्हारी बहुत ग़म उठा चुका हूँ मैं
ग़लत था दावा-ए-सब्र-ओ-शकेब आ जाओ
क़रार-ए-ख़ातिर-ए-बेताब थक गया हूँ मैं

*रियाज़-ए-ज़ीस्त=ज़िंदगी जीने का अभ्यास; आज़ुरदा-ए-बहार=बहार से पीड़ित; सोगवार=उदास; कफ़ील=जमानतदार; तवील=लम्बी

*दीद=दर्शन; ज़फ़ा=ज़ुल्म; गुरेज़-पा=छलावा; सब्र-ओ-शकेब=धीरज व सहन-शक्ति

~ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


  Sep 16, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, September 9, 2018

कब तलक ख़्वाबों से धोका खाओगी


कब तलक ख़्वाबों से धोका खाओगी
कब तलक स्कूल के बच्चों से दिल बहलाओगी
कब तलक मुन्ना से शादी के करोगी तज़्किरे
ख़्वाहिशों की आग में जलती रहोगी कब तलक
छुट्टियों में कब तलक हर साल दिल्ली जाओगी
कब तलक शादी के हर पैग़ाम को ठुकराओगी
चाय में पड़ता रहेगा और कितने दिन नमक
बंद कमरे में पढ़ोगी और कितने दिन ख़ुतूत
ये उदासी कब तलक
*तज़्किरे=चर्चा

कब तलक नज़्में लिखोगी
रोओगी यूँ रात की ख़ामोशियों में कब तलक
बाइबल में कब तलक ढूँडोगी ज़ख़्मों का इलाज
मुस्कुराहट में छुपाओगी कहाँ तक अपने ग़म
कब तलक पूछोगी टेलीफ़ोन पर मेरा मिज़ाज
फ़ैसला कर लो कि किस रस्ते पे चलना है तुम्हें
मेरी बाँहों में सिमटना है हमेशा के लिए
या हमेशा दर्द के शो'लों में जलना है तुम्हें
कब तलक ख़्वाबों से धोके खाओगी
ये उदासी कब तलक

~ कफ़ील आज़र अमरोहवी


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Saturday, September 8, 2018

मुझे ख़्वाब अपना अज़ीज़ था

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मुझे ख़्वाब अपना अज़ीज़ था
सो मैं नींद से न जगा कभी
मुझे नींद अपनी अज़ीज़ है
कि मैं सर-ज़मीन पे ख़्वाब की
कोई फूल ऐसा खिला सकूँ
कि जो मुश्क बन के महक सके
कोई दीप ऐसा जला सकूँ
जो सितारा बन के दमक सके

*मुश्क= इत्र, हिरन की नाभि में छुपी हुई ख़ुशबू

मिरा ख़्वाब अब भी है नींद में
मिरी नींद अब भी है मुंतज़िर
कि मैं वो करिश्मा दिखा सकूँ
कहीं फूल कोई खिला सकूँ
कहीं दीप कोई जला सकूँ

*मुंतज़िर=इंतज़ार में

~ बशर नवाज़


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Friday, September 7, 2018

तेरे घर के द्वार बहुत हैं


तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?
सब द्वारों पर भीड़ मची है,
कैसे भीतर जाऊं मैं?

द्वारपाल भय दिखलाते हैं,
कुछ ही जन जाने पाते हैं,
शेष सभी धक्के खाते हैं,
क्यों कर घुसने पाऊं मैं?

तेरी विभव कल्पना कर के,
उसके वर्णन से मन भर के,
भूल रहे हैं जन बाहर के
कैसे तुझे भुलाऊं मैं?

बीत चुकी है बेला सारी,
किंतु न आयी मेरी बारी,
करूँ कुटी की अब तैयारी,
वहीं बैठ गुन गाऊं मैं।

कुटी खोल भीतर जाता हूँ
तो वैसा ही रह जाता हूँ
तुझको यह कहते पाता हूँ-
‘अतिथि, कहो क्या लाउं मैं?

तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
किसमें हो कर आऊं मैं?

~ मैथिलीशरण गुप्त


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Monday, September 3, 2018

तुम्हारी आँखें शरारती हैं

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तुम्हारी आँखें शरारती हैं

तुम अपने पीछे छुपे हुए हो
बग़ौर देखूँ तुम्हें तो मुझ को
शरारतों पर उभारती हैं
तुम्हारी आँखें शरारती हैं
*बग़ौर=ध्यान से

लहू को शोला-ब-दस्त कर दें
ये पत्थरों को भी मस्त कर दें
हयात की सूखती रुतों में
बहार का बंद-ओ-बस्त कर दें
कभी गुलाबी कभी सुनहरी
समुंदरों से ज़ियादा गहरी
तहों में अपनी उतारती हैं
तुम्हारी आँखें शरारती हैं
*ब-दस्त=हाथ में

हया भी है उन में शोख़ियाँ भी
ये राज़ भी अपनी तर्जुमाँ भी
रियासत-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ की हैं
रेआया भी और हुक्मराँ भी
वो खो गया ये मिली हैं जिस को
ये जीतना चाहती है जिस को
उसी से दर-असल हारती हैं
तुम्हारी आँखें शरारती हैं
* रेआया, हुक्मराँ=प्रजा और राजा

कशिश का वो दायरा बनाएँ
हवास जिस से निकल न पाएँ
मैं अपने अंदर बिखर सा जाऊँ
समेटने भी न मुझ को आएँ
अजब है अंजान-पन भी उन का
मैं उन का और मेरा फ़न भी उन का
ख़मोश रह कर पुकारती हैं
तुम्हारी आँखें शरारती हैं
*हवास=चेतना (होशो-हवास)

~ मुज़फ़्फ़र वारसी


  Sep 2, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, September 1, 2018

दिल इक कुटिया दश्त किनारे

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दुनिया-भर से दूर ये नगरी
नगरी दुनिया-भर से निराली
अंदर अरमानों का मेला
बाहर से देखो तो ख़ाली
हम हैं इस कुटिया के जोगी
हम हैं इस नगरी के वाली
हम ने तज रक्खा है ज़माना
तुम आना तो तन्हा आना
दिल इक कुटिया दश्त किनारे
बस्ती का सा हाल नहीं है

मुखिया पीर प्रोहित प्यादे
इन सब का जंजाल नहीं है
ना बनिए न सेठ न ठाकुर
पैंठ नहीं चौपाल नहीं है
सोना रूपा चौकी मसनद
ये भी माल-मनाल नहीं है
लेकिन ये जोगी दिल वाला
ऐ गोरी कंगाल नहीं है

चाहो जो चाहत का ख़ज़ाना
तुम आना और तन्हा आना
आहू माँगे बन का रमना
भँवरा चाहे फूल की डाली
सूखे खेत की कोंपल माँगे
इक घनघोर बदरिया काली
धूप जले कहीं साया चाहें
अंधी रातें दीप दिवाली

हम क्या माँगें हम क्या चाहें
होंट सिले और झोली ख़ाली
दिल भँवरा न फूल न कोंपल
बगिया ना बगिया का माली
दिल आहू न धूप न साया
दिल की अपनी बात निराली
दिल तो किसी दर्शन का भूका
दिल तो किसी दर्शन का सवाली

नाम लिए बिन पड़ा पुकारे
किसे पुकारे दश्त किनारे
ये तो इक दुनिया को चाहें
इन को किस ने अपना जाना
और तो सब लोगों के ठिकाने
अब भटकें तो आप ही भटकें
छोड़ा दुनिया को भटकाना
गीत कबत और नज़्में ग़ज़लें
ये सब इन का माल पुराना
झूटी बातें सच्ची बातें
बीती बातें क्या दोहराना
अब तो गोरी नए सिरे से
अँधियारों में दीप जलाना
मजबूरी? कैसी मजबूरी
आना हो तो लाख बहाना 


आना इस कुटिया के द्वारे
दिल इक कुटिया दश्त किनारे

~ इब्न-ए-इंशा


  Sep 1, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, August 26, 2018

चाँद तारे याद आते हैं

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सुहानी रात में दिलकश नज़ारे याद आते हैं
नहीं हो तुम मगर वो चाँद तारे याद आते हैं

उसी सूरत से दिन ढलता है सूरज डूब जाता है
उसी सूरत से शबनम में हर इक ज़र्रा नहाता है
तड़प जाता हूँ मैं जब दिल ज़रा तस्कीन पाता है
उसी अंदाज़ से मुझ को सहारे याद आते हैं
नहीं हो तुम मगर वो चाँद तारे याद आते हैं

* तस्कीन=तसल्ली

अकेले मैं तुम्हारी याद से बच कर कहाँ जाऊँ?
लब-ए-ख़ामोश की फ़रियाद से बच कर कहाँ जाऊँ?
तुम्हीं कह दो दिल-ए-नाशाद से बच कर कहाँ जाऊँ?
किनायों को भुलाता हूँ इशारे याद आते हैं
नहीं हो तुम मगर वो चाँद तारे याद आते हैं

* दिल-ए-नाशाद=निराश दिल

निगाहों में अभी तक है उसी दिन रात का मंज़र
तुम्हारे साथ में बीते हुए लम्हात का मंज़र
मचलते, मुस्कुराते, जागते, जज़्बात का मंज़र
तसव्वुर-आफ़रीं वो शाह-पारे याद आते हैं
नहीं हो तुम मगर वो चाँद तारे याद आते हैं

* मंज़र=दृश्य

मिरी नज़रों से ओझल अब मक़ाम-ए-जोहद-ए-हस्ती है
न वो एहसास-ए-इशरत है, न वो अंजुम-परस्ती है
अकेला जान कर मुझ को मिरी तन्हाई डसती है
मुझे बीते हुए लम्हात सारे याद आते हैं
नहीं हो तुम मगर वो चाँद तारे याद आते हैं

*ज़िंदगी के सघर्ष की जगह; एहसास-ए-इशरत=आनंद की अनुभूतु; अंजुम-परस्ती=सितारों को पूजना

तमन्नाओं के मेले अब नहीं लगते कभी दिल में
कशिश बाक़ी रही कोई न राहों में, न मंज़िल में
धुआँ सा अब नज़र आता है मुझ को माह-ए-कामिल में
तुम्हारे साथ जितने दिन गुज़ारे याद आते हैं
नहीं हो तुम मगर वो चाँद तारे याद आते हैं

*माह-ए-कामिल=पूनम का चाँद

गिला इस का नहीं क्यूँ तुम ने मुझ से अपना मुँह मोड़ा
नहीं क़ाबू था अपने दिल पे पैमान-ए-वफ़ा तोड़ा
तुम्हारी याद ने लेकिन न क्यूँ अब तक मुझे छोड़ा
ये क्यूँ पैहम मुझे पैमाँ तुम्हारे याद आते हैं
नहीं हो तुम मगर वो चाँद तारे याद आते हैं

*पैहम=लगातार; पैमाँ=वादे

~ शौकत परदेसी

  Aug 26, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, August 24, 2018

तुम कैसे गुन वाले हो

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हीरे मोती ला'ल जवाहर रोले भर भर थाली
अपना कीसा अपना दामन अपनी झोली ख़ाली
अपना कासा पारा पारा अपना गरेबाँ चाक
चाक गरेबाँ वाले लोगो तुम कैसे गुन वाले हो

*कीसा=जेब; कासा=कटोरा (भीख माँगने का)

काँटों से तलवे ज़ख़्मी हैं रूह थकन से चूर
कूचे कूचे ख़ुश्बू बिखरी अपने घर से दूर
अपना आँगन सूना सूना अपना दिल वीरान
फूलों कलियों के रखवालो तुम कैसे गुन वाले हो

तूफ़ानों से टक्कर ले ली जब थामे पतवार
प्यार के नाते जिस कश्ती के लाखों खेवन-हार
साहिल साहिल शहर बसाए सागर सागर धूम
माँझी अपनी नगरी भोले तुम कैसे गुन वाले हो

आँखों किरनें माथे सुरज और कुटिया अँधियारी
कैसे लिख लुट राजा हो तुम समझें लोग भिखारी
शीशा सच्चा उजला जब तक ऊँचा उस का भाव
अपना मोल न जाना तुम ने कैसे गुन वाले हो

जिन खेतों का रंग निखारे जलती तपती धूप
सावन की फुवारें भी चाहें इन खेतों का रूप
तुम को क्या घाटा दिल वालो
तुम जो सच्चे हो गुन वाले हो

~ अदा जाफ़री


  Aug 24, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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शाएर का जशन-ए-सालगिरह

शाएर का जशन-ए-सालगिरह है शराब ला
मंसब ख़िताब रुत्बा उन्हें क्या नहीं मिला
बस नक़्स है तो इतना कि मम्दूह ने कोई
मिस्रा किसी किताब के शायाँ नहीं लिखा

*मंसब=पदवी, ख़िताब; नक़्स=कमी; मम्दूह=प्रसिद्ध (व्यक्ति); शायाँ=क़ाबिल

~ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  Aug 22, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, August 17, 2018

आदमी सिर्फ आदमी होता है



आदमी न ऊंचा होता है, न नीचा होता है,
न बड़ा होता है, न छोटा होता है।
आदमी सिर्फ आदमी होता है।

पता नहीं, इस सीधे-सपाट सत्य को
दुनिया क्यों नहीं जानती है?
और अगर जानती है,
तो मन से क्यों नहीं मानती
इससे फर्क नहीं पड़ता
कि आदमी कहां खड़ा है?
पथ पर या रथ पर?
तीर पर या प्राचीर पर?

फर्क इससे पड़ता है कि जहां खड़ा है,
या जहां उसे खड़ा होना पड़ा है,
वहां उसका धरातल क्या है?
हिमालय की चोटी पर पहुंच,
एवरेस्ट-विजय की पताका फहरा,
कोई विजेता यदि ईर्ष्या से दग्ध
अपने साथी से विश्वासघात करे,
तो उसका क्या अपराध
इसलिए क्षम्य हो जाएगा कि
वह एवरेस्ट की ऊंचाई पर हुआ था?
नहीं, अपराध अपराध ही रहेगा,
हिमालय की सारी धवलता
उस कालिमा को नहीं ढ़क सकती।
कपड़ों की दुधिया सफेदी जैसे
मन की मलिनता को नहीं छिपा सकती।

किसी संत कवि ने कहा है कि
मनुष्य के ऊपर कोई नहीं होता,
मुझे लगता है कि मनुष्य के ऊपर
उसका मन होता है।
छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता,
टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।
इसीलिए तो भगवान कृष्ण को
शस्त्रों से सज्ज, रथ पर चढ़े,
कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े,
अर्जुन को गीता सुनानी पड़ी थी।
मन हारकर, मैदान नहीं जीते जाते,
न मैदान जीतने से मन ही जीते जाते हैं।

चोटी से गिरने से
अधिक चोट लगती है।
अस्थि जुड़ जाती,
पीड़ा मन में सुलगती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि
चोटी पर चढ़ने की चुनौती ही न माने,
इसका अर्थ यह भी नहीं कि
परिस्थिति पर विजय पाने की न ठानें।
आदमी जहां है, वही खड़ा रहे?
दूसरों की दया के भरोसे पर पड़ा रहे?

जड़ता का नाम जीवन नहीं है,
पलायन पुरोगमन नहीं है।
आदमी को चाहिए कि वह जूझे
परिस्थितियों से लड़े,
एक स्वप्न टूटे तो दूसरा गढ़े।
किंतु कितना भी ऊंचा उठे,
मनुष्यता के स्तर से न गिरे,
अपने धरातल को न छोड़े,
अंतर्यामी से मुंह न मोड़े।
एक पांव धरती पर रखकर ही
वामन भगवान ने आकाश-पाताल को जीता था।

धरती ही धारण करती है,
कोई इस पर भार न बने,
मिथ्या अभियान से न तने।
आदमी की पहचान,
उसके धन या आसन से नहीं होती,
उसके मन से होती है।
मन की फकीरी पर
कुबेर की संपदा भी रोती है।

~ अटल बिहारी वाजपेयी


  Aug 17, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Thursday, August 16, 2018

मौत से ठन गई!

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ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

~ अटल बिहारी वाजपेयी


  Aug 16, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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मुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने

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मुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने
शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो
एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद
अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा हो
*जज़ीरे=द्वीप, आइलैंड

मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा
खो चुका है जो किसी और की रानाई में
शायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल में
और कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई में
*बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा=वादा न पूरा करने वाला; रानाई=सुंदरता

मैं ने माना कि शब ओ रोज़ के हंगामों में
वक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता रफ़्ता
चाहे उम्मीद की शमएँ हों कि यादों के चराग़
मुस्तक़िल बोद बुझा देता है रफ़्ता रफ़्ता
* मुस्तक़िल=सदा के लिये

फिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहे
मुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतीं
ज़ख़्म भर जाएँ मगर दाग़ तो रह जाता है
दूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतीं
*माज़ी=बीता हुआ

ये भी मुमकिन है कि इक दिन वो पशीमाँ हो कर
तेरे पास आए ज़माने से किनारा कर ले
तू कि मासूम भी है ज़ूद-फ़रामोश भी है
उस की पैमाँ-शिकनी को भी गवारा कर ले
*पसीमाँ=शर्मिंदा; ज़ूद-फ़रामोश=जो जल्दी भूल जाता हो; पैमाँ-शिकनी=वादा तोड़ना

और मैं, जिस ने तुझे अपना मसीहा समझा
एक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँ
जिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैं
इसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँ
*अहद-ए-वफ़ा=वादा निभाना

~ अहमद फ़राज़

  Aug 16, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Wednesday, August 15, 2018

प्रथम चरण है नए स्वर्ग का

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प्रथम चरण है नए स्वर्ग का,
नए स्वर्ग का प्रथम चरण है,
नए स्वर्ग का नया चरण है,
नया क़दम है!

जिंदा है वह जिसने अपनी
आज़ादी की क़ीमत जानी,
ज़िंदा, जिसने आज़ादी पर
कर दी सब कुछ की कुर्बानी,
गिने जा रहे थे मुर्दों में
हम कल की काली घड़ियों तक,
आज शुरू कर दी फिर हमने
जीवन की रंगीन कहानी।

इसीलिए तो आज हमारे
देश जाति का नया जनम है,
नया कदम है!
नए स्वर्ग का प्रथम का चरण है,
नए स्वर्ग का नया चरण है,
नया कदम है,
नया जनम है!

हिंदू अपने देवालय में
राम-रमा पर फूल चढ़ाता,
मुस्लिम मस्जिद के आंगन में
बैठ खुदा को शीश झुकाता,
ईसाई भजता ईसा को
गाता सिक्ख गुरू की बानी,
किंतु सभी के मन-मंदिर की
एक देवता भारतमाता!

स्वतंत्रता के इस सतयुग में
यही हमारा नया धरम है,
नया कदम है!
नए स्वर्ग का प्रथम का चरण है,
नए स्वर्ग का नया चरण है,
नया कदम है,
नया धरम है!

अमर शहीदों ने मर-मरकर
सदियों से जो स्वप्न सँवारा,
देश-पिता गाँधी रहते हैं
करते जिसकी ओर इशारा,
नए वर्ष में नए हर्ष से
नई लगन से लगी हुई हो
उसी तरफ़ को आँख हमारी,
उसी तरफ़ को पाँव हमारा।

जो कि हटे तिल भर भी पीछे
देश-भक्ति की उसे कसम है,
नया कदम है!
नए स्वर्ग का प्रथम का चरण है,
नए स्वर्ग का नया चरण है,
नया कदम है!
नया जनम है!
नया धरम है!

~ हरिवंशराय बच्चन


  Aug 15, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, August 12, 2018

मज़दूर

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मैं मज़दूर मुझे देवों की बस्ती से क्या?
अगणित बार धरा पर मैंने स्वर्ग बनाए।

अम्बर पर जितने तारे, उतने वर्षों से
मेरे पुरखों ने धरती का रूप सँवारा,
धरती को सुंदरतम करने की ममता में
बिता चुका है कई पीढियाँ वंश हमारा।
और अभी आगे आने वाली सदियों में
मेरे वंशज धरती का उद्धार करेंगे,
इस प्यासी धरती के हित मैं ही लाया था
हिमगिरि चीर, सुखद गंगा की निर्मल धारा।
मैंने रेगिस्तानों की रेती धो-धो कर
वंध्या धरती पर भी स्वर्णिम पुष्प खिलाए।
मैं मज़दूर मुझे देवों की बस्ती से क्या?

अपने नहीं अभाव मिटा पाया जीवन भर
पर औरों के सभी अभाव मिटा सकता हूँ,
तूफ़ानों भूचालों की भय-प्रद छाया में,
मैं ही एक अकेला, जो गा सकता हूँ।
मेरे 'मैं' की संज्ञा भी इतनी व्यापक है
इसमें मुझ-से अगणित प्राणी आ जाते हैं
मुझको अपने पर अदम्य विश्वास रहा है
मैं खंडहर को फिर महल बना सकता हूँ
जब जब भी मैंने खंडहर आबाद किए हैं
प्रलय-मेघ भूचाल देख मुझको शरमाए।
मैं मज़दूर मुझे देवों की बस्ती से क्या?

ऐसे ही मेरे कितने साथी भूखे रह,
लगे हुए हैं औरों के हित अन्न उगाने,
इतना समय नहीं मुझको जीवन में मिलता
अपनी ख़ातिर सुख के कुछ सामान जुटा लूँ।
पर मेरे हित उनका भी कर्तव्य नहीं क्या?
मेरी बाँहें जिनके भरती रहीं खज़ाने,
अपने घर के अंधकार की मुझे न चिंता
मैंने तो औरों के बुझते दीप जलाए।

मैं मज़दूर मुझे देवों की बस्ती से क्या?
अगणित बार धरा पर मैंने स्वर्ग बनाए।

~ देवराज दिनेश


  Aug 12, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, August 11, 2018

लो तुम जीत गए

 
दीवारें दरवाज़े दरीचे गुम-सुम हैं
बातें करते बोलते कमरे गुम-सुम हैं
हँसती शोर मचाती गलियाँ चुप चुप हैं
रोज़ चहकने वाली चिड़ियाँ चुप चुप हैं

पास पड़ोसी मिलने आना भूल गए
बर्तन आपस में टकराना भूल गए
अलमारी ने आहें भरना छोड़ दिया
संदूक़ों ने शिकवा करना छोड़ दिया

मिट्ठू ''बी-बी रोटी दो'' कहता ही नहीं
सूनी सेज पे दिल बस में रहता ही नहीं
सिंगर की आवाज़ को कान तरसते हैं
घर में जैसे सब गूँगे हैं बस्ते हैं

तुम क्या बिछड़े समय सुहाने बीत गए
लौट आओ मैं हारा लो तुम जीत गए!

~ मोहम्मद अल्वी

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Friday, August 10, 2018

ग्लेनफिडिच

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उसने मेरी कमर पर
हाथ रखा,
और कहा
मैं तुम्हारी रूह से प्यार करता हूँ
चेहरे से नहीं
फिर जैसे बेखयाल होकर
हाथ ऊपर को बढ़ाया
और कहा,
तुमसे
वर्जिनिया वूल्फ की-सी महक आती है
और ये भी कहा
उसे बहुत पसंद हैं
फेमिनिस्ट औरतें!
माया एंजेलो उसे उत्तेजित करती है
और मैं भी।

उसने ब्रेख्त की कविता पढ़ी
कहा विश्व एक कम्यून है
और मेरे कन्धों की गोलाई के साथ
पूरा आवर्त (चारों ओर फेरा) घूम गया

फिर बताया कि
कितनी पीली होती है सरसों
और कितना मादक महुआ!
मजदूर का पसीना!
जमीन की खुशबू!
और क्यों वाजिब है
आदिवासी गुस्सा
गरीब की शिकायत

फिर अलमारी से एक
खूबसूरत ग्लास निकालते हुए कहा
ग्लेनफिडिच एक सिंगल माल्ट ह्विस्की है!

~ ज्योत्स्ना मिश्रा

- लंडन में जन्मी (1882), वर्जीनिया वूल्फ की गिनती विश्व की महान महिला लेखिकाओं में होती है।

- बर्तोल्त ब्रेख्त: (जर्मनी, 19 फरवरी - 14 अगस्त 1956 ) एक साथ, एक ही समय में सघन संवेदना के कवि, बेचैन नाटककार, अग्रिम मोर्चे पर जूझते संस्कृतिकर्मी और सजग राजनीतिक अध्येता

- माया एंजेलो: अमेरिकी (अफ्रीका मूल की) कवयित्री, समाजसेवी, मनोरंजक, और अपनी आत्मकथाओं और कविताओं के लिए प्रसिद्ध लेखिका


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Wednesday, August 8, 2018

तिरे चाहने वाले और भी हैं

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नए कपड़े बदल और बाल बना तिरे चाहने वाले और भी हैं
कोई छोड़ गया ये शहर तो क्या तिरे चाहने वाले और भी हैं

कई पलकें हैं और पेड़ कई महफ़ूज़ है ठंडक जिन की अभी
कहीं दूर न जा मत ख़ाक उड़ा तिरे चाहने वाले और भी हैं

कहती है ये शाम की नर्म हवा फिर महकेगी इस घर की फ़ज़ा
नया कमरा सजा नई शम्अ' जला तिरे चाहने वाले और भी हैं

कई फूलों जैसे लोग भी हैं इन्ही ऐसे-वैसे लोगों में
तू ग़ैरों के मत नाज़ उठा तिरे चाहने वाले और भी हैं

बेचैन है क्यूँ ऐ 'नासिर' तू बेहाल है किस की ख़ातिर तू
पलकें तो उठा चेहरा तो दिखा तिरे चाहने वाले और भी हैं

~ साबिर ज़फ़र


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Tuesday, August 7, 2018

रेत मुट्ठी में कभी ठहरी है

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रेत मुट्ठी में कभी ठहरी है
प्यास से उस को इलाक़ा (संबंध) क्या है
उम्र का कितना बड़ा हिस्सा गँवा बैठा मैं
जानते बूझते किरदार ड्रामे का बना
और इस रोल को सब कहते हैं
होशियारी से निभाया मैं ने

हँसने के जितने मक़ाम आए हँसा
बस मुझे रोने की साअत (क्षण) पे ख़जिल (शर्मिंदा) होना पड़ा
जाने क्यूँ रोने के हर लम्हे को
टाल देता हूँ किसी अगली घड़ी पर
दिल में ख़ौफ़ ओ नफ़रत को सजा लेता हूँ
मुझ को ये दुनिया भली लगती है

भीड़ में अजनबी लगने में मज़ा आता है
आश्ना चेहरों के बदले हुए तेवर मुझ को
हाल से माज़ी (गुज़रे हुए समय) में ले जाते हैं
कुहनियाँ ज़ख़्मी हैं और घुटनों पर
कुछ ख़राशों के निशाँ
सोंधी मिट्टी की महक खींचे लिए जाती है
तितलियाँ फूल हवा चाँदनी कंकर पत्थर
सब मिरे साथ में हैं
साँस बे-ख़ौफ़ी (बिना डरे) से लेता हूँ मैं

~ शहरयार

  Aug 07, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, August 3, 2018

रात ओढ़े हुए आई है फ़क़ीरों का लिबास

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रात ओढ़े हुए आई है फ़क़ीरों का लिबास
चाँद कश्कोल-ए-गदाई की तरह नादिम है
एक इक साँस किसी नाम के साथ आती है
एक इक लम्हा-ए-आज़ाद नफ़स मुजरिम है
*कश्कोल-ए-गदाई=(भिखारी का) कटोरा; नादिम=लज्जित; नफ़स=साँस

कौन ये वक़्त के घूँघट से बुलाता है मुझे
किस के मख़मूर इशारे हैं घटाओं के क़रीब
कौन आया है चढ़ाने को तमन्नाओं के फूल
इन सुलगते हुए लम्हों की चिताओं के क़रीब
*मख़मूर=नशीले

वो तो तूफ़ान थी, सैलाब ने पाला था उसे
उस की मदहोश उमंगों का फ़ुसूँ क्या कहिए
थरथराते हुए सीमाब की तफ़्सीर भी क्या
रक़्स करते हुए शोले का जुनूँ क्या कहिए
*फ़ुसूँ=जादू; सीमाब=पारा; तफ़्सीर=फैलाव; रक़्स=नृत्य

रक़्स अब ख़त्म हुआ मौत की वादी में मगर
किसी पायल की सदा रूह में ताबिंदा है
छुप गया अपने निहाँ-ख़ाने में सूरज लेकिन
दिल में सूरज की इक आवारा किरन ज़िंदा है
*ताबिंदा=रौशन; निहाँ=ख़ाने=छुपने की जगह

कौन जाने कि ये आवारा किरन भी छुप जाए
कौन जाने कि इधर धुँद का बादल न छटे
किस को मालूम कि पायल की सदा भी खो जाए
किस को मालूम कि ये रात भी काटे न कटे

ज़िंदगी नींद में डूबे हुए मंदिर की तरह
अहद-ए-रफ़्ता के हर इक बुत को लिए सूती है
घंटियाँ अब भी मगर बजती हैं सीने के क़रीब
अब भी पिछले को, कई बार सहर होती है
*अहद-ए-रफ़्ता=गुज़रे हुए दिन; सूती=कपास का

~ मुस्तफ़ा ज़ैदी

  Aug 03, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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बारहा उन से न मिलने

बारहा उन से न मिलने
की क़सम खाता हूँ मैं,
और फिर ये बात क़स्दन
भूल भी जाता हूँ मैं

*क़स्दन=जान बूझ कर

~ इक़बाल अज़ीम

  Jul 31, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, July 29, 2018

तुम्हारे गाँव से जो रास्ता निकलता है

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तुम्हारे गाँव से जो रास्ता निकलता है
मैं बार बार उसी रास्ते गुज़रा हूँ

हर एक ज़र्रा यहाँ का मिरी निगाह में है
तुम्हारे गाँव के उस रास्ते का एक इक मोड़
खुदा हुआ है मिरे पाँव की लकीरों में
हर एक मोड़ पे रुकता हुआ मैं गुज़रा हूँ
कभी सुनंद की दुक्काँ पे जा के खाया पान
कभी भरे हुए बाज़ार पर नज़र दौड़ाई
कभी शरीफ़ के होटल पे रुक के पी ली चाय

मुझे शरीफ़ से मतलब न कुछ सुनंद से काम
न उस भरे हुए बाज़ार से मुझे कोई रब्त
वो पूछें हाल मैं उन से कहूँ कि अच्छा हूँ
वो मुझ से बढ़ती हुई क़ीमतों का ज़िक्र करें
मैं उन से शहर की बे-लुत्फ़ियों की बात करूँ
गुज़ारता है बस इस तरह एक दो लम्हे
और इस के बाद सड़क पर क़दम बढ़ाता है
तुम्हारे गाँव से जो रास्ता निकलता है
मैं बार बार उसी रास्ते से गुज़रा हूँ

कभी तो काम के हीले से या कभी यूँही
और इन दिनों तो कोई काम सूझता भी नहीं
वो दौर बीत गया मेरा काम ख़त्म हुआ
रही न काम से निस्बत मुझे तुम्हारे बाद
पर इक लगन जो कभी थी तुम्हारे कूचे से
उसी लगन के सहारे फिर आ गया हूँ यहाँ
अभी शरीफ़ के होटल पे आ के बैठा हूँ
अभी सुनंद की दुक्काँ से पान खाऊँगा
ज़रा सी देर यहाँ रुक के कर ही लूँगा सैर
फिर अपने वक़्त पे रस्ते पे बढ़ ही जाऊँगा

ये देखो बढ़ने ही वाली है जैसे गाँव की शाम
ये जैसे उठने ही वाला है गाँव का बाज़ार
यहाँ से वैसे ही बस मैं भी उठने वाला हूँ
बिसान-ए-शाम बस अब मैं भी बढ़ ही जाऊँगा
न कोई मुझ से ये पूछेगा क्यूँ मैं आया था
न मैं किसी से कहूँगा कहाँ मैं जाता हूँ
और एक उम्र से इस तरह जाने कितनी बार
तुम्हारे गाँव के उस रास्ते से गुज़रा हूँ

और अब न जाने इसी तरह और कितनी बार
तुम्हारे गाँव उस इस रास्ते से गुज़रूँगा

~ हबीब तनवीर

  Jul 29, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, July 27, 2018

कोई आशिक़ किसी महबूबा से!

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याद की राहगुज़र जिस पे इसी सूरत से 
मुद्दतें बीत गई हैं तुम्हें चलते चलते 
ख़त्म हो जाए जो दो चार क़दम और चलो 
मोड़ पड़ता है जहाँ दश्त-ए-फ़रामोशी का 
जिस से आगे न कोई मैं हूँ न कोई तुम हो 
साँस थामे हैं निगाहें कि न जाने किस दम
तुम पलट आओ गुज़र जाओ या मुड़ कर देखो
गरचे वाक़िफ़ हैं निगाहें कि ये सब धोका है
गर कहीं तुम से हम-आग़ोश हुई फिर से नज़र
फूट निकलेगी वहाँ और कोई राहगुज़र
फिर इसी तरह जहाँ होगा मुक़ाबिल पैहम
साया-ए-ज़ुल्फ़ का और जुम्बिश-ए-बाज़ू का सफ़र

*दश्त-ए-फ़रामोशी=सब कुछ भूलजाने वाला वीराना; हम-आग़ोश=आलिंगन; मुक़ाबिल=आमने-सामने ; पैहम=लगातार; जुम्बिश=हिलाना-डुलना

दूसरी बात भी झूटी है कि दिल जानता है
याँ कोई मोड़ कोई दश्त कोई घात नहीं
जिस के पर्दे में मिरा माह-ए-रवाँ डूब सके
तुम से चलती रहे ये राह, यूँही अच्छा है
तुम ने मुड़ कर भी न देखा तो कोई बात नहीं

*दश्त=जंगल; घात=छुप कर प्रहार करने को बैठा हुआ; माह-ए-रवाँ=चल रहा महीना

~ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


  Jul 27, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, July 22, 2018

आख़िरी बार मिलो

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आख़िरी बार मिलो ऐसे कि जलते हुए दिल
राख हो जाएँ कोई और तक़ाज़ा न करें
चाक-ए-वादा न सिले ज़ख़्म-ए-तमन्ना न खिले
साँस हमवार रहे शम्अ की लौ तक न हिले
बातें बस इतनी कि लम्हे उन्हें आ कर गिन जाएँ
आँख उठाए कोई उम्मीद तो आँखें छिन जाएँ

*तकाज़ा=माँग; चाक-ए-वादा=टूटे हुए वादे

इस मुलाक़ात का इस बार कोई वहम नहीं
जिस से इक और मुलाक़ात की सूरत निकले
अब न हैजान ओ जुनूँ का न हिकायात का वक़्त
अब न तजदीद-ए-वफ़ा का न शिकायात का वक़्त
लुट गई शहर-ए-हवादिस में मता-ए-अल्फ़ाज़
अब जो कहना है तो कैसे कोई नौहा कहिए
आज तक तुम से रग-ए-जाँ के कई रिश्ते थे
कल से जो होगा उसे कौन सा रिश्ता कहिए

*हैजान=उत्तेजना; हिकायात=कहानी; तजदीद=फिर से (शुरू करना); हवादिस=हादसों का; मता-ए-अल्फ़ाज़=शब्दों नाम की वस्तु; नौहा=शोक

फिर न दहकेंगे कभी आरिज़-ओ-रुख़्सार मिलो
मातमी हैं दम-ए-रुख़्सत दर-ओ-दीवार मिलो
फिर न हम होंगे न इक़रार न इंकार मिलो
आख़िरी बार मिलो

*आरिज़-ओ-रुख़्सार=गाल और चेहरा; दम-ए-रुख़सत=विदाई के क्षण

~ मुस्तफ़ा ज़ैदी


  Jul 22, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, July 21, 2018

जब चले जाएँगे हम लौट के

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जब चले जाएँगे हम लौट के सावन की तरह 
याद आएँगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह 

ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उन की गली में मेरा 
जाने शरमाए वो क्यूँ गाँव की दुल्हन की तरह 

मेरे घर कोई ख़ुशी आती तो कैसे आती
उम्र-भर साथ रहा दर्द महाजन की तरह

कोई कंघी न मिली जिस से सुलझ पाती वो
ज़िंदगी उलझी रही ब्रम्हा के दर्शन की तरह

दाग़ मुझ में है कि तुझमें ये पता तब होगा
मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह

हर किसी शख़्स की क़िस्मत का यही है क़िस्सा
आए राजा की तरह जाए वो निर्धन की तरह

जिस में इंसान के दिल की न हो धड़कन 'नीरज'
शाइ'री तो है वो अख़बार के कतरन की तरह

~ गोपालदास नीरज


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Saturday, July 14, 2018

ख़ुदारा यादें मत लेना

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शिकस्ता हूँ मगर दौलत भी है हासिल हुई हम को 
गुज़ारे साथ जो पल क़द्र उस की हो नहीं किस को 
बने सरमाया हैं वो ज़िंदगी का प्यार से रखना 
ख़ुदारा यादें मत लेना 

*शिकस्ता=टूटा हुआ; सरमाया=पूँजी

यही यादें हैं ले जाएँगी हम को आख़री दम तक
न कोई हम-सफ़र होगा न जाएगा कोई घर तक
ये घर एहसास का होगा मेरा एहसास मत लेना
ख़ुदारा यादें मत लेना

है खेली प्यार की बाज़ी न जीता मैं न तुम हारी
लगाएगी ये दुनिया ज़र्ब अपने दम से ही कारी
ये तय है ज़ख़्म माँगेगा कोई मरहम लगा देना
ख़ुदारा यादें मत लेना

*ज़र्ब=चोट; कारी=गहरी

मिले हम इत्तिफ़ाक़न थे मगर राहें लगीं यकसाँ
कभी दुश्वारियाँ अपनी कभी मंज़िल रही पिन्हाँ
ये होता रहता है अक्सर जो रूठे दिल मना लेना
ख़ुदारा यादें मत लेना

*पिन्हाँ=छुपा हुआ

ये हाथों की लकीरें बाज़ आएँगी कहाँ दिलबर
इन्हें तो बैर है हम से करम-फ़रमा रक़ीबों पर
रहेगा खेल क़िस्मत का उसे है खेल में लेना
ख़ुदारा यादें मत लेना

मुझे है ये यक़ीं पाओगे तुम अपनी नई मंज़िल
मैं तड़पूँ या करूँ गिर्या नहीं होगा कोई हासिल
हटा कर मुझ को रस्ते से क़दम आगे बढ़ा लेना
ख़ुदारा यादें मत लेना

~ उज़ैर रहमान


  Jul 14, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Wednesday, July 4, 2018

जश्न

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जश्न-ए-नौरोज़ भी है
जश्न-ए-बहाराँ भी है
शब-ए-महताब (चाँद रात) भी
जश्न-ए-मह-ए-ताबाँ (चमकता चाँद) भी है
सुनते हैं
आज ही जश्न-ए-शह-ए-ख़ूबाँ (अच्छा राजा) भी है

आइए ऐ दिल-ए-बर्बाद
चलें हम भी वहाँ
जश्न की रात है
सौग़ात तो बटती होगी
अपने हिस्से की
चलें हम भी उठा लें सौग़ात
दर्द की
आख़िरी सीने से लगा लें सौग़ात
और फिर यूँ हो
कि जब शाम ढले
ओस में भीग के
गुल-मोहर की ख़ुश्बू फैले
याद की चाँदनी
बे-ख़्वाब दरीचों (खिड़कियों) पे गिरे
फिर उसी जश्न की
ये रात मिरे काम आए
दर्द की आख़िरी सौग़ात
मिरे काम आए
आख़िर शब
शब-ए-आख़िर ठहरे
ज़िद पे आया हुआ ये दिल ठहरे

तोड़ दूँ शीशा
जो हस्ती का भी फिर जाम आए
काम आए
तो ये सौग़ात मिरे काम आए
जश्न की रात है
यूँ नज़्र गुज़ारी जाए
एक इक आरज़ू सदक़े (चढ़ावे) में उतारी जाए

~ नसीम सय्यद


  Jul 04, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, July 1, 2018

कुछ होश नहीं, कुछ होश नहीं

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कुछ होश नहीं, कुछ होश नहीं

जब दर्द की लहरें डूब गईं
जब आँखें चेहरा भूल गईं
तुम सोच के आँगन में कैसे
फिर याद के घुँगरू ले आए
मैं कैसी महक से पागल हूँ
फिर रक़्स-ए-जुनूँ में शामिल हूँ
कुछ होश नहीं, कुछ होश नहीं



फिर चेहरा चेहरा तेरा चेहरा
फिर आँख में तेरी आँखों का
पुर-कैफ़ नज़ारा झूम उठा
फिर सारा ज़माना झूम उठा
कब रात गई कब दिन जागा

कुछ होश नहीं, कुछ होश नहीं

~ ख़ालिद मलिक साहिल

  Jul 01, 2018 | e-kavya.blogspot.com
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