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Sunday, March 22, 2020

हम



बिछी हुई है बिसात कब से
ज़माना शातिर है और हम
इस बिसात के ज़िश्त-ओ-ख़ूब-ख़ानों (कुरूप या सुघड़ दड़बों) में
दस्त-ए-नादीदा (अदृश्य हाथ) के इशारों पे चल रहे हैं
बिछी हुई है बिसात अज़ल (अनादि काल) से
बिछी हुई है बिसात जिस की न इब्तिदा है न इंतिहा है
बिसात (खेल की बाज़ी) ऐसा ख़ला (शून्य) है जो वुसअत-ए-तसव्वुर (कल्पना से) मावरा (परे) है
करिश्मा-ए-काएनात (सृष्टि का चमत्कार) क्या है
बिसात पर आते जाते मोहरों का सिलसिला है
बिसात साकित (चुप) है वक़्त-ए-मुतलक़ (सर्वोच्च)

बिसात बे-जुम्बिश (अचल) और बे-हिस (असंवेदन) है
अपने मोहरों से ला-तअल्लुक़ (सम्बंध) है
उस को इस से ग़रज़ नहीं है
कि कौन जीता है
और किस ने शिकस्त खाई
वजूद (अस्तित्व) हादिस (नया) वजूद मोहरे

बिसात-ए-साकित (बिसात/खेल बिछाने का कपड़ा) की वुस'अतों (क्षणों) में
ज़मीन अहल-ए-ज़मीन (धरती-वासी) अफ़्लाक (आसमान) अहल-ए-अफ़्लाक
अपनी अपनी मुअ'य्यना (पूर्व-निर्धारित) साअ'तों (समय) में ऐसे गुज़र रहे हैं
कि जैसे आँखों से ख़्वाब गुज़रें
बिसात पर जो भी है
वो होने की मोहलतों में असीर (बंदी)
पैहम (पहनावा) बदल रहा है
वजूद वो हिद्दत-ए-रवाँ (बहती हुई ऊर्जा) है
जो नित-नई हैअतों (रूपों) में बाक़ी है
और उस को फ़ना (विनाश) नहीं

जहाँ पहाड़ों के आसमाँ-बोस (गगन-चुम्बी) सिलसिले हैं
वहाँ कभी बहर (समुद्र) मौजज़न (प्रवाहित) थे
जहाँ बयाबाँ में रेत उड़ती है
बाद-ए-मस्मूम (विषैली हवा) गूँजती है
वहाँ कभी सब्ज़ा-ज़ार-ओ-गुल-गश्त (हरे भरे बाग़ में टहलने) का समाँ था
बुलंद-ओ-बाला (ऊँचे और बेहतर) हक़ीर-ओ-हेच (छोटे और छुद्र)
इस शिकस्त-ओ-ता'मीर (विनाश और सृजन) के तसलसुल (बहाव) में बह रहे हैं
शिकस्त-ओ-ता'मीर (विनाश और सृजन) के तसलसुल (बहाव) में तू है मैं हूँ

हम ऐसे मोहरे
जिन्हें इरादे दिए गए हैं
ये जन (अवाम) की तौफ़ीक़ (सामर्थ्य) पर हदें हैं
जिन्हें तमन्ना के रंग दिखला दिए गए हैं
मगर वसीलों (साधनों) पर क़दग़नें (प्रतिबंध)हैं
जिन्हें मोहब्बत के ढंग सिखला दिए गए हैं
प दस्त-ओ-पा (हाथ और पैर) में सलासिल-ए-नौ (नई जंज़ीरें) बनो
तो गर्दन में तौक़ (साँकल) पहना दिए गए हैं

जो है जो अब तक हुआ है जो हो रहा है
उस से किसे मफ़र है
कोई जो चाहे
कि अहद-ए-रफ़्ता (गुज़रे दिन) से एक पल फिर से लौट आए
कहा हुआ लफ़्ज़ अन-कहा हो सके
तो इस आरज़ू का हासिल वो जानता है
बहुत सही इख़्तियार-ओ-इम्काँ (नियंत्रण – सम्भावनाएँ)
बर्ग-ओ-ख़स (ख़स की पत्ती) की ताब-ओ-मजाल (ताक़त और हिम्मत) क्या है
नुमू-ए-ग़ुंचा (कली के उदय होने) में उस का अपना कमाल क्या है
तिरी निगाहों में तेरा ग़म कोह (पर्वत) से गिराँ-तर (ऊँचा) है
तू समझता है
तेरे सीने के सुर्ख़ लावे से
शहर-ओ-क़र्या (शहर – गाँव) पिघल रहे हैं
ख़िज़ाँ ज़मिस्ताँ (शीत ऋतु) तिरी उदासी के आइने हैं
तू मुश्तइ'ल (उत्तेजित) हो तो ज़लज़लों से ज़मीन काँपे
तुझे गुमाँ है
कि गुल खिले हैं तिरे तबस्सुम की पैरवी में
ये फूल को इख़्तियार कब था
कि कौन सी शाख़ पर खिले
कौन कुंज में मुस्कुराए
और किन फ़ज़ाओं में ख़ुशबुएँ बिखेरे
नहीफ़ (कोमल) शो'ला जमाल (सुंदरता) कोंपल
जो दस्त-ए-नाज़ुक (नर्म हाथों) की नर्म पोरों से धीरे धीरे
दरीचा-ए-शाख़ (शाख़ से दरार) खोल कर
सुब्ह की सफ़ेदी में झाँकती है
ये सोचती है
कि बाग़ सारा उसी के दम से महक रहा है
उसी के परतव (प्रतिबिम्ब) से गोशा गोशा (कोना कोना) दमक रहा है
उसी के दीदार में मगन
ख़ुशबुओं से बोझल हवाओं में
शोख़ तितलियाँ रक़्स (नृत्य) कर रही हैं

वो बे-ख़बर है
कि शातिर-ए-वक़्त (बेहद चालक वक़्त) की नज़र में
कोई इकाई
शजर (इंसान) हजर (वस्तु) हो कि ज़ी-नफ़्स (जीवित) हो
निज़ाम-ए-कुल (पूरे तंत्र) से अलग नहीं है
वो ये नहीं जानती कि हस्ती के कार-ख़ाने में
उस का होना न होना बे-नाम हादिसा है
और उस के हिस्से का कुल असासा (सम्पत्ति)
वो चंद लम्हे वो चंद साँसें हैं
जिन में वो ख़्वाब देखती है
सलीक़ा-ए-ज़ात (अपनी रीति) से चमन को सँवारने का
बहार-ए-जाँ (जीवन के वसंत) को निखारने का

~ ज़िया जालंधरी


Mar 22, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Saturday, March 21, 2020

आता है याद मुझ को गुज़रा हुआ ज़माना

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आता है याद मुझ को गुज़रा हुआ ज़माना 
वो बाग़ की बहारें वो सब का चहचहाना
आज़ादियाँ कहाँ वो अब अपने घोंसले की
अपनी ख़ुशी से आना अपनी ख़ुशी से जाना
लगती है चोट दिल पर आता है याद जिस दम
शबनम के आँसुओं पर कलियों का मुस्कुराना
वो प्यारी प्यारी सूरत वो कामनी सी मूरत
आबाद जिस के दम से था मेरा आशियाना
आती नहीं सदाएँ उस की मिरे क़फ़स में
होती मिरी रिहाई ऐ काश मेरे बस में

क्या बद-नसीब हूँ मैं घर को तरस रहा हूँ
साथी तो हैं वतन में मैं क़ैद में पड़ा हूँ
आई बहार कलियाँ फूलों की हंस रही हैं
मैं इस अँधेरे घर में क़िस्मत को रो रहा हूँ
इस क़ैद का इलाही दुखड़ा किसे सुनाऊँ
डर है यहीं क़फ़स में मैं ग़म से मर न जाऊँ

जब से चमन छुटा है ये हाल हो गया है
दिल ग़म को खा रहा है ग़म दिल को खा रहा है
गाना इसे समझ कर ख़ुश हों न सुनने वाले
दुखते हुए दिलों की फ़रियाद ये सदा है
आज़ाद मुझ को कर दे ओ क़ैद करने वाले
मैं बे-ज़बाँ हूँ क़ैदी तू छोड़ कर दुआ ले!

‍~ अल्लामा इक़बाल

Mar 21, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

Sunday, March 15, 2020

क्या हाल कहें उस मौसम का


क्या हाल कहें उस मौसम का
जब जिंस-ए-जवानी सस्ती थी
जिस फूल को चूमो खुलता था
जिस शय को देखो हँसती थी
जीना सच्चा जीना था
हस्ती ऐन हस्ती थी
अफ़्साना जादू अफ़्सूँ था
ग़फ़लत नींदें मस्ती थी
उन बीते दिनों की बात है ये
जब दिल की बस्ती बस्ती थी

*जिंस-ए-जवानी=जवानी जैसी; अफ़्सूँ=जादुई; ग़फ़लत=असावधानी, बेपरवाही

ग़फ़लत नींदें हस्ती थी
आँखें क्या पैमाने थे
हर रोज़ जवानी बिकती थी
हर शाम-ओ-सहर बैआ'ने थे
हर ख़ार में इक बुत-ख़ाना था
हर फूल में सौ मय-ख़ाने थे
काली काली ज़ुल्फ़ें थीं
गोरे गोरे शाने थे
उन बीते दिनों की बात है ये
जब दिल की बस्ती बस्ती थी

*बैआ'ने=बयाना

गोरे गोरे शाने थे
हल्की-फुल्की बाँहें थीं
हर-गाम पे ख़ल्वत-ख़ाने थे
हर मोड़ पे इशरत-गाहें थीं
तुग़्यान ख़ुशी के आँसू थे
तकमील-ए-तरब की आहें थीं
इश्वे चुहलें ग़म्ज़े थे
पल्तीं ख़ुशियाँ चाहीं थीं
उन बीते दिनों की बात है ये
जब दिल की बस्ती बस्ती थी

*ख़ल्वत=निजी, गुप्त; इशरत-गाह=मज़े करने की जगह; तकमील-ए-तरब=उन्माद की चीखें; इश्वे=शोख़; ग़म्ज़े=शरारती इशारे

~ जोश मलीहाबादी


Mar 15, 2020 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, March 14, 2020

दास्ताँ वस्ल की इक बात से


दास्ताँ वस्ल की इक बात से आगे न बढ़ी
आप की शिकवा-शिकायत से आगे न बढ़ी

लाख रोती रही जलती रही अफ़्सोस मगर
ज़िंदगी शम्अ' की इक रात से आगे न बढ़ी

तू जफ़ा-केश रहा और में वफ़ा-कोश रहा
बात तेरी भी मिरी बात से आगे न बढ़ी
*जफ़ा-केश=जो वफ़ा में कच्चा हो; वफ़ा-कोश=प्रेम निर्वाह की कोशिश

यूँ तो आग़ाज़-ए-मोहब्बत में बड़े दा'वे थे
दोस्ती पहली मुलाक़ात से आगे न बढ़ी
*आग़ाज़-ए-मोहब्बत=प्रेम की शुरुआत

मिल गए जब वही शिकवे वही क़िस्से 'असअद'
ये ख़ुराफ़ात ख़ुराफ़ात से आगे न बढ़ी

~ असअ'द बदायुनी


Mar 14, 2020 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, March 13, 2020

अब सितारों में जवानी नहीं

 
अब सितारों में जवानी नहीं रक़्साँ कोई
चाँद के नूर में नग़्मात के सैलाब नहीं
दिल में बाक़ी नहीं उमडा हुआ तूफ़ाँ कोई
रूह अब हुस्न उचक लेने को बेताब नहीं

*रक़्साँ=नृत्य; सैलाब=बाढ़

अब फ़रोज़ाँ सी नहीं क़ौस-ए-क़ुज़ह की राहें
इन्ही राहों से उफ़ुक़ पार से घूम आते थे
मुंतज़िर अब नहीं फ़ितरत की गुलाबी बाहें
हम जिन्हें जा के शफ़क़-ज़ार से चूम आते थे

*फ़रोज़ाँ=रौशनी से भरी; क़ौस-ए-क़ुज़ह=इंद्रधनुष; उफ़ुक़=क्षितिज; मुंतज़िर=इंतज़ार; शफ़क़-ज़ार=उषा वर्ण

अब घटाओं में नहीं हौसले रिंदाना से
अब फ़ज़ाओं में हैं वलवले दीवाना से
रूह एहसास की तल्ख़ी से बुझी जाती है
ऐसे माहौल के ज़िंदाँ से रिहा कर मुझ को
वही पहले से हसीं ख़्वाब अता कर मुझ को

*रिंदाना=मतवालों; वलवले=ललक; ज़िंदाँ=जेल; अता=प्रदान

~ नज़ीर मिर्ज़ा बर्लास

Mar 13, 2020 | e-kavya.blogspot.com
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तुम अपने रँग में रँग लो तो


तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
देखी मैंने बहुत दिनों तक
दुनिया की रंगीनी,
किंतु रही कोरी की कोरी
मेरी चादर झीनी,
तन के तार छूए बहुतों ने
मन का तार न भीगा,
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

अंबर ने ओढ़ी है तन पर
चादर नीली-नीली,
हरित धरित्री के आँगन में
सरसों पीली-पीली,
सिंदूरी मंजरियों से है
अंबा शीश सजाए,
रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है।
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

~ हरिवंशराय बच्चन


Mar 09, 2020 | e-kavya.blogspot.com
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Monday, March 9, 2020

यह मिट्टी की चतुराई है

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यह मिट्टी की चतुराई है,
रूप अलग औ’ रंग अलग,
भाव, विचार, तरंग अलग हैं,
ढाल अलग है ढंग अलग,
आजादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो,
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर को।

निकट हुए तो बनो निकटतर
और निकटतम भी जाओ,
रूढ़ि-रीति के और नीति के
शासन से मत घबराओ,
आज नहीं बरजेगा कोई, मनचाही कर लो,
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो।

प्रेम चिरंतन मूल जगत का,
वैर-घृणा भूलें क्षण की,
भूल-चूक लेनी-देनी में
सदा सफलता जीवन की,
जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो,
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो।

होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,
भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो।

~ हरिवंशराय बच्चन
 
Mar 09, 2020 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, March 1, 2020

बीत चला यह जीवन सब

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बीत चला यह जीवन सब
प्रिय, न दो विश्वास अभिनव
मिल सको तो अब मिलो, अगले जनम की बात छोड़ो।

भ्रान्त मन, भीगे नयन
बिखरे सुमन, यह सान्ध्य-बेला
शून्य में होता विलय
यह वन्दना का स्वर अकेला
फूल से यह गन्ध, देखो
कह चली, `सम्बंध, देखो
टूटकर जुड़ते नहीं फिर, मोह-भ्रम की बात छोड़ो।

यह कुहासे का कफ़न
यह जागता सोता अँधेरा
प्राण तरू पर स्वप्न के
अभिशप्त विहगों का बसेरा
यूँ न देखो प्रिय इधर तुम,
एक ज्योँ तस्वीर गुमसुम,
अनवरत, अन्धी प्रतीक्षा, के नियम की बात छोड़ो।

यह दिये की काँपती लौ,
और यह पागल पतँगा
दूर नभ के वक्ष पर
सहमी हुई आकाश गंगा
एक सी सबकी कथा है,
एक ही सबकी व्यथा है,
हैं सभी असहाय, मेरी या स्वयम् की बात छोड़ो।

हर घड़ी, हर एक पल है,
पीर, दामनगीर कोई
शीश उठते ही खनकती
पाँव में जंज़ीर कोई
आज स्वर की शक्ति बन्दी,
साध की अभिव्यक्ति बन्दी,
थक गये मन-प्राण तक, मेरे अहम की बात छोड़ो।

~ किशन सरोज

Mar 01, 2020 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, February 29, 2020

इश्क़ से पैदा नवा-ए-ज़िंदगी

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इश्क़ से पैदा नवा-ए-ज़िंदगी में ज़ेर-ओ-बम 
इश्क़ से मिट्टी की तस्वीरों में सोज़-ए-दम-ब-दम

* नवा-ए-ज़िंदगी=ज़िंदगी की आवाज़; ज़ेर-ओ-बम;उतार-चढ़ाव; सोज़-ए-दम-ब-दम= हलचल

आदमी के रेशे रेशे में समा जाता है इश्क़
शाख़-ए-गुल में जिस तरह बाद-ए-सहर-गाही का नम

* बाद-ए-सहर-गाही=सुबह के बाद

अपने राज़िक़ को न पहचाने तो मुहताज-ए-मुलूक
और पहचाने तो हैं तेरे गदा दारा ओ जम

*राज़िक=अन्नदाता; मुहताज-ए-मुलूक=राजपद से वंचित; गदा=भिखारी; दारा=राजा,ईश्वर; जम=रजा जमशेद

दिल की आज़ादी शहंशाही शिकम सामान-ए-मौत
फ़ैसला तेरा तिरे हाथों में है दिल या शिकम

*शिकम=पेट

ऐ मुसलमाँ अपने दिल से पूछ मुल्ला से न पूछ
हो गया अल्लाह के बंदों से क्यूँ ख़ाली हरम

~ अल्लामा इक़बाल

Feb 29, 2020 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, February 22, 2020

चाँद हवा और मैं

 
घूम रहे हैं आँगन आँगन चाँद हवा और मैं
ढूँड रहे हैं बिछड़ा बचपन चाँद हवा और मैं

भूला-बिसरा अफ़्साना हैं आज उस के नज़दीक
कल तक थे जिस दिल की धड़कन चाँद हवा और मैं

ख़्वाबों से बे-नाम जज़ीरों में घूमे सौ बार
यादों का थामे हुए दामन चाँद हवा और मैं
*जज़ीरों=द्वीपों

अपने ही घर में हैं या सहरा में गर्म-ए-सफ़र
क्यूँकर सुलझाएँ ये उलझन चाँद हवा और मैं

आज के दौर में अपनी ही पहचान हुई दुश्वार
देख रहे हैं वक़्त का दर्पन चाँद हवा और मैं

रंग का हाला ख़ुशबू का इक झोंका कुछ तो मिले
कब से हैं आवारा-ए-गुलशन चाँद हवा और मैं

परछाईं के पीछे भागे खोए ख़लाओं में
निकले आप ही अपने दुश्मन चाँद हवा और मैं
*ख़लाओं=शून्य, अंतराल

जाने किस की कौन है मंज़िल फिर भी हैं इक साथ
घूम रहे हैं तीनों बन बन चाँद हवा और मैं

उर्यानी का दोश किसे दें अपनी है तक़दीर
ख़ुद ही जला बैठे पैराहन चाँद हवा और मैं
*उर्यानी=वस्त्रहीन होने की अवस्था; पैराहन=वस्त्र

~ हामिद यज़दानी

Feb 22, 2020 | e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh


Friday, February 21, 2020

जय शिवशंकर, जय गंगाधर

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जय शिवशंकर, जय गंगाधर, करुणा-कर करतार हरे,
जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशि, सुख-सार हरे
जय शशि-शेखर, जय डमरू-धर जय-जय प्रेमागार हरे,
जय त्रिपुरारी, जय मदहारी, अमित अनन्त अपार हरे,
निर्गुण जय जय, सगुण अनामय, निराकार साकार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

जय रामेश्वर, जय नागेश्वर वैद्यनाथ, केदार हरे,
मल्लिकार्जुन, सोमनाथ, जय, महाकाल ओंकार हरे,
त्र्यम्बकेश्वर, जय घुश्मेश्वर भीमेश्वर जगतार हरे,
काशी-पति, श्री विश्वनाथ जय मंगलमय अघहार हरे,
नील-कण्ठ जय, भूतनाथ जय, मृत्युंजय अविकार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

जय महेश जय जय भवेश, जय आदिदेव महादेव विभो,
किस मुख से हे गुरातीत प्रभु! तव अपार गुण वर्णन हो,
जय भवकार, तारक, हारक पातक-दारक शिव शम्भो,
दीन दुःख हर सर्व सुखाकर, प्रेम सुधाधर दया करो,
पार लगा दो भव सागर से, बनकर कर्णाधार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

जय मन भावन, जय अति पावन, शोक नशावन,
विपद विदारन, अधम उबारन, सत्य सनातन शिव शम्भो,
सहज वचन हर जलज नयनवर धवल-वरन-तन शिव शम्भो,
मदन-कदन-कर पाप हरन-हर, चरन-मनन, धन शिव शम्भो,
विवसन, विश्वरूप, प्रलयंकर, जग के मूलाधार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

भोलानाथ कृपालु दयामय, औढरदानी शिव योगी, सरल हृदय,
अतिकरुणा सागर, अकथ-कहानी शिव योगी, निमिष में देते हैं,
नवनिधि मन मानी शिव योगी, भक्तों पर सर्वस्व लुटाकर, बने मसानी
शिव योगी, स्वयम्‌ अकिंचन,जनमनरंजन पर शिव परम उदार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

आशुतोष! इस मोह-मयी निद्रा से मुझे जगा देना,
विषम-वेदना, से विषयों की मायाधीश छड़ा देना,
रूप सुधा की एक बूँद से जीवन मुक्त बना देना,
दिव्य-ज्ञान- भंडार-युगल-चरणों को लगन लगा देना,
एक बार इस मन मंदिर में कीजे पद-संचार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

दानी हो, दो भिक्षा में अपनी अनपायनि भक्ति प्रभो,
शक्तिमान हो, दो अविचल निष्काम प्रेम की शक्ति प्रभो,
त्यागी हो, दो इस असार-संसार से पूर्ण विरक्ति प्रभो,
परमपिता हो, दो तुम अपने चरणों में अनुरक्ति प्रभो,
स्वामी हो निज सेवक की सुन लेना करुणा पुकार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

तुम बिन व्याकुल हूँ प्राणेश्वर, आ जाओ भगवन्त हरे,
चरण शरण की बाँह गहो, हे उमारमण प्रियकन्त हरे,
विरह व्यथित हूँ दीन दुःखी हूँ दीन दयालु अनन्त हरे,
आओ तुम मेरे हो जाओ, आ जाओ श्रीमंत हरे,
मेरी इस दयनीय दशा पर कुछ तो करो विचार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

~ अज्ञात


Feb 22, 2020 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, February 16, 2020

घास भी मुझ जैसी है

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घास भी मुझ जैसी है
पाँव-तले बिछ कर ही ज़िंदगी की मुराद पाती है
मगर ये भीग कर किस बात गवाही बनती है
शर्मसारी की आँच की
कि जज़्बे की हिद्दत की
घास भी मुझ जैसी है

*मुराद=इच्छा; शर्मसारी=लज्जित; हिद्दत= तीव्रता

ज़रा सर उठाने के क़ाबिल हो
तो काटने वाली मशीन
उसे मख़मल बनाने का सौदा लिए
हमवार करती रहती है
औरत को भी हमवार करने के लिए
तुम कैसे कैसे जतन करते हो

*हमवार=समतल, सपाट

न ज़मीं की नुमू की ख़्वाहिश मरती है
न औरत की
मेरी मानो तो वही पगडंडी बनाने का ख़याल दुरुस्त था
जो हौसलों की शिकस्तों की आँच न सह सकें
वो पैवंद-ए-ज़मीं हो कर
यूँ ही ज़ोर-आवरों के लिए रास्ता बनाते हैं
मगर वो पर-ए-काह हैं
घास नहीं
घास तो मुझ जैसी है!

*नुमू=पैदावार; शिकस्त=पराजय; ज़ोर-आवरों=ज़बर्दस्त, ताक़तवर; पर-ए-काह=सूखी घास का बंडल

~ किश्वर नाहीद


Feb 16, 2020 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, February 8, 2020

जमाल-ए-बदन का ए'तिराफ़

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मुझे जमाल-ए-बदन का है ए'तिराफ़ मगर
मैं क्या करूँ कि वरा-ए-बदन भी देखता हूँ
ये काएनात फ़क़त एक रुख़ नहीं रखती
चमन भी देखता हूँ और बन भी देखता हूँ

*जमाल-ए-बदन=शरीर की सुंदरता; ए'तिराफ़=स्वीकार; वरा-ए-बदन=शरीर से परे; काएनात=सृष्टि

मिरी नज़र में हैं जब हुस्न के तमाम अंदाज़
मैं फ़न भी देखता हूँ फ़िक्र-ओ-फ़न भी देखता हूँ
निकल गया हूँ फ़रेब-ए-निगाह से आगे
मैं आसमाँ को शिकन-दर-शिकन भी देखता हूँ
वो आदमी कि सभी रोए जिन की मय्यत पर
मैं उस को ज़ेर-ए-कफ़न ख़ंदा-ज़न भी देखता हूँ

*शिकन=सिकुड़न; ज़ेर-ए-कफ़न=क़फ़न के नीचे[; ख़ंदा-ज़न=हँसने वाले

मैं जानता हूँ कि ख़ुर्शीद है जलाल-मआब
मगर ग़ुरूब से ख़ुद को रिहाई देता नहीं
मैं सोचता हूँ कि चाँद इक जमाल-पारा है
मगर वो रुख़ जो किसी को दिखाई देता नहीं

*ख़ुर्शीद=सूरज; जलाल-मआब=तेजस्वी; ग़ुरूब=अस्त; जमाल-पारा=सुंदरता की सीमा

मैं सोचता हूँ हक़ीक़त का ये तज़ाद है क्या
ख़ुदा जो देता है सब कुछ ख़ुदाई देता नहीं
वो लोग ज़ौक़ से आरी हैं जो ये कहते हैं
कि अश्क टूटता है और सुनाई देता नहीं
बदन भी आग है और रूह भी जहन्नम है
मिरा क़ुसूर ये है में दुहाई देता नहीं

*तजाद=विरोधाभास; ज़ौक़=आनंद; आरी=वंचित

~ अहमद नदीम क़ासमी


Feb 8, 2020 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, February 7, 2020

एक उम्मीद

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दूर आँखों से बहुत दूर, कहीं
इक तसव्वुर है, जो बे-ज़ार किए रखता है
वो कोई ख़्वाब है या ख़्वाब का अंदेशा है
जो मिरे सोच को मिस्मार किए रखता है

*तसव्वुर=कल्पना; बे-ज़ार=उचाट; मिस्मार=तबाह

दूर, क़िस्मत की लकीरों से बहुत दूर, कहीं
एक चेहरा है, तिरे चेहरे से मिलता-जुलता
जो मुझे नींद में बेदार किए रखता है
दूर से, और बहुत दौर की आवाज़ों से
एक आवाज़ बुलाती है सर-ए-शाम मुझे
जानता हूँ मैं मोहब्बत की हक़ीक़त लेकिन
फिर भी आग़ोश-ए-तमन्ना में, तड़प उठता हूँ

*बेदार=जगाना; आग़ोश-ए-तमन्ना=आलिंगन की इच्छा

चेहरे चेहरे पे बिखरती हुई, आवाज़ों में
तेरी आवाज़ से आवाज़ कहाँ मिलती है
एक क़िंदील ख़यालों की मगर जलती है
तू मिरे पास, बहुत पास, कहीं रहती है
दूर है दूर बहुत दूर, मगर फिर भी, मुझे
एक उम्मीद सर-ए-शाम सजा रखती है
एक उलझन मुझे रातों को जगा रखती है

*किंदील=लैम्प

~ ख़ालिद मलिक साहि
ल

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Sunday, February 2, 2020

वक़्त की खेती हैं हम

 
वक़्त की खेती हैं हम
वक़्त बोता है उगाता पालता है
और बढ़ने के मवाक़े भी हमें देता है वक़्त

*मवाक़े=मौके

सब्ज़ को ज़र्रीं बताने की इजाज़त मर्हमत करता है और
नाचने देता है बाद-ए-शोख़ की मौजों के साथ
झूमने देता है सूरज की किरन की हम-दमी में
चाँदनी पी कर हमें ब-दस्त पाता है तो ख़ुश होता है वक़्त

*सब्ज़=हरा; ज़री=सुनहरा; मर्हमत=प्रदान; बाद-ए-शोख़=नटखट हवा; ब-दस्त=हाथ में

फूलने फलने की तदबीरें बताता है हमें
हाँ मगर अंजाम कार
काट लेना है हमें
हम बिल-आख़िर उस के नग़्मे
हम बिल-आख़िर उस की फ़स्ल

*तदबीरें=उपाय; बिल-आख़िर-अंत में

‍~ अमीक़ हनफ़ी


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Saturday, February 1, 2020

वही जो कुछ सुन रहा हूँ

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वही जो कुछ सुन रहा हूँ कोकिलों में,
वही जो कुछ हो रहा तय कोपलों में,
वही जो कुछ ढूँढ़ते हम सब दिलों में,
वही जो कुछ बीत जाता है पलों में,
बोल दो यदि...

कीच से तन-मन सरोवर के ढँके हैं,
प्यार पर कुछ बेतुके पहरे लगे हैं,
गाँठ जो प्रत्यक्ष दिखलाई न देती-
किन्तु हम को चाह भर खुलने न देती,
खोल दो यदि...

बहुत सम्भव, चुप इन्हीं
अमराइयों में गान आ जाये,
अवांछित, डरी-सी
परछाइयों में जान आ जाये,
बहुत सम्भव है इसी
उन्माद में बह दीख जाये
जिसे हम-तुम चाह कर भी
कह न पाये

वायु के रंगीन आँचल में भरी
अँगड़ाइयाँ बेचैन फूलों की सतातीं
तुम्हीं बढ़ कर एक प्याला
धूप छलका दो अँधेरे हृदय में
कि नाचे बेझिझक हर दृश्य
इन मदहोश आँखों में
तुम्हारा स्पर्श मन में सिमट आये
इस तरह ज्यों एक मीठी धूप में
कोई बहुत ही शोख़ चेहरा
खिलखिला कर सैकड़ों सूरजमुखी-सा
दृष्टि की हर वासना से
लिपट जाये

~ कुँवर नारायण


 Feb 1, 2020 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, January 31, 2020

बसंत

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लाल लाल टेसू फूलि रहे हैं बिलास संग,
स्याम रंग मयी मानो मसि में मिलाए हैं।
तहाँ मधु-काज आइ बैठे मधुकर पुंज,
मलय पवन उपवन - बन धाए हैं।
‘सेनापति’ माधव महीना में पलाश तरु,
देखि देखि भाव कविता के मन आये हैं।
आधे अंग सुलगि सुलगि रहे, आधे मानो
विरही धन काम क्वैला परचाये हैं।

--

धरयौ है रसाल मोर सरस सिरच रुचि,
उँचे सब कुल मिले गलत न अंत है।
सुचि है अवनि बारि भयौ लाज होम तहाँ,
भौंरे देखि होत अलि आनंद अनंत है।
नीकी अगवानी होत सुख जन वासों सब,
सजी तेल ताई चैंन मैंन भयंत है।
सेनापति धुनि द्विज साखा उच्चतर देखौ,
बनौ दुलहिन बनी दुलह बसंत है।

~ सेनापति

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Wednesday, January 29, 2020

फिर भी बहार आएगी

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रोज़-ओ-शब
हल्क़ा-ए-आफ़ात हैं
हर लहज़ा जवाँ
सिलसिला वक़्त की गर्दिश का यहाँ
सब हैं पाबंदी-ए-औक़ात-ए-ज़माना में मगन
जान-ओ-तन फ़हम-ओ-ख़िरद होश-ओ-गुमाँ
तुम ही तन्हा नहीं इस सैल-ए-रवाँ में मजबूर
मैं भी जीती हूँ यहाँ ख़ुद से गुरेज़ाँ हो कर

*रोज़-ओ-शब=दिन और रात; हल्क़ा-ए-आफ़ात=विषम चक्र; पाबंदी-ए-औक़ात-ए-ज़माना=समय और युग की नियमितता; फ़हम-ओ-ख़िरद=समझ और बुद्धि; सैल-ए-रवाँ=निरंतर बहाव

फिर भी इक लम्हे की फ़ुर्सत जो मयस्सर आए
दिल वहीं चुपके से धड़कन को जगा देता है
तार-रातों में बिखरती हैं रुपहली किरनें
चाँदनी पिछली मुलाक़ातों के आईने में
रोज़-ए-आइंदा से मिलती है गले

*मयस्सर=प्राप्त; रोज़-ए-आइंदा=आने वाले दिन

कहती है
अन-कही बातों की ख़ुश्बू से मोअ'त्तर रखना
अपनी आवाज़ अभी
ज़िंदगी कितनी ही बे-मेहर सहमी
फिर भी बहार आएगी
आँखों में बसाए रखना मेरे अंदाज़ अभी

*मोअत्तर=ख़ुशबू से भरा हुआ; बे-मेहर=प्रेम विहीन

~ माह तलअत ज़ाहिदी


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Sunday, January 26, 2020

छब्बीस जनवरी है

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गुलशन में रुत नई है
हर सम्त बे-ख़ुदी है
हर गुल पे ताज़गी है
मसरूर ज़िंदगी है
सरचश्मा-ए-ख़ुशी है
छब्बीस जनवरी है

*सिम्त=तरफ; मसरूर=आनंदित; सरचश्मा-ए-ख़ुशी=ख़ुशियों की बहार

हर सू ख़ुशी है छाई
सब ने मुराद पाई
फिर जनवरी ये आई
यौम-ए-सुरूर लाई
साअ'त मुराद की है
छब्बीस जनवरी है

*हर सू=चारों तरफ; यौम=दिन; सा’अत=क्षण

आँखों में रंग-ए-नौ है
बातिल से जंग-ए-नौ है
साज़ और चंग-ए-नौ है
हर दर पे संग-ए-नौ है
पुर-कैफ़ ज़िंदगी है
छब्बीस जनवरी है

*रंग-ए-नौ=नया रंग; बातिल=बुराई; पुर-कैफ़=उन्माद से भरपूर

मैं गुनगुना रहा हूँ
मस्ती में गा रहा हूँ
ख़ुशियाँ मना रहा हूँ
आलम पे छा रहा हूँ
दिल महव-ए-बे-ख़ुदी है
छब्बीस जनवरी है

*महव-ए-बे-ख़ुदी=ख़ुद को भूला हुआ

हिन्दोस्तान ख़ुश है
हर पासबान ख़ुश है
हर नौ-जवान ख़ुश है
सारा जहान ख़ुश है
एक जोश-ए-सरमदी है
छब्बीस जनवरी है

*पासबान=रक्षक; जोश-ए-सरमदी=उल्लास

~ कँवल डिबाइवी

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Saturday, January 25, 2020

जो चाँद पर गया है.. आदमी

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जो चाँद पर गया है सो है वो भी आदमी
जो गप उड़ा रहा है सो है वो भी आदमी
जो हँस हँसा रहा है सो है वो भी आदमी
जो जी जला रहा है सो है वो भी आदमी
हैं आदमी के सारे ज़माने में रंग-रूप
हैं आदमी ही चाँदनी और आदमी ही धूप

है आदमी हज़ारों का और एक पाई का
आधा है अपनी माँ का तो आधा है दाई का
पेशा भी आदमी ने सँभाला गदाई का
दावा भी आदमी ने किया है ख़ुदाई का
गोरा भी आदमी है तो काला भी आदमी
बुज़दिल भी आदमी है जियाला भी आदमी

*गदाई=भीख माँगने का काम; जियाला=बहादुर

जब आदमी के दिल को चुराता है आदमी
सीने से अपने उस को लगाता है आदमी
और इस तरह से उम्र बढ़ाता है आदमी
मुश्किल से इस जहान से जाता है आदमी
जाता कहाँ है ख़ुद वो पकड़वाया जाता है
यानी फ़रिश्ता भेज के बुलवाया जाता है

डाला है आदमी ने हर इक आदमी पे जाल
'है आदमी बजाए ख़ुद इक महशर-ए-ख़याल'
निकला तमाम उम्र की कोशिश का ये मआल
आया था रोता पीटता जाता है ख़स्ता-हाल
इस पर ये हाल है कि अकड़ता है आदमी
ग़ैरों से और अपनों से लड़ता है आदमी

*मशहर-क़यामत; मआल=नतीज़ा

ये आदमी लड़ाई को वियतनाम में गया
वो कोरिया गया कभी आसाम में गया
वो तिल-अबीब ओ क़ाहिरा ओ शाम में गया
ये आदमी ही मुत्तहिद-अक़्वाम में गया
फिर आदमी को अम्न सिखाता है आदमी
भैंसों के आगे बीन बजाता है आदमी

*मुत्तहिद-अक़्वाम=युनाइटेड नेशन्स

इबलीस को फ़रेब सिखाता रहा है वो
और शोबदे हज़ार दिखाता रहा है वो
आलम को उँगलियों पे नचाता रहा है वो
हम को जज़ा सज़ा से डराता रहा है वो
दोज़ख़ से वाज़ कह के बचाता है आदमी
पर ख़ुद कभी कभी वहीं जाता है आदमी

*इबलीस=शैतान; शोबदे=तरक़ीबें; जज़ा=बदला; वाज़=सलाह

है आदमी जो करता है सब सीना-ज़ोरियाँ
करता है लूटने के लिए नफ़अ-ख़ोरियाँ
भरता है इस बहाने से अपनी तिजोरियां
दुश्मन को बेच खाता है गंदुम की बोरियाँ
चीज़ों की क़ीमतों को बढ़ाता है आदमी
और गाहकों को ख़ून रुलाता है आदमी

~ सय्यद मोहम्मद जाफ़री


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Friday, January 24, 2020

बड़ी लम्बी कहानी है



बड़ी लम्बी कहानी है सुनोगे?

सहर की आँख खुलने भी न पाई थी
मिरे तरकश ने लाखों तीर बरसाए शुआओं के
किसी ने आफ़्ताबाना हर इक ज़र्रे को चमकाया
किसी ने माहताबी चादरें हर सम्त फैलाईं
कोई जुगनू की सूरत झिलमिलाया
इन्हीं बिखरे हुए तीरों के ज़ेर-ए-साया
मैं चलता रहा
हर मोड़ पे कोई न कोई वाक़िआ
कोई न कोई हादसा

*शुआओं=किरणों; ज़ेर-ए-साया=साये के नीचे; वाक़िआ=घटना

मेरे उजाले को लिपट कर चाट कर
दीमक-ज़दा करता रहा लेकिन
सफ़र की धुन सलामत
जुम्बिश-ए-पा आगे बढ़ती ही रही
कोह-ए-गिराँ पिसते रहे
सागर की लहरें दम-ब-ख़ुद होती रहीं
मैं बढ़ते बढ़ते सरहद-ए-इमरोज़ तक आ पहुँचा

*जुम्बिश-ए-पा=पैरों की हरकत; कोह-ए-गिराँ=बड़े पर्वत; सरहद-ए-इमरोज़=आज की हद

ये माना दूर है मंज़िल
ये माना आबला-पा हूँ
ग़ुबार-ए-गर्दिश-ए-अय्याम में लिपटा हुआ
लेकिन अभी फैला हुआ है सिलसिला मेरे उजालों का
अभी तरकश में लाखों तीर बाक़ी हैं
अभी मेरी कहानी ख़त्म को पहुँची नहीं है
ये बड़ी लम्बी कहानी है
*आबला-पा=पाँव में छाले; दिन=बहुत दिन

~ अज़ीज़ तमन्नाई


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Sunday, January 19, 2020

तुम्हारे नाम तुम्हारे निशाँ से

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तुम्हारे नाम तुम्हारे निशाँ से बे-सरोकार
तुम्हारी याद के मौसम गुज़रते जाते हैं
बस एक मन्ज़र-ए-बे-हिज्र-ओ-विसाल है जिस में
हम अपने आप ही कुछ रंग भरते जाते हैं

*जुदाई और मिलन से परे

न वो नशात-ए-तसव्वुर कि लो तुम आ ही गए
न ज़ख़्म-ए-दिल की है सोज़िश कोई जो सहनी हो
न कोई वा'दा-ओ-पैमाँ की शाम है न सहर
न शौक़ की है कोई दास्ताँ जो कहनी हो

*नशात-ए-तसव्वुर=काल्पिनकता का आनंद; सोज़िश=जलन

नहीं जो महमिल-ए-लैला-ए-आरज़ू सर-ए-राह
तो अब फ़ज़ा में फ़ज़ा के सिवा कुछ और नहीं
नहीं जो मौज-ए-सबा में कोई शमीम-ए-पयाम
तो अब सबा में सबा के सिवा कुछ और नहीं

*महमिल-ए-लैला-ए-आरज़ू=ऊँट पर बैठी हुई लैला; सर-ए-राह=रास्ते पर

उतार दे जो किनारे पे हम को कश्ती-ए-वहम
तो गिर्द-ओ-पेश को गिर्दाब ही समझते हैं
तुम्हारे रंग महकते हैं ख़्वाब में जब भी
तो ख़्वाब में भी उन्हें ख़्वाब ही समझते हैं

न कोई ज़ख़्म न मरहम कि ज़िंदगी अपनी
गुज़र रही है हर एहसास को गँवाने में
मगर ये ज़ख़्म ये मरहम भी कम नहीं शायद
कि हम हैं एक ज़मीं पर और इक ज़माने में

~ जौन एलिया


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Saturday, January 18, 2020

नारी एक कला है

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कुशल तूलिका वाले कवि की नारी एक कला है।

फूलों से भी अधिक सुकोमल
नरम अधिक नवनी से,
प्रतिपल पिछल-पिछल उठने वाली
अति इन्दु मनी से,
नवल शक्ति भरने वाली वह कभी नहीं अबला है।

तनया-प्रिया-जननि के
अवगुण्ठन में रहने वाली,
सत्यं शिवम् सुन्दरम् सी
जीवन में बहने वाली,
विरह मिलन की धूप-छाँह में पलती शकुन्तला है।

है आधार-शिला सुन्दरता की
मधु प्रकृति-परी सी,
शुभ संसृति का बीज लिये,
मनु की उस तरुण-तरी सी,
तिमिरावृत्त जीवन के श्यामल पट पर चंद्र्कला है।

करुणा की प्रतिमा वियोग की
मूर्ति-मधुर-अलबेली
निज में ही परिपूर्ण प्रेममय
जग आधार अकेली,
सारी संसृति टिकी हुई ऐसी सुन्दर अचला है।

अमृत-सिन्धु ,अमृतमयी
जग की कल्याणी वाणी।
अब भी चम-चम चमक रही हैं
तेरी चरण निशानी,
तेरे ही प्रकाश से जगमग दीप जला है।

नारी एक कला है॥

~ केदारनाथ पाण्डेय

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Friday, January 17, 2020

हम उन को छीन कर लाए हैं

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हम उन को छीन कर लाए हैं कितने दावेदारों से
शफ़क़ से चाँदनी-रातों से फूलों से सितारों से
शफ़क़= सवेरे या शाम की लालिमा

हमारे ज़ख़्म-ए-दिल दाग़-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं
गुलों से गुल-रुख़ों से महवशों से माह-पारों से
*गुल-रुख़ों=बहुत सुंदर; महवशों=चंद्रमुखी; माह-पारों=चाँद सी सूरत

ज़माने में कभी भी क़िस्मतें बदला नहीं करतीं
उमीदों से भरोसों से दिलासों से सहारों से

सुने कोई तो अब भी रौशनी आवाज़ देती है
गुफाओं से पहाड़ों से बयाबानों से ग़ारों से
*ग़ारों=गुफ़ाओं

बराबर एक प्यासी रूह की आवाज़ आती है
कुओं से पन-घटों से नद्दियों से आबशारों से
*आबशारों=झरनों

कभी पत्थर के दिल ऐ 'कैफ़' पिघले हैं न पिघलेंगे
मुनाजातों से फ़रियादों से चीख़ों से पुकारों से
*मुनाजातों=प्रार्थना

~ कैफ़ भोपाली

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Sunday, January 12, 2020

एक रक़्क़ासा थी



एक रक़्क़ासा थी किस किस से इशारे करती
आँखें पथराई अदाओं में तवाज़ुन न रहा
डगमगाई तो सब अतराफ़ से आवाज़ आई
फ़न के इस औज पे इक तेरे सिवा कौन गया

*रक़्क़ासा=नर्तकी; तवाजुन=संतुलन; फ़न=कला; औज=ऊँचाई

फ़र्श-ए-मरमर पे गिरी गिर के उठी उठ के झुकी
ख़ुश्क होंटों पे ज़बाँ फेर के पानी माँगा
ओक उठाई तो तमाशाई सँभल कर बोले
रक़्स का ये भी इक अंदाज़ है अल्लाह अल्लाह

*ओक=अंजुरी; रक़्स=नृत्य

हाथ फैले ही रहे सिल गई होंटों से ज़बाँ
एक रक़्क़ास किसी सम्त से नागाह बढ़ा!
पर्दा सरका तो मअन फ़न के पुजारी गरजे
रक़्स क्यूँ ख़त्म हुआ? वक़्त अभी बाक़ी था

*रक़्क़ास=नर्तकी; नागाह=अचानक; मअन=बहुत तेज़ी से

~ अहमद नदीम क़ासमी


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Saturday, January 11, 2020

हँसती आँखें हँसता चेहरा



हँसती आँखें हँसता चेहरा इक मजबूर बहाना है
चाँद में सच-मुच नूर कहाँ है चाँद तो इक वीराना है

नाज़ परस्तिश बन जाएगा सब्र ज़रा ऐ शोरिश-ए-दिल
उल्फ़त की दीवाना-गरी से हुस्न अभी बेगाना है
*नाज़=गर्व(सुंदरता का); परस्तिश=पूजा’; शोरिश-ए-दिल=बेचैनी

मुझ को तन्हा छोड़ने वाले तू न कहीं तन्हा रह जाए
जिस पर तुझ को नाज़ है उतना उस का नाम ज़माना है

तुम से मुझ को शिकवा क्यूँ हो आख़िर बासी फूलों को
कौन गले का हार बनाए कौन ऐसा दीवाना है

एक नज़र में दुनिया भर से एक नज़र में कुछ भी नहीं
चाहत में अंदाज़ नज़र ही चाहत का पैमाना है

ख़ुद तुम ने आग़ाज़ किया था जिस का एक तबस्सुम से
महरूमी के आँसू बन कर ख़त्म पे वो अफ़्साना है
*महरूमी=नाउम्मीदी

यूँ है उस की बज़्म-ए-तरब में इक दिल ग़म-दीदा जैसे
चारों जानिब रंग-महल हैं बीच में इक वीराना है
*बज़्म-ए-तरब=ख़ुशी की महफ़िल; ग़म-दीदा=शोक संतप्त

‍~ 
अंदलीब शादानी

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Friday, January 10, 2020

हिंदी के चेहरे पर चाँदी की चमक है

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कहने को जनता की कितनी मुँहबोली है
सुख-दुख में शामिल है सबकी हमजोली है
कामकाज में लेकिन रत्‍ती-भर धमक है
हिंदी के चेहरे पर चाँदी की चमक है.

ऊँचे आदर्शों के सपनों में खोई है
किये रतजगे कितनी रात नहीं सोई है
आजादी की खातिर बलिदानी वीरों की
यादों में यह कितनी घुट-घुट कर रोई है.
यों तो यह भोली है, युग की रणभेरी है
लेकिन अंग्रेजी की, भृत्या है, चेरी है
हाथों में संविधान फिर भी है तुच्‍छ मान
आंखों में लेकिन पटरानी-सी ललक है
हिंदी के चेहरे पर चाँदी की चमक है.

कितने ईनाम और कितने प्रोत्‍साहन हैं
फिर भी मुखमंडल पर कोरे आश्‍वासन हैं.
जेबों में सोने के सिक्‍कों की आमद है
फाइल पर हिंदी की सिर्फ हिनहिनाहट है.
बैठक में चर्चा है दो जो भी देना है.
महामहिम के हाथो पुरस्‍कार लेना है.
कितना कुछ निष्‍प्रभ है, समारोह लकदक है
शील्‍ड लिये हाथों में क्‍या शाही लचक है!
हिंदी के चेहरे पर चांदी की चमक है.

इत्रों के फाहे हैं, टाई की चकमक है
हिंदी की देहरी पर हिंग्‍लिश की दस्‍तक है.
ऊँची दूकानों के फीके पकवान हैं
बॉस मगर हिंदी के परम ज्ञानवान हैं.
शाल औ दुशाला है पान औ मसाला है.
उबा रहे भाषण हैं यही कार्यशाला है.
हिंदी की बिंदी की होती चिंदी-चिंदी
गायब होता इसके चेहरे का नमक है.
हिंदी के चेहरे पर चॉंदी की चमक है.

हिंदी के तकनीकी शब्‍द बहुत भारी हैं
शब्‍दकोश भी जैसे बिल्‍कुल सरकारी हैं.
भाषा यह रंजन की और मनोरंजन की
इस भाषा में दिखते कितने व्‍यापारी हैं.
बेशक इस भाषा का ऑंचल मटमैला है
राष्‍ट्रप्रेम का केवल शुद्ध झाग फैला है.
दाग़ धुलें कैसे इस दाग़दार चेहरे के
नकली मुस्कानें हैं, बेमानी ठसक है.
हिंदी के चेहरे पर चांदी की चमक है.

हिंदी की सेवा है, हिंदी अधिकारी हैं
खाते सब मेवा हैं, गाते दरबारी हैं
एक दिवस हिंदी का, एक शाम हिंदी की
बाकी दिन कुर्सी पर अंग्रेजी प्‍यारी है.
कैसा यह स्‍वाभिमान अपना भारत महान !
हिंदी अपने ही घर दीन-हीन,मलिन-म्‍लान

पांवों के नीचे है इसके दलदल ज़मीन
नित प्रति बुझती जाती सत्‍ता की हनक है.
हिंदी के चेहरे पर चॉंदी की चमक है.

~ ओम निश्‍चल

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Wednesday, January 8, 2020

न जाने रूठ के बैठा है

न जाने रूठ के बैठा है दिल का चैन कहाँ
मिले तो उस को हमारा कोई सलाम कहे
~ कलीम आजिज़

 Jan 08, 2020 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, January 4, 2020

इस नाज़ इस अंदाज़ से तुम


इस नाज़ इस अंदाज़ से तुम हाए चलो हो
रोज़ एक ग़ज़ल हम से कहलवाए चलो हो

रखना है कहीं पाँव तो रक्खो हो कहीं पाँव
चलना ज़रा आया है तो इतराए चलो हो

दीवाना-ए-गुल क़ैदी-ए-ज़ंजीर हैं और तुम
क्या ठाट से गुलशन की हवा खाए चलो हो

मय में कोई ख़ामी है न साग़र में कोई खोट
पीना नहीं आए है तो छलकाए चलो हो

हम कुछ नहीं कहते हैं कोई कुछ नहीं कहता
तुम क्या हो तुम्हीं सब से कहलवाए चलो हो

ज़ुल्फ़ों की तो फ़ितरत ही है लेकिन मिरे प्यारे
ज़ुल्फ़ों से ज़ियादा तुम्हीं बल खाए चलो हो

वो शोख़ सितमगर तो सितम ढाए चले है
तुम हो कि 'कलीम' अपनी ग़ज़ल गाए चलो हो

~ कलीम आजिज़


 Jan 04, 2020 | e-kavya.blogspot.com
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Wednesday, January 1, 2020

नया साल

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2020 - नये साल की मुबारक बाद - नूतन वर्षाभिनंदन

दुआएँ और दुआओं से भरी
बे-अंत तहरीरें*
मुझे हर साल के इन आख़िरी
लम्हों में मिलती हैं

मेरे अहबाब* के नामों में
अक्सर दर्ज होता है
ख़ुदा महफ़ूज़* रक्खे
साल भर मुझ को बलाओं से
मुझे अब ज़हर में लिपटी हवाएँ
छू के न गुज़रें
मुझे मौजूद और आने वाले
साल के लम्हे
मुबारक दर मुबारक हों

यही तहरीर मैं अहबाब को
वापस लुटाता हूँ
यही जज़्बात मेरे दोस्तों
के नाम होते हैं
मगर फिर वक़्त के हाथों

न जाने क्या गुज़रती है
कि जो भी तीर आता है
उसी जानिब से आता है
जहाँ से इत्र में डूबा हुआ
पैग़ाम आया था
जहाँ से साल भर
महफ़ूज़ रहने का
हसीं मलफ़ूफ़
मेरे नाम आया था

*तहरीर=लिखावटें; अहबाब=मित्र-गण; महफ़ूज़=सुरक्षित; मलफ़ूफ़=लिफ़ाफ़े में बंद खत

‍~ इक़बाल नाज़िर


 Jan 01, 2020 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh