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Saturday, August 31, 2019

फूल की ख़ुशबू


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फूल की ख़ुशबू हँसती आई
मेरे बसेरे को महकाने
मैं ख़ुशबू में ख़ुशबू मुझ में
उस को मैं जानूँ मुझ को वो जाने
मुझ से छू कर मुझ में बस कर
इस की बहारें उस के ज़माने
लाखों फूलों की महकारें
रखते हैं गुलशन वीराने
मुझ से अलग हैं मुझ से जुदा हैं
मैं बेगाना वो बेगाने

उन को बिखेरा उन को उड़ाया
दस्त-ए-ख़िज़ाँ ने मौज-ए-सबा ने
भूला-भटका नादाँ क़तरा
आँखों की पुतली को सजाने
आँसू बन कर दौड़ा आया
मेरी पलकें उस के ठिकाने
उस का थिरकना, उस का तड़पना
मेरे क़िस्से मेरे फ़साने
उस की हस्ती मेरी हस्ती
उस के मोती मेरे ख़ज़ाने
बाक़ी सारे गौहर-पारे
ख़ाक के ज़र्रे रेत के दाने

पर्बत की ऊँची चोटी से
दामन फैलाया जो घटा ने
ठंडी हवा के ठंडे झोंके
बे-ख़ुद आवारा मस्ताने
अपनी ठंडक ले कर आए
मेरी आग में घुल-मिल जाने
उन की हस्ती का पैराहन
मेरी साँस के ताने-बाने
उन के झकोले मेरी उमंगें
उन की नवाएँ मेरे तराने
बाक़ी सारे तूफ़ानों को
जज़्ब किया पहना-ए-फ़ज़ा ने

फ़ितरत की ये गूनागूनी
गुलशन बिन वादी वीराने
काँटे कलियाँ नूर अंधेरा
अंजुमनें शमएँ परवाने
लाखों शातिर लाखों मोहरे
फैले हैं शतरंज के ख़ाने
जानता हूँ मैं ये सब क्या हैं
सहबा से ख़ाली पैमाने
भूकी मिट्टी को सौंपे हैं
दुनिया ने अपने नज़राने
जिस ने मेरा दामन थामा
आया जो मुझ में बस जाने
मेरे तूफ़ानों में बहने
मेरी मौजों में लहराने

मेरे सोज़-ए-दिल की लौ से
अपने मन की जोत जगाने
ज़ीस्त की पहनाई में फैले
मौत की गीराई को न जाने
उस का बरबत मेरे नग़्मे
उस के गेसू मेरे शाने
मेरी नज़रें उस की दुनिया
मेरी साँसें उस के ज़माने

~ मजीद अमजद

 Feb 15, 2020 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, August 30, 2019

कौन सोचे



कौन सोचे कि
सूरज के हाथों में क्या है
हवाओं की तहरीर पढ़ने की
फ़ुर्सत किसी को नहीं
कौन ढूँडे
फ़ज़ाओं में तहलील रस्ता
कौन गुज़रे
सोच के साहिलों से
ख़्वाहिशों की सुलगती हुई रेत को
कौन हाथों में ले
कौन उतरे
समुंदर की गहराइयों में
चाँदनी की जवाँ उँगलियों में
उँगलियाँ कौन डाले
कौन समझे
मिरे फ़लसफ़े को
जल्द ही ये सफ़र ख़त्म होने को है
किसी बेनाम-ओ-निशाँ लम्हे में दिल चाहता है

दूरियाँ बस मिरी मुट्ठी में सिमट कर रह जाएँ
डोरियाँ ख़ेमा-ए-तन्हाई की कट कर रह जाएँ 

*बेनाम-ओ-निशाँ=पहचान रहित;  ख़ेमा-ए-तन्हाई= अकेलेपन का डेरा


~ असअ'द बदायुनी


 Aug 30, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Saturday, August 24, 2019

किस ओर मैं, किस ओर मैं

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किस ओर मैं, किस ओर मैं!

है एक ओर असित निशा,
है एक ओर अरुण दिशा,
पर आज स्‍वप्‍नों में फँसा, यह भी नहीं मैं जानता
किस ओर मैं, किस ओर मैं!

है एक ओर अगम्‍य जल,
है एक ओर सुरम्‍य थल,
पर आज लहरों से ग्रसा, यह भी नहीं मैं जानता
किस ओर मैं, किस ओर मैं!

है हार ऐक तरफ पड़ी,
है जीत ऐक तरफ खड़ी,
संघर्ष-जीवन में धँसा, यह भी नहीं मैं जानता।
किस ओर मैं, किस ओर मैं!

~ हरिवंशराय बच्चन

 Aug 24, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, August 23, 2019

आजु दिन कान्ह आगमन




आजु दिन कान्ह आगमन के बधाए सुनि ,
छाए मग फूलन सुहाए थल थल के।
कहैँ पदमाकर त्योँ आरती उतारिबे को ,
थारन मे दीप हीरा हारन के छलके।
कंचन के कलस भराए भूरि पन्नन के ,
ताने तुँग तोरन तहाँई झलाझल के।
पौर के दुवारे तैँ लगाय केलि मँदिर लौ,
पदमिनि पांवडे पसारे मखमल के।

~ पद्माकर

 Aug 23, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, August 18, 2019

मेरा वतन हिन्दोस्ताँ

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मेरा वतन हिन्दोस्ताँ 
हर राह जिस की कहकशाँ
कोह-ए-गिराँ से कम नहीं जिस के जियाले नौजवाँ
ये वीर-ओ-गौतम की ज़मीं अमन-ओ-अहिंसा का चमन
अकबर के ख़्वाबों का जहाँ चिश्ती-ओ-नानक का वतन
शमएँ हज़ारों हैं मगर है एकता की अंजुमन
तहज़ीब का गहवारा हैं गंग-ओ-जमन की वादियाँ
मेरा वतन हिन्दोस्ताँ

तारीख़ की अज़्मत है ये जम्हूरियत की शान है
रूहानियत की रूह है सब मज़हबों की जान है
ये अपना हिन्दोस्तान है ये अपना हिन्दोस्तान है
हासिल यहाँ इंसान को हर तरह की आज़ादियाँ
मेरा वतन हिन्दोस्ताँ

जब दिल से दिल मिलते गए मिटते गए सब फ़ासले
ये आज का नग़्मा नहीं सदियों के हैं ये सिलसिले
सदियों से मिल कर ही बढ़े सब अहल-ए-दिल के क़ाफ़िले
इक साथ उठती है यहाँ आवाज़-ए-नाक़ूस-ओ-अज़ाँ
मेरा वतन हिन्दोस्ताँ

तारीख़ के इस मोड़ पर हम फ़र्ज़ से ग़ाफ़िल नहीं
क़ाबू न जिस पर पा सकें ऐसी कोई मुश्किल नहीं
जिस को न हम सर कर सकें ऐसी कोई मंज़िल नहीं
हाँ बाँकपन की शान से है कारवाँ अपना रवाँ
मेरा वतन हिन्दोस्ताँ

~ रिफ़अत सरोश

 Aug 18, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, August 17, 2019

ज़िंदगी घबरा गई है

 
जिस्म का जस, रूप का रस, काम का कस
ज़िंदगी की ये सुहानी धूप बहलाती रही है मेरे मन को
ख़ूब गरमाती रही है, आरज़ूओं की पवन को
और चमकाती रही है अपने-पन को

*जस=उत्कृष्टता; रस=मर्म, तत्व; कस=दुराग्रह, सख़्त पकड़

दे के इक नश्शा नयन को
लज्जतों में डूब कर भी
मैं उभरता ही रहा हूँ
सोच की बे-ताब लहरें ज़ेहन में रक़्साँ रही हैं

*लज्जत=स्वादिष्ट पन; रक़्साँ=नृत्य करती

लेकिन अब तो इक उदासी छा गई है
सोच की शाम आ गई है
ज़िंदगी घबरा गई है

~ कृष्ण मोहन

 Aug 17, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, August 16, 2019

ख़्वाब के म'अनी

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ख़्वाबों से तही (खाली) बे-नूर आँखें
हर शाम नए मंज़र चाहें
बेचैन बदन प्यासी रूहें
हर आन नए पैकर (शरीर) चाहें

बेबाक लहू
अन-देखे सपनों की ख़ातिर
जाने अनजाने रस्तों पर
कुछ नक़्श (निशान) बनाना चाहता है
बंजर पामाल (रौंदी) ज़मीनों में
कुछ फूल खिलाना चाहता है

यूँ नक़्श कहाँ बन पाते हैं
यूँ फूल कहाँ खिलने वाले
इन बदन-दरीदा (फटे हाल बदन) रूहों के
यूँ चाक (फटे हुए) कहाँ सिलने वाले

बेबाक लहू को हुर्मत (इज़्ज़त) के आदाब सिखाने पड़ते हैं
तब मिट्टी मौज में आती है
तब ख़्वाब के म'अनी बनते हैं
तब ख़ुशबू रंग दिखाती है

~  इफ़्तेख़ारआरिफ़


 Aug 16, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Thursday, August 15, 2019

आज़ादी

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आज हम सब शाद हैं अपना वतन आज़ाद है
हम हैं बुलबुल जिस चमन के वो चमन आज़ाद है
आज आज़ादी का दिन है आओ हम ख़ुशियाँ मनाएँ
नाच आज़ादी का नाचें गीत आज़ादी के गाएँ
थी घटा छाई हुई अंधेर की वो छट गई
तेग़-ए-आज़ादी से ज़ंजीर-ए-ग़ुलामी कट गई
*शाद=प्रसन्न; तेग़=तलवार

आज वो दिन है हुई थी देश की जनता की जीत
आज ही के दिन चली थी इस में आज़ादी की रीत
आज वो दिन है तराने ऐश के इशरत के गाएँ
आज वो दिन है कि तानें मिल के ख़ुशियों की उड़ाएँ
क़ौम जो आज़ाद है दुनिया में इज़्ज़त उस की है
आन उस की शान उस की और अज़्मत उस की है
* इशरत=ख़ुशी; अज़्मत=प्रतिष्ठा

देश के बच्चे भी ख़ुश हैं क्यों न हो इन की ख़ुशी
खिल गई है फूल बन कर आज हर दिल की कली
दिल लगी है चहल है और हर तरफ़ हैं क़हक़हे
हैं ये बुलबुल इस चमन के कर रहे हैं चहचहे
दिल में जज़्बा है जवाँ हो कर सभी आगे बढ़ें
अज़्म है ये जान-ओ-दिल से देस की ख़िदमत करें
*अज़्म=दृढ़ निश्चय

अम्न-ओ-आज़ादी का हम पैग़ाम दुनिया को सुनाएँ
देस की अपने बड़ाई अपने कामों से दिखाएँ
फ़र्ज़ अपना हम करें दिल से अदा और जान से
हो वफ़ादारी हमारी अपने हिन्दोस्तान से
एक इक बच्चा गई हो इल्म का चर्चा बढ़े
एक इक बच्चा धनी हो देस की सेवा करे
*अम्न=शांति

एक इक बच्चा रहे बढ़ चढ़ के गुन और ज्ञान में
इक से इक बढ़ कर दिखाए आप को विज्ञान में
आओ 'नय्यर' देस के बच्चों की झुरमुट में तुम आओ
आओ आओ नज़्म आज़ादी की बच्चों को सुनाओ
आओ सब ना'रा लगाएँ ज़िंदाबाद हिन्दोस्तान
आओ हम सब मिल के गाएँ ज़िंदाबाद हिन्दोस्तान
ज़िंदाबाद हिन्दोस्तान ज़िंदाबाद हिन्दोस्तान

~ मोहम्मद शफ़ीउद्दीन नय्यर


 Aug 15, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Wednesday, August 14, 2019

ख़राबी

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ख़राबी का आग़ाज़
कब और कहाँ से हुआ
ये बताना है मुश्किल
कहाँ ज़ख़्म खाए
कहाँ से हुए वार
ये भी दिखाना है मुश्किल
कहाँ ज़ब्त की धूप में हम बिखरते गए
और कहाँ तक कोई सब्र हम ने समेटा
सुनाना है मुश्किल

ख़राबी बहुत सख़्त-जाँ है
हमें लग रहा था ये हम से उलझ कर
कहीं मर चुकी है
मगर अब जो देखा तो ये शहर में
शहर के हर मोहल्ले में हर हर गली में
धुएँ की तरह भर चुकी है

ख़राबी रूएँ में
ख़्वाबों में, ख़्वाहिश में
रिश्तों में घिर चुकी है
ख़राबी तो लगता है
ख़ूँ में असर कर चुकी है

ख़राबी का आग़ाज़
जब भी जहाँ से हुआ हो
ख़राबी के अंजाम से ग़ालिबन
जाँ छुड़ाना है मुश्किल

~ अज़्म बहज़ाद


 Aug 14, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, August 11, 2019

नया आने वाला ज़माना हमारा

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है रौशन हक़ीक़त फ़साना हमारा
नई ज़िंदगी बन के बिखरेगा हर सू
नई रौशनी का तराना हमारा
नया आने वाला ज़माना हमारा

पुराने चराग़ों के मद्धम उजालो
हमारे ही हाथों सजेगी ये महफ़िल
हमें सिर्फ़ बच्चा समझ कर न टालो
नया आने वाला ज़माना हमारा

तुम्हारी बुज़ुर्गी का है पास हम को
मगर इस नए दौर की रौशनी में
है अपने फ़राएज़ का एहसास हम को
नया आने वाला ज़माना हमारा
*पास=लिहाज़; फ़राएज़=फ़र्ज़(बहुवचन)

ये दौर-ए-शबाब बहार-ए-ज़मीं है
तुम्हारा ज़माना तो जैसा रहा हो
नया आने वाला ज़माना हसीं है
नया आने वाला ज़माना हमारा

~ सलाम मछलीशहरी


 Aug 11, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, August 10, 2019

तुम्हें ख़्वाहिश को छूने की तमन्ना है



तुम्हें ख़्वाहिश को छूने की तमन्ना है

ख़्वाहिशें तो उड़ती-फिरती तितलियाँ हैं
डाक की नाकारा टिकटें तो नहीं हैं
जिन्हें एल्बम में रख कर तुम ये समझो
कि ये नायाब चीज़ें अब तुम्हारी दस्तरस (पहुँच) में हैं

तुम्हें सपने पकड़ने की तमन्ना है
नहीं ये ग़ैर-मुमकिन है
कि सपने अन-छुए लम्हों के नाज़ुक अक्स (प्रतिबिम्ब) हैं
आराइशी (सजी हुई) बेलें नहीं
जो कमरे की किसी दीवार पर सज कर
तुम्हारी दीद (नज़र) का एहसाँ उठाएँ

तुम्हें कोहरे के भीगे फूल चुनने की तमन्ना है
ये कोहरा तो चराग़-ए-मौसम-ए-गुल का धुआँ है
कोई दीवार-ए-बर्लिन पर खिंची तहरीर (लिखावट) या नक़्शा नहीं
जिसे जिस वक़्त जो चाहे बदल दे
या मिटा दे
सब्ज़-रू (हरित) कोहरा पकड़ना इस क़दर आसाँ नहीं

सुनो, दीवानगी छोड़ो
चलो वापस हक़ीक़त में चलें

~ हामिद यज़दानी


 Aug 10, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, August 9, 2019

मेरी इक छोटी सी कोशिश

 
मेरी इक छोटी सी कोशिश तुझ को पाने के लिए
बन गई है मसअला सारे ज़माने के लिए

रेत मेरी उम्र मैं बच्चा निराले मेरे खेल
मैं ने दीवारें उठाई हैं गिराने के लिए

वक़्त होंटों से मिरे वो भी खुरच कर ले गया
इक तबस्सुम जो था दुनिया को दिखाने के लिए

आसमाँ ऐसा भी क्या ख़तरा था दिल की आग से
इतनी बारिश एक शोले को बुझाने के लिए

छत टपकती थी अगरचे फिर भी आ जाती थी नींद
मैं नए घर में बहुत रोया पुराने के लिए

देर तक हँसता रहा उन पर हमारा बचपना
तजरबे आए थे संजीदा बनाने के लिए

मैं 'ज़फ़र' ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में
अपनी घर-वाली को इक कंगन दिलाने के लिए

~ ज़फ़र गोरखपुरी


 Aug 9, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, August 4, 2019

हसरत कहूँ तो किस से कहूँ

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भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ
सुने है कौन मुसीबत कहूँ तो किस से कहूँ

जो तू हो साफ़ तो कुछ मैं भी साफ़ तुझ से कहूँ
तिरे है दिल में कुदूरत कहूँ तो किस से कहूँ
*कुदूरत=मैल

न कोहकन है न मजनूँ कि थे मिरे हमदर्द
मैं अपना दर्द-ए-मोहब्बत कहूँ तो किस से कहूँ
*कोहकन= फ़रहाद, जिसने शीरीं के लिए पहाड़ काटा था

दिल उस को आप दिया आप ही पशेमाँ हूँ
कि सच है अपनी नदामत कहूँ तो किस से कहूँ
*पशेमाँ=शर्मिंदा; नदामत=लज्जा

कहूँ मैं जिस से उसे होवे सुनते ही वहशत
फिर अपना क़िस्सा-ए-वहशत कहूँ तो किस से कहूँ

रहा है तू ही तो ग़म-ख़्वार ऐ दिल-ए-ग़म-गीं
तिरे सिवा ग़म-ए-फ़ुर्क़त कहूँ तो किस से कहूँ
*ग़म-ख़्वार=सांत्वना देने वाला; दिल-ए-ग़म-गीं=दुखी मन; ग़म-ए-फ़ुर्क़त=अलग होने का दुख

जो दोस्त हो तो कहूँ तुझ से दोस्ती की बात
तुझे तो मुझ से अदावत कहूँ तो किस से कहूँ
*अदावत=दुश्मनी

न मुझ को कहने की ताक़त कहूँ तो क्या अहवाल
न उस को सुनने की फ़ुर्सत कहूँ तो किस से कहूँ

किसी को देखता इतना नहीं हक़ीक़त में
'ज़फ़र' मैं अपनी हक़ीक़त कहूँ तो किस से कहूँ

~ बहादुर शाह ज़फ़र

 Aug 4, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Friday, August 2, 2019

ज्ञान घटे ठग चोर की सँगति

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ज्ञान घटे ठग चोर की सँगति, मान घटे पर गेह के जाये,
पाप घटे कछु पुन्य किये, अरु रोग घटे कछु औषध खाये।
प्रीति घटे कछु माँगन तें, अरु नीर घटे रितु ग्रीषम आये,
नारि प्रसंग ते जोर घटे, जम त्रास घटे हरि के गुन गाये।।

~ अज्ञात

भावार्थ:

धूर्त र्और धोखेबाज़ लोगों के साथ रहने से ज्ञान कम होता है, और दूसरे के घर बार बार जाने से सम्मान। परंतु इस दुनिया में पुण्य के काम करने से पाप कम होते हैं, और औषधि यानि कि दवा खाने से रोग नियंत्रण में होता है। कुछ माँगने से प्रेम में कमी आती है, जैसे कि गर्मी की ऋतु आने पर ताल तलैयों में पानी की कमी हो जाती है। इसी तरह सदा स्त्रियों के बारे में सोचने और चर्चा करते रहने से शरीर में दुर्बलता और मन के नियंत्रण में कमज़ोरी आती है लेकिन हरि के गुण गाने से डर, भय और तकलीफ़ में जम कर कमी आती है।


 Aug 2, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, July 27, 2019

अबकी अगर लौटा तो

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अबकी अगर लौटा तो
बृहत्तर लौटूँगा

चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं
कमर में बाँधे लोहे की पूँछें नहीं
जगह दूँगा साथ चल रहे लोगों को
तरेर कर न देखूँगा उन्हें
भूखी शेर-आँखों से

अबकी अगर लौटा तो
मनुष्यतर लौटूँगा
घर से निकलते
सड़कों पर चलते
बसों पर चढ़ते
ट्रेनें पकड़ते
जगह बेजगह कुचला पड़ा
पिद्दी-सा जानवर नहीं

अगर बचा रहा तो
कृतज्ञतर लौटूँगा

अबकी बार लौटा तो
हताहत नहीं
सबके हिताहित को सोचता
पूर्णतर लौटूँगा

*बृहत्तर=किसी बड़े या विस्तृत की तुलना में और भी बड़ा या विशाल

~ कुँवर नारायण


 Jul 27, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, July 26, 2019

प्यार करते रहो

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सब कि सुनते रहो
प्यार करते रहो
और कुछ न कहो

चाहे बोलें न वो
लब को खोलें न वो
दिल अलग बात है
अपने लहजा में भी
प्यार घोलें न वो
अपना जो फ़र्ज़ है
इस तरह हो अदा
जैसे एक क़र्ज़ है
कोई जो कुछ कहे
उस कि सुनते रहो
प्यार करते रहो

और कुछ न कहो
बे-ख़याली में ही
लब जो खुल जाएँ तो
और ज़बाँ पर कभी
कोई सच आ गया
यूँ समझ लूँ कि फिर
सिलसिले जितने थे
दरमियाँ जो भी था
ख़्वाब देखे थे जो
सब बिखर जाएँगे
ऐसा करना नहीं
सब की सुनना मगर
तुम बिखरना नहीं
मसले सब के सब
हैं सफ़ेद-ओ-सियाह
मसअलों मैं कभी
रंग भरना नहीं
दिल में गर प्यार हो
लब पे इक़रार हो
प्यार ही प्यार बस
हर्फ़-ए-इज़हार हो
गर अना ये कहे
दिल न मिल पाएँगे
इस पे मत जाइए
खोटी हे ये अना
इस से कुछ न बना
दिल की बातें सुनो
फ़ासले से सहीह
प्यार करते रहो
और कुछ न कहो

रास्ता एक है
मुद्दआ' एक है
इक हमारी है क्या
सारी दुनिया का ही
सिलसिला एक है
एक आए थे हम
एक आए थे तुम
एक है ये सफ़र
भीड़ कितनी भी हो
अपनी अपनी जगह
हर कोई एक है
नाम हैं गो जुदा
पर ख़ुदा एक है
बस ख़ुदा की तरह
सब की सुनते रहो
प्यार करते रहो

और कुछ न कहो
कहने सुनने से तो
कुछ बदलता नहीं
रात जाती नहीं
दिन ठहरता नहीं
होने वाला है क्या
कुछ भी खुलता नहीं
वक़्त कम है बहुत
इतने कम वक़्त में
जिस क़दर कर सको
प्यार करते रहो
और कुछ न कहो

~ अदील ज़ैदी


 Jul 26, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, July 21, 2019

तुम्हारे लिए

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तुम्हारे लिए सँभाल कर रक्खा था
ज़मीन की कशिश से बाहर एक आसमान
एक घोड़े की पीठ
और एक सड़क जिस पर
धूप चमकीली
बारिश अलबेली होती है
एक मिसरा लिखा था तुम्हारे लिए
मन की मिट्टी में दबा कर रखी थी
तुम्हारे नाम की कोंपल
तुम्हारे लिए बचाई थी
लहू की लाली
रतजगे
अक़ीदों की शिकस्तगी
आग की लपटें एक हाथ में
एक में आब-ए-पाक
एक आँख शर्मीली
एक आँख बेबाक
कश्ती के तख़्ते
और शौक़ का मव्वाज दरिया
शहद दुनिया को बाँट दिया
बचा कर रखा अपना मोम
तुम उस की बाती होतीं
हम जलते सारी रात

तुम ने चुना
सोने का सिंदूर
चाँदी की चँगीरी
पलंग नक़्शीन
पुख़्ता छत
पक्की दीवारें
पक्का घड़ा
उथला कुआँ

पानी जैसा ठहर गईं तुम
हवा के जैसा बिखर गया मैं

~ ख़ुर्शीद अकरम

 Jul 21, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, July 20, 2019

रात मीठी चांदनी है

 
रात मीठी चांदनी है,
मौन की चादर तनी है।

एक चेहरा या कटोरा सोम मेरे हाथ में,
दो नयन या नखत वाले व्‍योम मेरे हाथ में,
प्रकृति कोई कामिनी है,
या चमकती नागिनी है।

रूप - सागर कब किसी की चाह में मैले हुए,
ये सुवासित केश मेरी बांह पर फैले हुए,
ज्‍योति में छाया बनी है,
देह से छाया घनी है।

वासना के ज्‍वार उठ-उठ चंद्रमा तक खिंच रहे,
ओंठ पाकर ओंठ मदिरा सागरों में सिंच रहे;
सृष्टि तुमसे मांगनी है,
क्‍योंकि यह जीवन ऋणी है।

वह मचलती-सी नजर उन्‍माद से नहला रही,
वह लिपटती बांह नस-नस आग से सहला रही,
प्‍यार से छाया सनी है,
गर्भ से छाया धनी है।

दामिनी की कसमसाहट से जलद जैसे चिटकता,
रौंदता हर अंग प्रतिपल फूटकर आवेग बहता।
एक मुझमें रागिनी है,
जो कि तुमसे जागनी है।

~ कुँवर नारायण

 Jul 20, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh

Sunday, July 14, 2019

ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर


ऐ इश्क़ न छेड़ आ आ के हमें, हम भूले हुओं को याद न कर
पहले ही बहुत नाशाद हैं हम, तू और हमें नाशाद न कर
क़िस्मत का सितम ही कम नहीं कुछ, ये ताज़ा सितम ईजाद न कर
यूँ ज़ुल्म न कर, बे-दाद न कर
ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर
*नाशाद=दु:खी; बेदाद=ज़ुल्म

जिस दिन से मिले हैं दोनों का, सब चैन गया आराम गया
चेहरों से बहार-ए-सुब्ह गई, आँखों से फ़रोग़-ए-शाम गया
हाथों से ख़ुशी का जाम छुटा, होंटों से हँसी का नाम गया
ग़मगीं न बना, नाशाद न कर
ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर
*फ़रोग़-ए-शाम=शाम की रौनक

हम रातों को उठ कर रोते हैं, रो रो के दुआएँ करते हैं
आँखों में तसव्वुर दिल में ख़लिश, सर धुनते हैं आहें भरते हैं
ऐ इश्क़ ये कैसा रोग लगा, जीते हैं न ज़ालिम मरते हैं
ये ज़ुल्म तू ऐ, जल्लाद न कर
ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर
*तसव्वुर=सपने; ख़लिश=फ़िक्र

ये रोग लगा है जब से हमें, रंजीदा हूँ मैं बीमार है वो
हर वक़्त तपिश हर वक़्त ख़लिश, बे-ख़्वाब हूँ मैं बेदार है वो
जीने पे इधर बेज़ार हूँ मैं, मरने पे उधर तयार है वो
और ज़ब्त कहे, फ़रियाद न कर
ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर
*रंजीदा=संतप्त; बेज़ार=थके हुए; ज़ब्त=आत्म नियंत्रण

जिस दिन से बँधा है ध्यान तिरा, घबराए हुए से रहते हैं
हर वक़्त तसव्वुर कर कर के, शरमाए हुए से रहते हैं
कुम्हलाए हुए फूलों की तरह, कुम्हलाए हुए से रहते हैं
पामाल न कर, बर्बाद न कर
ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर
*पामाल=परों से कुचलना

बेदर्द! ज़रा इंसाफ़ तो कर, इस उम्र में और मग़्मूम है वो
फूलों की तरह नाज़ुक है अभी, तारों की तरह मासूम है वो
ये हुस्न सितम! ये रंज ग़ज़ब! मजबूर हूँ मैं मज़लूम है वो
मज़लूम पे यूँ, बे-दाद न कर
ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर
*मग़्मूम=दु:खी; मज़लूम=उत्पीड़ित

ऐ इश्क़ ख़ुदारा देख कहीं, वो शोख़-ए-हज़ीं बद-नाम न हो
वो माह-लक़ा बद-नाम न हो, वो ज़ोहरा-जबीं बद-नाम न हो
नामूस का उस के पास रहे, वो पर्दा-नशीं बद-नाम न हो
उस पर्दा-नशीं, को याद न कर
ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर
*ख़ुदारा=ईश्वर के लिए; शोख़-ए-हज़ीं=हास्यास्पद दुख; माह-लक़ा=चंद्रमुखी; ज़ोहरा-जबीं=वीनस जैसे माथे वाली यानि कि सौंदर्य/प्रेम की देवी

~ अख़्तर शीरानी

 Jul 14, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, July 13, 2019

इस पे भूले हो कि हर दिल को


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इस पे भूले हो कि हर दिल को कुचल डाला है
इस पे भूले हो कि हर गुल को मसल डाला है
और हर गोशा-ए-गुलज़ार में सन्नाटा है
*गोशा-ए-गुलज़ार=बाग के कोने कोने

किसी सीने में मगर एक फ़ुग़ाँ तो होगी
आज वो कुछ न सही कल को जवाँ तो होगी
*फ़ुग़ाँ=आह, फ़रियाद

वो जवाँ हो के अगर शोला-ए-जव्वाला बनी
वो जवाँ हो के अगर आतिश-ए-सद-साला बनी
*शोला-ए-जव्वाला=नाचता हुआ शोला; आतिश-ए-स्द-साल=सौ साल तक जलने वाली आग

ख़ुद ही सोचो कि सितम-गारों पे क्या गुज़रेगी
*सितम-गार=अत्याचारी

‍~ अली सरदार जाफ़री

 Jul 13, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, July 12, 2019

तू अगर सैर को निकले तो

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तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए

सुरमई शाल का डाले हुए माथे पे सिरा
बाल खोले हुए संदल का लगाए टीका
यूँ जो हँसती हुई तू सुब्ह को आ जाए ज़रा
बाग़-ए-कश्मीर के फूलों को अचम्भा हो जाए
तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए

ले के अंगड़ाई जो तू घाट पे बदले पहलू
चलता फिरता नज़र आ जाए नदी पर जादू
झुक के मुँह अपना जो गंगा में ज़रा देख ले तू
निथरे पानी का मज़ा और भी मीठा हो जाए
तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए

सुब्ह के रंग ने बख़्शा है वो मुखड़ा तुझ को
शाम की छाँव ने सौंपा है वो जोड़ा तुझ को
कि कभी पास से देखे जो हिमाला तुझ को
इस तिरे क़द की क़सम और भी ऊँचा हो जाए
तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए

~ जोश मलीहाबादी

 Jul 12, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, July 6, 2019

छा गई बरसात की पहली घटा

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छा गई बरसात की पहली घटा अब क्या करूँ
ख़ौफ़ था जिस का वो आ पहुँची बला अब क्या करूँ
हिज्र को बहला चली थी गर्म मौसम की सुमूम
ना-गहाँ चलने लगी ठंडी हवा अब क्या करूँ

*हिज्र=वियोग; सुमूम=लू जैसी हवा; ना-गहाँ=अचानक

आँख उठी ही थी कि अब्र-ए-लाला-गूँ की छाँव में
दर्द से कहने लगा कुछ झुटपुटा अब क्या करूँ
अश्क अभी थमने न पाए थे कि बेदर्दी के साथ
बूंदियों से बोस्ताँ बजने लगा अब क्या करूँ

*अब्र-ए-लाला-गूँ=लालिमा लिए हुए बादल; बोस्ताँ=ख़ुशी के बाग़

ज़ख़्म अब भरने न पाए थे कि बादल चर्ख़ पर
आ गया अंगड़ाइयाँ लेता हुआ अब क्या करूँ
आ चुकी थी नींद सी ग़म को कि मौसम ना-गहाँ
बहर-ओ-बर में करवटें लेने लगा अब क्या करूँ

*चर्ख़=आसमान; ना-गहाँ=अचानक; बहर-ओ-बर=ज़मीन और पानी

चर्ख़ की बे-रंगियों से सुस्त थी रफ़्तार-ए-ग़म
यक-ब-यक हर ज़र्रा गुलशन बन गया अब क्या करूँ
क़ुफ़्ल-ए-बाब-ए-शौक़ थीं माहौल की ख़ामोशियाँ
दफ़अतन काफ़िर पपीहा बोल उठा अब क्या करूँ

*क़ुफ़्ल-ए-बाब-ए-शौक़=प्रेमनगर का दरवाज़ा; दफ़अतन=अचानक

हिज्र का सीने में कुछ कम हो चला था पेच-ओ-ताब
बाल बिखराने लगी काली घटा अब क्या करूँ
आँख झपकाने लगी थी दिल में याद-ए-लहन-ए-याद
मोर की आने लगी बन से सदा अब क्या करूँ

*पेच-ओ-ताब=घुमाव; याद-ए-लहन-ए-याद=किसी चीज़ का बार बार याद आना

घट चला था ग़म की रंगीं बदलियों की आड़ से
उन का चेहरा सामने आने लगा अब क्या करूँ
आ रही हैं अब्र से उन की सदाएँ 'जोश' 'जोश'
ऐ ख़ुदा अब क्या करूँ बार-ए-ख़ुदा अब क्या करूँ

~ जोश मलीहाबादी


 Jul 6, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, July 5, 2019

इत्तिफ़ाक़

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हम सब
एक इत्तिफ़ाक़ के
मुख़्तलिफ़ नाम हैं
मज़हब
मुल्क
ज़बान
इसी इत्तिफ़ाक़ की अन-गिनत कड़ियाँ हैं
अगर पैदाइश से पहले
इन्तिख़ाब की इजाज़त होती
तो कोई लड़का (या लड़की)
अपने (माँ) बाप के घर में पैदा होना पसंद नहीं करता

*मुख़्तलिफ़=अलग अलग; इंतिख़ाब=चुना हुआ

~ निदा फ़ाज़ली


 Jul 5, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Thursday, July 4, 2019

ऐ वतन ऐ वतन हम तिरे पासबाँ

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ऐ वतन ऐ वतन हम तिरे पासबाँ
ऐ चमन ऐ चमन हम तिरे बाग़बाँ

चाँदनी धूप बादल बरसती घटा
हर नज़ारा हसीं हर अदा दिलरुबा
गुल-बदामाँ तिरी दिल-नशीं-दारियाँ
ऐ वतन ऐ वतन हम तिरे पासबाँ

तेरी तहज़ीब गुलदस्ता-ए-ज़िंदगी
तेरी तारीख़ आईना-ए-ज़िंदगी
हर वरक़ आदमियत की है दास्ताँ
ऐ वतन ऐ वतन हम तिरे पासबाँ

ख़ून-ए-दिल से सजाते रहे हम तुझे
रश्क-ए-जन्नत बनाते रहे हम तुझे
तुझ को हसरत से देखा किया आसमाँ
ऐ वतन ऐ वतन हम तिरे पासबाँ

*पासबाँ=संतर

~ रिफ़अत सरोश

 Jul 4, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, June 29, 2019

तिरे निखरे हुए जल्वों ने

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तिरे निखरे हुए जल्वों ने दी थी रौशनी मुझ को
तिरे रंगीं इशारों ने मुझे जीना सिखाया था
क़सम खाई थी तू ने ज़िंदगी भर साथ देने की
बड़े ही नाज़ से तू ने मुझे अपना बनाया था
मगर पछता रहा हूँ अब तिरी बे-ए'तिनाई पर
कि मैं ने क्यूँ मोहब्बत का सुनहरा ज़ख़्म खाया था
*बे-ए'तिनाई=बेपरवाही

तिरा पैकर तिरी बाँहें तिरी आँखें तिरी पलकें
तिरे आरिज़ तिरी ज़ुल्फ़ें तिरे शाने किसी के हैं
मिरा कुछ भी नहीं इस ज़िंदगी के बादा-ख़ाने में
ये ख़ुम ये जाम ये शीशे ये पैमाने किसी के हैं
बनाया था जिन्हें रंगीन अपने ख़ून से मैं ने
वो अफ़्साने नहीं मेरे वो अफ़्साने किसी के हैं
*पैकर=आकार; आरिज़=गाल; शाने=कंधे; बादा-ख़ाने=सराय; ख़ुम=शराब रखने का बड़ा पात्र

किसी ने सोने चाँदी से तिरे दिल को ख़रीदा है
किसी ने तेरे दिल की धड़कनों के गीत गाए हैं
किसी ज़ालिम ने लूटा है तिरे जल्वों की जन्नत को
मगर मैं ने तिरी यादों से वीराने सजाए हैं
कभी जिन पर मोहब्बत का मुक़द्दर नाज़ करता था
वो यादें भी नहीं अपनी वो सपने भी पराए हैं

किसे मालूम था मंज़िल ही मुझ से रूठ जाएगी
लरज़ कर टूट जाएँगे मिरी क़िस्मत के सय्यारे
सर-ए-बाज़ार बिक जाएगी तेरे प्यार की अज़्मत
चलेंगे इश्क़ के हस्सास दिल पर ज़ुल्म के आरे
बड़े अरमान से मैं ने चुना था जिन को दामन में
किसे मालूम था वो फूल बन जाएँगे अंगारे
*लरज़=थरथरा कर; अज़्मत=प्रतिष्ठा

जहाँ तू है वहाँ हैं नुक़रई साज़ों की झंकारें
जहाँ मैं हूँ वहाँ चीख़ें हैं फ़रियादें हैं नाले हैं
मिरी दुनिया में ग़म ही ग़म हैं तारीकी ही तारीकी
तिरी दुनिया में नग़्मे हैं बहारें हैं उजाले हैं
मिरी झोली में कंकर हैं तिरी आग़ोश में हीरे
तिरे पैरों में पायल है मिरे पैरों में छाले हैं
*नुक़रई=चाँदी की घंटियाँ; नाले=आह; तारीक़ी=अंधेरे

मैं जब भी ग़ौर करता हूँ तिरी इस बेवफ़ाई पर
तो ग़म की आग में मेहर-ओ-वफ़ा के फूल जलते हैं
न फ़रियादों से ज़ंजीरों की कड़ियाँ टूट सकती हैं
न अश्कों से निज़ाम-ए-वक़्त के तेवर बदलते हैं
मैं भर सकता हूँ तेरी याद में हसरत भरी आहें
मगर आहों की गर्मी से कहीं पत्थर पिघलते हैं
*मेहर-ओ-वफ़ा=प्रेम और निष्ठा; निज़ाम-ए-वक़्त=समय के रखवाले

~ प्रेम वरबारतोनी

 Jun 29, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, June 28, 2019

हवा उड़ाए रेशम बादल

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हवा उड़ाए रेशम बादल के पर्दे
छन छन कर पेड़ों से उतरें रौशनियाँ
जैसे अचानक बच्चों को आ जाए हँसी
जंगल तीरा-बख़्त नहीं 

*तीरा-बख़्त=अभागा;

छन छन कर छितनार से बरसो रौशनियो
पौदों की रग रग में तैरो रौशनियो
जंगल के सीने के कोनों-खुदरों में
दबे हुए असरार बहुत
ख़्वाब-गज़ीदा नशे में सरशार बहुत
नींद नगर को तजने पुर इसरार बहुत
कोंपल कोंपल फूटने पे तय्यार बहुत 

*छितनार=घनी; असरार=भेद; ख़्वाब-गज़ीदा=सपनों से त्रसित; सरशार=मस्त;

बूढे पेड़ न रस्ता रोको
उन ख़्वाबों को जी लेने दो
छन छन कर छितनार से बरसो रौशनियो
इस मा'सूम हँसी में गरचे रब्त नहीं
पल-भर में आँसू बिन जाएँ ज़ब्त नहीं
इस मोती के क़ल्ब में उतरो रौशनियो
और चमक उस की चमकाओ रौशनियो 

*गरचे=अगर; रब्त=सम्बंध; कल्ब=दिल
 
नगर नगर में तुम सा नाज़ुक लम्स न पाऊँ
किरन किरन के लेकिन बरसों बोझ उठाऊँ

*लम्स=स्पर्श

~ अबरारूल हसन


 Jun 28, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Saturday, June 22, 2019

बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम



बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से
तो मुझ को ख़ुदा रा ग़लत मत समझना
कि मेरी ज़रूरत हो तुम
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी
हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी
जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ
सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी
नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना
किसी और से देखो दिल मत लगाना
कि मेरी अमानत हो तुम
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा
है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा
और इस पर ये काली घटाओं का पहरा
गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है
ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है
बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल
फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल
वो पाकीज़ा मूरत हो तुम
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर
शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर
जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे
जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के
छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए
भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए
वो पहली मोहब्बत हो तुम
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

~ ताहिर फ़राज़


 Jun 22, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Friday, June 21, 2019

शैलेंद्र

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गीतकार शैलेंद्र के प्रति

'गीतों के जादूगर का मैं छंदों से तर्पण करता हूँ।'

सच बतलाऊँ तुम प्रतिभा के ज्योतिपुत्र थे,छाया क्या थी,
भली-भाँति देखा था मैंने, दिल ही दिल थे, काया क्या थी।

जहाँ कहीं भी अंतर्मन से, ॠतुओं की सरगम सुनते थे,
ताज़े कोमल शब्दों से तुम रेशम की जाली बुनते थे।

जन मन जब हुलसित होता था, वह थिरकन भी पढ़ते थे तुम,
साथी थे, मज़दूर-पुत्र थे, झंडा लेकर बढ़ते थे तुम।

युग की अनुगुंजित पीड़ा ही घोर घन-घटा-सी छाई
प्रिय भाई शैलेन्द्र, तुम्हारी पंक्ति-पंक्ति नभ में लहराई।

तिकड़म अलग रही मुस्काती, ओह, तुम्हारे पास न आई,
फ़िल्म-जगत की जटिल विषमता, आख़िर तुमको रास न आई।

ओ जन मन के सजग चितेरे, जब-जब याद तुम्हारी आती,
आँखें हो उठती हैं गीली, फटने-सी लगती है छाती

~ नागार्जुन

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Sunday, June 9, 2019

अब के दीवार में दरवाज़ा रखूँ

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अब के दीवार में दरवाज़ा रखूँ या न रखूँ
अजनबी फिर न कोई दरपय-ए-आज़ार आ जाए
एक दस्तक में मिरी सारी फ़सीलें ढा जाए
अब के दीवार में दरवाज़ा रक्खूँ या न रखूँ

*आज़ार=रोग, तक़लीफ़; फ़सीलें=किले की दीवारें

एक अहराम न चुन लूँ सिफ़त-ए-दूद-ए-हरीर
कोई आए तो बस इक गुम्बद-ए-दर-बस्ता मिले
राज़-ए-सर-बस्ता मिले
लाख सर फोड़े सदा कोई न मुझ तक पहुँचे
क़ासिद-ए-मौज-ए-हवा कोई न मुझ तक पहुँचे
अब के दीवार में दरवाज़ा रक्खूँ या न रखूँ

*अहराम=पिरामिड; सिफ़त-ए-दूद-ए-हरीर=रेशमी धुयें से बना; गुम्बद-ए-दर-बस्ता=बंद दरवाज़ों वाला गुम्बद; क़ासिद-ए-मौज-ए-हवा=संदेश वाहक या हवा का झोंका सारे अंदेशे मगर एक तरफ़

एक तरफ़ तेरी उम्मीद
जाने किस वक़्त इधर तेरी सवारी आ जाए
अजनबी लाख कोई मेरी फ़सीलें ढा जाए
मुझ को दीवार में दरवाज़ा लगाना होगा


~ ख़ुर्शीद रिज़वी

 Jun 9, 2019 | e-kavya.blogspot.com
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Sunday, June 2, 2019

मैं तिरी उल्फ़त में फ़ना

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तू मिरे पास रहे मैं तिरी उल्फ़त में फ़ना (बरबाद)

जैसे अँगारों पे छींटों से धुआँ
बिंत-ए-महताब (चाँद की बेटी) को हाले (हैलो) में लिए
तू फ़रोज़ाँ (प्रकाशमान) हो मगर सारी तपिश मेरी हो
फैले अफ़्लाक (आसमानों) में बे-सम्त (दिशाहीन) सफ़र
साथ में वक़्त का रहवार (घोड़ा) लिए
जिस तरफ़ मौज-ए-तमन्ना कह दे
जुस्तुजू (इच्छा) शौक़ का पतवार लिए
गुफ़्तुगू रब्त (सम्बंध) के एहसास से दूर
ख़ामुशी रंज-ए-मुकाफ़ात (प्रतिशोध) से दूर
चाँदनी की कभी सरगोशी (काना-फूँसी) सी

फूल के नर्म लबों को चूमे
गर्द अंदेशा को शबनम धो दे
क़हक़हे फूटीं तअम्मुल (सोच) के बग़ैर
नूर उबले कभी फ़व्वारों में
और नुक़्ते (बिंदु) में सिमट आए कभी
तह-ब-तह खोले रिदा (चादर) ज़ुल्मत की
अपनी बेबाक निगाहों से मुनव्वर (रौशन) कर दे
नुक़्ता-ए-वस्ल (मिलन बिंदु) ये मिटता हुआ धब्बा ही सही
होश बहता है तो बह जाने दे

तू मिरे पास रहे मैं तिरी उल्फ़त में फ़ना

~ अबरारूल हसन

 Jun 2, 2019 | e-kavya.blogspot.com
 Submitted by: Ashok Singh