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Saturday, April 30, 2016

दीवाना बनाना है तो



दीवाना बनाना है तो, दीवाना बना दे
वरना कहीं तक़दीर, तमाशा न बना दे

ए देखनेवालों मुझे हंस हंस के न देखो
तुम को भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे

मैं ढूँढ रहा हूँ मेरी वो शम्मा कहाँ है
जो बज़म की हर चीज़ को परवाना बना दे
*बज़म=महफ़िल

आख़िर कोई सूरत भी तो हो खाना-ए-दिल की
काबा नहीं बनता है, तो बुत-खाना बना दे
*खाना-ए-दिल=दिल का घर

'बहज़ाद' हर एक जाम पे एक सजदा-ए-मस्ती
हर ज़र्रे को संग-ए-दर-ए-जानां न बना दे
*सजदा=प्रार्थना; संग-ए-दर-ए-जानां= महबूब के दरवाज़े का पत्थर

~ बहज़ाद लखनवी


  Apr 16, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

रे, रोक युधिष्ठिर को न यहाँ,

रे, रोक युधिष्ठिर को न यहाँ,
जाने दे उसको स्वर्ग, धीर!
पर, फिरा हमें गांडीव-गदा,
लौटा दे अर्जुन-भीम वीर!
कह दे शंकर से,आज करें
वे प्रलय नृत्य फिर एक बार।
सारे भारत में गूँज उठे,
हर-हर-बम का फिर महोच्चार!

~ 'दिनकर'


  Apr 15, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

हमने तूफां अपना, खुद चुना है



हमने तूफां अपना, खुद चुना है
साहिल न हो, पतवार न हो, तो क्या।

हम ही तूफां हैं साहिल हैं,
पतवार हम हैं।
यह क्या कम है कि,
मौजे रवां हम हैं
तूफां हम हैं पतवार हम हैं।

वर्ष दो वर्ष, जिन्दगी एक नये मोड़ पर
घूम जाती है
वो कैसे लोग हैं कि सीधी सड़क पर
चले जा रहें हैं
हमने हर मोड़ पर
एक नया तर्न्नुम पाया -
संगीत जिन्दगी का
गाते चले।

तुम दूर चले जाओगे, तो क्या
तुम याद आओगे, तो क्या
तुम भूल जाओगे, तो क्या
जिन्दगी यही याद, भूल, आसरा है

नये रिश्तों में, तूफां मे चलो नहीं
किसी नाव को तूफां में ठेलो नहीं
कोई तूफां कोई रिश्ते
बहती रेत में नहीं उठते बनते

ऐसे तूफां के सपने संजोओ नहीं
जिसकी इक लहर का दूसरी से
कोई रिश्ता न हो

न जाने कितने संग ओ साथी
के बाद
एकाकी जीवन पाया है।
एक समय था कि
साथ छॊड़ जाते थे हम
अब है कि नये साथ खोजते हैं।

हमने सोचा था कि जीवन एकाकी है
न जाने कब किसने
नये साथ की आहट दी है।

यह आहट सुनों नहीं
इस साथ में भटको नहीं
साथ अपने एकाकीपन का
संगीत अपनी रुह का
गाते चलो निभाते चलो।

इकतारे को औरों की हवा से
न छेड़ो
इसका संगीत नायाब है
अनमोल है
इसे नये रिश्तों से, न जोड़ो।

~ रणजीत कुमार मुरारका


  Apr 15, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

मैं तो इक अश्के-नदामत के सिवा

मैं तो इक अश्के-नदामत के सिवा कुछ भी नहीं
तुम अगर चाहो तो पलकों पे बिठा लो मुझको

*अश्के-नदामत=पश्चाताप का आंसू

‍~ मोमिन

  Apr 14, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

बैठ जाता हूँ जहाँ छाँव घनी होती है




बैठ जाता हूँ जहाँ छाँव घनी होती है
हाए क्या चीज़ ग़रीब-उल-वतनी होती है
*ग़रीब-उल-वतनी=देश से बाहर रहना

दिन को इक नूर बरसता है मिरी तुर्बत पर
रात को चादर-ए-महताब तनी होती है
*नूर=प्रकाश; तुर्बत=मकबरा; महताब=चांद(नी)

रूत बदलते ही बदल जाती है नीयत मेरी
जब बहार आती है तौबा-शिकनी होती है

ग़ैर के बस में तुम्हें सुन के ये कह उठता हूँ
ऐसी तक़दीर भी अल्लाह ग़नी होती है
*ग़नी=समृद्ध

न बढ़े बात अगर खुल के करें वो बातें
बाइस-ए-तूल-ए-सुख़न कम-सुख़नी होती है
*ज़्यादा बोलने का नतीज़ा; कम-सुख़नी=कम बातचीत

लुट गया वो तिरे कूचे में धरा जिस ने क़दम
इस तरह की भी कहीं राह-ज़नी होती है
*कूचा=गली; राह-ज़नी=लूट लेना

हुस्न वालों को ज़िद आ जाए ख़ुदा ये न करे
कर गुज़रते हैं जो कुछ जी में ठनी होती है

हिज्र में ज़हर है साग़र का लगाना मुँह से
मय की जो बूँद है हीरे की कनी होती है
*हिज्र=जुदाई; कनी=कणिका

मय-कशों को न कभी फ़िक्र-ए-कम-ओ-बेश रही
ऐसे लोगों की तबीअत भी ग़नी होती है
*फ़िक्र-ए-कम-ओ-बेश=कम या ज़्यादा होने की चिंता

हूक उठती है अगर ज़ब्त-ए-फ़ुगाँ करता हूँ
साँस रूकती है तो बरछी की अनी होती है
*ज़ब्त-ए-फ़ुगाँ=दर्द की बर्दाईश; अनी=नोक

अक्स की उन पर नज़र आईने पर उन की निगाह
दो कमाँ-दारों में नावक-फ़गनी होती है
*कमाँ-दारों=बिना किसी कमी के; नावक-फ़गनी=(छोटे छोटे) तीर चलाना

पी लो दो घूँट कि साकी की रहे बात ‘हफीज़’
साफ़ इंकार में ख़ातिर-शिकनी होती है
*ख़ातिर-शिकनी=मेज़बान की बेइज्जती

‍ ~ हफीज़ जौनपुरी



  Apr 13, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

चलो अच्छा हुआ काम आ गई

चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी
वरना ज़माने-भर को समझाने हम कहाँ जाते
क़तील अपना मुकद्दर ग़म से बेगाना अगर होता
तो फिर अपने पराए हम से पहचाने कहाँ जाते

~ क़तील शिफ़ाई

  Apr 12, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Monday, April 11, 2016

गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं

गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं कांटों से भी ज़ीनत होती है
जीने के लिये इस दुनिया में ग़म की भी ज़रूरत होती है
जो आकर रुके दामन पे 'सबा' वो अश्क नहीं है पानी है
जो आंसू न छलके आँखों से उस अश्क की कीमत होती है

~ सबा अफ़ग़ानी

  Apr 11, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

रूप का दर्पण लिये तुम



रूप का दर्पण लिये तुम सामने जो आ खड़ी हो,
लग रहा है चांद का प्रतिबिम्ब दर्पण पर पड़ा है।

किस चितेरे ने अदा से सुभग यह मूरत गढ़ी है
देख जिसको उर्वशी ने प्यार की गीता पढ़ी है
कौन चितवन चांदनी का चोर कर घर यों गया है
कौन इसमे इंद्रधनुषी रंग सारे भर गया है।
रचा शायद जनकपुर में स्वयंवर फिर जानकी का
रहा शिव धनुष अब फिर कसौटी पर चढ़ा है

प्यार की गज़लें थीं ग़ालिब ने लिखी शायद तुम्हीं पर
खींच लाया कौन तुम सा चांद नभ से इस ज़मीं पर
और किन शिल्पीकारों ने रंग अधरों पर उतारा
चांदनी की पालकी से कौन करता है इशारा
पहन कर नीले वसन यों आ रही स्वप्नों की मलिका
लग रहा प्रणयी कहीं अभिसार करने को खड़ा है

कौन बेसुध कर रहा है दर्द के नग़मे सुना कर
राधिका के हाथ में यों प्यार की मुरली थमा कर
आज मन की बात कोई हीर, रांझा से कहेगा
लग रहा है आज की ये रात भी उजली रहेगी
जा रही नैहर से पुरवा आज प्रीतम के नगर को,
लग रहा शायद इसी से हर तरफ पहरा कड़ा है।

~ दुलीचन्द 'शशि'



  Apr 11, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

रफ्ता रफ्ता वो मेरे हस्ती का



रफ्ता रफ्ता वो मेरे हस्ती का सामां हो गये
पहले जां, फिर जानेजां, फिर जानेजाना हो गये

दिन-ब-दिन बढती गईं इस हुस्न की रानाइयां,
पहले गुल, फिर गुल-बदन, फिर गुल-बदामां हो गए
*रानाइयां:सौन्दर्य; गुल=फूल; बदामा=प्रलय मचाने वाली

आप तो नज़दीक से नज़दीक-तर आते गए,
पहले दिल, फिर दिलरुबा, फिर दिल के मेहमां हो गए

प्यार जब हद से बढ़ा सारे तकल्लुफ मिट गए,
आप से, फिर तुम हुए, फिर तू का खुनवाँ हो गए
*तकल्लुफ=औपचारिकता

~ ‍तस्लीम फाज़ली



  Apr 10, 2015|e-kavya.blogspot.com
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ख़ुदा करे कि मुहब्बत में

ख़ुदा करे कि मुहब्बत में वो मुकाम आये,
किसी का नाम लूँ लब पे तुम्हारा नाम आये.

~ तस्लीम फाज़ली


  Apr 09, 2015|e-kavya.blogspot.com
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चांद मद्धम है, आसमां चुप है



चांद मद्धम है, आसमां चुप है।
नींद की गोद में जहां चुप है।

दूर वादी पे दूधिया बादल
झुक के पर्वत को प्यार करते हैं।
दिल में नाकाम हसरतें लेकर,
हम तेरा इन्तज़ार करते हैं।

इन बहारों के साये में आ जा
फिर मोहब्बत जवां रहे न रहे।
ज़िन्दगी तेरे नामुरादों पर
कल तलक मेहरबां रहे न रहे।

रोज की तरह आज भी तारे
सुबह की ग़र्द में न सो जायें।
आ तेरे ग़म में जागती आंखें
कम से कम एक रात सो जायें।

चांद मद्धम है, आसमां चुप है।
नींद की गोद में जहां चुप है।

~ साहिर लुधियानवी
 
  Apr 09, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

 

वो जो मुंसिफ़ है तो क्या

वो जो मुंसिफ़ है तो क्या कुछ भी सज़ा दे देगा
हम भी रखते हैं ज़ुबाँ, पहले ख़ता पूछेंगे

~ राहत इंदौरी

  Apr 08, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

Friday, April 8, 2016

होंठ पर पाबन्दियाँ हैं



होंठ पर पाबन्दियाँ हैं
गुनगुनाने की।

निर्जनों में जब पपीहा
पी बुलाता है।
तब तुम्हारा स्वर अचानक
उभर आता है।
अधर पर पाबन्दियाँ हैं
गीत गाने की।

चाँदनी का पर्वतों पर
खेलना रुकना
शीश सागर में झुका कर
रूप को लखना।
दर्पणों को मनाही
छबियाँ सजाने की।

ओस में भीगी नहाई
दूब सी पलकें,
श्रृंग से श्यामल मचलती
धार सी अलकें।
शिल्प पर पाबन्दियाँ
आकार पाने की।

केतकी सँग पवन के
ठहरे हुए वे क्षण,
देखते आकाश को
भुजपाश में, लोचन।
बिजलियों को है मनाही
मुस्कुराने की।

हवन करता मंत्र सा
पढ़ता बदन चन्दन,
यज्ञ की उठती शिखा सा
दग्ध पावन मन।
प्राण पर पाबन्दियाँ
समिधा चढाने की।

~ बालकृष्ण मिश्र


  Apr 08, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

न उदास हो न मलाल कर

न उदास हो न मलाल कर किसी बात का न ख़याल कर
कई साल बाद मिले हैं हम तेरे नाम आज की शाम है

~ बशीर बद्र


  Apr 07, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

किस क़दर सर्द है यह रात



किस क़दर सर्द है यह रात, अंधेरे ने कहा
मेरे दुशमन तो हज़ारों हैं - कोई तो बोले

चांद की क़ाश भी तहलील हुई शाम के साथ
और सितारे तो संभलने भी न पाए थे अभी
*क़ाश=टुकडा(फांक); तहलील=घुलना

कि घटा आई, उमड़ते हुए गेसू खोले
वह जो आई थी तो टूटके बरसी होती

मगर एक बूंद भी टपकी न मेरे दामन पर
सिर्फ़ यख़-बस्ता हवाओं के नुकीले झोंके
*यख़-बस्ता=बहुत ठंढी

मेरे सीने में उतरते रहे, खंजर बनकर
खोई आवाज़ नहीं- कोई भी आवाज़ नहीं

चार जानिब से सिमटता हुआ सन्नाटा है
मैंनें किस कर्ब से इस शब का सफ़र काटा है
*जानिब=ओर; कर्ब=दुख; शब=रात

दुशमनों! तुमको मेरे जब्रे-मुसलसल की कसम
मेरे दिल पर कोई घाव ही लगाकर देखो
*जब्रे-मुसलसल=निरंतर अत्याचार

वह अदावत ही सही, तुमसे मगर रब्त तो है
मेरे सीने पे अलाव ही लगाकर देखो
*अदावत=दुश्मनी; रब्त=लगाव

~ अहमद नदीम क़ासमी


  Apr 06, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

मधुर मधुर मेरे दीपक जल

मधुर मधुर मेरे दीपक जल,
युग युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल,
प्रियतम का पथ आलोकित कर।

मिट मिट कर हर सांस लिख रही, शत शत मिलन-विरह लेखा,
निज को खो कर निमिष आँकते - अनदेखे चरणों की रेखा,
पल भर का यह स्वप्न तुम्हारी युग युग की पहचान बन गया,
पथ मेरा निर्वाण बन गया ।

~ महादेवी वर्मा


  Apr 05, 2015|e-kavya.blogspot.com
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तुम्हारे नयनों की बरसात।




तुम्हारे नयनों की बरसात।
रिम-झिम, पल-छिन, बरस रही जो,
बे-मौसम दिन-रात।

उठती आकुल आह धुआँ बन,
घिरता प्राणों का गगन-आंगन।
प्रिय की सुधि बन चमकी बिजली
सिहरे पुलकिन गात।

जीवन का सिर कितना पंकिल,
जिसमें चुपके से जाता खिल,
करुणा-सा शुचि, दुख-सा सुन्दर
यौवन का जल-जात!
*पंकिल=कीचड़ से युक्त; शुचि=शुद्ध; जल-जात=जो जल में मे उपजा हो यहां तात्पर्य कमल से है

तिमिर विरह का विकल शून्य क्षण।
क्रन्दन, जैसे नभ का गर्जन।
दो उसाँस से चलती रह-रह
थर-थर कम्पित वात।
*वात=हवा

~ श्यामनन्दन किशोर


  Apr 04, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

बहुत दिनों तक उम्मीदों से

बहुत दिनों तक उम्मीदों से ताका तुम्हें जलधर
मगर क्या बात है ऎसी, कहीं गरजे कहीं बरसे
कहीं तो शोख सागर से, मचलते भूल मर्यादा
कहीं कोई अभागिन चातकी दो बूँद को तरसे

~ श्यामनन्दन किशोर

  Apr 03, 2015|e-kavya.blogspot.com
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आज हमने एक दुनिया बेची




आज हमने एक दुनिया बेची
और एक दीन ख़रीद लिया
हमने कुफ़्र की बात की

*कुफ़्र=इस्लाम धर्म की मान्यताओं के विरुद्ध कोई आचरण

सपनों का एक थान बुना था
एक गज़ कपड़ा फाड़ लिया
और उम्र की चोली सी ली

आज हमने आसमान के घड़े से
बादल का एक ढकना उतारा
और एक घूँट चाँदनी पी ली

यह जो एक घड़ी हमने
मौत से उधार ली है
गीतों से इसका दाम चुका देंगे

~ अमृता प्रीतम
 

  Apr 03, 2015|e-kavya.blogspot.com
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भांप ही लेंगे इशारा

भांप ही लेंगे, इशारा जो सरे-महफ़िल किया
ताड़ने वाले, क़यामत की नज़र रखते हैं।

~ लाल माधवराम जौहर


  Apr 02, 2015|e-kavya.blogspot.com
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जाम चलने लगे दिल मचलने लगे


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ज़िन्दगी जीने को दी, जी मैंने,
क़िस्मत में लिखा था पी, तो पी मैंने।
मैं न पीता तो तेरा लिखा गलत हो जाता
तेरे लिखे को निभाया, क्या ख़ता की मैंने

जाम चलने लगे दिल मचलने लगे चेहरे चेहरे पे रंगे-शराब आ गया
बात कुछ भी न थी बात इतनी हुई आज महफ़िल में वो बेनकाब आ गया

दिलकशी क्या कहें नाज़ुकी क्या कहें ताज़गी क्या कहें ज़िंदगी क्या कहें
हाथ में हाथ उसका वो ऐसे लगा जैसे हाथों में कोई गुलाब आ गया

हुस्न वाले तेरी बात रखनी पड़ी आ गयी इम्तिहाँ की वो आख़िर घडी
पूछ ले पूछ ले आइना ही तो है, देख ले आज तेरा जवाब आ गया

नाम अपना कहीं पर लिखा तो नहीं बस इसी बात का आज कर ले यक़ीं
आओ राही ज़रा पूछ कर देख ले अपने दिल की वो खोले किताब आ गया

~ सईद राही


  Apr 01, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

छिटक रही है चाँदनी




छिटक रही है चाँदनी, मदमाती उन्मादिनी
कलगी-मौर सजाव ले कास हुए हैं बावले
पकी ज्वार से निकल शशों की जोड़ी गई फलाँगती-
सन्नाटे में बाँक नदी की जगी चमक कर झाँकती!

*कलगी-मौर=(लम्बी घास पर निकले) फूलों से तात्पर्य; कास=लम्बी घास; शशों=खरगोशों; बाँक=टेढापन

कुहरा झीना और महीन, झर-झर पड़े अकासनीम
उजली-लालिम मालती गंध के डोरे डालती,
मन में दुबकी है हुलास ज्यों परछाईं हो चोर की-
तेरी बाट अगोरते ये आँखें हुईं चकोर की!

*अकासनीम=नीम पर पनपने वाली एक तरह की बेल; मालती=एक प्रकार की लता, जिसमें सफेद रंग के सुगंधित फूल लगते हैं; बाट=राह; अगोरते=अपलक देखते

‍ ~ अज्ञेय
  Mar 31, 2015|e-kavya.blogspot.com
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बहुत प्यारे बन्धनों को आज



बहुत प्यारे बन्धनों को आज झटका लग रहा है,
टूट जायेंगे कि मुझ को आज खटका लग रहा है,
आज आशाएं कभी भी चूर होने जा रही हैं,
और कलियां बिन खिले कुछ चूर होने जा रही हैं,

बिना इच्छा, मन बिना,
आज हर बंधन बिना,
इस दिशा से उस दिशा तक छूटने का सुख!
टूटने का सुख।

शरद का बादल कि जैसे उड़ चले रसहीन कोई,
किसी को आशा नहीं जिससे कि सो यशहीन कोई,
नील नभ में सिर्फ उड़ कर बिखर जाना भाग जिसका,
अस्त होने के क्षणों में है कि हाय सुहाग जिस का,

बिना पानी, बिना वाणी,
है विरस जिसकी कहानी,
सूर्य कर से किन्तु किस्मत फूटने का सुख!
टूटने का सुख।

फूल श्लथ-बंधन हुआ, पीला पड़ा, टपका कि टूटा,
तीर चढ़ कर चाप पर, सीधा हुआ खिंच कर कि छूटा,
ये किसी निश्चित नियम, क्रम कि सरासर सीढ़ियां हैं,
पाँव रख कर बढ़ रही जिस पर कि अपनी पीढियां हैं,

बिना सीढ़ी के चढ़ेंगे तीर के जैसे बढ़ेंगे,
इसलिए इन सीढ़ियों के फूटने का सुख!
टूटने का सुख।

*श्लथ=शिथिल

∼ भवानीप्रसाद मिश्र


  Mar 30, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

एक आहट अभी दरवाज़े पे लहराई थी



एक आहट अभी दरवाज़े पे लहराई थी
एक सरगोशी अभी कानों से टकराई थी
एक ख़ुशबू ने अभी जिस्म को सहलाया था
एक साया अभी कमरे में मेरे आया था
और फिर नींद की दीवार के गिरने की सदा
और फिर चारों तरफ तेज़ हवा...!!

‍ ~ शहरयार


   Mar 29, 2015|e-kavya.blogspot.com
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रेगिस्तानी आँखों में भी हैं



रेगिस्तानी आँखों में भी हैं तस्वीरें पानी की
क्या-क्या पेश करूँ बतलाओ और नज़ीरें पानी की
* नज़ीरें=मिसालें

मिटने से भी मिट न सकेंगी चंद लकीरें पानी की
पत्थर पर मौजूद रहेंगी कुछ तहरीरें पानी की
*तहरीरें=लिखावट

ख़्वाबों को कतरा-कतरा हो जाना है, बह जाना है
पानी-पानी हो जाती हैं सब ताबीरें पानी कीं
*ताबीरें=व्यक्तीकरण, अर्थ लगाना

तैरना आता है लेकिन मैं डूब रहा हूँ दरिया में
पानी की ये लहरें हैं या हैं जंज़ीरें पानी की

दिल टूटा तो ख़ून बहेगा आँखों से आँसू की जगह
आँखों को ज़ख़्मी कर देती हैं शमशीरें पानी की
*शमशीर=तलवार

जाम हुए रौशन यूँ जैसे रौशन होते जाएँ चराग़
रंग-बिरंगी हमनें देखी हैं तासीरें पानी की
*तासीर=प्रभाव, छाप

धुंधला-धुंधला हो जाता है मंज़र जो भी हो गुलशन
आँखों में जब जश्न मनाती हैं तस्वीरें पानी की
*मंज़र=दृष्य

~ गोविन्द गुलशन


   Mar 25, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

मेरे उसके बीच का रिश्ता

मेरे उसके बीच का रिश्ता इक मजबूर ज़रूरत है
मैं सूखे ज़ज़्बों का ईंधन वो माचिस की तीली सी

देखूं कैसी फसल उगाता है मौसम तन्हाई का
दर्द के बीज की नस्ल है ऊँची, दिल की मिटटी गीली सी

मुझको बाँट के रख देती है धूप-छाँव के खेमों में
कुछ बेग़ैरत सी मसरूफ़ी, कुछ फुर्सत शर्मीली सी

*बेगैरत=निर्लज्ज; मसरूफ़ी=व्यस्तता

~ खुर्शीद अकबर


   Mar 24, 2015|e-kavya.blogspot.com
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रंग भरी राग भरी राग सूं भरी री



रंग भरी राग भरी राग सूं भरी री।
होली खेल्यां स्याम संग रंग सूं भरी, री।।
उडत गुलाल लाल बादला रो रंग लाल।
पिचकाँ उडावां रंग रंग री झरी, री।।
चोवा चन्दण अरगजा म्हा, केसर णो गागर भरी री।
मीरा दासी गिरधर नागर, चेरी चरण धरी री।।

हे सखि मैंने अपने प्रियतम कृष्ण के साथ रंग से भरी, प्रेम के रंगों से सराबोर होली खेली। होली पर इतना गुलाल उडा कि जिसके कारण बादलों का रंग भी लाल हो गया। रंगों से भरी पिचकारियों से रंग-रंग की धारायें बह चलीं। मीरा कहती हैं कि अपने प्रिय से होली खेलने के लिये मैं ने मटकी में चोवा, चन्दन, अरगजा, केसर आदि भरकर रखे हुये हैं। मीरा कहती हैं कि मैं तो उन्हीं गिरधर नागर की दासी हूँ और उन्हीं के चरणों में मेरा सर्वस्व समर्पित है।

~ मीरा बाई


   Mar 23, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

जो नख्ल पुरसमर हैं

जो नख्ल पुरसमर हैं वो सर उठा सकते नहीं,
सरकश हैं वो दरख़्त, जिस पर समर नहीं।

*नख्ल=वृक्ष, पेड़, रेगिस्तान में हरा भरा पानी वाला इलाका; पुरसमर=फलों से लदे हुए; सरकश=सर उठाए हुए, उद्दंड; समर=फल

~‍ 'नामालूम'

   Mar 22, 2015|e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

फूल-सी हो फूलवाली।



फूल-सी हो फूलवाली।
किस सुमन की सांस तुमने
आज अनजाने चुरा ली!

जब प्रभा की रेख दिनकर ने
गगन के बीच खींची।
तब तुम्हीं ने भर मधुर
मुस्कान कलियां सरस सींची,
किंतु दो दिन के सुमन से,
कौन-सी यह प्रीति पाली?
फूल-सी हो फूलवाली।

प्रिय तुम्हारे रूप में
सुख के छिपे संकेत क्यों हैं?
और चितवन में उलझते,
प्रश्न सब समवेत क्यों हैं?
मैं करूं स्वागत तुम्हारा,
भूलकर जग की प्रणाली।
फूल-सी हो फूलवाली।

तुम सजीली हो, सजाती
हो सुहासिनि, ये लताएं
क्यों न कोकिल कण्ठ
मधु ॠतु में, तुम्हारे गीत गाएं!
जब कि मैंने यह छटा,
अपने हृदय के बीच पा ली!
फूल सी हो फूलवाली।

‍ ~ रामकुमार वर्मा


  Mar 22, 2015|e-kavya.blogspot.com
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जीस्त भी इक हसीना से कम नहीं

जीस्त भी इक हसीना से कम नहीं यारों,
प्यार है उससे तो फिर नाज़ उठाते जाइए।

*जीस्त=ज़िन्दगी, जीवन

~ वज़ीर अफसर

  Mar 21, 2015|e-kavya.blogspot.com
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