
न इंतज़ार की लज़्ज़त न आरज़ू की थकन
बुझी हैं दर्द की शमाएँ कि सो गया है बदन
*लज़्ज़त=स्वाद
सुलग रही हैं न जाने किस आँच से आँखें
न आँसुओं की तलब है न रतजगों की जलन
*रतजगों=रात भर जागने
दिले-फ़रेब-ज़दा, दावते-नज़र पे न जा
ये आज के क़दो-गेसू हैं कल के दारो-रसन
*फ़रेब-ज़दा=धोखा खाए हुए; दावते-नज़र=दृष्टि के निमन्त्रण; क़दो-गेसू=क़द और बाल; दारो-रसन=सूली और रस्सी
ग़रीबे-शहर किसी साया-ए-शजर में न बैठ
कि अपनी छाँव में ख़ुद जल रहे हैं सर्वो-समन
*ग़रीबे-शहर=परदेसी; साया-ए-शजर=पेड़ की छांव; सर्वो-समन=पेड़ और फूल
बहारे-क़ुर्ब से पहले उजाड़ देती हैं
जुदाइयों की हवाएँमुहब्बतों के चमन
*बहारे-क़ुर्ब=सामीप्य के वसंत
वो एक रात गुज़र भी गई मगर अब तक
विसाले-यार की लज़्ज़त से टूटता है बदन
*विसाले-यार=प्रेमिका-मिलन;
फिर आज शब तिरे क़दमों की चाप के हमराह
सुनाई दी है दिले-नामुराद की धड़कन
*शब=रात; दिले-नामुराद=अभागे दिल
ये ज़ुल्म देख कि तू जान-ए-शाइरी है मगर
मिरी ग़ज़ल पे तिरा नाम भी है जुर्मे-सुख़न
*जुर्मे-सुख़न=बात या शायरी करने का अपराध
हवा-ए-दहर से दिल का चराग़ क्या बुझता
मगर ‘फ़राज़’ सलामत है यार का दामन
*हवा-ए-दहर=ज़माने की हवा
~ अहमद फ़राज़
Apr 29, 2015|e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
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