
गिरे हैं जब भी अश्क उनकी आंखों से कभी
बिखरे हैं अंजुम टूटे हुए आसमां से कई
और कभी जब मौज में वह आके मुस्कराए हैं
एक साथ खिल गए गुल जैसे गुलसितां में कई
*अंजुम=तारे; मौज=आनंद
उनकी अंगड़ाई जैसे हो कौस-ए-कज़ा का उभार
बात करने का सलीका जैसे निकले सुराही से शराब
गुनगुनाना उनका ऐसे जैसे दूर सहरा में कहीं
चांदनी रात में धीरे से बजाता है कोई रबाब
*कौस-ए-कज़ा=इंद्र-धनुष; सहरा=रेगिस्तान; रबाब=अफगानी वाद्य यंत्र
चमक तेरी मुहब्बत की मुझे दरकार नहीं
मेरे जज़्बात की तुम मुझको और सज़ा न दो
करना ही है तो करम इतना ही फ़रमाईए
दूर से ही देख लो मुझको और बस मुस्करा दो
मैं वीराने में, इक सज़र हूं तनहा
सूखी चन्द शाख़ों के सिवा कुछ भी नहीं
ज़माने की आंधी से जब गिर जाऊं मैं
मातम को आ जाना मट्टी के सिवा कुछ भी नहीं
*सज़र=वृक्ष
~ कृष्ण बेताब
Mar 18, 2015|e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
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