
किताब: 'निर्वासित बाहर-भीतर' (तसलीमा की जीवनी)
नोट: तसलीमा के शब्दों में, 'निर्वासित बाहर-भीतर' काव्य संग्रह में संकलित सभी कविताएं उस दौर में लिखी गई थीं, जब रूद्र से मेरा रिश्ता, बस, टूटने- टूटने को था । 'नियति' कविता भी, रूद्र की किसी हरकत पर ही लिखी गई थी ।
हर रात मेरे बिस्तर पर आकर लेट जाता है, एक नपुंसक मर्द !
आंखें
अधर
चिबुक
पागलों की तरह चूमते-चूमते,
अपनी दोनों मुट्ठियों में भर लेता है-स्तन!
मुंह में भरकर चूसता रहता है ।
मारे प्सास के जाग उठता है, मेरा रोम-रोम
मांगते हुए सागर भर पानी, छटपटाता रहता है ।
बालों के अरण्य में अपनी बेचैन उंगलियां,
उंगलियों की दाह
मुझमें सिर से पांव तक अंगार भरकर,
खेलता है उछालने-लपकने का खेल!
उन पलों में मेरी आधी-अधूरी देह
उस मर्द का तन-बदन कर डालती है चकनाचूर,
मांगते हुए नदी भर पानी, छटपटाता रहता है ।
सिरहाने पूस की पूर्णिमा !
रात बैठी रहती है जगी-जगी
उसकी गोद में सिर रखकर,
करके मुझे उत्तप्त,
बनाकर मुझे अंगार
नपुंसक-नामर्द सो जाता है बेसुध!
उन पलों में मेरी समूची देह में जगी-जगी प्यास,
उस सोए हुए मर्द की मुर्दा देह छूकर,
मांगते हुए बून्द भर पानी, रोती रहती है ।
~ तसलीमा नसरीन
Nov 18, 2012| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
तसलीमा नसरीन (बांग्ला:তসলিমা নাসরিন) एक बांग्लादेशी लेखिका हैं जो नारीवाद से संबंधित विषयों पर अपनी प्रगतिशील विचारों के लिये चर्चित और विवादित रही हैं। बांग्लादेश में उनपर जारी फ़तवे की वजह से आजकल वे कोलकाता में निर्वासन की ज़िंदगी बिता रही हैं। हालांकि कोलकाता में विरोध के बाद उन्हें कुछ समय के लिये दिल्ली और उसके बाद फिर स्वीडन में भी समय बिताना पड़ा है लेकिन इसके बाद जनवरी २०१० में वे भारत लौट आईं। उन्होंने भारत में स्थाई नागरिकता के लिये आवेदन किया है लेकिन भारत सरकार की ओर से उस पर अब तक कोई निर्णय नहीं हो पाया है। स्त्री के स्वाभिमान और अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए तसलीमा नसरीन ने बहुत कुछ खोया। अपना भरापूरा परिवार, दाम्पत्य, नौकरी सब दांव पर लगा दिया। उसकी पराकाष्ठा थी देश निकाला।
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