आहट-सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए, तो लगता है कि तुम हो
रास्ते के धुंधलके में किसी मोड़ पे,कुछ दूर
इक लौ-सी चमक जाए, तो लगता है कि तुम हो
सन्दल से महकती हुई पुरकैफ हवा का
झोंका कोई टकराए, तो लगता है कि तुम हो
ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
नदी कोई बल खाए, तो लगता है कि तुम हो
जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर
चुपचाप से सो जाए, तो लगता है कि तुम हो
~ जाँ निसार अख़्तर
Feb 26, 2012| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh

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