
शूद्रक के मशहूर नाटक मृच्छकटिक (मिट्टी की गाड़ी) में दो बहुत सुन्दर सुभाषित हैं:
रे रे चातक सावधान मनसा मित्रं क्षणं श्रूयताम्।
अम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेति नैताद्रशाः।।
केचिद् वृष्टिभिराद्रयन्ति वसुधा केचिद् गर्जन्ति वृथा।
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरता मा ब्रूहि दीनं वचः।।
हे चातक (पपीहा) सावधान होकर एक क्षण के लिये मेरी बात सुनो। आकाश में बहुत से बादल होते हैं किनतु सभी समान नहीं होते हैं। किन्हीं की वर्षा से पृथ्वी गीली हो जाती है और कुछ व्यर्थ ही गरजते हैं। इस लिये जिस जिस को देखते हो उन सभी के सामने दीन वचन न बोलो।
रहीम:
रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखौ गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब बाँटि न लेहै कोय।।
रहीम कहते हैं कि अपने मन की व्यथा अपने ही मन में रखो क्योंकि सुन कर लोग केवल हँसी उड़ायेंगे और तुम्हारा कष्ट कोई नहीं बाँटेगा।
सुखं हि दुःखाय अनुभूय शोभते घनांधकारेमिव दीपदर्शनम्।
सुखात् यो याति नरो दरिद्रतां धृत: शरीरेण मृत: स जीवति।।
सुख का अनुभव दुःख के अनुभव के बाद ज्यादा गहराई से होता है जैसे घने अँधेरे में दीपक की रोशनी ज्यादा भली लगती है किन्तु जो सुख के बाद गरीबी में जाता है वह शरीर धारण किये हुए भी मरे हुए की तरह जीता है।
बढ़त बढ़त सम्पति सलिल मन सरोज बढ़ि जाय।
घटत घटत पुनि ना घटै तब समूल कुम्हिलाय।।
सम्पत्ति रूपी पानी के बढ़ने पर मन रूपी कमल बढ़ जाता है। सम्पत्ति के घटने पर यह कमल घट नहीं पाता और जड़ के सहित कुम्हला जाता है।
~ सुभाष
Jan 1, 2012| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
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