
स्नेह-निर्झर बह गया है!
रेत ज्यों तन रह गया है।
अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा,
श्याम तृण पर बैठने को निरुपमा।
बह रही है हृदय पर केवल अमा;
मै अलक्षित हूँ; यही
कवि कह गया है।
*पुलिन=नदी/सागर का किनारा; प्रियतमा=प्रेयसी; श्याम तृण=गहरी घास;
अमा = विंध्याचल पर्वत पर एक ऊँचा स्थान जहाँ से सोन और नर्मदा नदियाँ निकलती हैं।
अलक्षित = जो दिखाई न दे
अमा = विंध्याचल पर्वत पर एक ऊँचा स्थान जहाँ से सोन और नर्मदा नदियाँ निकलती हैं।
अलक्षित = जो दिखाई न दे
आम की यह डाल जो सूखी दिखी
कह रही है- "अब यहाँ पिक या शिखी
नहीं आते पंक्ति मैं वह हूँ लिखी
नहीं जिसका अर्थ -
'जीवन दह गया है।'
*पिक = कोयल, शिखी = मयूर
दिए हैं मैंने जगत को फूल फल
किया है अपनी प्रभा से चकित चल
पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल
ठाठ जीवन का वही
जो ढह गया है।
*अनश्वर=नष्ट हो जाने वाला; पल्लवित = जिसमें नए नए पत्ते निकले हों);
~ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
Feb 19, 2012| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
किया है अपनी प्रभा से चकित चल
पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल
ठाठ जीवन का वही
जो ढह गया है।
*अनश्वर=नष्ट हो जाने वाला; पल्लवित = जिसमें नए नए पत्ते निकले हों);
~ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
Feb 19, 2012| e-kavya.blogspot.com
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