शम्मअ़-ए-अन्जुमन (महफ़िल का दीपक - सुन्दरी)
मैं ज़िन्दगी की हर-इक साँस को टटोल चुकी
मैं लाख बार मुहब्बत के भेद खोल चुकी
मैं अपने आपको तनहाइयों में तोल चुकी
मैं जल्वतों में सितारों के बोल बोल चुकी
-मगर कोई भी न माना
*जल्वतों में=सबके सामने
वफा़ के दाम बिछाए गए क़रीने से4
मगर किसी ने भी रोका न मुझको जीने से
किसी ने जाम चुराए हैं मेरे सीने से
किसी ने इत्र निचोड़ा मेरे पसीने से
-किसी को ग़ैर न जाना
*दाम=जाल; क़रीने से=सुरीति से
मेरी नज़र की गिरह खुल गई तो कुछ भी न था
जो बाज़ुओं में कहीं तुल गई तो कुछ भी न था
मेरे लबों से शफ़फ़ धुल गई तो कुछ भी न था
जवाँ रही, सो रही, घुल गई तो कुछ भी न था।
-कि लुट चुका था ख़ज़ाना
*लबों से=होंठों से; शफ़फ़=उषा की लाली
रही न साँस में ख़ुशबू तो भाग फूट गए
गया शबाब तो अपने पराए छूट गए
कोई तो छोड़ गए कोई मुझको लूट गए
महल गिरे सो गिरे, झोंपडे भी टूट गए
-रहा न कोई ठिकाना
*शबाब=यौवन
~ क़तील शिफ़ाई
Feb 29, 2012| e-kavya.blogspot.com
Submitted by: Ashok Singh
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