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Thursday, April 2, 2015

सखी पिया को जो मैं न देखूँ



सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अंधेरी रतियाँ
के' जिनमें उनकी ही रोशनी हो कहीं से ला दो मुझे वो अँखियाँ।

दिलों की बातें दिलों के अंदर ज़रा-सी ज़िद से दबी हुई हैं
वो सुनना चाहें ज़ुबाँ से सब कुछ मैं करना चाहूँ नज़र से बतियाँ।

ये इश्क़ क्या है ये इश्क़ क्या है ये इश्क़ क्या है ये इश्क़ क्या है
सुलगती-साँसे तरसती-आँखें मचलती-रूहें धड़कती-छतियाँ।

उन्हीं की आँखें उन्हीं का जादू उन्हीं की हस्ती उन्हीं की ख़ुशबू
किसी भी धुन में रमाऊँ जियरा किसी दरस में पिरो लूँ अँखियाँ।

मैं कैसे मानूँ बरसते नैनो के' तुमने देखा है पी को आते
न काग बोले न मोर नाचे न कूकी कोयल न चटखीं कलियाँ ।

~ आलोक श्रीवास्तव



  Oct 9, 2012| e-kavya.blogspot.com
  Submitted by: Ashok Singh

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