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Sunday, April 5, 2015

अगर आदमी ख़ुद से हारा न होता




अगर आदमी ख़ुद से हारा न होता ,
ख़ुदा को किसी ने पुकारा न होता !

कहां आसमां पर ख़ुदा बैठ जाता ,
जो हम ने ज़मीं पर उतारा न होता !

बदलता नहीं वक़्त यह रंग अपने ,
किसी आदमी का गुज़ारा न होता !

नहीं ख़्वाब कोई हक़ीक़त में ढ़लता ,
जो दस्ते-जुनूं ने सँवारा न होता !

बुझानी अगर आग आसान होती ,
किसी राख में फिर अँगारा न होता !

कहीं पर भी होती अगर एक मंज़िल ,
तो गर्दिश में कोई सितारा न होता !

ये सारे का सारा जहां अपना होता ,
अगर यह हमारा तुम्हारा न होता !

~ मधुभूषण शर्मा 'मधुर'

   May 17, 2012| e-kavya.blogspot.com
   Submitted by: Ashok Singh

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