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Saturday, November 29, 2014

हासिल-ऐ-बहार हो तुम



शगुफ्तगी का लताफत का शाहकार हो तुम,
फ़क़त बहार नहीं हासिल-ऐ-बहार हो तुम,
*शगुफ्तगी=शालीन; लताफत=तरो-ताजगी; शाहकार=उत्कृष्ट कृति;

जो इक फूल में है कैद वो गुलिस्तान हो,
जो इक कली में है पिन्हाँ वो लालाज़ार हो तुम।
*लालाजार=बागान; पिन्हाँ=छुपा हुआ
 
हलावतों की तमन्ना, मलाहतों की मुराद,
ग़रूर कलियों का कलियों का इंकसार हो तुम,
*हलावतों=लजीज़; मलाहतों=सलोनापन, सुंदरता; इंकसार=विनम्रता

जिसे तरंग में फितरत ने गुनगुनाया है,
वो भैरवी, वो दीपक, वो मल्हार हो तुम ।
 

तुम्हारे जिस्म में ख्वाबीदा हैं हजारों राग,
निगाह छेड़ती है जिसको वो सितार हो तुम,

जिसे उठा न सकी जुस्तजू वो मोती हो,
जिसे न गूँथ सकी आरज़ू वो हार हो तुम।
 

जिसे न बूझ सका इश्क़ वो पहेली हो,
जिसे समझ न सका प्यार वो प्यार हो तुम
 

खुदा करे किसी दामन में जज़्ब हो न सके
ये मेरे अश्क-ऐ-हसीं जिन से आशकार हो तुम

*आशकार=ज़ाहिर करना

~
क़ैफी आज़मी

   April 15, 2013|e-kavya.blogspot.com
   Submitted by: Ashok Singh

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