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Friday, November 28, 2014

कहो तो लौट जातें हैं…



कहो तो लौट जातें हैं…
 
अभी तो बात लम्हों तक है, सालों तक नहीं आई
अभी मुस्कानों की नौबत भी नालों तक नहीं आई
अभी तो कोई मज़बूरी ख़यालों तक नहीं आई
अभी तो गर्द पैरों तक है, बाँलों तक नहीं आई
चलो एक फैसला करने शजर की और जाते हैं|
कहो तो लौट जातें हैं…
*शजर=दरख्त

अभी काजल की डोरी सुर्ख़ गालों तक नहीं आई
ज़बाँ दाँतों तलक है ज़हर प्यालों तक नहीं आई
अभी तो मस्क-ए-कस्तूरी ग़ज़ालों तलक नहीं आई
अभी रुदाद-ए-बे-उन्वाँ हमारे दर्मियाँ है,
दुनियावालों तक नहीं आई
कहो तो लौट जातें हैं…

*मस्क-ए-कस्तूरी=कस्तूरी नर हिरन की खुशबू; ग़ज़ालों=हिरन; रुदाद-ए-बे-उन्वाँ=कहानी का शीर्षक

अभी नज़दीक है घर, और मंजिल दूर है अपनी,
मुबादा नार हो जाए, ये हस्ती नूर है अपनी
कहो तो लौट जातें हैं…

*मुबादा नार=(प्यार की) चिंगारी भड़काना

मेरे बारे न कुछ सोचो, 
मुझे तय करना आता है, रसन का, दार का रस्ता…
ये आसीबों भरा रस्ता, ये अंधी घार का रस्ता
तुम्हारा नर्म-ओ-नाज़ुक हाथ हो अगर मेरे हाथों में,
तो मैं समझूँ के जैसे दो जहाँ है मेरी मुट्ठी में
तुम्हारा कुर्ब हो तो मुश्किलें काफूर हो जाएँ
ये अन्धें और काले रास्तें पुर-नूर हो जाएँ
तुम्हारे गेसुओं के छावँ मिल जाए,
तो सूरज से उलझना बात ही क्या है
उठा लो अपना साया तो मेरी औक़ात ही क्या है

*रसन=रस्सी; दार=फांसी; असाबों=बेचैनी; घार=खोह; कुर्ब=नजदीकी; पुर-नूर=रोशनी से भरे हुये; गेसुओं=ज़ुल्फों

मेरे बारे न कुछ सोचो, 
तुम अपनी बात बतलाओ
कहो तो चलते रहतें हैं, 
कहो तो लौट जातें हैं|

~ वसी शाह
 
   May 10, 2013  | e-kavya.blogspot.com
   Submitted by: Ashok Singh 


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