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Saturday, November 29, 2014

माँ! यह वसंत ऋतुराज री !



आया लेकर नव साज री !
मह-मह-मह डाली महक रही
कुहु-कुहु-कुहु कोयल कुहुक रही
संदेश मधुर जगती को वह
देती वसंत का आज री !
माँ! यह वसंत ऋतुराज री !

गुन-गुन-गुन भौंरे गूंज रहे
सुमनों-सुमनों पर घूम रहे
अपने मधु गुंजन से कहते
छाया वसंत का राज री !
माँ! यह वसंत ऋतुराज री !

मृदु मंद समीरण सर-सर-सर
बहता रहता सुरभित होकर
करता शीतल जगती का तल
अपने स्पर्शों से आज री !
माँ! यह वसंत ऋतुराज री !

फूली सरसों पीली-पीली
रवि रश्मि स्वर्ण सी चमकीली
गिर कर उन पर खेतों में भी
भरती सुवर्ण का साज री !
मा! यह वसंत ऋतुराज री !

माँ ! प्रकृति वस्त्र पीले पहिने
आई इसका स्वागत करने
मैं पहिन वसंती वस्त्र फिरूं
कहती आई ऋतुराज री !
माँ! यह वसंत ऋतुराज री !

~ द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी


   March 24, 2013 | e-kavya.blogspot.com
   Ashok Singh

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