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Saturday, November 29, 2014

खुल के मिलने का सलीक़ा



खुल के मिलने का सलीक़ा आपको आता नहीं
और मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं

वो समझता था उसे पाकर ही मैं रह जाऊंगा
उसको मेरी प्यास की शिद्दत का अन्दाज़ा नहीं

जा दिखा दुनिया को मुझको क्या दिखाता है ग़रूर
तू समन्दर है तो हो मैं तो मगर प्यासा नहीं

कोई भी दस्तक करे आहट हो या आवाज़ दे
मेरे हाथों में मेरा घर तो है दरवाज़ा नहीं

अपनों को अपना कहा चाहे किसी दर्जे के हों
और अब ऐसा किया मैंने तो शरमाया नहीं

उसकी महफ़िल में उन्हीं की रौशनी जिनके चराग़
मैं भी कुछ होता तो मेरा भी दिया होता नहीं

तुझसे क्या बिछड़ा मेरी सारी हक़ीक़त खुल गयी
अब कोई मौसम मिले तो मुझसे शरमाता नहीं

~ वसीम बरेलवी


   March 14, 2013 | e-kavya.blogspot.com
   Ashok Singh

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