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Wednesday, November 26, 2014

अजब तर्कीब से साने ने



अजब तर्कीब से साने ने रख्खी है बिना इस की
कि सदिया हो गयी इक ईंट भी इसकी नहीं खिसकी
लगी रहती है आमद-रफ़्त जिसमें रोज़ जिस-तिस की
वही रौनक है जिसकी और वही दिलचस्पियाँ जिसकी
यह दुनिया या इलाही !जल्वा गाह-ए-नाज़ है किस की
हज़ारो उठ गये ,रौनक़ वही है आज तक इस की

*साने=बनाने वाला; बिना=आधार
*आमद-रफ़्त=आने और जाने की क्रिया

~ नादिर काकोरवी

   July 18, 2013

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