Disable Copy Text

Wednesday, November 26, 2014

अलि रचो छंद

 
आज कण-कण कनक कुंदन
आज तृण-तृण हरित चंदन
आज क्षण-क्षण चरण वंदन
विनय अनुनय लालसा है
आज वासन्ती उषा है
अलि रचो छंद

आज आई मधुर बेला
अब करो मत निठुर खेला
मिलन का हो मधुर मेला
आज अधरों में तृषा है
आज वासंती उषा है
अलि रचो छंद

मधु के मधु ऋतु के सौरभ के
उल्लास भरे अवनी नभ के
जड़-जीवन का हिम पिघल चले
हो स्वर्ण भरा प्रतिचरण मंद
अलि रचो छंद

~ -सोहनलाल द्विवेदी

   July 14, 2013

No comments:

Post a Comment