
लिखी है नाम यह किसके,
तुम्हारी उम्र बासंती?
अधर पर रेशमी बातें,
नयन में मखमली सपने ।
लटें उन्मुक्त सी हो कर,
लगीं ऊँचाइयाँ नपनें।
शहर में हैं सभी निर्धन,
तुमहीं हो सिर्फ धनवंती ।
तुम्हारा रूप अंगूरी
तुम्हारी देह नारंगी ।
स्वरों मेँ बोलती वीणा,
हँसी जैसे कि सारंगी ।
मुझे डर है न बन जाओ
कहीं तुम एक किंवदंती ।
तुम्हें यदि देख ले तो,
ईर्ष्या वो उर्वशी कर ले ।
झलक यदि मेनका पा ले,
तो समझो ख़ुदकुशी कर ले ।
कहो तो प्यार से रख दूँ,
तुम्हारा नाम वैजयंती ।
धवल सी देह के आगे
शरद का चाँद भी फीका ।
सुकोमल गाल पर का तिल,
नज़र का लग रहा टीका ।
तुम्हारा कौन राजा 'नल'
बताओ आज 'दमयंती' ।
लिखी है नाम यह किसके,
तुम्हारी उम्र बासंती?
~ दिनेश प्रभात
Oct. 24, 2013
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