
इक गीत लिखने बैठा था मैं कल पलाश का।
ये बात सुन के हँस पडा़ जंगल पलाश का ।
साखू को बे-लिबास जो देखा तो शर्म से,
धरती ने सर पे रख लिया आँचल पलाश का।
रितुराज के ख़याल में गुम होके वन-परी,
कब से बिछाये बैठी है मख़मल पलाश का।
सूरज को भी चराग़ दिखने लगा है अब,
बढ़ता ही जा रहा है मनोबल पलाश का।
रंगे-हयात है कि है मौसम का ये लहू,
या फ़िर किसी ने दिल किया घायल पलाश का।
तनहा सफ़र था राह के मंजर भी थे उदास,
अच्छा हुआ कि मिल गया संबल पलाश का।
’मेयार’ इन्कलाब का परचम लिये हुए,
उतरा है आसमान से ये दल पलाश का।
~ मेयार सनेही
July 11, 2013
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