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Sunday, November 23, 2014

ख़ुदा करे कि मोहब्बत में



ख़ुदा करे कि मोहब्बत में ये मक़ाम आए
किसी का नाम लूँ लब पे तुम्हारा नाम आए।

कुछ इस तरह से जिए ज़िन्दग़ी बसर न हुई
तुम्हारे बाद किसी रात की सहर न हुई
सहर नज़र से मिले ज़ुल्फ़ ले के शाम आए।

ख़ुद अपने घर में वो मेहमान बन के आए हैं
सितम तो देखिए अनजान बन के आए हैं
हमारे दिल की तड़प आज कुछ तो काम आए।

वही है साज़ वही गीत है वही मंज़र
हर एक चीज़ वही है नहीं है तुम वो मगर
उसी तरह से निग़ाहें उठें, सलाम आए।

~ तस्लीम फाज़्ली

   Sept 30, 2013

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