बहुधन लै अहसान सौं, पारो देत सराहि।
बैद-वधू हसि भेद सौं, रही नाहि मुँह चाँहि।।
(स्वयं वैद्यराज जी नपुंसक हैं किन्तु ग्राहक को ठगने के लिए पारे की भस्म देकर उसे मर्दानगी देना चाहते हैं। वैद्य-पत्नी यह देखकर मन ही मन हँसती है।)
~ बिहारी
July 7, 2013
बैद-वधू हसि भेद सौं, रही नाहि मुँह चाँहि।।
(स्वयं वैद्यराज जी नपुंसक हैं किन्तु ग्राहक को ठगने के लिए पारे की भस्म देकर उसे मर्दानगी देना चाहते हैं। वैद्य-पत्नी यह देखकर मन ही मन हँसती है।)
~ बिहारी
July 7, 2013
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