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Wednesday, November 26, 2014
पंछी में गाने का गुन है
पंछी में गाने का गुन है
दो तिनके चुन कर
वह तृप्त जहाँ होता है
गीतों की कड़ियाँ
बोता है !......
कँटीली टहनी, सूखे पेड़
बियावान, सुनसान
उसे नहीं तन में
चुभी हुई है
कोई वंशी
उसके रोम-रोम में
सुरवाले मीठे सपने पलते हैं !
~ रवीन्द्र भ्रमर
July 8, 2013
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