
खुशबुओं से तरबतर हूँ आजकल,
और खुद से बाखबर हूँ आजकल.
देख लेता हूँ हर इक लम्हे को मैं ,
मैं नज़र की भी नज़र हूँ आजकल.
सर पे चढ़ के जो कभी उतरे नहीं,
उस नशे का ही असर हूँ आजकल.
जिसके ऊपर छत न नीचे है ज़मीं,
उस बसेरे का बसर हूँ आजकल.
हर परिंदे को समेटूं बांह में,
एक ऐसा ही शजर हूँ आजकल.
~ सुरेन्द्र सुकुमार
Oct. 20, 2013
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