Disable Copy Text

Sunday, November 23, 2014

बिजली चमकी


शहर में रात:-

बिजली चमकी, पानी गिरने का डर है
वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर है

वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा
वह क्या है जो दिखता है धुँआ-धुआँ-सा

वह क्या है हरा-हरा-सा जिसके आगे
हैं उलझ गए जीने के सारे धागे

यह शहर कि जिसमें रहती है इच्छाएँ
कुत्ते भुनगे आदमी गिलहरी गाएँ

यह शहर कि जिसकी ज़िद है सीधी-सादी
ज्यादा-से-ज्यादा सुख सुविधा आज़ादी

तुम कभी देखना इसे सुलगते क्षण में
यह अलग-अलग दिखता है हर दर्पण में

साथियों, रात आई, अब मैं जाता हूँ
इस आने-जाने का वेतन पाता हूँ

जब आँख लगे तो सुनना धीरे-धीरे
किस तरह रात-भर बजती हैं ज़ंजीरें

~ केदारनाथ सिंह

   Sept 27, 2013

No comments:

Post a Comment